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शनिवार, 31 मार्च 2012

अर्थ आवर

मार्च महीने के अंतिम
सप्ताह का शनिवार
मानव को जाग्रत
करने का एक विचार
ऋतु परिवर्तन के बारे
में जागरूकता बढ़ाने
लोगों का ध्यान उनके
कर्मों की ओर दिलाने
वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर का
होता है कुछ खास प्रयोजन
करता है इस उपलक्ष्य में वो
हर वर्ष एक घटना का आयोजन
2007 में पहली बार
जागरूकों ने मनाया
सिडनी शहर के लोगों ने
एक अभियान चलाया
इस बार छटी बार
फिर से नंबर है आया
शाम आज 8:30 पर
हम को भी अलख जगाना है
जरूरी गैर जरूरी घर
और व्यव्साय की बत्तियों को
बस एक घंटे के लिये बुझाना है
इससे जल और उर्जा
हम बचा पायेंगे
साठ मिनट के अंधेरे से
भविष्य को रोशन कर पायेंगे
जलवायू परिवर्तन से हो रहे
पृथ्वी पर घावों को सहलायेंगे
अर्थ आवर के बारे में
सबको आज जरूर बतायेंगे
पूरे परिवार के साथ
अंधेरे का मजा उठायेंगे ।

रहम

 सुन !
मेरे को मत पका
कभी कुछ अच्छी
दो
बातें भी
तो ढूँढ के ला

गजल सुना
चुटकुला सुना

रंगीन नहीं है तो
ब्लैक एंड वाहिट
ही चल दिखा
कभी दिल्ली
में भटक जाता है
वहाँ नहीं चला पाता
तो देहरादून
आ जाता है

तेरा अपना
शहर तो जैसे

तुझे रोज ही 

काटने को आता है
कभी तो मुस्कुरा
दो बातें प्रेम की सुना
माना की बीबी की
डाँठ भी खाता है
पर कोई तेरी तरह
नहीं झल्लाता है
ज्यादा कचकच
लगाने वाला
अपने को मत बना
मान जा
कभी हमारे लिये
भी तो गा
तितलियाँ फूल
झरने देख के आ
उनके बारे में
आ के बता
स्कूल में बच्चों
को पढा़ता होगा
हमको तो मत पढ़ा
अनारकली आ रही है
आज टी वी में
क्या तुझे है पता
रोज लिखना
जरूरी है क्या
आज कविता
मत चिपका
हम पर रहम
थोड़ा सा खा ।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

देखता है क्या

कोई कुछ देखता है कोई कुछ देखता है
कोई कुछ भी कभी यहाँ नहीं देखता है।
तू जहर देखता है वो शहर देखता है
बैचेनी तुम्हारी कोई बेखबर देखता है।
कोई आता इधर है और उधर देखता है
कहता कुछ भी नहीं है अगर देखता है।
चमचा धीरे से आकर एक नजर देखता है
बताने को उसको एक खबर देखता है।
भटकना हो किस्मत तो कुवां देखता है
बंदा मासूम सा एक बस दुवा देखता है।
अपने सपनो को जाता वहाँ देखता है
उसके कदमों की आहट यहां देखता है।
सबको मालूम है कि वो क्या देखता है
हर कोई यहाँ नहीं एक खुदा देखता है।

