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मंगलवार, 28 मई 2013

सरकार होती है किसकी होती है से क्या ?

अब भाई होती है
हर जगह एक
सरकार बहुत
जरूरी होती है
चाहे बनाई गयी हो
किसी भी प्रकार
घर की सरकार
दफ्तर की सरकार
शहर की सरकार
जिला प्रदेश होते हुऎ
पूरे देश की सरकार
कुछ ही लोग बने होते हैं
सरकार बनाने के लिये
उनको ही बुलाया जाता है
हमेशा हर जगह
सरकार को चलाने के लिये
कुछ नाकारा भी होते हैं
बस सरकार के काम
करने के तरीके पर
बात की बात बनाने वाले
काम करने वाले काम
करते ही चले जाते हैं
बातें ना खुद बनाते हैं
ना बाते बनाने वालों
की बातों से परेशान
हो गये हैं कहीं दिखाते हैं
छोटी छोटी सरकारें
बहुत काम की
सरकारें होती हैं
सभी दल के लोग उसमें
शामिल हुऎ देखे जाते हैं
दलगत भावनाऎं कुछ
समय के लिये अपने
अंदर दबा ले जाते हैं
बडे़ बडे़ काम
हो भी जाते हैं
पता ही नहीं चलता है
काम करने वाले काम
के बीच में बातों को
कहीं भी नहीं लाते हैं
छोटी सरकारों से
गलतियाँ भी नहीं
कहीं हो पाती है
सफाई से हुऎ होते हैं
सारे कामों के साथ साथ
गलतियाँ भी आसानी से
सुधार ली जाती हैं
तैयारी होती है तो
मदद भी हमेशा
मिल ही जाती है
गलती खिसकती भी है
तो अखबार तक पहुँचने
से पहले ही पोंछ दी जाती है
ज्यादा परेशानी होने पर
छोटी सरकार के हिस्से
आत्मसम्मान अपना जगाते हैं
अपनी अपनी पार्टी के
झंडे निकाल कर ले आते हैं
मिलकर काम करने को
कुछ दिन के लिये टाल
कर देश बचाने के
काम में लग जाते हैं
बड़ी सरकार की
बड़ी गलतियों से
छोटी सरकारों की
छत्रियां बनाते हैं
बडी सरकार में भी
तो इनके पिताजी
लोग ही तो होते हैं
वो भी तुरंत कौल का गेट
बंद कर कुछ दिन
आई पी एल की
फिक्सिंग का ड्रामा
करना शुरु हो जाते हैं ।

शनिवार, 25 मई 2013

कमल बनना है तो कीचड़ पहले बना !

पढे़ लिखे लोग
यूं ही बुद्धिजीवी
नहीं कहलाते हैं
कभी देखा
कुछ हो भी जाये
उनके आस पास
बहुत सारे होते हैं
उसपर भी
कहने को कोई
कुछ नहीं आते हैं
कहते भी हैं तो
कान में कहते हैं
अखबार में नहीं
वो जो भी
छपवाते हैं
आई एस बी एन
होने पर ही
छपवाते हैं
माना कि तू भी
गलती से कुछ
पढ़ लिख ले गया
पर किस ने
कह दिया तुझसे
कि तू भी उसी
कैटेगरी का हो गया
हर बात पर
कुछ ना कुछ
कहने को चला
यहां आता है
गन्दी बातें बस
दिमाग में रखता है
गन्दगी यहाँ फैलाता है
देखा कभी कोई
पौसिटिव सोच वाला
तेरे से बात भी करना
कुछ चाहता है
निगेटिव देखता है
निगेटिव सोचता है
निगेटिव ही
बस फैलाता है
अब किसी कीचड़
फैलाने वाले को
यूँ ही फालतू में नहीं
गलियाना चाहिये
ये भी देखना चाहिये
अखबार में वो
कमल की तरह
दिख रहा है
इतना तो समझ
ही जाना चाहिये
कीचड़ अगर
नहीं फैलाया जायेगा
तो कमल कैसे
एक उगाया जायेगा
समझा कर
ये बात शायद
तेरे पिताजी ने तुझे
नहीं बतायी होगी
कमल बनाने के लिये
कीचड़ बनाने की विधि
तुझे नहीं समझाई होगी
देखता नहीं
तेरे आसपास के
सारे सफेदपोश
पैजामा उठा
कर चलते हैं
कीचड़ के छीटे
उछलते हैं तो
बस उछलते हैं
किसी को
उस कीचड़ से
कोई परेशानी
नहीं होती है
सरकार को
पता होता है
वो तो कमल की
दीवानी होती है
इसलिये
अब भी समय है
कुछ तो सुधर जा
पब्लिक को बेवकूफ
मत समझा कर
अपना भी समय
ऎसे वैसे में ना गंवा
कुछ काम धाम
करने की सोच बना
समान सोच के लोग
जो फैला रहे हैं कीचड़
उनकी शरण में जा
कमल ना भी बन पाया
तो कोई बात नहीं
कमल बनाने की
तकनीक सीख कर
वैज्ञानिक सोच ही
पैदा कर ले जा
कुछ प्रोजेक्ट ही ले आ
कुछ कर रहा है
वो ही चल दे दिखा ।

