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शनिवार, 31 अगस्त 2013

सच्चा और अच्छा होने का लाइसेंस ले आ फिर करता जा मत घबरा

चार लोगों को
जो अपने साथ
खड़ा भी नहीं
कर सकता हो
वो भला सच्चा
कैसे हो सकता है
सब के साथ में
सब जगह दिखेगा
कुछ नहीं कहेगा
कुछ नहीं लिखेगा
वो जरूर अच्छा
हो सकता है
अच्छे और सच्चे
होने की परिभाषा
निर्धारित की
जा चुकी है
सदन में पास
हो चुकी है
अखबार में छापी
जा चुकी है
जल्दी ही इसके
लिये निविदा एक
निकाली भी
जाने वाली है
अच्छे और सच्चे
होने के लाइसेंस
सरकार जल्दी
ही बनवा के
बंटवाने वाली है
छोटे छोटे गली
नुक्कड़ के अपराधों
के लिये किसी को
कोई सजा अब नहीं
दी जाने वाली है
अपने अपने हिसाब
से जिसको जो
अच्छा लगता
हो प्रायोजित
करवा सकता है
जिसे धरना
कराना हो
वो धरना
करा सकता है
जिसे किसी को
उठवाना हो
वो उसे उठा के
अपने घर में
रखवा सकता है
जल्दी ही इन सब पर
नियम कानून की
किताब बन के
आ जाने वाली है
छोटी मोटी घटनाओं
की बड़ती आवृति से
पुलिस भी अब निजात
पा जाने वाली है
बुद्धिजीवियों को भी
गुंडागर्दी करने की
कुछ छूट भी इसमें
दी जाने वाली है
राजनैतिक दल से
जुडे़ होने पर
दल की हैसियत
के अनुसार कम बाकी
कर दी जाने वाली है
सरकार के दल से
जुडे़ अच्छे और सच्चे
को छूट के साथ
ईनाम भी दिया जायेगा
सरकार के कमीशन
का कुछ प्रतिशत
उसके खाते में
अपने आप जमा
जा के हो जायेगा
रोज रोज छोटे मोटे
हाथ साफ करने से
कुछ तो राहत
वो पायेगा
विपक्ष का भी
ध्यान रखा जायेगा
उनके अच्छे और
सच्चे लोगों को
उनके अपने हिसाब
से काम करने
दिया जायेगा
बस उनको ये
बता दिया जायेगा
कि पक्ष के अच्छे
और सच्चे लोगों से
उनका कोई भी
आदमी कहीं भी
नहीं टकरायेगा
ऊपर वालों को
कुछ दिखाने के
लिये कुछ करना
अगर बहुत जरूरी
हो जायेगा
ऎसे समय में जो
किसी भी दल
में नहीं होगा
उससे पंगा
ले लिया जायेगा
जिसका कोई
नहीं होगा वो
किसी के पास
अपनी फरियाद ले
कर नहीं जा पायेगा
जनता सुखी होगी
उन्नति करेगी
डर सबका
भाग जायेगा
मुसीबत
आ भी गई
कभी सामने तो
अच्छा आदमी
सच्चा होने का
लाइसेंस निकाल
के दिखायेगा ।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