गुरुवार, 29 मार्च 2012

अंत:विषय दृष्टिकोण

विद्यालय से लौट के
घर आ रहा हूँ
आज का एक
वाक्या सुना रहा हूँ
सुबह जब विद्यालय
के गेट पर पहुँचा
हमेशा मिलने वाला
काला कुत्ता
रोज की तरह
मुझपर नहीं भौंका
आज वो अपना मुँह
गोल गोल घुमा रहा था
मैंने उसकी तरफ
देख कर पूछा
ये क्या नया कर
रहे हैं जनाब
बोला मास्साब
तुम क्यों करते हो
मुझसे मजाक
मैं सूँड हिला हिला कर
मक्खियाँ भगा रहा हूँ
हाथी बनकर उसका
काम भी निभा रहा हूँ
असमंजस में मुझे
देख वो मुस्कुराया
थौडा़ सा किनारे की
ओर खिसक के आया
फिर मेरे कान में
धीरे से फुसफुसाया
तुम कैमिस्ट्री क्यों
नहीं पढ़ा रहे हो
रोज फालतू की
एक कविता
यहाँ चिपका रहे हो
जमाना बहुत आगे
आजकल जा रहा है
फिर तुम मेरे को पीछे
क्यों खिसका रहे हो
अंत:विषय दृष्टिकोण
क्या तुमको नहीं आता
इसमें वो बिल्कुल
नहीं है किया जाता
तुमको अच्छी
तरह है जो आता
और दूसरा उसको
अच्छी तरह है समझ जाता
तुम डाक्टर हो तो
स्कूल चले जाओ
मास्टर हो तो तबला
हारमोनियम बजाओ
समय के साथ नया
काम करते चले
जाना चाहिये
जो किसी की समझ
में नहीं आना चाहिये
पुराने कामों का बक्सा बना
कुवें में फेंक आना चाहिये
कल से किसी मुर्गे को
यहाँ काम पर लगवाइये
बाँग बिल्ली दे देगी
उससे यहाँ भौंकवाइये।

बुधवार, 28 मार्च 2012

सरकारी

सरकार की नौकरी
करने वाले
सरकारी नौकर
कहलाते हैं
गवर्नमेंट सर्वेंट
कहलाते हैं
सरकार बदलने से
कभी नहीं घबराते हैं
कुछ लोग जो
सरकारी नौकरी
में नहीं होते
वो भी यहाँ सरकारी
होना शुरु हो जाते हैं
देख रहा हूँ
पिछली भाजपा सरकार में
जो सरकारी हो गया था
वो कांंग्रेस की सरकार को
आता हुवा देख कर
कुछ दिन के लिये
बैक फुट पर चला गया था
इधर नयी सरकार को
बनने सवरने संभलने में
समय बीता जा रहा था
उधर वो अपनी कैंचुली का
ड्राईक्लीन करवा रहा था
पिछले साल नवसंवत्सर पर
वो घर पर गेरूवा
झंडा फहरा रहा था
इस बार पूछने पर
हैप्पी न्यू इयर
एक जनवरी को
कर चुका है
ये बता रहा था
कुछ कुछ अंदाज
मुझको भी
आ रहा था
क्योंकी प्रधानाचार्य
का कार्यकाल पूरा
होने जा रहा था
वो शुरू हो गया था
दूर की कोड़ी
पकड़ने को
अभी से
जा रहा था ।

मंगलवार, 27 मार्च 2012

खुदा और नजर।

नजर से नजर
मिलाता है
नजर की नजर
से मार खाता है

महफिल
वो इसीलिये
सजाता है
बुला के तुझको
वहाँ ले जाता है

नजरों के खेल का
इतना माहिर है
तुझे पता है
कितना शातिर है
तुझ को पता नहीं
क्या हो जाता है
चुंबक सा उसके पीछे
चला जाता है

सबको पहले से
ही बतायेगा
उसके इक इशारे
पे चला आयेगा
इस बार फिर से
महफिल सजायेगा
तुझको हमेशा की
तरह बुलायेगा

सब मिलकर
नजर से नजर
मिलायेंगे
तुझे कुछ
भी नहीं
कभी बतायेंगे
तुझको तेरी
नजर से
गिरायेंगे
पर तू तो
खुदा हो
जाता है
खुदा
कहां नजर
बचाता है
मिला कर
नजर
मिलाता है।

