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सोमवार, 30 सितंबर 2013

चारे ने पहुंचा दिया एक बेचारे को जेल समझ में नहीं आता है !

सच में कभी कभी
अपनी होशियारी
का हमको भी पता
नहीं हो पाता है
एक बड़ी लूट को
जब अदालत में
मान लिया जाता है
तब छोटी छोटी
पाकेट मारी का
धंधा ही सबसे अच्छा
धंधा सिद्ध हो जाता है
ना सी बी आई को
पता चल पाता है
ना ही कोई अदालत
में ले जाकर सजा
का फैसला सुनाता है
छोटी छोटी बचत से
भी एक बड़ा घड़ा
भरा जाता है
फिर एक ही बार में
कोई एक बड़ा हाथ
मारने की गलती
क्यों कर जाता है
तभी तो कहा जाता है
क्यों बिना पढ़े लिखे
कोई नेतागिरी करने
चले जाता है
अपने को तो संभाल
नहीं पाता है
इतने बड़े देश को
चलाने के ख्वाब फिर
क्यों पालना चाहता है
बहुत कुछ है खाने के लिये
पर क्या किया जाये
अगर कोई घास खा कर
जेल जाना चाहता है
एक बेचारा चारे का
मारा हो जाता है
मुख्यमंत्री हो जाने से भी
कुछ नहीं हो पाता है
अपने साथ चार दर्जन
और लोगों का बंटाधार
भी करवाता है !
जो नहीं जा पाया है
किसी भी कारण से
जेल अभी भी
भविष्य के लिये ऐसी
घटनाओं को नजीर
क्यों नहीं बनाता है
अधिक से अधिक
पढ़ा लिखा होकर
छोटा मोटा रोज का
रोज खाने की आदत
क्यों नहीं बनाता है
तीस चालीस साल
की नौकरी में वो भी
जुड़ जुड़ा कर एक
करोड़ तो हो
ही जाता है
पर ऐसा दिमाग
लगाना भी सबको
कहां आ पाता है
इसीलिये कितना बड़ा
भी हो जाये नेता
कभी एक बुद्धिजीवी
नहीं कहलाता है ।

रविवार, 29 सितंबर 2013

मुड़ मुड़ के देखना एक उम्र तक बुरा नहीं समझा जाता है

समय के साथ बहुत सी
आदतें आदमी की
बदलती चली जाती हैं
सड़क पर चलते चलते
किसी जमाने में
गर्दन पीछे को
बहुत बार अपने आप
मुड़ जाती है
कभी कभी दोपहिये पर
बैठे हुऐ के साथ
दुर्घटनाऐं तक ऐसे
में हो जाती हैं
जब तक अकेले होता है
पीछे मुड़ने में जरा सा
भी नहीं हिचकिचाता है
उम्र बढ़ने के साथ
पीछे मुड़ना कम
जरूर हो जाता है
सामने से आ रहे
जोड़े में से बस
एक को ही
देखा जाता है
आदमी आदमी को
नहीं देखता है
महिला को भी
आदमी नजर
नहीं आता है
अब आँखें होती हैं
तो कुछ ना कुछ
तो देखा ही जाता है
चेहरे चेहरे पर
अलग अलग भाव
नजर आता है
कोई मुस्कुराता है
कोई उदास हो जाता है
पर कौन क्या देख रहा है
किसी को कभी भी
कुछ नहीं बताता है
सब से समझदार
जो होता है वो
दिन हो या शाम
एक काला चश्मा
जरूर लगाता है ।

शनिवार, 28 सितंबर 2013

कल तक चाँद हो रहा था रात ही रात में दाग हो गया

सुबह के
अखबार से
सबको पता
हो गया
बच्चा बापू
से बहुत
नाराज हो गया
उसके जवान
हो जाने का
जैसे कहीं कोई
ऐलान हो गया
घर के अंदर
लग रहा था
कल ही कल
में कोई
संग्राम हो गया
अंदर ही अंदर
पक रहा हलुवा
पता नहीं कैसे
आम हो गया
चाँद के सुंदर
होने की बात
पीछे हो गई
दाग होने से
ही वो आज
बेकाम हो गया
माँ की
अंगुली छोड़
अचानक
बेटा खड़ा
हो कर
आम हो गया
विदेश गये
बापू जी
का वहाँ रहना
हराम हो गया
एक बड़ा
दाग होना
होने जा रहा था
सोने में सुहागा
अचानक कोड़ में
खाज हो गया
कुछ खास बड़ा
नहीं बस एक
छोटा सा
अध्यादेश
मुंह में शहद
हो रहा था
गले तक पहुंचते
पहुंचते मुर्गे की
हड्डी हो गया
सच्ची मुच्ची में
लगने लगा है
किसी को कुछ
कुछ हो गया
क्या था कल तक
घर का ही आदमी
घर ही घर में
क्या से क्या
आज हो गया
बेवफा तू ऐसे में
पूरी पूरी रात
चैन की नींद
कैसे सो गया ।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