मंगलवार, 21 मई 2013

बधाई रजिया ने दौड़ है लगाई

अफसोस हुआ बहुत
अभी अभी जब किसी
ने खबर मुझे सुनाई
होने वाला है ये जल्दी
कह रही थी मुझसे
कब से फेसबुकी ताई
पर इतनी जल्दी ये सब
हो ऎसे ही जायेगा
क्यों हुआ कैसे हुआ
अब कौन मुझे बतायेगा
रजिया जब से गुंडों को
सुधारने मेरे घर में आई
पच नहीं रही थी मुझे
उसकी ये बात
बिल्कुल भी भाई
बस लग रही थी जैसे
इतनी हिम्मत उसमें
किसने है जाकर जगाई
रजिया सुना सब कुछ
छोड़ कर जा रही है
मेरे घर का राज
फिर से मेरे घर के
गुण्डों को फिर से
थमा रही है
मेरे घर की किस्मत
फिर से फूटने को
सुना है जा रही है
चलो कोई बात नहीं
फिर से मिलकर अब
जुट जाना चाहिये
किसी और एक रजिया
को यहाँ आ कर
फंसने के लिये
फंसाना चाहिये
वैसे चिंता करने
की बात नहीं
होनी चाहिये
जो कर रही है
देश को बर्बाद
उसको मेरे घर को
गिराने के लिये
कोई बड़ा बहाना
कहाँ होना चाहिये
जल्दी ही सरकार
किसी रजिया को
फिर ढूँढ लायेगी
मेरे घर के गुंडो
का फिर भी वो
क्या कुछ कर पायेगी
ये बात ना मेरे को
ना मेरे पड़ोसियों
के समझ में आयेगी
जो शक्ति इतने बडे़
देश का कर रही है
बेड़ा गर्क रोज रोज
वो ही मेरे घर के बेडे़
का गड्ढा भी बनायेगी ।