सोमवार, 26 मार्च 2012

लड़की भाग गयी

एक लड़की बरतन धो
के परिवार चलाती है
गाँव के उसी घर से एक लड़की
एक लड़के के साथ भाग जाती है
खाने के जुगाड़ में बाप
हाड़ तोड़ता चला जाता है
पता नहीं बच्ची के हाथ में
मोबाइल क्यों दे जाता है
पहाड़ के बच्चों में एक
नया खेल चल रहा है
मोबाइल रखना और
मोटरसाईकिल पे चलना नये
भारतीय मूल्यों की
रामायण रच रहा है
दो कदम चल नहीं सकते
पहाड़ के नौनीहाल
जो कभी सेना में जाते थे
मेडिकल मे अन्फिट हो रहे है
वो जो गुटका खाते थे
लड़के मोटरसाईकिल
लड़किया स्कूटी में ही जाते हैं
घर के नीचे से उसमें
वो सब्जी लाते हैं
दो किलोमीटर की त्रिज्या के
शहर मे पचास चक्कर लगाते हैं
बरतन धोने वाली लड़की
कल से काम पे नहीं जाती है
बहन ढूढने को बेचारी
थाने के चक्कर लगाती है
गाँव गाँव में पहाड़ के
रोजगार नहीं मिल पाता है
पत्थर तोड़ने भी आदमी
पैदल दूर शहर में जाता है
खाने को रोटी तब भी
बड़ी मुश्किल से पाता है
क्यों उसके बच्ची को
मोबाईल मिल जाता है
और बच्चा उसका
मोटरसाईकिल चलाता है
पैट्रोल चोरने के लिये
फिर एक पाईप लगाता है
ये सब करना भी सही चलो
पर इन सब बातों से ही
एक बाप अपनी बेटी पहाड़
की मुफ्त में बिकवाता है
लड़की को एक
बरतन धोने पे लगाता है
लड़की मेहनत से
परिवार चलाती है
मोबाईल के चक्कर
में बहन गवांती है
रोती जाती है लड़की
रोती जाती है।

रविवार, 25 मार्च 2012

सारे साहब

अपने रोज के नये साहब
को नया सलाम बोलता है
आके फिर से यहाँ
वो किताब खोलता है
सुबह खोलता है
शाम खोलता है
किताब के पन्ने
एक गुलाम खोलता है
देख कर नये पन्ने
जब दिमाग डोलता है
कई बार खोलता है
अपने आप बोलता है
खेल नहीँ खेलता है
खिलाड़ी को झेलता है
फुटबाल बना के कोई
जब हवा पेलता है
हर कोई अपने को
साहब बोलता है
गुलाम कभी नहीं
जुबान खोलता है
अपने रोज के नये साहब
को नया सलाम बोलता है
आके फिर से यहाँ
वो किताब खोलता है।

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

धुआँ

जरूरी नहीं
कुछ जले
और धुआँ 
भी उठे
धुऎं का
धुआँ बनाना
तो और भी
मुश्किल काम है
कब कौन क्या
जला ले जाता है
किसी को पता
नहीं चल पाता है
हर कोई अपना
धुआँ बनाता है
हर कोई अपना
धुआँ फैलाता है
कहते हैं
आग होगी
तो धुआँ 
भी उठेगा
माहिर लोग
इन सब
बातो को
नहीं मानते हैं
वो तो धुऎं का
धुआँ बनाना
बहुत ही अच्छी
तरह जानते हैं
बहुत बार धुआँ 
धुऎं में ही
मिल जाता है
कौन किसका
धुआँ था
पता नहीं
लग पाता है
ये भी जरूरी नहीं
हर चीज जल कर
धुआँ हो जाये
बिना जले भी
कभी कभी धुआँ
देखा जाता है
धुऎं का धुआँ
बनाकर
धुआँ देखने
वाला खुद
कब धुआँ
हो जाता है
ये धुआँ 
जरूर
बताता है।

चित्र साभार: imgarcade.com

गुरुवार, 22 मार्च 2012

चेहरे

चेहरे दर चेहरे
कुछ लाल होते हैं
कुछ होते हैं हरे

कुछ बदलते हैं
मौसम के साथ

बारिश में
होते हैं गीले
धूप में हो
जाते हैं पीले

चेहरे चेहरे
देखते हैं

छिपते हुवे चेहरे
पिटते हुवे चेहरे

चेहरों को कोई
फर्क पढ़ना
मुझे नजर
नहीं आता है

मेरा चेहरा
वैसे भी
चेहरों को
नहीं भाता है
चेहरा शीशा
हो जाता है

चेहरा चेहरे को
देखता तो है
चेहरे में चेहरा
दिखाई दे जाता है

चेहरे को चेहरा
नजर नहीं आता है
चेहरा अपना
चेहरा देख कर ही
मुस्कुराता है
खुश हो जाता है