जो भूत से डरता है पक्का श्राद्ध करता है

सोलह दिन
के पित्र पक्ष
के शुरु होते ही
पंडित जी बहुत ही
व्यस्त हो जाते हैं
श्राद्ध सामग्री
के लिये एक
लम्बी सूची भी
प्रिंट कराते हैं
दूध दही घीं शहद
काजू किशमिश
बादाम फल
मिठाई कपड़े लत्ते
अच्छी क्वालिटी
और
अच्छी दुकान से
लाने का आदेश
साथ में दे जाते हैं
खुद ही खा कर
पितर लोगों तक
खाना पहुंचाते हैं
इसलिये भोजन
छप्पन प्रकार का
होना ही चाहिये
समझा जाते हैं
सुबह सात बजे का
समय देकर दिन में
दो बजे से पहले कभी
नहीं आ पाते हैं
देरी का कारण
पूछने पर
बताने में भी नहीं
हिचकिचाते हैं
लोग बाग जीते जी
अपने मां बाप के लिये
कुछ नहीं कर पाते हैं
इसलिये मरने के बाद
उनकी इच्छाओं को पूरा
जरूर करना चाहते हैं
अपनी इच्छाओं को
इसके लिये
मारना भी पड़े
तब भी नहीं
हिचकिचाते हैं
मृतात्मा के जीवन
काल के शौक को
पंडित से पूरा कराते हैं
जजमान आप इतना भी
नहीं समझ पाते हैं
मरने के बाद मरने वाले
क्योंकि भूत बन जाते हैं
उसके डर से अपने को
निकालने के लिये लोग
कुछ भी कर जाते हैं
कुछ दिन हमारी भी
चल निकलती है गाड़ी
ऐसे लोग वैसे तो कभी
हाथ नहीं आते हैं
कुछ जजमान पीने के
शौक रखने वाले
पितर के नाम से
पंडित जी को अंग्रेजी
ला कर दे जाते हैं
उनके यहां पहले जाना
बहुत जरूरी
होता है इन दिनो
इसलिये आपके यहां
थोड़ा देर से आते हैं ।

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

याद नहीं रहा आज से पहले खतड़ुवा कब था हुआ

बरसात जब
कुछ कम हो गई
घर की सफाई
कुछ शुरु हो गई
काम पर लगे नंदू
से पूछ बैठा यूं ही
ठंड भी शुरु
हो गई ना
हां होनी ही है
खतड़ुवा भी हो गया
उसका ये बताना
जैसे मुझे धीरे से
छोटा करते हुऐ
कहीं बहुत
पीछे पहुंचाना
याद आने लगा मुझे
पशु प्रेमी ग्वालों
का पारंपरिक पर्व
का हर वर्ष अश्विन
माह की संक्रांती
को मनाना और
याद आया
भूलते चले जाना
घास का एक
त्योहार पशुधन
की कुशलता और
गौशालाऐं गाय से
भरी रहने की कामना
गाय के मालिकों की
वंशवृद्धि होती रहे
गाय का सम्मान भी
करती रहे की भावना
त्योहार मनाना
ना होता हो जैसे
कोई खेल होता हो
भांग के पौंधे के एक
सूखे से डंडे को
सुबह से घास फूल
पत्तियों से सजाना
गाय के जाने के
रास्ते के चौराहे पर
घास के चार हाथ पैर
बनाकर फुलौरी
एक बनाना
शाम ढले सपरिवार
उस आकृति
को आग लगाना
सुबह बनायी गई
सजायी गई
लकड़ी से आग को
पीटते चले जाना
'भैल्लो जी भैल्लो
भैल्लो खतड़ुवा
भाग खतड़ुवा भाग'
साथ साथ चिल्लाते
भी चले जाना
जली आग का एक
हिस्सा ले जा कर
गाय के गौठ और
घर पर ला
कर घुमाना
पीली ककड़ी
काट कर बांटना
और मिलकर खाना
फिर याद आया
खो जाना शहर के
पेड़ और घास
घर से गायों
का रंभाना
गायों का
कारें हो जाना
दूध का
यूरिया हो जाना
हर हाथ का
कान से जा कर
चिपक जाना
सड़क पर
चलते चलते
बोलते चले जाना
पड़ोसी की
मौत की खबर
अखबार से
पता चल पाना
ऐसे में बहुत
 बड़ी बात है
खतड़ुऐ की याद
भर आ जाना ।