शनिवार, 18 मई 2013

कुछ अच्छा लिख ना

आज कुछ तो
अच्छा लिखना
रोज करता है
यहाँ बक बक
कभी तो एक
कोशिश करना
एक सुन्दर सी
कविता लिखना
तेरी आदत में
हो गया है शुमार
होना बस हैरान
और परेशान
कभी उनकी तरह
से कुछ करना
जिन्दगी को रोंदते
हुऎ जूते से
काला चश्मा
पहने हुऎ हंसना
गेरुआ रंगा
कर कुछ कपडे़
तिरंगे का
पहरा करना
अपने घर मे
क्या अटल
क्या सोनिया
कहना
दिल्ली में
करेंगे लड़ाई
घर में साथ
साथ रहना
ले लेना कुछ
कुछ दे देना
इस देश में
कुछ नहीं
है होना
देश प्रेम
भगत सिंह का
दिखा देना
बस दिखा देना
बता देना वो
सब जो हुआ
था तब बस
बता देना
लेना देना
कर लेना
कोई कुछ
नहीं कहेगा
गाना इक
सुना देना
वन्दे मातरम
से शुरु करना
जन गण मन
पर जाकर
रुका देना
कर लेना जो
भी करना हो
ना हो सके तो
पाकिस्तान
के ऊपर ले जा
कर ढहा देना
सब को सब
कुछ पता होता है
तू अपनी किताब
को खुला रखना
आज कुछ तो
अच्छा लिखना
रोज करता है
यहाँ बक बक
कभी तो एक
कोशिश करना
एक सुन्दर सी
कविता लिखना ।

शुक्रवार, 17 मई 2013

मुखौटे हम लगाते हैं !

उसे पता होता है
मुझे पता होता है
उसके पास होता है
मेरे पास होता है
हम दोनो लगाते हैं
बस यूँ मुस्कुराते हैं
खुश बहुत हो जाते हैं
जैसे कुछ पा जाते हैं
बस ये भूल जाते हैं
समझ सब सब पाते हैं
वो जब हमें बनाते हैं
साँचे एक ही लगाते हैं
पढ़ते हैं और पढा़ते हैं
किताबें साँथ लाते हैं
स्कूल साथ जाते हैं
घर को साँथ आते हैं
समझते हैं समझाते हैं
फोटो सुंदर लगाते हैं
हंसते हैं मुस्कुराते हैं
बातें खूब बनाते हैं
इसको ये दिखाते हैं
उसको वो दिखाते हैं
बिना पहने ही आते हैं
आते ही बनाते हैं
बिना पहने ही जाते हैं
जाते हुऎ छोड़ जाते हैं
ना आते में दिखाते हैं
ना जाते में दिखाते हैं
सब के पास पाते हैं
मिलते ही लगाते हैं
दिल खोल के दिखाते हैं
खुली किताब है बताते हैं
विश्वास में ले आते हैं
विश्वास फिर दिलाते हैं
कुछ कुछ भूल जाते हैं
कुछ कुछ याद लाते हैं
कितना कुछ कर ले जाते हैं
कितना कुछ ले आते हैं
कितना कुछ दे जाते हैं
ना जाने क्यों फिर भी
हम जब भी मिलते हैं
मिलते ही लगाते हैं
ना जाने क्यों लगाते हैं
ना जाने क्यों बनाते हैं
ना जाने क्यों छिपाते हैं
मुखौटे मेरे और उसके
कब किस समय आके
चेहरे पर हमारे बस
यूँ ही लग जाते हैं
ना वो बताते हैं
ना हम बताते हैं
उनको पता होता है
हमको पता होता है
उनके पास होता है
मेरे पास होता है
हम दोनो लगाते हैं
मुखौटे सब लगाते हैं
सब कुछ बताते हैं
बस मुखौटे छिपाते हैं ।

मंगलवार, 14 मई 2013

कुछ तो सीख बेचना सपने ही सही

उसे देखते ही
मुझे कुछ हो
ही जाता है
अपनी करतूतों
का बिम्ब बस
सामने से ही
नजर आता है
सपने बेचने
में कितना
माहिर हो
चुका है
मेरा कुनबा
जैसे खुले
अखबार की
मुख्य खबर
कोई पढ़
कर सामने
से सुनाता है
कभी किसी
जमाने में
नयी पीढी़ के
सपनों को
आलम्ब देने
वाले लोग
आज अपने
सपनों को
किस शातिराना
अंदाज में
सोने से
मढ़ते चले
जा रहे हैं
इसके सपने
उसके सपने
का एक
अपने अपने
लिये ही बस
आधार बना
रहे हैं
सपने जिसे
देखने हैं
अभी कुछ
वो बस
कुछ सपने
अपने अपने
खरीदते ही
जा रहे हैं
सच हो रहे
सपने भी
पर उसके
और इसके
जो बेच
रहे हैं
खरीदने वाले
बस खरीद
रहे हैं
उन्हे भी
शायद पता
हो गया है
कि वो
सपने सच
होने नहीं
जा रहे हैं
वो तो बस
इस बहाने
हमसे सपने
बेचने की
कला में
पारंगत होना
चाह रहे हैं ।