सबके
अपने अपने
चेहरे हो जाते हैं

चेहरे किसी
के चेहरे को
देखना कहाँ
चाहते हैं

चेहरे बदल
रहे हैं रंग
किसी
को दिखाई
नहीं देते हैं

चेहरे चेहरे को
देखते जा रहे हैं
चेहरे अपनी
घुटन मिटा रहे हैं

चेहरे चेहरे को
नहीं देख पा रहे हैं
चेहरे पकड़े
नहीं जा रहे हैं
चेहरे चेहरे
को भुना रहे हैं

चेहरे दर चेहरे
कुछ लाल होते हैं
कुछ होते हैं हरे

कुछ बदलते हैं
मौसम के साथ
बारिश में
होते हैं गीले
धूप में हो
जाते हैं पीले।

बुधवार, 21 मार्च 2012

गौरेया का दिन

बहुत
कम जगह
सुना है
अब वो 

पायी
जाती हैं
लेकिन
गौरेया 

बिना नागा
सुबह यहाँ 

जरूर
आती हैंं

खेत की
झाड़ियों 
में
हो कर इकट्ठा 

हल्ला मचाती
चहचहाती हैं

दाना पाने
की उम्मीद में
फिर आंगन
में आकर
सब बैठ
जाती हैं

एक लड़की
जो करती है
उनकी
रखवाली
सुबह
सवेरे ही
उठ के
आती है
झाडू़
लगाती है
आंगन में
उनके लिये

खुश हो कर
वो चावल
के दाने
भी फैलाती है

कोने कोने
के घौंसलों
में 
आजकल

उनके
बच्चों की
चीं चीं की
आवाज
कानों
में घंटी
बजाये
जाती है

दाना ले
जा कर
गौरेया
उनको
खिलाये
जाती हैं

बिल्लियाँ
मेरे पड़ौस
की रहती हैं
उनकी ताक में
बिल्लियों
को लड़की
झाडू़ फेंक
कर भगाये
जाती है

बाज
होता है
बिल्ली से
फुर्तीला
कभी एक
दो को
ले कर
ऊड़ ही
जाता है

लड़की
उदास
हो जाती है
उस दिन
लेकिन
फिर से
अपने
काम पर
हमेशा
की तरह
तैनात
हो जाती है

गौरेया
से है
उसका
बहुत याराना
चावल
ना मिले तो
लड़की के
कंधों पर
आकर
चढ़ जाती हैं

छोटी सी
गौरेया
का दिन
है आज
देखा था
अखबार में
छपा था
दिन पर दिन
कम होते
जाती हैं

घर पर
हमारे बहुत
हो गयी हैं
जो
चहचहाती हैं
रोज
आती है
दाना
ले जाती हैं
फुर्र से
उड़ जाती हैं ।

मंगलवार, 20 मार्च 2012

सौदा

अगले पाँच वर्षों
की लूट का खाका
लगभग तैयार हो गया है
एक खेमें को आधा
हिस्सा देने को दूसरा खेमा
पूरे से आधा बाहर हो गया है
छोटा घर बनवाना
घरवालों के ही सर पर
सवार हो गया है
घरवाला अपने ही घर से
अपने घरवालों के कारण
घर से बाहर हो गया है
दूल्हे बदलना एक परंपरा
यहाँ की बारातों में
हर बार हो गया है
दहेज बहुत है लड़की के
बाप के पास देख कर
बारात में ही दूल्हा एक
और तैयार हो गया है
पहला वाला दूल्हा भी
कहाँ छोड़ने वाला है मैदान
लड़की बांटने को ही
तैयार हो गया है
कन्या और कन्यादान
करने वाले को भी
नहीं पूछने वाला कोई यहाँ
वो भी क्या करे बेचारा
उसे पता है उनको
बेचने का दूल्हों के बीच
एक करार हो गया है।

रविवार, 18 मार्च 2012

सच

सच तो
सच
होता है
फिर कहने
सुनने में
क्यों चुभने
लगता है

लोग अपने
घर के
छेद देख
कर आँख
बंद कर
ही लेते हैं
देश के
छेद को
दिखा
कर झंडे
बुलंद कर
लेते हैं