बुधवार, 25 सितंबर 2013

अपने कैलेंडर में देख अपनी तारीख उसके कैलेंडर में कुछ नया नहीं होने वाला है

रोज एक कैलेंडर
नई तारीख का
ला कर यहां लटका
देने से क्या कुछ
नया होने वाला है
सब अपने अपने
कैलेंडर और तारीख
लेकर अपने साथ
चलने लगे हैं आजकल
उस जगह पर तेरे
कैलेंडर को कौन देखेने
आने वाला है
अब तू कहेगा तुझे
एक आदत हो गई है
अच्छी हो या खराब
किसी को इससे
कौन सा फर्क जो
पड़ने वाला है
परेशानी इस बात
की भी नहीं है
कहीं कोई कह रहा हो
दीवार पर नये साल पर
नया रंग होने वाला है
जगह खाली पड़ी है
और बहुत पड़ी है
इधर से लेकर उधर तक
जहां जो मन करे जब करे
लटकाता कोई दूर तक
अगर चले भी जाने वाला है
सबके पास हैं बहुत हैं
हर कोई कुछ ना कुछ
कहीं ना कहीं पर
ला ला कर
लटकाने वाला है
फुरसत नहीं है किसी को
जब जरा सा भी कहीं
देखने कोई किसी और का
कैलेंडर फिर क्यों कहीं
को जाने वाला है
अपनी तारीख भी तो
उसी दिन की होती है
जिस दिन का वो एक
कैलेंडर ला कर यहां
लटकाने वाला है
मुझे है मतलब पर
बस उसी से है जो
मेरे कैलेंडर की तारीख
देख कर अपना दिन
शुरु करने वाला है |

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मर गयी बीमार नहीं थी बहुत खुश हो गयी थी

एक लड़की
हमेशा बहुत
खुश दिखती थी
शादी के सोलह
साल बाद
उम्मीद होने
से उसकी
खुशी दुगुनी
हो गयी थी
इंतजार की
घड़ियां कुछ
लम्बी जरूर
हो गयी थी
मगर होते
होते बहुत
छोटी हो
गयी थी
दो दिन
पहले
ही उससे
राह चलते
मुलाकात
भी हो
गई थी
कल हुई
थी सर्जरी
जो आजकल
के जमाने में
आम बात
हो गयी थी
बेटा हुआ
था और
खुशी की
बरसात
हो गयी थी
बस एक दिन
के बाद की
खबर आम
हो गई थी
खुशी खुशी
वो इस दुनिया
से ही विदा
हो गई थी
डाक्टर ने
बताया
इतना खुश
हो गई थी
कि हमेशा
के लिये ही
सो गई थी
पहली बार
ही ऐसी बात
कुछ सुनी थी
मेरे लिये नयी
बस नयी सी थी
बीमारी से नहीं
खुशी से
हो गई थी
एक खुश
मिजाज लड़की
इतना खुश
हो गयी थी
मौत के साथ
खुशी खुशी
विदा हो गयी थी ।

