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बुधवार, 31 जुलाई 2013

बाहर के लिये अलग बनाते है अंदर की बात खा जाते हैं !

मुड़ा तुड़ा 
कागज का
एक टुकड़ा
मेज के नीचे
कौने में पड़ा
मुस्कुराता है
लिखी होती है
कोई कहानी
अधूरी उसमें
जिसको कह
लेना वाकई
आसान नहीं
हो पाता है
ऎसे ही पता
नहीं कितने
कागज के
पन्ने हथेली
के बीच में
निचुड़ते ही
चले जाते हैं
कागज की
एक बौल
होकर मेज
के नीचे
लुढ़कते ही
चले जाते हैं
ऎसी ही
कई बौलों
की ढेरी
के बीच
में बैठे
हुऎ लोग
कहानियाँ
बनाने में

माहिर हो
जाते हैं
एक कहानी
शुरु जरूर
करते हैं
राम राज्य
का सपना
भी दिखाते हैं
राजा बनाने
के लिये
किसी को
भी कहीं से
ले भी आते हैं
कब खिसक
लेते हैं बीच
में ही और
कहाँ को
ये लेकिन
किसी को
नहीं बताते हैं
अंदर की
बात को
कहना इतना
आसान कहाँ
होता है
कागजों को
निचोड़ना 

नहीं छोड़
पाते हैं
कुछ दिन
बनाते हैं
कुछ और
कागज की बौलें
लोग राम
और राज्य
दोनो को
भूल जाते हैं
ऎसे ही में
कहानीकार
और कलाकार
नई कहानी
का एक
प्लौट ले
हाजिर हो
जाते हैं ।

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

सीधे सीधे बता पागल मत बना

कबीर जैसा
कैसे बनूँ
कैसे कुछ
ऎसा कहूँ
समझ में
खुद के
भी कुछ
आ जाये
समझाना
भी सरल
सरल सा
हो जाये
पहेलियाँ
कहाँ किसी
की सहेलियाँ
हुआ करती हैं
समझने के
लिये दिमाग
तो लगाना
ही पड़ता है
जिसके पास
जितना होता है
उतना ही बस
खपाना पड़ता है
जिसके समझ
में आ गई
जिंदगी को
सुलझाता
चला जाता है
उससे पहेली
पूछने फिर
किसी को
कहीं नहीं
आना पड़ता है
उसका एक
इशारा अपने
आप में पूरा
संदेश हो जाता है
उसे किसी
को कुछ
ज्यादा में
बताना भी
नहीं पड़ता है
दूसरी तरफ
ऎसा भी कहीं
पाया जाता है
जिसको आस पास
का बहुमत ही
पागल बनाता है
जहाँ हर कोई
एक कबूतर को
बस यूं ही देखता
चला जाता है
पूछने पर एक
नहीं हर एक उसे
कौवा एक बताना
जहाँ चाहता है
एक अच्छी भली
आँखो वाले को
डाक्टर के पास
जाना जरूरी
हो जाता है
बस इन्ही बातों
से कोई दीवाना
सा हो जाता है
सीधे सीधे किसी
बात को कहने
में शरमाता है
कभी आदमी
को गधा
कभी गधे
को आदमी
बनाना सीख
जाता है
समझने वाला
समझ भी
अगर जाता है
समझ में आ
गया है करके
किसी को भी
बताना नहीं
चाहता है
अब आप ही
बताइये
बहुमत छोड़ कर
कौन ऎसे पागल
के साथ में आ
जाना चाहता है ।

सोमवार, 29 जुलाई 2013

सभी देखते हैं, मोर नाचते हैं. कितने बाँचते हैं !

सभी को दिखाई
दे जाते हैं रोज
कहीं ना कहीं
कुछ मोर उनके
अपने जंगलों
में नाचते हुऎ
सब लेकिन
कहाँ बताते है
किसी और को
जंगल में मोर
नाचा था और
उन्होने उसे
नाचते हुए
देखा था
बस एक तेरे
ही पेट में
बातें जरा सा
रुक नहीं
पाती हैं
मोर के नाच
खत्म होते ही
बाहर तुरंत
निकल के
आती हैं
पता है तू
सुबह सुबह
जंगल को
निकल के
चला जाता है
शाम को लौट
के आते ही
मोर के नाच
की बात रोज
का रोज यहाँ
पर बताता है
बहुत सारे
मोर बहुत से
जंगलो में रोज
नाचते हैं
बहुत सारे
लोग मोर
के नाच को
देखते हैं फिर
मोर बाँचते हैं
कुछ मोर
बहुत ही
शातिर माने
जाते हैं
अपने नाचने
की खबर
खुद ही
आकर के
बता जाते हैं
क्यों बताते हैं
ये बात
सब की
समझ में
कहाँ आ
पाती है
कभी दूसरे
किसी जंगल
से भी एक
मोर नाचने
की खबर
आती है
यहाँ का
एक मोर
वहां बहुत
दिनो से
नाच रहा है
कोई भी
उसके नाच
को पता
नहीं क्यों
नहीं बाँच
रहा है
तब जाके
हरी बत्ती
अचानक ही
लाल हो
जाती है
बहुत दिनों
से जो बात
समझ में
नहीं आ
रही थी
झटके में
आ जाती है
मोर जब
भी कहीं
और किसी
दूसरे जंगल
में जाना
चाहता है
अपना नाच
कहीं और
जाकर दिखाना
चाहता है
जिम्मेदारी
किसी दूसरे को
सौंपना नहीं
चाहता है
बिना बताये
ही चला
जाता है
बस दूसरे
मोर को
जंगल में
नाचते रहना
का आदेश
फोन से
बस दे
जाता है
इधर उसका
मोर नाच
दिखाता है
उधर उसका
भी काम
हो जाता है
सब मोर
का नाच
देखते हैं
किसी को
पता नहीं
चल पाता है ।

