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मंगलवार, 15 अगस्त 2017

ऊँची उड़ान पर हैं सारे कबूतर सीख कर करना बन्द पंख उड़ते समय

किसी
से उधार
ली गई
बैसाखियों
पर करतब
दिखाना
सीख लेना

एक दो
का नहीं
पूरी एक
सम्मोहित
भीड़ का

काबिले
तारीफ ही
होता है

सोच के
हाथ पैरों को
आराम देकर

खेल खेल
ही में सही

बहुत दूर के
आसमान
को छू लेने
का प्रयास

अकेले नहीं
मिलजुल कर
एक साथ

एक मुद्दे
चाँद तारे
उखाड़ कर
जमीन पर
बिछा देने
को लेकर

सोच का
बैसाखी लिये
सड़क पर
चलना दौड़ना

नहीं जनाब
उड़ लेने
का जुनून

साफ नजर
आता है आज

बहुत बड़ी
बात है
त्याग देना
अपना
सब कुछ

अपनी खुद
की सोच
को तक

तरक्की के
उन्माँद की
खुशी व्यक्त
करना
बहुत जरूरी
होता है ‘उलूक’

त्यौहारों के
उत्सवों को
मनाते हुऐ

अपने पंखों
को बन्द कर
उड़ते पंछियों
को एक ऊँची
ऊड़ान पर
अग्रसर होते
देख कर।

चित्र साभार: NASA Space Place

शनिवार, 12 अगस्त 2017

बस एक कमेटी बना मौत के खेल को कोढ़ के खेल पर ले आ

कहा था
कोढ़ फैला

कोढ़
समझ में
नहीं आया तेरे
मौत फैला आया

आक्सीजन से
कोढ़ भी हो
सकता था
तुझे पता
नहीं था

मौत देने की
क्या जरूरत थी

आक्सीजन
से कोढ़
समझ में
नहीं आ
रहा होगा

होता है

कुछ भी
सम्भव है
किसी चीज
से कुछ भी
हो सकता है

कैसे हो
सकता है


अखबार
वालों से
रेडियो
वालों से
टी वी
वालों से
समबन्ध कुछ
अच्छे बना

समबन्ध
मतलब
वही जो
घर में घर
के लोगों से
घर के जैसे
होते हैं

चिन्ता करने
की जरूरत
नहीं है

अब कर दिया
तो कर दिया
हो गया
तो हो गया

ऐसा कर
अब कमेटी
एक बना

कमेटी में
उन सब को
सदस्य बना
जिनको मौत
समझ में
नहीं आती है
बस कोढ़
समझ में
आता है

कोढ़ का
मतलब
उस बीमारी
से नहीं है
जिसमें शरीर
गलता है थोड़ी सी
आत्मा को गला

कई जगह
कई आत्माएं
सामने सामने
गलती बहती
हुई दिखती हैं
बहुत मौज
में होती हैं

जब कोढ़
हो जाना
या कोढ़ी
कहलाया जाना
किसी जमाने से
सम्मान की बात
हो चुकी होती है

‘उलूक’ को
खुजली होती
ही रहती है
उसकी खुजली
पर मत जा

कोढ़ और कोढ़ी
उन्मूलन के
खिलाफ
कुछ मत बता

बस कुछ
रायता फैला
कुछ दही
कुछ खीरा
अलग कर
और
कुछ नमक
कुछ मसाला
फालतू का मिला

खुद भी खा
कमेटी को
भी कुछ खिला।


चित्र साभार: Weymouth Drama Club

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

बेहयाई से लिखे बेहयाई लिखे माफ होता है

लहर कब उठेगी
पता नहीं होता है
जरूरी नहीं
उसके उठने के
 समय हाथ में
किसी के
कैमरा होता है

शेर शायरी
लिखने की बातें
हैं शायरों की
ऐसा सभी सुनते हैं
बहुतों को पता होता है

बहकती है सोच
जैसे पी कर शराब
सोचने वाला
पीने पिलाने की
बस बातें
सोचता रहता है

कुछ आ रहा
था मौज में
लिख
देना चाहिये
सोच कर
लिखना
शुरु होता है

सोच कब
मौज में आयी
सोचा हुआ कब
बह गया होता है
किसे पता होता है

रहने दे चल
कुछ फिर और
डाल साकी
सोच के गिलास में

शराब और गिलास
का रिश्ता अभी
भी बचा है
कोई गिला कोई
शिकवा नहीं
बताता है
अखबार वाला भी
कभी पढ़ने में
सुनने में ऐसा
आया भी
नहीं होता है