सोमवार, 23 सितंबर 2013

एक सही एक करोड़ गलत पर भारी होता है

ऐसा एक नहीं
कई बार होता है
जब ऊपर वाले
का अपना कोई
नीचे आकर के
जन्म लेता है
हर कोई उसे
उसका एक
अवतार कहता है
सुना गया है
बैकुंठ में वैसे तो
सब कुछ होता है
और
अलौकिक होता है
फिर इस लोक में
क्यों कोई आने को
इतना आतुर होता है
ये उसकी समझ में
आने से बहुत
दूर होता है
जो खुद के
यहां होने से
बहुत दुखी होता है
जब देखो बैकुंठ
जाने के लिये
रोता रहता है
पर जो जो
यहां होता है
वो बैकुंठ में कभी
नहीं होता है
लूटमार भ्रष्टाचार
सड़क का ब्लात्कार
बीस गोपियां
बीबी चार
मैं और मेरे को
लेकर मारामार
केवल यहीं होता है
और
यहां सब की
नजर में ये
सब कुछ
ठीक होता है
वो कहता है कि
सबको ठीक करने
के लिये ही उसे
ऊपर से नीचे
उतरना होता है
किसी को पता
नहीं होता है
जब भी उसका मन
इस लोक में
आने का होता है
उसके इशारे पर ही
यहां बहुत कुछ होता है
उस बहुत कुछ को
देखने सुनने के लिये
ही तो वो यहां होता है
अकेले होता है
से क्या होता है
परलोक का एक
इस लोक के अनेक
के ऊपर बहुत
भारी होता है
कोई भी कहीं भी
कुछ भी करता रहे
जब वो यहां होता है
तो फिर किसी के भी
किये गये गलत सलत
से क्या होता है
उसका होना ही
अपने आप में
क्या नहीं होता है ।

रविवार, 22 सितंबर 2013

छुट्टी पर जा कुछ लिख पढ़ के आ

लम्बे अर्से के बाद
मिले एक मित्र से
पूछ बैठा यूं ही
क्या बात है
बहुत दिनों के बाद
नजर आ रहे हो
आजकल काम पर
क्या किसी दूसरे
रास्ते से जा रहे हो
जवाब मिला कुछ ऐसा
काम के दिनों में
ज्यादातर छुट्टी पर
चला जाता हूं
कभी आप भी
चलिये ना मेरे साथ
चलकर आपको भी
किसी दिन वो
जगह दिखाता हूं
जहां चैन से बैठ कर
कुछ लिख पढ़
ले जाता हूं
काम का क्या है
बहुत से पागल होते हैं
काम के दीवाने
उनको थोड़ा थोड़ा
बांट के आता हूं
कागज कलम लेकर
लिखने में अब वो
मजा कहां रह गया
अखबार में लिखने पर
पता चला कि सब को
कहां हूं मैं का कुछ
पता चल गया
इसी लिये यहां
पर लिखता हूं
कौन हूं बस ये बात
किसी को नहीं बताता हूं
अंदर की बातें अपने
अंदर ही रखकर एक
छद्मरुप हो जाता हूं
बहुत सुकून मिलता है
उधर अपने किये हुऐ
इधर उधर का प्रायश्चित
इधर लिख लिख कर
पा जाता हूं
बस यही कारण है
काम के बोझ को
कम करने के लिये
लिखने पढ़ने को
कहीं को भी कभी भी
चला जाता हूं ।

शनिवार, 21 सितंबर 2013

सजाये मौत पहले बहस मौत के बाद !


अलग अलग जगहें
अलग अलग आदमी
कई किताबों में
कई जगह लिखी
हुई कुछ इबारतें
समय के साथ
बदलते हुऐ उनके मायने
मरती हुई एक लड़की
कोख में सड़क में
ससुराल में घर में
कभी एक औरत
कभी अर्धांगिनी
कभी बेटी कभी बहन
कहीं दुपट्टे से लटकी हुई
कहीं कटी हुई टुकड़ों में
कहीं जलती हुई खेत में
कहीं बीच सड़क पर
टी वी के एक प्रोग्राम
के बहस का मुद्दा
एक लाश एक फोटो
एक अखबार के लिये
बस एक खबर
सड़क पर एक भीड़
हर मौत पर एक गुस्सा
पता नहीं किस पर
मौत भी ऐसी जो
दे दी जाती है
बिना किसी
सजा के सुनाये
समय के साथ
इबारत नहीं बदली
ना ही आदमी बदला
मौत की सजा जारी है
अपनी जगह बादस्तूर
दे दी जाती है
बहस भी होती है
हमेशा की तरह पर
सजाऐ मौत के बाद
आदमी के पास
कानून नहीं है
पता नहीं क्यों
नहीं है अभी तक
पता चलती है ये बात
अगर देखेने लगे कोई
कितनी लड़कियों को
मारा गया सजाये
मौत देने के बाद ।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