रविवार, 28 जुलाई 2013

किस को करना है हिट किसको जाना है पिट मिलकर बतायें

स्कोर क्या हुआ
कहीं दो कहीं तीन
कहीं तो कुछ
भी नहीं हुआ
आया जरूर था
कह कर नहीं गया
बस जीरो एक दिखा
कितने हिट मिले
रोज का रोज
कौन गिनता फिरे
कहीं उम्दा दिखे
कहीं सुंदर दिखे
कहीं वाह वाह
हर कोई लिखे
कुछ समझ में
थोड़ा सा आये
कुछ पूरा ऊपर
ऊपर ही निकल
कर उड़ जाये
अब किससे
क्या कहा जाये
सब्जी की दुकान में
मछली भी मिल जाये
गूगल से बुलाये
ट्वीटर से हकाये
खुद आये ना आये
पता चिपका कर
ही चला जाये
ब्लागिंग की दुनिया
गोल है चपटी नहीं
इधर से जाने वाला
उधर भी मिल जाये
मैं तेरे घर में आऊँ
तू मेरे घर में आये
मैं तेरे पै दे जाऊँ
तू मेरे पै दे जाये
ना बैट नजर आये
ना बौल नजर आये
आँख बंद कर के
चौके छक्के उड़ाये
टिप्पणी के खेल
का तेंदुलकर हो जाये
अपना अपना
बैट अपने साथ
लेकर आयें
अपनी बौल
दूसरे के हाथ
ना थमायें
टीम भावना
सर्वोपरि बनायें
फुटबाल खेलने
वालों को काहे
मैच देखने के
लिये बुलायें
अच्छा हो
अगर इस सब
को नियम बना
संविधान में
भी ले आयें
देश एक है
नेता एक हैं
हम भी साथ
कुछ निभायें ।

शनिवार, 27 जुलाई 2013

लिखने से कोई विद्वान नहीं होता है

सम्पादक जी
को देखते ही
साथ में किसी
जगह कहीं

मित्र से रहा
नहीं गया

कह बैठे
यूँ ही

भाई जी
ये भी
लिख रहे हैं
कुछ कुछ
आजकल

कुछ
कीजिये
इन पर
भी कृपा

कहीं
पीछे पीछे
के पृष्ठ पर
ही सही
थोड़ा सा
इनका कुछ
छापकर

क्या पता
किसी के
कुछ समझ में
भी आ जाये

ऎसे ही कभी
बड़ी ना सही
कोई छोटी
सी दुकान

लिखने पढ़ने
की इनकी
भी कहीं
किसी कोने
में एक
खुल जाये

मित्रवर की
इस बात पर
उमड़ आया
बहुत प्यार

मन ही मन
किया उनका
आभार

फिर मित्र को
समझाने के
लिये बताया

पत्रिका में
जो छपता है
वो तो
कविता
या लेख
होता है

विद्वानो
के द्वारा
विद्वानो
के लिये
लिखा हुआ
एक संकेत
होता है

आप मेरे को
वहाँ कहाँ
अढ़ा रहे हो

शनील के
कपडे़ में
टाट का 

टल्ला क्यों
लगा रहे हो

मेरा लिखना
कभी भी
कविता या लेख
नहीं होता है

वो तो बस
मेरे द्वारा
अपने ही
आस पास
देखी
समझी गयी
कहानी का 
एक पेज
होता है

और
आस पास
इतना कुछ
होता है
जैसे खाद
बनाने के लिये
कूडे़ का एक
ढेर होता है

रोज अपने
पास इसलिये
लिखने के लिये
कुछ ना कुछ
जरूर होता है

यहाँ आ कर
लिख लेता हूँ
क्योंकि
यहाँ लिखने
के लिये ही
बस एक
विद्वान होना
जरूरी नहीं
होता है

खुद की
समझ में
भी नहीं
आती हैंं
कई बार
कई बात 

उसको भी
कह देने से
किसी को
कोई भी
कहाँ यहाँ
परहेज
होता है

विद्वान लोग
कुछ भी
नहीं लिख
देते हैं

'उलूक'
कुछ भी
लिख देता है

और
उसका
कुछ मतलब
निकल ही
आये ये
जरूरी भी
नहीं होता है ।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

भले हैं नारद जी अच्छा ही चाहते हैं

नारद जी को ये जरा भी 
समझ में नहीं आता है
देवताओं और असुरों से
साथ साथ आखिर क्यों
नहीं रहा जाता है
कितने साल देखिये हो गये
कितने असुर असुर नहीं रहे
देवता जैसे ही हो गये
देवताओं का असुरों में
असुरों का देवताओं में
आना जाना भी अब
देखा ही जाता है
नारद जी को वैसे तो
देवता ही माना जाता है
असुरों के यहाँ आना जाना
लेकिन उनका बहुत बार
देखा सुना जाता है
बहुत समय से इसीलिये
जुगाड़ लगा रहे हैं
असुरों को देवताओं में
मिलाने का मिशन
अपना ध्येय बना रहे हैं
देवता तो हमेशा बहुमत
में होते हैं क्योंकी वो तो
देवता लोग होते हैं
ये बात कोई नहीं देखता
कुछ देवता देवताओं
के कहने पर नहीं जाते हैं
पर देवता तो देवता होते हैं
गिनती में देवताओं के
साथ ही हमेशा गिने जाते हैं
असुर तो हमेशा से ही
अल्पसंख्या में पाये जाते हैं
मौका मिलता है कभी
अपने काम के लिये
देवता हो जाने में
नहीं हिचकिचाते हैं
बेवकूफ लेकिन हमेशा
ही नहीं बनाये जाते हैं
समझते हैं सारे असुर
अगर देवताओं के
साथ चले जायेंगे
अभी छुप कर करते हैं
जो मनमानी उसे
करने के लिये
खुले आम मैदान में
निकल के आ जायेंगे
यही सब सोच कर
असुर रुक जाते हैं
ज्यादा नुकसान कुछ
उनको नहीं होता
देवताओं के राज्य में
वैसे भी उनके काम
कौन सा हो पाते हैं ।

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

यहाँ होता है जैसा वहाँ होता है !