दूसरा
कोई
देश की
बात
कैसे करेगा
करेगा
अगर तो
पहले
अपने घर
का छेद
भरेगा

घर
का छेद
बंद नहीं
किया
जाता है
ब्लैकमेल
अगर
सामने वाले
को करना
हो तो
उसी समय
खोल दिया
जाता है

लोग
घर के
चोरों को
हमेशा
माफ कर
दिया
करते हैं
देश में
हो रही
चोरियों का
हिसाब किया
करते हैं

जब
सम्भलती
नहीं पैंट
कभी
उनसे
अपनी ही
तुरंत
सामने
वाले
की बैल्ट
पर वार
किया
करते हैं

अरे घरवालो
उन घरवालों
को तो ना
डराया करो
जो घर से
बात शुरू
किया करते हैं
और
मौका
लगता
है तो
कोशिश
करते हैं
प्रदेश की
बात करें
और देश
की भी

लेकिन इन
सब बातो
से पहले
ये तो
जान जाईये

ठेका अगर
घर देश
प्रदेश का
आप ले
 रहे हैं
तो
हिम्मत करें
अपना फोटो
जरूर अपने
प्रोफाइल
पर लगाइये।

शनिवार, 17 मार्च 2012

शेर

सारे शेर भी थे
एक जंगल के भी थे
सबके सपने
अपने अपने थे
गीदड़ों ने मिल कर
उनका शिकार किया
एक नहीं ग्यारह
शेरों पर वार किया
अब शेरों के
घर वालों को
रोना आ रहा है
हर कोई
शेर था शेर था
करके बता रहा है
गीददों से मार
खाई करके बिल्कुल
नहीं शरमा रहा है
जंगल इसीलिये
बरबाद होता जा रहा है
शेर लोग तो जायें गड्ढों में
बेचारे जानवरों को क्यों
जमीन के अंदर बिना
बात ले जाया जा रहा है ?

शतक और बजट

बजट पर भारी पड़
गया सौंवा शतक

न्यूज रीडर भी आज
गया खबरों में भटक

सचिन देश के
लिये खेलता तो

स्कोर तीन सौ से
ऊपर चला जाता

फिर बाँग्लादेश
उसको कैसे हरा पाता

ज्यादातर सचिन
जब शतक बनाता है

भारत उस मैंच में
हार ही जाता है

खबरों ने आज सचिन
का सौंवा शतक गाया

इसी लिये बजट के
बारे में कुछ नहीं सुनाया

बजट सुनकर भी क्या
करेगी भारत की जनता

हर बार की तरह
इस बार भी
चुनाव
के खर्चे की
भरपायी करेगा संता

बजट कब किस की
समझ में आता है

मेरी समझ में आज तक
ये नहीं घुस पाता है

फिर भी ये बेवकूफ
हर आदमी को

टी वी से चिपका
हुवा क्यों पाता है

सिगरेट और बीड़ी
के दाम को

हर बार सरकार ने
ढ़ा हुवा दिखाया है
गरीब को लगा
इससे मुर्गा जरूर

उसके हाथ इस
बार जरूर आया है

रेल से जाने वालों
को दिनेश ने तो

कल ही छत
पर चढ़ा दिया है

जिसे लगे हाथ
ममता दीदी ने

धक्का मार कर
लु
ढ़का दिया है
मनमोहन की
मोहनी सूरत की
फोटो 
अब जरूर
खरीद कर लानी है