एक भीड़ एक पोस्टर और एक देश

इधर कुछ
पढ़े लिखे
कुछ अनपढ़
एक दूसरे के
ऊपर चढ़ते हुऐ
एक सरकारी
कागज हाथ में
कुछ जवान
कुछ बूढ़े
किसी को
कुछ पता नहीं
किसी से कोई
कुछ पूछता नहीं
भीड़ जैसे भेड़
और बकरियों
का एक रेहड़
कुछ लैप टौप
तेज रोशनी
फोटोग्राफी
अंगुलियों और
अंगूठे के निशान
सरकार बनाने
वालों को मिलती
एक खुद की पहचान
एक कागज का टुकड़ा
'आधार' का अभियान
उसी भीड़ का अभिन्न
हिस्सा 'उलूक'
गोते लगाती
हुई उसकी
अपनी पहचान
डूबने से अपने
को बचाती हुई
दूसरी तरफ
शहर की सड़कों
पर बजते ढोल
और नगाड़े
हरे पीले गेरुए
रंग में बटा हुआ
देश का भविष्य
थम्स अप लिमका
औरेंज जूस
प्लास्टिक की
खाली बोतलें
सड़क पर
बिखरे खाली
यूज एण्ड थ्रो गिलास
हजारों पैंप्लेट्स
नाच और नारे
परफ्यूम से ढकी सी
आती एल्कोहोल
की महक
लड़के और लड़कियां
कहीं खिसियाता
हुआ 
 लिंगदोह
फिर कहीं 'उलूक'
बचते बचाते
अपनी पहचान को
निकलता हुआ दूसरी
भीड़ के बीच से और
तीसरी तरफ
प्रेस में छपते हुए
एक आदमी
के पोस्टर
जो कल
सारी देश की
दीवार पर होंगे
और
यही भीड़
पढ़ रही होगी
दीवार पर
लिखे हुऐ
देश के
भविष्य को
जिसे इसे ही
तय करना है ।

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

सोचता हूं कुछ अलग सा लिखूं पर जब ऐसा देखता हूं तो कैसे लिखूं

बंदर को नहीं
पता होता है
उसका एक
एक करतब
मदारी के कितने
काम का होता है
बंदर को बंदर से
जब लड़ाया जा
रहा होता है
मदारी भी मदारी
की टांग खीचने
का गणित लगा
रहा होता है
मदारी भी क्या करे
उसके ऊपर भी एक
मदारी होता है
बंदर तो पूरी चेन का
एक छोटा सा बस
खिलाड़ी होता है
बंदर की हार या
बंदर की जीत
तय करती है
मदारी उसके अपने
मदारी के कितने
काम का होता है
जरुरी नहीं होता है
कि हरेक मदारी
अपने अपने बंदर
के साथ होता है
मौका पड़ता है तो
दूसरे मदारी के
बंदर का हाथ भी
उसके हाथ होता है
बंदर और बंदरों
की लड़ाईयां
मौके बे मौके
प्रायोजित
करवाई जाती हैं
बंदर इस
काम के लिये
बहुत से बंदरों
को अपने
साथ लेता है
बंदर कभी
नहीं सोचता है
वो क्यों और
किसके लिये
मैदान में होता है
मदारी का काम भी
अपने मदारी के
लिये होता है
हर मदारी के
ऊपर भी एक
मदारी होता है
बंदर बस मैदान का
एक खिलाड़ी होता है
बंदर का बंदर भी
अपना नहीं होता है
एक बंदर एक मदारी के
लिये कुर्बान होता है
ये सब कुछ तो
हर समय हर जगह
पर हो रहा होता है
मेरे देश की
एक खासियत है ये
मजमा जरूर होता है
हर समय होता है
हर जगह हो
रहा होता है
'उलूक'
खुद भी कभी
एक मूक
दर्शक होता है
और कभी
एक बंदर
भी किसी का
हो रहा होता है ।

बुधवार, 18 सितंबर 2013

किसी का ठेका कभी तू भी तो ले, नहीं तो सबका ठेका हो जायेगा !