होने को माना
बहुत कुछ होता है
कौन सा कोई सब
कुछ कह देता है
अपनी फितरत से
चुना जाता है मौजू
कोई कहता है और
कहते कहते सब
कुछ कह लेता है
जो नहीं चाहता कहना
देखा सुना फिर से
वो चाँद की कह लेता है
तारों की कह लेता है
आत्मा की कह लेता है
परमात्मा की कह लेता है
सुनने वाला भी कोई
ना कोई ना कोई
चाहिये ही होता है
कहने वाले को ये भी
अच्छी तरह पता होता है
लिखने वाले का
भी एक भाव होता है
सुनने वाला लिखने
वाले से शायद ज्यादा
महंगा होता है
सुंदर लेखनी के
साथ सुंदर चित्र हो
ज्यादा नहीं थोडी़
सी भी अक्ल हो
सोने में सुहागा होता है
हर कोई उस भीड़ में
कहीं ना कहीं
सुनने के लिये
दिख रहा होता है
बाकी बचे बेअक्ल
उनका अपना खुद
का सलीका होता है
जहाँ कोई नहीं जाता
वहां जरूर कहीं ना
कहीं उनका डेरा होता है
कभी किसी जमाने में
चला आया था मैं
यहाँ ये सोच के
शायद यहां कुछ
और ही होता है
आ गया समझ में
कुछ देर ही से सही
कि आदमी जो मेरे
वहाँ  का होता है
वैसा ही  कुछ कुछ
यहाँ का होता है
अंतर होता है
इतना कि यहाँ
तक आते आते
वो ऎ-आदमी से
ई-आदमी
हो लेता है ।

बुधवार, 24 जुलाई 2013

आज गिरोह बनायेगा कल पक्का छा जायेगा



सावन के अंधे की
तरह हो जायेगा
समय के साथ अगर
बदल नहीं पायेगा
कोई कुछ नहीं
देखेगा जहां
वहाँ तुझको
सब हरा हरा
ही नजर आयेगा
पिताजी ने बताया
होगा कोई रास्ता
उस जमाने में कभी
भटकने से तुझे वो
भी नहीं बचा पायेगा
अपने लिये आखिर
कब तक खुद ही
सोचता रह जायेगा
गिरोह में शामिल
अगर नहीं हो पायेगा
बेवकूफी के साथ
दो करोड़ घर
में रख जायेगा
आबकारी आयुक्त की
तरह लोकपाल
के पंजे मे जा
कर फंस जायेगा
समझदारी के साथ
एक झंडा उठायेगा
उंगली भी कोई नहीं
कभी उठा पायेगा
अपना और अपने
लोगों का तो करेगा
ही बहुत कुछ भला
गिरोह के लिये भी
कुछ कर पायेगा
करोडो़ की योजना
परियोजना बनायेगा
सबका हिस्सा टाईम
पर दे के आयेगा
झुक कर करता चलेगा
रोज बस नमस्कार
बस एक बार
काम का बस भोंपू
बना कर बजायेगा
आज गिरोह के लिये
झंडा एक उठायेगा
कल खुद गिरोह के
झंडे में नजर आयेगा
एक बेवकूफ दो
करोड़ के साथ
घर में
पकड़ा जायेगा
जेल पहुँच जायेगा
तू दस करोड़
भी ले जायेगा
लाल बत्ती की कार
के साथ कहीं बैठा
भी दिया जायेगा
निर्वात पैदा होने की
चिंता कोई भी
नहीं कर पायेगा
निकलते ही तेरे ऊपर
नीचे से एक
नया गिरोहबाज
तैयार खड़ा
तुझे मिल जायेगा ।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

चेहरे पर भी लिखा होता है

चेहरे पर भी
तो कुछ कुछ
लिखा होता है
ना कहे कुछ
भी अगर कोई
तब भी थोड़ा
थोड़ा सा तो
पता होता है
अपना चेहरा
सुबह सुबह ही
धुला होता है
साफ होता है
कुछ भी कहीं
नहीं कहता है
चेहरा चेहरे
के लिये एक
आईना होता है
अपना चेहरा
देखकर कुछ
कहाँ होता है
बहुत कम
जगहों पर
ही  एक आईना
लगा होता है
अंदर बहुत
कुछ चल
रहा होता है
चेहरा कुछ
और ही तब
उगल रहा
होता है
दूसरे चेहरे
के आते ही
चेहरा रंग
अपना बदल
रहा होता है
चेहरे पर
कुछ लिखा
होता है
ऎसा बस
ऎसे समय
में ही तो
पता चल
रहा होता है ।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