‘ऊलूक’ की
आदत है
इधर की
उधर करने की

जैसा कहावतों
में किसी की
आदत के लिये
कहा होता है

रोज लिखना
शरीफों
की खबर
ठीक भी
नहीं होता है

किसी दिन
शरीफों के
मोहल्ले में
शराफत से
कुछ नहीं
बोल देना भी
ठीक होता है।

चित्र साभार: Shutterstock

सोमवार, 31 जुलाई 2017

काला पूरा काला सफेद पूरा सफेद अब कहीं नहीं दिखेगा

शतरंज की
काली सफेद
गोटियाँ
अचानक
अपने डिब्बे
को छोड़ कर
सारी की सारी
बाहर हो गयी हैं

दिखा रही हैं
डिब्बे के
अन्दर साथ
रहते रहते
आपस में
हिल मिल कर
एक दूसरे में
खो गयी हैं

समझा
रही हैं
तैयार हैं
खुद ही
मैदान में
जाने के लिये

आदेशित
नहीं की
गयी हैं
विनम्र
होते होते
खुद ही
निर्देशित
हो गयी हैं

कुछ काली
कुछ सफेद के
साथ इधर
की हो गयी हैं
कुछ सफेद
कुछ काली के
साथ उधर
को चली गयी हैं

अपने खेल
गोटियाँ अब
खुद खेलेंगी
चाल चलने
वालों को
अच्छी तरह से
समझा गयी हैं

घोड़े ऊँठ
और हाथी
पैदल वजीर
के साथी
सोचना छोड़ दें
पुराना खेल
खेलने के आदी

हार जीत
की बात
कोई नहीं
करेगा
भाईचारे के
खेल का
भाईचारा
भाई का भाई
अपने अखबार में
कम्पनी के लिये नहीं
खिलाड़ियों के
लिये ही
बस और बस
लिखता
हुआ दिखेगा

खेल का
मैदान भी
काले सफेद
खानों में
नहीं बटेगा

आधे
सफेद खाने
के साथ आधा
काला खाना भी
बराबरी के साथ
कंधे से कंधा
मिलाता
हुआ दिखेगा

 जातिवाद
क्षेत्रवाद
आतंकवाद
इसी तरह से
खेल खेल में
शतरंज के
खेल को
उसी की
गोटियों के हाथ
स्वतंत्रता के साथ
खेलने देने के हक
दे डालने के बाद
से मिटता हुआ
अपने आप दिखेगा

‘उलूक’
समझ ले
हिसाब किताब
पीछे पीछे कुछ भी
नहीं अब चलेगा

इस सब
के बाद
काला काले
के लिये ही
और सफेद
सफेद के
लिये ही नहीं

काला सफेद
के लिये और
सफेद काले
के लिये भी
आसानी से
सस्ते दामों में
खुली बाजार में
बिकता हुआ दिखेगा ।

चित्र साभार: 123RF.com

रविवार, 23 जुलाई 2017

अपना सच कह देना अच्छा है ताकि सनद रहे

बहुत अच्छा
लगता है

जब अपने
मोहल्ले की
अपनी गली में

अपने जैसा ही
कोई मिलता है
अपनी तरह का
अपने हाथ
खड़े किये हुऐ

उसे भी
वो सब
पता होता है
जितना तुम्हें
पता होता है

ना तुम
कुछ कर
पाते हो
ना वो
कुछ कर
सकता है

हाँ
दोनों की
बातों की
आवृति
मिलती है
दो सौ
प्रतिशत

फलाँ
चोर है
फलाँ
बिक
गया है
फलाँ
बेच
रहा है
फलाँ
बेशरम है

हाँ
हो रहा है
पक्का

अजी
बेशरमी से
शरम है
ही नहीं

लड़कियों
को फंसा
रही है वो

बहुत
गन्दे खेल
चल रहे हैं

नाक ए है
कहते हैं
आप लोग

ना जी ना
अखबार में
नहीं आ
सकती हैं
ये सब बातें

नौकरी का
सवाल हुआ

कोई नहीं
तुम अपने
अखबार में
लिखते रहो
अपने फूलों
के लड़ने
की खबरें
उनकी
खुश्बुओं
पर खुश्बू
छिड़क कर

हम तो
लिखते
ही हैं
बीमार हैं

जरूरी है
लिखनी
अपनी
बीमारी
इलाज
नहीं है
कर्क
रोग का
जानते हुऐ

अच्छा लगा
मिलकर

दो भाइयों
का मिलन
हाथ खड़े
किये हुऐ ।

चित्र साभार: Shutterstock

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