साल भर उसके
नीचे अगरबत्तियां

सस्ती वाली जरूर
ही जलानी हैं।

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

चिंता

एक मित्र को चिंता है
अच्छी रचना कोई
क्यों नहीं सुनता है

किस्म किस्म के
लोग जब एक
साँथ हो जाते है
एक ही बाजार में
कुछ खरीदने जाते हैं
अपनी अपनी पसंद का
माल ही तो उठाते हैं
मित्र आप भी तो अपनी
पसंद की साड़ी खरीद
कर ही ले जाती हैं
पतिदेव की
कलर चौईस
पर कभी कभी
मुँह बनाती हैं
यहाँ तो लोग
सूँई से हाथी
बना कर
लगा रहे हैं
हम कौन सा
खरीदते जा रहे हैं
मेरे बहुत से
मित्रों के मित्र
बड़े बड़े नेता हैं
पर हमको पार्टी
वाला कहाँ कुछ
कभी देता है
काँग्रेस भाजपा
सपा बसपा
हर तरह की
पार्टियां लगीं थी
पर हमें तो
बस अपने देश
की पतली होती
हालत की
ही पड़ी थी
हम कब से
भुनभुना रहे थे
हमारे हजार
फेसबुक मित्रों में
से बीस पच्चीस
ही तो हमारे साँथ
ताली बजा रहे थे
सबसे बड़ी बात
आपकी समझ में
भी अब तक
आ जानी चाहिये
कोई क्या सोचता
है कहता है
इस रास्ते पर गाड़ी
नहीं दौड़ानी चाहिये
लगे रहिये आप
भी हमारी तरह
मसाले छौंक के सांथ
दाल पकानी चाहिये
कोई खाये तो खाये
नहीं खाता है
तो उसके लिये
बिरयानी नहीं
पकानी चाहिये।

गुरुवार, 15 मार्च 2012

अपना कल याद नहीं

वो कल नंगा
हो गया था
आज उसे
कुछ याद नहीं

हंस रहा है
आज सुबह से
सामने खड़े हुवे
नंगो को
देख देख कर

बिना कपड़ों के
भूखे की रोटी
छीन कर खाने
मरीज की
दवा बेच कर
उसे ऊपर पहुंचाने
में माहिर होने के
आरोपों के मेडल
छाती से चिपकाये

आज भौंक रहा है
सुबह से उन्ही
भाई भतीजों पर
जिनको आज उसने
इस लायक बना के
यहां तक आने के
लिये तैयार किया है

उससे दो
कदम आगे
पहुंचने वाले
उसके शागिर्द
काट खा रहे हैं
एक दूसरे को
खुले आम

कर रहे हैं
वो काम
जो उसने
भी किया

चुटकी में
पटक दिया
अपने सांथी को
बिना भनक लगे

सुना था
देख
भी लिया
गुरू सब
दाँव सिखाता है

एक को
छोड़ कर
अपने बचाव
के लिये।

बुधवार, 14 मार्च 2012

लगा दी लंगड़ी

आओ आओ कोई आओ
सिसूँण काट के जल्दी लाओ
चौराहे पर खड़े करो सब
पैंट खोल कर फिर झपकाओ
बेशर्मी की हद होती है
जनता जिनको सपने देती है
हरकत उनकी देखते जाओ
करोड़पति हैं पढ़े लिखे हैं
अखबारों में मत छपवाओ
चुल्लू भर पानी दे आओ
सफेद कपड़ो़ पर मत जाओ
दल से इनके मत भरमाओ
भाईचारा समझ भी जाओ
किस सीमा तक जा सकते हैं
जमीर बेच कर खा सकते हैं
चरित्र देश का मत गिरवाओ
समय अभी भी बचा हुवा है
लुटने से अब भी बच जाओ
जल्दी जाओ सिसूँण लाओ
मिलकर जाओ और झपकाओ।