हर काम को ठेके के
हिसाब से करने की
आदतें हो जाती है
ठेकेदारी घर से ही
जब शुरु की जाती है
गली मौहल्ले शहर
राज्य से होते हुऐ
देश तक भी तभी
ले जाई जाती है
कहीं कोई निविदा
नहीं निकाली जाती है
काम ठेकेदार के हाथ में
दिखने के बाद ही
ठेके की कीमत
आंकी जाती है
ठेके लेने के लिये
किसी भी तरह की
योग्यता एक बना
ली जाती है जो
कभी कभी ठेके देने
वाले की मूंछ की
लम्बाई से भी
निकाली जाती है
आकाश पृथ्वी हवा
के ठेके तक भी
लिये जाते हैं
किसने दिये किससे लिये
कौन कहां किस किस को
जा जा कर बताते हैं
कोई भी अपने आप
को एक ठेकेदार
मान ले जाता है
जिस चीज पर दिल
आ जाये उस का वो
एक ठेकेदार हो जाता है
किसी दूसरी चीज पर
दूसरा ठेकेदार अपनी
किस्मत आजमाता है
ठेकेदार की भाषा को
ठेकेदार ही बस
समझ पाता है
एक ठेकेदार हमेशा
दूसरे ठेकेदार से
रिश्तेदारी पर
जरूर निभाता है
कभी खुद के लिये
एक तलवार कभी
दूसरे के लिये ढाल
तक हो जाता है
छोटे छोटे ठेकों से
होते हुऐ ठेकेदार
कब एक बड़ा
ठेकेदार हो जाता है
ठेकेदार को भी पता
नहीं चल पाता है
अपने घर को ठेके
पर लगाते लगाते
जिस दिन पूरे देश को
ठेके पर देने के लिये
उतर आता है
उसी दिन समझ में
ये सब आता है
ठेका लेना हो अगर
किसी भी चीज का
तो किसी से कुछ कभी
नहीं पूछा जाता है
बस ठेका ले ही
लिया जाता है।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

उनकी मजबूरी के खेत मेरे सपनों के पेड़

किसी की
मजबूरी भी
किसी का
सपना हो
जाती है
ये बात
बहुत आसानी
से कहां समझ
में आ पाती है
आश्चर्य तो
तब होता है
जब एक ऐसे ही
सपने के आते ही
किसी की बांछें
खिल जाती हैं
यही सोच एक
दुधारू गाय
बन कर
सामने आ
जाती है
जितने ज्यादा
मजबूर लोग
होते हैं उतना
ज्यादा दूध
बहाती है
किसी की
मजबूरी को
एक सपना
बनाना
उस सपने
को पूरा
करने के लिये
तन मन
धन लगाना
सपने की
बात को
किसी को
भी ना बताना
इसके बावजूद
उस सपने को
पूरा करने
के लिये
मिनटों में
मददगारों
के एक
जमघट का
जुट जाना
सपने का
फलना फूलना
शुरु हो जाना
दूध का
निकलने से
पहले ही
बंट जाना
कुछ लोगों की
मजबूरी पर
एक पूरा उद्योग
खड़ा हो जाना ही
एक आदमी की
प्रबंधन क्षमता
को दिखाती है
देश को चलाने
के लिये ऐसे ही
सक्षम लोगों की
जरूरत महसूस
की जाती है
इसीलिये
हर सरकार
हर जगह पर
छांट छांट कर
ऐसे महागुरुओं को
ला कर बिठाती है
इन महागुरुओं की
मदद लेकर ही
मजबूर देश के
मजबूरों को वो
हांक ले जाती है ।

सोमवार, 16 सितंबर 2013

बाघ तू तो खाली बाघ हो रहा है

सुबह से शोर
मच रहा है
शहर के किसी
मौहल्ले में आज
झाड़ियों के बीच
एक बाघ
दिख रहा है
ऐसा आज
पहली बार
नहीं हो रहा है
कि बाघ आबादी
के बीच में
आकर के
घुस रहा है
या तो बाघ
जंगल में बहुत
हो रहे हैं
या जंगल में
बाघ बहुत
बोर हो रहे हैं
इसीलिये शायद
जंगल छोड़
शहर की ओर
हो रहे हैं
बाघ को कौन
समझाये जाकर
कि शहर के लोग
भी अब बहुत
बाघ हो रहे हैं
बाघ कुछ भी
नहीं है
उनके सामने
बताया नहीं
जा सकता कि
वो कितने
घाघ हो रहे हैं
कंकरीट के जंगल
शहर में हर ओर
बो रहे हैं
बाहर से मुलायम
दिखा कर अंदर से
कठोर हो रहे हैं
बाघ माना कि
तेरे पास खाने को
नहीं हो रहा है
तभी तो तू शहर
की ओर हो रहा है
शहर में लेकिन
बस वो ही बाघ
हो रहा है
जिसका पेट पूरे
गले गले तक
भरा हो रहा है
तू तो बाघ है
और रहेगा भी
बाघ हमेशा ही
पर वो जब जब
लाल देख रहा है
तब तब वो एक
बाघ हो रहा है ।