रविवार, 12 मई 2013

अच्छी सोच छुट्टी के दिन की सोच

अखबार आज
नहीं पढ़ पाया
हौकर शायद
पड़ौसी को
दे आया
टी वी भी
नहीं चल पाया
बिजली का
तार बंदर ने
तोड़ गिराया
सबसे अच्छा
ये हुआ कि
मै काम पर
नहीं जा पाया
आज रविवार है
बडी़ देर में
जाकर याद आया
तभी कहूँ आज
सुबह से अच्छी
बातें क्यों सोची
जा रही हैं
थोड़ा सा रूमानी
हो जाना चाहिये
दिल की धड़कन
बता रही है
बहुत कुछ अच्छा
सा लिखते हैं
कुछ लोग
कैसे लिखते होंगे
अब समझ में
आ रहा है
मेरा लेखन
इसीलिये शायद
कूड़ा कूड़ा हुआ
जा रहा है
अखबार हो
टी वी हो
या तेरा समाज हो
तेरे को जो कुछ
दिखा रहा है
तू खुद वैसा
होता जा रहा है
कुछ अच्छी सोच
से अगर अच्छा
लिखना चाह रहा है
अखबार पढ़ना छोड़
और टी वी बेच कर
जंगल को क्यों
नहीं चले
जा रहा है ?

शनिवार, 11 मई 2013

फिर देख फिर समझ लोकतंत्र

रोज एक लोकतंत्र
समझ में आता है
तू फिर भी लोकतंत्र
समझना चाहता है
क्यों तू इतना
बेशरम हो जाता है
बहुमत को समझने
में सारी जिंदगी
यूँ ही गंवाता है
बहुमत इस
देश की सरकार है
क्या तेरे भेजे में
ये नहीं घुस पाता है
देखता नहीं
सबसे ज्यादा
मूल्यों की
बात उठाने वाला ही
तो मौका आने पर
अपना बहुमत
अखबार में
छपवाता है
मौसम मौसम
दिल्ली सरकार
और उसके लोगों
को कोसने वालों
की भीड़ का
झंडा उठाता है
अपनी गली में
उसी सरकार
के झंडे के
परदे का घूँघट
बनाने से बाज
नहीं आता है
मेरे देश की
हर गली
कूँचे में
एक ऎसा
शख्स जरूर
पाया जाता है
जो अपना
उल्लू सीधा
करने के लिये
लोकतंत्र की
धोती को सफेद
से गेरुआँ
रंगवाता है
तिरंगे के रंगो
की टोपियाँ
बेचता हुआ
कई बार
पकड़ा जाता है
ऎसा ही शख्स
कामयाबी की
बुलंदी छूने
की मुहिम में
इस समाज के
बहुमत से
दोनो हाथों
में उठाया
जाता है
और एक
तू बेशरम है
सब कुछ देखते
सुनते हुऎ
अभी तक
दलाली के
पाठ को नहीं
सीख पाता है
तेरे सामने सामने
कोई तेरा घर
नीलाम कर
ले जाता है
जब तू अपना
घर ही नहीं
बेच पाता है
तो कैसे
तू पूरे देश
को नीलाम
करने की
तमन्ना के
सपने पाल कर
अपने को
भरमाता है ।