तुलसीदास जी की दुविधा

सरस्वती प्रतिमा
को हाथ जोडे़ खडे़
तुलसीदास जी
को देख कर
थोडी़ देर को
अचंभा सा हुआ
पर पूछने से
अपने आप को
बिल्कुल भी
ना रोक सका
पूछ ही बैठा
आप और यहाँ
कैसे आज दिखाई
दे जा रहे हैं
क्या किसी को
कुछ पढा़ने के
लिये तो नहीं
आप आ रहे हैं
राम पर लिखा
किसी जमाने में
उसे ही कहाँ
अब कोई पढ़
पा रहा है
बस उसके नाम
का झंडा बहुतों
के काम बनाने
के काम में जरूर
आज आ रहा है
हाँ यहाँ तो बहुत
कुछ है नया नया
बहुत कुछ ऎसा
जैसे हो अनछुआ
अभी अभी देखा
नये जमाने का
नायक एक मेरे
सामने से ही
जा रहा है
उसके बारे में
पता चला कि
हनुमान उसे
यहाँ कहा
जा रहा है
हनुमान मेरी
किताब का
नासमझ निकला
फाल्तू में रावण से
राम के लिये
पंगा ले बैठा
यहाँ तो
सुना रावण
की संस्तुति
पर हनुमान
के आवेदन
को राम खुद ही
पहुँचा रहा है
समझदारी से देखो
कैसे दोनों का ही
आशीर्वाद बिना पंगे
के वो पा रहा है
राम और रावण
बिना किसी चिंता
2014 की फिल्म
की भूमिका बनाने
निकल जा रहे हैं
हनुमान जी जबसे
अपनी गदा यहाँ
लहरा रहे हैं
लंकादहन के
समाचार भी
अब अखबार
में नहीं पाये
जा रहे हैं
मैं भी कुछ
सोच कर यहाँ
आ रहा हूँ
पुरानी कहानी के
कुछ पन्ने हटाना
अब चाह रहा हूँ
क्या जोडूँ
क्या घटाऊँ
बस ये ही
नहीं कुछ समझ
पा रहा हूँ
विद्वानों की
छत्र छाया
शायद मिटा
दे मेरी
इस दुविधा
को कभी
इसीलिये आजकल
यहाँ के चक्कर
लगा रहा हूँ ।

शनिवार, 20 जुलाई 2013

कब्र की बात पता करके आ मुर्दा एक हो जा

बहुत बार इस
बात का उदाहरण
अपनी बात को
एक ताकत देने
के लिये दे
दिया जाता है
जिसे सुनते ही
सामने वाला
भी भावुक हो
ही जाता है
जब उससे
कहा जाता है
अपनी कब्र का
हाल तो बस
मुर्दा ही
बता पाता है
कब्र में तो जाना
ही होता है
एक ना एक दिन
वहाँ से कौन
फिर जाकर के
वापस आता है
फिर कैसे कह
दिया जाता है
एक नहीं
कई कई बार
कब्र का हाल तो
बस मुर्दा ही
बता पाता है
ये सच होता है
या कई बार
बोला गया झूठ
जिसे बोलते बोलते
एक सच बना
दिया जाता है
वैसे भी एक मुर्दा
कभी दूसरे मुर्दे से
विचारों का आदान
प्रदान कहाँ
कर पाता है
मुर्दो की गोष्ठी या
मुर्दों की कार्यशाला
कभी कहीं हुई हो
ऎसा कहीं इतिहास
के पन्नों में भी तो
नहीं पाया जाता है
इस बात को बस
तभी कुछ थोड़ा
बहुत समझा जाता है
जब सामने सामने
बहुत कुछ होता
हुआ साफ साफ
सबको नजर आता है
हर कोई आँख
अपनी लेकिन बंद
कर ले जाता है
जैसे मुर्दा एक
वो हो जाता है
बोलता कुछ नहीं
मौत का सन्नाटा
चारों तरफ जैसे
छा जाता है
जब हो ही जाता है
अपने चारों और
कब्र का माहौल
खुद ही बनाता है
मुर्दा होकर जब
कब्र भी पा जाता है
उसके बाद फिर
बाहर कुछ भी
कहाँ आ पाता है
बस यूँ ही कह
दिया जाता है
अपनी कब्र का
हाल मुर्दा ही
बस बता पाता है । 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सुबह एक सपना दिखा उठा तो अखबार में मिला

कठपुतली वाला
कभी आता था
मेरे आँगन में
धोती तान दी
जाती थी एक
मोहल्ले के बच्चे
इक्ट्ठा हो जाते थे
ताली बजाने के
लिये भी तो कुछ
हाथ जरूरी हो
जाते थे
होते होते सब
गायब हो गया
कब पता ही
कहाँ ये चला
कठपुतलियाँ
नचाने वाले
नियम से
चलते हुऎ
हमेशा ही देखे
जाते थे
धोती लांघ कर
सामने भी नहीं
कभी आते थे
कठपुतलियाँ
कभी भी पर्दे
के पीछे नहीं
जाती थी
काठ की जरूर
होती थी सब
पर हिम्मत की
उनकी दाद
सभी के द्वारा
दी जाती थी
धागे भी दिखते
थे साफ साफ
बंधे हुऎ कठपुतलियों
के बदन के साथ
समय के साथ
जब समझ कुछ
परिपक्व हो जाती है
चीजें धुँधली भी हों
तो समझ में आनी
शुरु हो जाती है
कठपुतली वाला
अब मेरे आँगन
में कभी नहीं आता है
कठपुतलियाँ के काठ
हाड़ माँस हो गये हैं
वाई फाई के आने से
धागे भी खो गये हैं
धोती कौन पहनता
है इस जमाने में
जब बदन के कपडे़
ही खो गये हैं
बहुत ही छोटे
छोटे हो गये हैं
कठपुतली का नाच
बदस्तूर अभी भी
चलता जा रहा है
सब कुछ इतना
साफ नजर सामने
से आ रहा है
कठपुतलियाँ ही
कठपुतलियों को
अब नचाना सीख
कर आ रही है
पर्दे के इधर भी हैं
और पर्दे के उधर
भी जा रही हैं
बहुत आराम से
है कठपुतलियाँ
नचाने वाला
अब कहीं और
चला जाता है
उसको इन सब
नाचों में उपस्थिती
देने की जरूरत
कहाँ रह जा रही है
खबर का क्या है
वो तो कुछ होने
से पहले ही
बन जा रही है
क्या होगा ये
भी होता है पता
कठपुतलियाँ सब
सीख चुकी हैं
ऎ आदमी तू
अभी तक है कहाँ
बस एक तुझे ही
क्यों नींद आ रही है
जो सुबह सुबह
सपने दिखा रही है ।