रविवार, 15 सितंबर 2013

गर्व से कहो फर्जी हैं


देश में फर्जी लोगों
की कमी नहीं है ये
मैं नहीं कह रहा हूं
आज के हिंदुस्तान के
मुख्य पृष्ठ में छपा है
और इस बात को
देश का सुप्रीम कोर्ट
सुना है कह रहा है
फर्जी डाक्टर
फर्जी पुलिस
फर्जी पायलट
जैसे और कई
खुशी हुई बस
ये देख कर
फर्जी मास्टर कहीं
भी नहीं लिखा है
मजे की बात देखिये
कोर्ट को जैसे बहुत
गर्व हो रहा है कि
इन फर्जी लोगों के
कारण ही तो
देश सही ढंग से
चल रहा है
कोर्ट मानता है
हजारों फर्जी वकील
रोज वहां आ रहे हैं
अच्छा काम कर रहे हैं
समय पर लोगों को
न्याय दिलवा रहे हैं
ऐसे में आप लोग
क्यों परेशान इतना
हो जा रहे हैं
क्यों फर्जी पायलटों की
बात हमें बता रहे हैं
एक दो हवाई जहाज
अगर वो कहीं
गिरा रहे हैं तो
कौन सा देश के लिये
खतरा हो जा रहे हैं
थोड़े कुछ अगर मर
भी जा रहे हैं
तो देश की जनसंख्या
कम करने में अपना
योगदान कर जा रहे हैं
देख क्यों नहीं रहे हैं
बहुत से ऐसे लोग
देश को तक चला रहे हैं
इतना बड़ा देश
हवा में उड़ रहा है
कई साल हो गये
इसे उड़ते उड़ते
आज तक तो कहीं
भी नहीं गिरा है
फिर काहे में कोर्ट
का समय आप
लोग खा रहे हैं
फर्जी होना ही
आज के समय में
बहुत जरूरी हो गया है
जो नहीं हुआ है
उसने कुछ भी नहीं
अभी तक किया है
सही समय पर
सही निर्णय जो
लोग ले पा रहे हैं
किसी ना किसी
फर्जी को अपना
गुरु बना रहे हैं
और जो लोग फर्जी
नहीं हो पा रहे हैं
देश के नाम पर
कलंक एक हो
जा रहे हैं
ना ही अपना भला
कर पा रहे हैं
ना ही किसी के
काम आ पा रहे हैं
आपको शरम भी
नहीं आ रही है
ऐसे में भी एक
फर्जी के ऊपर
मुकदमा ठोकने
कोर्ट की शरण में
आ जा रहे हैं ।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिंदी दिवस तो हो गया

हिंदी दिवस ही
तो था हो गया
कुछ को पता था
कुछ और को भी
चलो आज इसी
बहाने से और
पता हो गया
हिंदी के अखबार में
छोटा सा समाचार
हिंदी दिवस पर
दिखा कहीं कौने
पर एक वो भी
पढ़ते पढ़ते पता
ही नहीं चला
कंहा गया और
कहां खो गया
अब किसी सँत
वैलेंटाईन का
आदेश तो था नहीं
जो कह ले जाते
मनाना बहुत ही
जरूरी हो गया
चकाचौंध कभी
थी नहीं वैसे भी
हिंदी भाषा में
सीधी सादी एक
हीरोईन को छोटे
कपड़ों में आना
लगता है अब
बहुत ही जरूरी
सा कुछ हो गया
सबसे सुन्दर और
अलंकृत मात्र भाषा
की सुन्दरता को
उसके अपनो को ही
दिखाने के लिये
एक नजदीक का
चश्मा पहनाना
लगता है अब बहुत
ही जरूरी हो गया
ज्यादा क्या लिखना
हिंदी जैसे विषय पर
घर की मुर्गी का
स्वाद एक बार फिर
से जब मूंग की दाल
के बराबर हो गया ।

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