लंगड़ी लगती है तभी तो सीखी भी जाती है

जुम्मा जुम्मा
आ 
कर
अभी 
तो
पाँव 
कुछ 
जमाई हैंं
कुछ बातें
समझनी 

बहुत जरूरी
होती हैं

पता नहीं
क्यों नहीं
समझ
पाई हैंं

पढ़ी लिखी हैंं
और
समझदार हैंं
दिखती
मजबूत सी हैंं
बाहर से

काम करने
में भी काफी
होशियार हैंं

पर
हर जगह के
अपने अपने
कुछ
उसूल होते हैं

बहुत से
लोग होते हैं
जो
बहुत पुराने
हो चुके
होते हैं

उन लोगों
के भी
अपने अपने
दुख : होते हैं

जो उनसे भी
पुराने लोग
उनको
जाते जाते
दे गये
होते हैं

इसी चीज
को ही
तो अनुभव
कहते हैं

जल्दी बाजी
नहीं करेगी
तो समय
आने पर
सब कुछ
तू भी
समझ जायेगी

देख लेना
आने वाले
समय में
तू भी
उनकी जैसी
जरूर
हो पायेगी

उनका
तो कुछ
वैसे भी
तू कुछ
बिगाड़
नहीं पायेगी

हाँ
आने वाली
नयी खेप से
अपनी खुंदकें
निकालने में
पुरानी खेप
तेरा कुछ भी
नहीं कर पायेगी

कुछ
समय लगा
काम करना
सीख जा

समीकरण
बनाना अगर
सीख जायेगी
तो थोड़ा गणित
लगाने में
महारथ भी
तेरी हो जायेगी

अच्छे काम
तो किसी
भी तरह
हो जायेंगे

पर किसी
की वाट
लगाने में
यही सब
अनुभव तेरे
काम आयेंगे

किसी को
मारना हो
तो सामने
से कभी
नहीं मारा
जाता है
हिसाब किताब
धर्म का जाति का
गांव का वर्ग का
उम्र का लिंग का
अंदर की आग का
अपने विभाग का
या
फिर काम के
कमीशन के
हिसाब का
सबसे पहले
लगाया जाता है

जिस से
निशाना
साफ नजर
आता है

उसे छाँट कर
मिलबाँट कर
ठिकाने लगा
लिया जाता है

 हर बार एक ही
तिकड़म से काम
नहीं किया जाता है

अगली बार किसी
और तरीके से
उल्लू सीधा कर
लिया जाता है

 तुझे लगता है
लगना भी चहिये
कि तुझको
बहुत कुछ आता है

अब क्या करेगी
अगर
सब मिलकर
कह देंगे
सब से कह देंगे
तेरा बताया हुआ
किसी के समझ
में नहीं आता है

हर एक की
चाह होती है
बहुत ऊपर
तक उठता
चले जाने की

सीढी़ नहीं
होती है
इसीलिये
अपने
आसपास
के मजबूत
कंधों की
सीढ़ी बनाने
की जरूरत
होती है

सीढ़ी

बन गया
कोई किसी की
ये भी तभी पता
चल पाता है

जब चढ़ा हुआ
बंदर पेड़ की
चोटी पर दूर
नजर आता है

मुझ से भी हमेशा
इस तरह कहाँ
कहा जाता है

आँखों में तैरता
बाहर को
निकलता
हुआ सा पानी
कहीं दिख जाता है

किया
जब कुछ
नहीं जाता है
बस आक्रोश
ऎसे ही
समय में
शब्दों के
रूप में
बाहर निकल
जाता है

उपर वाला
भी तो
उम्र के साथ
अक्ल की
जुगलबंदी
हमेशा कहाँ
कराता है ।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