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

देश बड़ा है घर की बनाते हैं

देश की सरकार
तक फिर कभी
पहुँच ही लेगें
चल आज अपने
घर की सरकार
बना ले जाते हैं
अंदर की बात
अंदर ही रहने
देते हैं किसी को
भी क्यों बताते हैं
ना अन्ना की टोपी
की जरूरत होती है
ना ही मोदी का कोई
पोस्टर कहीं लगाते हैं
मनमोहन को चाहने
वाले को भी अपने
साथ में मिलाते हैं
चल घर में घर की ही
एक सरकार बनाते हैं
मिड डे मील से हो
रही मौतों से कुछ तो
सबक सीख ले जाते हैं
जहर को जहर ही
काटता है चल
मीठा जहर ही
कुछ कहीं फैलाते हैं
घर के अंदर लाल
हरे भगवे में तिरंगे
रंगो को मिलाते हैं
कुछ पाने के लिये
कुछ खोने का
एहसास घर के
सदस्यों को दिलाते हैं
चाचा को समझा
कुछ देते हैं और
भतीजे को इस
बार कुछ बनाते हैं
घर की ही तो है
अपनी ही है
सरकार हर बार
की तरह इस
बार भी बनाते हैं
किसी को भी इस
से फरक नहीं
पड़ने वाला है कहीं
कल को घर से
बाहर शहर की
गलियों में अगर
हम अपने अपने
झंडों को लेकर
अलग अलग
रास्तों से निकल
देश के लिये एक
सरकार बनाने
के लिये जाते हैं ।

बुधवार, 17 जुलाई 2013

बैल एक दिखा इसलिये कहा

कल्पना की उड़ान
कब कहाँ को कर
जाये प्रस्थान
रोकना भी उसे
आसान नहीं
हो पाता है
अब कुछ अजीब
सा आ ही जाये
दिमाग के पर्दे में
बनी फिल्म को देखना
लाजमी हो जाता है
क्या किया जाये
उस समय जब
एक बैल सामने
से आता हुआ
नजर आता है
बैल का बैल होना
उसके हल को
अपने कंधों पर ढोना
खेत का किसी के
पास भी ना होना
सबके समझ में
ये सब आ जाता है
हर बैल लेकिन
अपने बैल के लिये
एक खेत की सीमा
जरूर बनाता है
उसे भी होना ही
पड़ता है किसी
का एक बैल कभी
अपने बैल को देखते
ही लेकिन यही
वो भूल जाता है
ऊपर से नीचे तक
बैल के बैल का बैल
पर बैल हूँ एक मैं
कोई भी स्वीकार
नहीं ये कर पाता है
हरेक की इच्छा
होती है बहुत तीव्र
हर कोई एक ऎसा
बैल अपने लिये
हमेशा चाहता है
जिसके कटे हुऎ
हो सींग दोनो
हौ हौ करते ही
इशारा जिसके
समझ में आता है
बैल इस तरह
एक साम्राज्य
बैलों का बना
भी ले जाता है
लेकिन बैल तो
बैल होते हैं
गलती से कभी
उतर गया हल
कंधे से थोडी़
देर के लिये
हर बैल उजाड़
लेकिन चला ही
जाना चाहता है ।

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

पूछ रहा है पता जो खुद है लापता

बहुत दिनों से
कई कई बार
सुन रहा था
नया आया है
एक हथियार
कह रहे थे लोग
बहुत ही काम
की चीज है
कहा जा रहा था
उसको सूचना
का अधिकार
एक आदमी
अपना दिमाग
लगाता है और
एक हथियार
अच्छा बना
ले जाता है
दूसरा आदमी
उसी हथियार
को सही जगह
पर फिट करना
सीख जाता है
कमाल दिखाता है
धमाल दिखाता है
ऎल्फ्रेड नोबल का
डायनामाईट कब
का ये हो जाता है
जिसने बनाया
होता है उसे
भी ये पता
नहीं चल
पाता है
उसके घर का
एक लापता
दस रुपिये
के पोस्टल
आर्डर से
उसको ढूँढने
के लिये उसको
ही आवेदन
थमा जाता है
उस बेचारे को
समझ में ही
नहीं आ पाता है
किस से पूछे
कैसे जवाब
इसका बनाया
जाता है कि वो
रहता है आता है
और कहीं भी
नहीं जाता है
तीस दिन तक
बस ये ही काम
बस हो पाता है
जवाब देने की
सीमा समाप्त
भी हो जाती है
जवाब भी तैयार
किसी तरह
कर लिया जाता है
किसी को भी
ये खबर नहीं
होती है कि
लापता इस
बीच फिर
लापता हो
जाता है
सूचना उसकी
कोई भी नहीं
दे पाता है ।

सोमवार, 15 जुलाई 2013

अब तुम भी पूछोगी क्या?


