http://blogsiteslist.com

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

कुत्ता हड्डी और इतिहास













कुछ दिन
अच्छा होता है
नहीं देखना
कुछ भी
अपनी आँखों से
दिख रहे
सब कुछ में

कुछ दिन
अच्छा होता है
देखना
वो सब कुछ

जो सब को दिखाई
दे रहा होता है
उनके अपने चारों ओर
उनकी अपनी आँखों से

रोज अपने अपने
दिखाई दे रहे को
दिखाने की होड़ में

दौड़ लगा रहे
देखे गये बहुत कुछ में
आँखें बन्द कर
देख लेने वालों का
देखा हुआ

रायते की तरह
फैला देना सबसे
अच्छा होता है

जिसकी आँख से
सब देखना शुरु
कर दिये होते हैं
वो ईश्वर हो
चुका होता है

गाँधी बहुत बौना
हो चुका होता है
अपनी लाठी पकड़े हुऐ

उसको गाली देता
एक लोफर गली का
एक झंडा लिये
अपने हाथ में एक
बेरंगे हो गये रंग का
समय हो चुका होता है

‘उलूक’
समय खोद
रहा होता है
समय को समझने
के लिये

समय इतिहास
हो गया होता है

ऐसा इतिहास
जिसमें एक
कुत्ते का
गड्ढा खोदना
और
उसमें उसका
एक हड्डी दबाना
ही बस इतिहास
हो गया होता है |

चित्र साभार: Digging
 cliparts

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

बस ज्ञानी हिंदू ही पढ़ें समझ में आ जाये तो लाईक भी करें फिर फार्वर्ड भी करें

सारे शिव
डरपोक
हलाहल
गटके हुऐ
गले गले
नीले पड़े
दिखा रहे हैं
साँपों को

समझा रहे हैं
साँपों को
शाँत रहें
साँप बने रहें

सारे साँप
मौज में हैं
शिव के गले में
माला डाले हुए हैं

हर जगह
शिव ही शिव हैं
हर जगह
साँप ही साँप हैं

डस कोई
किसी को
नहीं रहा है

साँप साँप
के साथ है
और
रह रहा है

परेशान मेंढक
और चूहे हैं
इधर के
साँप से
भी डर है
उधर का साँप भी
निगलने को
तैय्यार है

यहाँ का साँप
वहाँ चला जाता है
बस एक खबर में
चला गया है
कोई बताता है

वहाँ का साँप
यहाँ चला आता है
किसी को कोई
फर्क नहीं
पड़ पाता है

साँप चूहे
छुछूँन्दर
के खेल में
कब कौन साँप
कौन चूहा
कौन छुछून्दर
हो जाता है

‘उलूक’
देखता है
समझता है
बस जानवर
जानवर खेल
नहीं पाता है

आदमी हो लेने
के प्रयास में
मायूस हो जाता है

साँप बना आदमी
आदमी को साँपों
की सोच से डराता है ।

चित्र साभार: Best Clip Art Images

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

सारे विश्व में सुना है मना रहे हैं मानसिक स्वास्थ दिवस आज पागल पागल खेलने का दिन है आ जाओ अब बाज

हिदायतें
दे रहें हैं
चिकित्सक
बहुत सारे
मुफ्त में ही
बेहिसाब

और दिन
का लिखना
अलग बात है
बहुत जरूरी है
लिखनी आज
मन की बात

उधर वो बात
दिमागी सेहत
की बता रहे हैं

खाने पीने को
ठीक रखना है
समझा रहे हैं

अकेलेपन से
निपटना है
भीड़ में
घर की ही सही

हिल मिल कर
कुछ इस तरह
से रहना है
बच्चों को भी
देखना है
बुजुर्गों को भी
थोड़ा बहुत
कुछ कहना है

व्यायाम
करना है
नकारात्मक
विचारों को
दिमाग में
नहीं भरना है
आत्मविश्वास
बनाये रखना है