़़़़़़़
सिसूँण = बिच्छू घास
़़़़़़

मंगलवार, 13 मार्च 2012

मिल गया मिल गया .. लीडर

बिल्लियों
की
लड़ाई में
बंदर रोटी
खा गया

बिल्लियों
के
रिश्तेदारों
को
बहुत रोना
आ गया

यहाँ का
बंदर
मलाई खुद
जब
खाता नहीं

बिल्लियों
को बंदर
इसी लिये
भाता नहीं

साँस्कृतिक
जंगल में
उदासी सी
छा गयी

बहुत से
जानवरों
को
मूर्छा जैसी
आ गयी

आगे
बंदर अब
बिल्लियों
को नचायेगा
या
बिल्लियों द्वारा
बंदर
फंसाया जायेगा

यह तो
आने वाला
समय ही
बता पायेगा

लेकिन
अफसोस

बहुत सी
स्थानीय
बिल्लियों
का कटोरा
वापिस
पांच साल
के लिये
फिर से
उल्टा
हो जायेगा

मुझे
वाकई में
बहुत ही
रोना आयेगा ।

सोमवार, 12 मार्च 2012

समाधान

राहुल भैया अब
आप ही संभालें
मदद कीजिये
मुश्किल से निकालें
माता जी को
 राय एक दे डालें
वो आ जायें या
आपको बनालें
नहीं हो पाये तो
नाराय़ण को बुलालें
पिछले बारह वर्षों
पर एक नजर डालें
मुख्यमंत्रियों की
एक लिस्ट बनालें
ऎसा भी नहीं तो
नया कर डालें
बारी बारी से
एक एक करके
वो गद्दी संभालें
खाने पीने की
सीमा रेखा बनालें
पूरा हो जाये तो
दूसरा बुलालें
साठ महीने
को छत्तीस से
भाग दे डालें
उतने महीने
सभी मौका भुनालें
जैसे हो सके
राज्य का
दिवाला निकालें
बचा खुचा दर्जा
धारियों को दिखालें
लाल बत्ती वालो
को भी बुलालें
लौलीपौप एक एक
उन्हें भी थमालें ।

शनिवार, 10 मार्च 2012

जय हो

सोनिया जी
राहुल जी
प्रियंका जी
को होली
की बधाई
सुना मैने
उत्तराखंड में
सरकार है
कांंग्रेस की
है आई
इसलिये
सारी बधाई
मैने आपके
लिये ही बचाई
कुर्सियाँ सब
बाँट ही
लेंगी आप
लाईन है
लम्बी लगाई
और पार्टियों की
लाल बत्तियाँ
आपने गधेरे
में पहुंचाई
कांंग्रेस की
लाल बत्ती की
ऎप्लीकेशन
मैने अभी
नहीं लगाई
होली की
मजाक में
मैने ये बात है
आपको बताई
वरना कहाँ
आने वाली
ठेरी
आम जनता
तक मलाई।

गुरुवार, 8 मार्च 2012

उ0 प्र0 2012

आधी बकवास 'उलूक' की आज के 'अमर उजाला' के पेज 9 पर छपी है बाकी बची खुची कहो पूरी कहो यहाँ नीचे पड़ी है।

बड़ी
मुश्किल से
हाथी काबू
में आया है
अगले पाँच
साल के लिये
बांध कर के
सुलाया है

महावत ही
खा रहा था
हाथी का खाना
बच ही नहीं
पा रहा था
कुछ उसके
अपने ही
परिवार के
लिये दाना

महावत
आज बहुत
खुश नजर
आ रहा था

अपनी
छकड़ा
साईकिल
निकाल कर
बहुत इतरा
रहा था

अगले
पाँच साल
वो साइकिल
में जाया करेगा

हाथी बेचारा
बैठे बैठे सूँड
हिलाया करेगा

मेरा कुछ
हो पायेगा
मुझे कुछ भी
नहीं मालूम
टूटे हाथ में
कमल मेरे
पहले की तरह
मुर्झाया करेगा

चार हजार
करोड़ के साथ
थोड़ा और कुछ
ही खा पाया था
हाथी सुना है

बचा हुवा
साईकिल की
रिपेयर में
काम आया करेगा

श्रीमती मेरी
दूध सब्जी गैस
के दामों पर
अभी भी चिल्लायेगी

क्या पता दीदी
की जगह भतीजे
को देख अब
वो मुस्कुरायेगी

आओ दुवा करो
मेरे साथ आप भी
मिलकर वोटरो

साईकिल बिना
रिपेयर के
पाँच साल
चल ही जायेगी
पैट्रोल के बिल
दिखा कर
एन आर एच एम
की कहानी
कम से कम फिर से
नहीं दोहरायेगी

कुछ बेकसूर
लोगो को
यूँ ही मौत
की नीद
असमय ही
ना सुलायेगी

अमन चैन
ना भी ला सकी
उसके सपने
तो दे ही जायेगी।

सबक

मायूस क्यों
होता है भाई
कुर्सी तेरे
आदमी तक
अगर नहीं
पहुंच पायी

तू लगा था
सपने देखने मे
तेरे हाथ भी
कभी एक
स्टूल आ
ही जायेगा
शेखचिल्ली
बनेगा तो
आगे भी जमीन
पर ही आयेगा
आसमान
से गिरेगा
खजूर में
अटक जायेगा