गुरुवार, 9 मई 2013

मजदूर का हितैषी ठेकेदार


ठेकेदार लोग
बहुत ही ज्यादा
ईमानदार लोग
अपने अपने ठेके
का पूरा पेमेंट
ले के आते हैं
इसलिये वो
मलाई भी
थोड़ा खाते हैं
इतनी सी बात
आप क्यों नहीं
समझ पाते हैं
सब एक जैसे
थोडे़ होते हैं
कुछ मजदूरों का
ध्यान रखने
वाले भी
तो होते हैं
ये बात
दिहाडी़ करने
वाले जानते हैं
हर ठेकेदार की
नब्ज पहचानते हैं
ठेकेदार का हर
काम इसलिये
वो चुटकी में
कर ले जाते हैं
उसके लिये
भीड़ भी
बनाते हैं
समाचार बने
या ना बने
वो बेचारे
अपनी फोटो
जरूर खींच
कर दे जाते हैं
ठेकेदार उनकी
मदद करने
में अपनी
जान न्योछावर
कर ले जाते हैं
रोटी अगर
दिलवा भी
ना सके उनको
डबलरोटी
दिलवाने के
लिये तुरंत
धरने में
बैठ जाते हैं
अपना पैमेंट
पहले ही
ले आते हैं
गरीब मजदूर
को फिर
एक बार
इक्ट्ठा करके
समझाते हैं
वो तो बस
उनके हित के
लिये ही
बस ठेकेदारी
करने के लिये
आते हैं
वरना तो
देश के लिये
जान देने के
लिये दिल्ली
से लोग बडे़ बडे़
उन्हे बहुत
बार बुलाते हैं ।

मंगलवार, 7 मई 2013

जरूरत नहीं है ये बस ऎसे ही है

कल
मिला वो
मुस्कुराया
फिर हाथ
मिलाया

बोला
लिखते हो
बहुत
लिखते हो
रोज
लिखते हो
मैं भी
पढ़ता हूँ
रोज
पढ़ता हूँ

कोशिश
करता हूँ
बहुत
करता हूँ
एक छोर
पकड़ता हूँ
दूसरा खो
जाता है
दूसरे तक
पहुँचने का
मौका ही
नहीं आता है

क्यों
लिखते हो
क्या
लिखते हो
क्या कोई
और भी
इस बात
को समझ
ले जाता है
मेरी समझ
में ये भी
कभी नहीं
आ पाता है

शरम
आती है
बहुत आती है

उसकी
मासूमियत
पर मुझे
भी थोड़ी
सी हंसी आयी

मैने भी
उसे
ये बात
यूँ बताई

भाई
ज्यादा
दिमाग
ना मैं
लिखने
में लगाता हूँ
बस वो
ही बात
बताता हूँ
जो घर में
सड़क में
शहर में
और
सबसे ज्यादा
अपने बहुत
बडे़ से
स्कूल में
देख सुन
कर आता हूँ

ज्यादातर
बातों में
गांधी जी
का एक
बंदर बन
जाता हूँ
कभी आँख
कभी कान
कभी मुँह
पर ताला
लगाता हूँ

जब
बहुत चिढ़
लग जाती है
तो कूड़े के
डब्बे को
यहाँ लाकर
उल्टा कर
ले जाता हूँ

कितनो के
समझ में
आयी ये बात
उस पर
ज्यादा दिमाग
नहीं लगाता हूँ

लोग
वैसे ही
चटे चटाये
लगते हैं
आजकल
व्यवस्था की
बात करने पर

मैं
अपनी
धुन में
जिस बात
को कोई
वहाँ नहीं
सुनता
यहाँ आकर
पकाता हूँ

यहाँ
बहुत 
बडे़ बडे़
शेर हैं
मैदान में
जो
दहाड़ते हैं
मेरी तरह
आ कर रोज

मैं
गधा भी
कुछ ऎसे ही
तीसमारखाँओं
के बीच में
रेंकते रेंकते
थोड़ी कुछ
आवाज
कर ही
ले जाता हूँ

परेशान
मत हुआ
करिये जनाब
मत
पढ़ा करिये

इस कूडे़
के ढेर में
मैं भी
आकर
रोज
कुछ कूड़ा
अपने
घर का
भी फेंक
जाता हूँ ।

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