पागल नहीं
हो रहे हैं
सोच कर
मन को
धैर्य दिलाये
रखना है

सोचिये
एक ही
दिन में
कितना
सारा
क्या क्या
करवाने
वो जा रहे हैं

इधर
नासमझ
लोग हैं
ये बात
वो कहाँ
समझ
पा रहे हैं

इतनी सी
छोटी बातों
को समझने
में ही आधी
जिन्दगी काट
कर यहाँ तक
चले आ रहे हैं

मानसिक रोग
को एक अकेला
नहीं समझ
पा रहा है

भीड़ की
हरकतें
देख कर
सामने खड़े
सभी लोगों
को पागल
बता रहा है

रोज
देखता है
सुनता है
कर रही
होती है
भीड़ कुछ
पागलपन

लाचार दूर से
देखता तमाशा
महसूस कर
रहा होता है
कुछ नहीं
कर पा रहा है

बरसों से यही
सब देखता सुनता
समझता रहता है
पागलों के पागलपन
को लिखता जा रहा है

देखने आ
रही है भीड़
लिखे लिखाये को

एक पागल
लिख रहा है
पागलपन अपना

इधर
से लेकर
उधर तक
भीड़ में
बताया जा
रहा है

इलाज
किसका
होना चाहिये

आज के
विश्व मानसिक
स्वास्थ दिवस के दिन

‘उलूक’
बस यही बात
आज भी नहीं
समझ पा रहा है

इस
सब के
बावजूद
लेकिन

विश्व मानसिक
स्वास्थ दिवस
के संदेश
को लेकर
फिर भी
दो शब्द
लम्बे लम्बे
कर करा कर
यहाँ कुछ
आदतन लिख
कर जा रहा है ।

चित्र साभार: Mental Health Concern

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

यूँ ही हो गये पंद्रह लाख पद चिन्ह पन्ने पर आज ‘उलूक’ के हो गया कुछ पास उसके भी बेचने के लिये

यूँ हीं देख
लिया कर
कुछ कभी भी
बस देखने के लिये

जिंदगी
कट जाती है
उसकी भी
जिसने आँखे
ताड़ कर पूरे को
पूरा ही घूरा हो
अपनी आँखे
सेकने के लिये

यूँ हीं कह
दिया कर
कुछ भी कभी भी
बस फेंकने के लिये

पता कर
ही लेता है
पता करने वाला
अन्दर की बातें
सारी सामने
वाले की खुद
समेटने के लिये

यूँ ही झुक
लिया कर
थोड़ा सा
कभी भी
बस लपेटने
के लिये

आती हैं
कलाबाजियाँ जिसे

कर 
ही लेता
है मजबूर
दुश्मन को
घुटने
टेकने के लिये

यूँ ही लिख
लिया कर
कबाड़

कुछ भी
कभी भी
कहीं भी
भेजने के लिये

देखने
आते ही हैं
‘उलूक’
की हरकतें
कुछ लोग
हमेशा ही
देखने के लिये ।

चित्र साभार: Hypergrid Business

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

डाकिया डाकखाना छोड़ कर चिट्ठियाँ खुले आम खुले में खोल कर दिखा रहा है

शेरो शायरी
बहुत हो गयी
मजा उतना
नहीं आ रहा है

सुना है फिर से
चिट्ठियाँ लिखने
का चलन लौट
कर वापस
आ रहा है

कागज
कलम दवात
टिकट लिफाफे
के बारे में
पूछ रहा है कोई

कई दिनों से
इधर और उधर
के डाकखानों के
चक्कर लगा रहा है

चिट्ठियाँ
लिखना भेजना
डाकिये का पता
देख कर किसी
का घर ढूँढना
कितना होम वर्क
किया जा रहा है

बहुत जरूरी था
चिट्ठी लिखना
लिखवाना
समझ में भी
आ रहा है

फेस बुक
व्हाट्स अप
में अच्छी
तरह से
नहीं पीटा
जा रहा है

चिट्ठियाँ लिखी
जा रही हैं
उसके लिये
मुहूरत भी
निकाला
जा रहा है

बहस
नहीं होनी
चाहिये किसी मुद्दे पर
किसी विशेष दिन
समझ में आ रहा है

ध्यान भटकाना है
मुद्दे और दिन से
चिट्ठी लिखने की
सुपारी को

चिट्ठी
लिखवाने वाला
लिखने वाले
को उसी दिन
भिजवा रहा है

प्रेम पत्र नहीं
सरकारी
पत्र नहीं
कुशल क्षेम
पूछने में
शरमा रहा है

चिट्ठी प्यार का
संदेश नहीं
प्रश्नों का पुलिंदा
बनाया जा रहा है

चिट्ठी
लिख रहा है
लिखने वाला
लिफाफे में
बन्द कर
टिकट नहीं
लगा रहा है

डाकखाना
डाकिया की
बात कौन
किस से पूछे
‘उलूक’

लिखवाने वाला
गली मोहल्ले
सड़क की
दीवार पर
चिपका रहा है ।

चित्र साभार: Pinterest

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...