क्यों पूछती हो
एक ही बात
बार बार
ये किस पर
लिखा है
क्या कुछ
लिखा है
मैने कभी
क्या तुमसे
कहा है
मैं लिख
रहा हूँ
तुमको पढ़
भी लेना है
समझना है
इतने लोग हैं
यहाँ कुछ ना
कुछ लिखते
हुऎ शायद
तुमको भी
मेरी तरह
ही नजर
आ रहे हैं
किसी को
कुछ लगता
है अच्छा
किसी को
लगता है
कुछ बुरा
सब ही तो
अपनी अपनी
बात यहाँ
समझा रहे हैं
अब जैसे
कभी चोर
पर लिखा
दिखता है
कहीं अगर
तो कौन सा
सिपाही लोग
उसको पकड़ने
को जा रहे हैं
बस लिख
ले जा
रहे हैं
हम भी
कुछ कहीं
करने को
नहीं जा
रहे हैं
करने वाले
सब लगे
हुऎ हैं
करने में
वो कौन
सा तुम्हारी
तरह पढ़ने
को यहाँ
आ रहे हैं
या तो सीख
लो उन से
कुछ करना
नहीं तो
बस पढ़
लिया करना
अगली बार
से हम भी
तुमको बताने
ये नहीं
जा रहे हैं
हम से
होता तो
है कुछ
भी नहीं
सरे आम
देख कर
आते हैं
वहाँ कुछ
अपनी अंधेरी
गली में
खम्बा नोचना
तक अपना
किसी को
भी नहीं
दिखा पा
रहे हैं ।

शनिवार, 13 जुलाई 2013

विभीषण या हनुमान बता किसको है चाहता

सारा का सारा
जैसे का तैसा
नहीं सब कह
दिया है जाता
बहकते और
भड़कते हुऎ
में से कहने
लायक ही
उगल दिया
है जाता
कहाँनिया तो
बनती ही हैं
मेरे यहाँ भी
तेरे यहाँ भी
बारिशों का
मौसम भी
होता है माना
सैलाब लेकिन
हर रोज ही
नहीं है आता
हर आँख
देखती है
एक ही
चीज को
अपने अलग
अंदाज से
मुझे दिखता
है कुछ जो
उसको कुछ
और ही है
नजर आता
राम की कहानी
है एक पुरानी
विभीषण सुना
रावण को छोड़
राम के पास
है चला जाता
क्या सच था
ये वाकया
तुलसी से
कहाँ अब
ये किसी
से है
पूछा जाता
आज भी तो
दिखता है
विभीषण
उधर जाता
इधर आता
राम के काम
में है आता
रावण के
भी काम
भी है
लेकिन आता
हनुमान जी
क्या कर
रहे होते
होंगे आज
जिसकी
समझ में
आ गयी
होगी मेरी
ये बात
वो भी
कुछ यहाँ
कहाँ कह
कर चला
है जाता
क्योंकि
सारा का सारा
जैसे का तैसा
नहीं सब कह
दिया है जाता ।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

बिल्ला कोई भी लगायेगा आदमी तो हो जायेगा !

कितनी भी बडी़
तोप तू होता होगा
तेरा गोला चलकर
भी फुस्स हो जायेगा
किसी भी गलत मुद्दे को
तू सही ठहराने की
मुहिम में हार जायेगा
कोई भी तेरे साथ
में नहीं आ पायेगा
एक ना एक दिन
लटका दिया जायेगा
बिना किसी बात के
मुश्किल में भी फंसा
कहीं दिया जायेगा
अपने पत्ते अगर
नहीं उनको दिखायेगा
तेरे होने ना होने से
यहाँ कुछ नहीं होता
जो भी होता है
माथे पे लिखे हुऎ
बिल्ले से होता है
तेरा होना यहाँ
भाजपा या काँग्रेस
वाला ही बता पायेगा
दो में नहीं होना भी
थोड़ा बहुत चल जायेगा
तीसरे फ्रंट से कहीं
तेरा तार अगर जुड़ा
उन्हें कहीं दिख जायेगा
मुश्किल में होने पर
होना कहीं ही तेरे को
बचा ले जायेगा
एक दिन तू बचेगा
कभी तू भी किसी को
बचा कर निकाल
के ले आयेगा
कहीं नहीं होने वाला
अपनी आवाज से
बस कुछ कौऎ
और कबूतर ही
उड़ा पायेगा
दल में नहीं घुस सके
संगठन से उसके जा
कर भी अगर
कहीं जुड़ जायेगा
मुश्किलें पैदा करना
किसी के लिये भी
तेरे लिये आसान
बहुत हो जायेगा
हर कोई तेरे से
राय फिर जरूर
लेने के लिये आयेगा
चुनाव के दिनों
को छोड़कर
बाकी दिनों की
समस्या में तू
कहाँ है ये नहीं
देखा जायेगा
तेरे दर्द के लिये
उधर वाला भी
अपने झंडे दिखा
कर जलूस बनायेगा
सबके दिल में
होगा तू इधर भी
और उधर भी
तेरा नाम किसी
की जबान पर
कहीं भी नहीं आयेगा
मेरी एक पते
की बात अगर
तू मान जायेगा
सोनिया, मोदी,
वृंदा या माया दीदी
में से किसी की
छाया भी अगर
कहीं पा जायेगा
तेरा अस्तित्व
उस दिन उभर
कर निखर जायेगा
कौड़ी का भाव
जो आज है तेरा
करोड़ों के मोल
का हो जायेगा
कुछ लोगों के
लिये कुछ
करने वालों मे
गिन लिया जायेगा
ये सब तभी
संभव हो पायेगा
जब बिल्ला कोई एक
माथे पर आज भी
अपने लिखवायेगा
ऎसे ही चलता
रहा बिना छत्र
छाया के अगर
कौन तेरा भला
कुछ कर पायेगा
लावारिस में गिना
जाता है आज भी
लावारिस हमेशा
के लिये हो जायेगा ।