इधर तू दूल्हा
सजा रहा था
उधर तेरा
ही रिश्तेदार
कुर्सी
खिसका रहा था

कहा गया है
कई बार
जिसका काम
उसी को साजे
और करे
तो ठेंगा बाजे

अब भी
सम्भल जा
उस्तरा उठा
और
सम्भाल अपनी
दुकान को
नाई था
नाई हो जा
नेता जी
की दुकान
सजाने अब
तो नहीं जा

कुर्सी सबके
नसीब में होती
तो मैने भी
पैदा होते ही
एक मेज
खरीद ली होती

नाई
दुकानदार
हलवाई
सब अपनी
अपनी जगह
ठीक लगते
हैं भाई

इतिहास
गवाह है
जिस दिन
मास्टर बंदूक
उठाता है
शेर के
शिकार
पर जाना
चाहता है
गोली पेड़
की जड़ मे
लगी हुवी
पाता है
और
मुंह की
खाता है

नेता को
नेतागिरी
अब तो
मत सिखा
लौट के
दुकान पर आ
उस्तरा उठा
शुरू हो जा।

बुधवार, 7 मार्च 2012

पुराना

सत्य अहिंंसा
की बात
गांधी तू क्यों
अब भी
आता है याद

मान जा
अब छोड़ दे
याद आना
और दिलाना
अगली बार
अगर आया
तुझे प्रमाण
पत्र होगा
हमको
दिखलाना

पुराना हो
चुका है
स्वतंत्रता संग्राम
की है आँधी
कि तू वाकई
में है गांंधी

गांधी
समझा
कर भाई

तेरे जमाने
में होता होगा
जो होता होगा

अब वो होता है 
जो वैसे
नहीं  होता है

बनाया जाता है 
मसाले डाल कर
पकाया  जाता है

पांच चोर
अगर कहेंगे
तेरे को सच्चा
तभी कुछ
हो पायेगा
तेरा कुछ अच्छा

इसलिये
थोड़ा
शर्माया कर
सच झूठ
की बात
हो रही हो
कहीं अगर
तो कूद कर
खाली भी
मत आ
जाया कर

उस
जमाने में
तू बन सका
महात्मा

इस जमाने में
अब कोशिश
भी मत करना

तू तो तू तेरी
बेच है सकता
कोइ भी आत्मा

इसलिये अब
भी मान जा
ले जा अपनी
धोती चश्मा
लाठी किताबे

दिखना
भी नहीं
कहीं फोटो
में भी

हमें सीखने
सिखाने
दे बाजीगरी

जब तक
तू बैठा रहेगा
हमारे नोटों में

कैसे
सीखेंगे हम
नये जमाने की
नयी नयी
कारीगरी।

सोमवार, 5 मार्च 2012

मैं आज

मुड़ते ही अचानक
फिर मुझे आज
मैं मिल गया
अवाक रह गया
अपने को देख
कर अचानक
बहुत कुछ बदल गया था
दिख रहा था साफ साफ
फ्रेम वही था घिसा पिटा
पर फोटो उसमें एक
डुप्लीकेट बनवाई
लग रही थी
अपनी हरामखोरी
देख देख कर
मेरी नजरें झुक झुक
सी जा रही थी
पर शरम मुझे
फिर भी थोड़ी सी भी
नहीं आ रही थी
मै वाकई में ऎसा
कभी नहीं रहा
ना ही कोई मेरे को
ऎसा कहने की
हिम्मत कर सकता है
पर जो मै होता जा रहा हूँ
वो मुझे तो पता ही होता होगा
तुमको क्या करना
मत सोचो
तुम अपनी फिक्र मत करो
क्योंकि तुम तो तुम
हो ही ना बहुत साफ साफ
और सूखे हुवे
मैं कुछ कर ही लूंगा
अपने लिये आज
नहीं तो कल
सीख लूंगा बारहखड़ी
खुद को खड़ा करने
के लिये कीचड़ में
कमल की फोटोस्टेट
बड़ी आसानी से
हो सकती है
लगा लूंगा
तुमको ताली बजाना
तो बहुत आता है
इस जमाने के
लूलों लंगड़ो़ के लिय
बिना बात के
फिर चिंन्ता किसको है
आओ बनाये एक पैग
तगड़ा वाला
खुदा के नाम पर
चीयर्स जय श्री राम जी ।

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