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

किसने बोला कलियुग में रामराज्य नहीं है आता

बाघ बकरी कभी
खेला जाता था
अब नहीं
खेला जाता
बहुत सी जगह
ये देखा है जाता
बाघ बकरी की
मदद कर उसे
बाघ बनाने में
मदद करने है आता
जहाँ बाघ बकरी
की मदद कतिपय
कारणों से नहीं
है कर पाता
वहाँ खुद ही
शहर की मुर्गियों
से बकरियों के लिये
अपील करवाने की
गुहार भी है लगाता
बाघ जिन बकरियों
के साथ है रहता
उनको खाने की
इच्छा नहीं दिखाता
वो बाघ होता है
इतना गया गुजरा
भी नहीं होता
उसके पास इधर
उधर से भी खाने
के लिये बहुत
है आ जाता
बाघ की टीम
का हर सदस्य
बकरियों को
हमेशा ही है
ये समझाता
बाघ बस बकरियों
को बाघ बनाने के
लिये अपनी
जान है लगाता
जिस बकरी की
समझ में नहीं
आ पाती है बात
उसके हाथ से
बाघ बनने का
स्वर्णिम अवसर
है निकल जाता
बाघ बकरियों को
बाघ बनाने के
लिये ही तो
उनकी लाईन
है लगवाता
अपनी कुछ खास
बकरियों को ही
इसके लिये
मानीटर है बनाता
अब इतना कुछ
कर रहा होता है
अपने लिये भी
कुछ माहौल इससे
बनवा ले जाता
बकरियों का इसमें
कौन सा कुछ
है चला जाता
बकरियों की मैं मैं
का शोर जब
अखबार में उसकी
फोटो के साथ
छप है जाता
उसका कद थोड़ा
सा लम्बा इससे
अगर हो भी जाता
ये सब भी तो
बाघ बकरी के
खेल में आघे को
काम है आता
बाघ का ऎसा
आत्मविश्वास
कहानियों में भी
नजर नहीं आता
कौन कहता है
राम राज्य अब
कहीं यहा नहीं
पाया है जाता
बाघ बकरियों को
अपने साथ है
पानी तक पिलाता
बस कभी जब
महसूस करता है
बकरियों के लिये
कुछ नहीं कर पाता
शहर की मुर्गियों से
उनके लिये
झंडे है उठवाता
बकरियों के लिये
बन जाती है
ये एक बडी़ खबर
अखबार तो कायल
होता है बाघ का
उसे छींक भी आये
उसकी फोटो अपने
फ्रंट पेज में
है छपवाता
बकरियों पर आई
आफत का होने
जा रहा है समाधान
बाघ का बस
होना ही
बकरियों के साथ
काम के होने का
संकेत है हो जाता
बाघ बकरी कभी
खेला जाता था
अब नहीं है
खेला जाता ।

सोमवार, 8 जुलाई 2013

मुझ से पूछने आता तो तेरे को कोई कैसे फंसाता

एक डी एन ए
टेस्ट करवाता है
दो नौकर के साथ
बनी सी डी मामले
में फंस जाता है
तीन का फोन
टेप करके चूजे
क्या होते हैं
टी वी पर
सरे आम सबको
बताया जाता है
हे भगवान !
इतनी पकी उम्र
होने पर भी
तेरा सब कुछ
कैसे इतनी
आसानी से
पब्लिक हो
जाता है
वो भी इतना
जिम्मेदार नेता
जो राज्य से
लेकर देश
को चला
ले जाता है
मेरी समझ
में ये नहीं
आता है
तेरे जैसे
लोगों को
उस जगह
पढ़ने कुछ
दिन के लिये
क्यों नहीं
भेज दिया
जाता है
जहाँ ऎसा
वैसा किताबों
में तो कहीं
नहीं दिखाया
जाता है
लेकिन सब कुछ
बहुत आसानी
से किया जाता है
कोई भी
किसी को
कहीं नहीं
फंसाता है
ना टी वी
में आता है
ना ही अखबार
वाला ही वो
सब बताता है
और ये सब करने
वाले को ही बस
इनाम में कुछ
साथ में दिया
भी जाता है
बाकी बचे हुओं
को अभी भी
बता दिया
जाता है
अगर वो भी
एक दो तीन
की तरह ही
कुछ करना
चाहता है
ऎसे स्कूलों
में क्यों नहीं
कुछ दिन
पढ़ने के
लिये आ
जाता है ।

रविवार, 7 जुलाई 2013

क्यों अपने बेताल की किस्मत का बाजा बजा रहा है

विक्रमादित्य के
समय से बेताल
फिर फिर पेड़ पर
लौट कर जाता रहा है
तुझे हमेशा खुशफहमी
होती ही रही है
तेरा बेताल तुझे छोड़
कर कहीं भी नहीं
जा पा रहा है
पेड़ पर लटकता है
जाकर जैसे ही वो
तू अपनी आदत से
बाज नहीं आ रहा है
समय के साथ जब
बदलते रहे हैं मिजाज
विक्रमादित्य के भी
और बेताल के भी
तू खुद तो उलझता ही है
बेताल को भी प्रश्नों में
उलझाता जा रहा है
बदल ले अपनी सोच को
और अपने बेताल को भी
नहीं तो हमेशा ही कहता
चले जायेगा उसी तरह
बेताल फिर फिर लौट
के पेड़ पर जा कर
लटक जा रहा है
देखता नहीं कितना
तरक्की पसंद हो चुके हैं
लोग तेरे आस पास के
हर कोई अपने बेताल से
किसी और के बेताल
के लिये थैलियाँ
पहुँचा रहा है
तू इधर प्रश्न बना रहा है
उसी सड़क से
ही रोज आता है
जहाँ से बरसों से
जाता रहा है
दुख इस बात का
ज्यादा हो जा रहा है
ना तो तू अपना
भला कर पा रहा है
तेरा बेताल भी
बेचारा आने जाने में
बूढा़ तक भी
नहीं हो पा रहा है
आदमी लगा है
अपने काम निकालता
चला जा रहा है
उसका बेताल
यहाँ जो भी करे
वहाँ तो मेरा भारत
महान बना रहा है
तेरे बेताल की किस्मत
ही फूटी हुई है
तेरे प्रश्नों की रस्सी
से फाँसी भी नहीं
लगा पा रहा है
तू बना संकलन
‘ज्यादातर पूछे गये प्रश्न “
कोई उत्तर लेने देने
को नहीं आ रहा है
आज फिर उसी तरह
दिख रहा है दूर से
तेरा बेताल अपने
सिर के बाल
नोचता हुआ
उसी पेड़ पर
लटकने को
चला जा रहा है
जहाँ तू उसे जमाने
से यूँ ही लटका रहा है ।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

पता नहीं चलता, चलता भी तो क्या होता ?

पता ही कहाँ
चल पाता है
जब कोई भगवान
अल्लाह या
मसीहा
हो जाता है
पता ही कहाँ
चलता है
जब आदमी
होना बेमानी
हो जाता है
पता ही कहाँ
चलता है जब
सब संडास
हो जाता है
पता ही कहाँ
चलता है जो
मजा आ रहा है
वो सड़ांध
फैलाने से
सबसे ज्यादा
आता है
पता ही
कहाँ चलता है
सड़ांध और संडास
का कोई कब
आदी हो जाता है
पता ही कहाँ
चल पाता है
तीन तीन साल
आकर आराम करने
वालों में से एक
छ : महीने में ही
भाग जाता है
पता ही कहाँ
चल पाता है
उसके जाते ही
ऊपर का ऎक
किसी के ना
चाहते हुऎ भी
आ जाता है
पता चलता है
वो भी जल्दी
छोड़ के जाना
चाहता है
पता कहाँ
चलता है
अखबार को
ये सब सबसे
पहले कौन
जा कर
बता आता है
पता चलता है
सड़ांध का आदी ही
संडास को सबसे
आसानी से चला
ले जाता है
पता चल
जाता है
बाहर से
आने वाला
संड़ाध को झेल
ही नहीं
पाता है
तीन साल नहीं
तीन महीने में
ही भाग
जाता है ।

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

कभी बड़ा ढोल पीट

कब तक
पीटेगा
कनिस्तर
कभी बड़ा
ढोल पीट
घर के फटे
पर्दे छोड़
नंगी धड़ंगी
पीठ पीट
आती हो
बहुसंख्यकों
को समझ में
ऎसी अब
ना लीक पीट
अपने घर के
कूडे़ को
कर किनारे
कहीं छिपा
ना दिखा
दूर की एक
कोडी़ लाकर
सरे आम
शहर के
बीच पीट
क ख से
कब तक
करेगा शुरु
समय आ
गया अब
एक महंगा
शब्द कोश
ला के पीट
पीट रहे
हैं सब
जब कुछ
किनारे में
जा कर
अपने लिये
ही जब
तू अपने
लिये अब
तो पीटना
ले इन
से सीख
कुछ ना
मिल पा
रहा हो
कहीं गर
तुझे तो
छाती अपनी
ही खोल
और पीट
मक्खियाँ
भिनभिनायें
गिद्ध लाशों
को खायें
किसने कहा
जा के देख
समझदारी
बस दिखा
महामारी की
खबर पीट
घर की
मुर्गी उड़ा
कबूतर
दिल्ली से ला
ओबामा
का कव्वा
बता के पीट
पीटना
है नहीं
तुझको
जब छोड़ना
कुछ बड़ा
सोच कर
बडी़ बातें
ही पीट
कब तक
पीटेगा
कनिस्तर
कभी बड़ा
ढोल पीट ।

सोमवार, 1 जुलाई 2013

रुक के आता दो एक दिन और जब यहाँ कुछ भी नहीं हो रहा था

ऎसा भयानक अनघट
चारों ओर धट रहा था
लिखने की किस को
पडी़ थी देखने में ही
अंदर तक जलता हुआ
लावा सा कुछ इधर
से उधर जैसे हो रहा था
नदी में ही था पानी
पानी की जगह पर
ही तो बह रहा था
वैसे भी किसको क्या
पडी़ थी कोई लिखे
या ना लिखे यहाँ
माथे पर लिखे हुऎ
को समय जब बहुत
बेरहमी से धो रहा था
पानी के शोर की
परवाह कौन करता
जब मौका तरह तरह
के शोर करने का बडी़
मुश्किल से हो रहा था
कुत्ता मालिक के गिरते
मकान का पहरा करते
करते कहीं रो रहा था
ग्लोबल पोजिशनिंग
सिस्टम रिमोट सेंसिंग
की शादी में जैसे
नशे में चूर हो रहा था
मौसम अंतरिक्ष पर्यावरण
सब व्यस्त हो रहे थे
हर बात पर शांतिपूर्वक
बहुत शोध हो रहा था
हर कोई निकल निकल
के जोर जोर से इसी
बात को लेकर रो रहा था
प्रयोगशाला में हो रही
परियोजनाओं का झंडा
पत्रिकाओं में फोटो सहित
ना जाने किस जमाने
से स्टोर हो रहा था
ऎसे मेले में जब हर
अनुभवी एक छोटा
सा पौंधा नहीं बहुत ही
बड़ा पेड़ हो रहा था
'उलूक' अच्छा ही किया
कुछ नहीं लिखा दीवार
पर यहाँ आ कर कुछ दिन
हर कोई चैन से था खुश था
और मजे से सो रहा था ।

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