उलूक की पोटली में कूड़ा ही कूड़ा

हवा में तैरती ही
हैं हर वक्त कथा
कहानी कविताऎं
जरूरी कहाँ होता है
सब की नजर में
सब के सब ऎसे
ही आ ही जायें
सबको पसंद आ जायें
शैतानियाँ बच्चों की
चुहुल बाजी कहीं
कहीं खट्टी कहीं
मीठी झिड.कियां
दरवाजे के किनारे से
झांकने का अपना
एक अलग मजा है
किसी को दिख रही
होती हैं खिड.कियां
कोई फर्क नहीं पड़ता है
जालियों में जाले लगे हो
या नहीं जब झांकने
की आदत हो जाये
आँख बंद कर बंद
दरवाजे के अंदर तक
झांक लेता है कोई
किसी को फर्क नहीं
पड़ता किसी के बच्चों
को कोई स्कूल अगर
पहुँचाने में लगा हो
क्या होता है
अगर सुबह का दूध
डेयरी से लाकर
रोज दे जाने लगा हो
अपने अपने शौक
अपनी अपनी महारथ
कोई हाथ की
सफाई में माहिर
कोई दिल पर डाके
डालने में उस्ताद
घर में एक अलग
बाहर के लिये अलग
बहुत कम होते हैं
मगर होते हैं
किताबी कीडे़
बस चले तो पढा़ने
वाले को ही खा जायें
रोज रोज के पूछने
का झंझट हो दूर
एक दिन में ही
सारी समस्यायें
खुद सुलझ जायें
कोई अगर खाली
होती कुर्सियों की
गिनती कर रहा हो
तो इसमें किसी के
बाप का क्या
चला जाता है
इसके लिये वो
झुक झुक कर काम
आने वाले लोगों
को सलाम ठोकना
शुरु हो जाता है
जहाँ दिमाग में
कुछ हिसाब किताब
घूम रहा होता है
वो लेखाधिकारी
आफिस में उपस्थित
हो या ना हो
उसकी कुर्सी को
चूम रहा होता है
कहीं कृष्ण देख लो
कहीं राधा भी होती है
राम के भक्तगण भी
मिल जायेंगे जरूरत
पढ़ने पर रावण के
भी काम आयेंगे
कहीं पत्थर सीमेंट
रेता भी होता है
इधर फेंका जाता है
उधर काम आ जाता है
जुगाडी़ भी तैरती
हुई परीकथा का
एक हिस्सा होता है
ऎसा दिखाया जाता है
कुछ कुछ तो ऎसा भी
होता है जो होता है
पर उसके ऊपर कुछ
भी कहीं नहीं
कहना होता है
कैसे कहे कोई
उसे कहने के लिये
पहले बेशरम
होना होता है
कोई बात नहीं
ये सब अगर नहीं
होता चला जायेगा
तो कहने वाले
के लिये भी तो
कहने के लिये
कुछ नहीं रह जायेगा
आज ही सब
कुछ नहीं कहेगा
कल को कहने के
लिये कुछ नया
चटपटा उठा
कर ले आयेगा
अपनी अपनी ढपली
अपने अपने रागों
से ही तो मेरा देश
महान होने की
दौड़ लगायेगा
अब गिरे हुऎ
रुपिये को उठाने
के लिये कोई
तो जोर लगायेगा ।

बुधवार, 28 अगस्त 2013

मैने तो नहीं पढ़ी है क्या आप के पास भी गीता पड़ी है

कृष्ण जन्माष्टमी
हर वर्ष की तरह
इस बार भी आई है
आप सबको इस
पर्व पर बहुत
बहुत बधाई है
बचपन से बहुत बार
गीता के बारे में
सुनता आया था
आज फिर से वही
याद लौट के आई है
कोशिश की कई बार
पढ़ना शुरु करने की
इस ग्रन्थ को पर
कभी पढ़ ही नहीं पाया
संस्कृत में हाथ तंग था
हिन्दी भावार्थ भी
भेजे में नहीं घुस पाया
आज फिर सोचा
एक बार यही कोशिश
फिर से क्यों नहीं की जाये
दिन अच्छा है अच्छी
शुरुआत कुछ आज
ही कर ली जाये
जो समझ में आये
आत्मसात भी
कर लिया जाये
कुछ अपना और
कुछ अपने लोगों का
भला कर लिया जाये
गीता थी घर में एक
देखी कहीं पुत्र से पूछा
पुस्तकालय के कोने से
वो एक पुरानी पुस्तक
उठा के ले आया
कपडे़ से झाड़ कर
उसमें जमी हुई
धूल को उड़ाया
पन्नो के भीतर
दिख रहे थे
कागज खाने वाले
कुछ कीडे़ उनको
झाड़ कर भगाया
फिर सुखाने को
किताब को धूप में
जाकर के रख आया
किस्मत ठीक नहीं थी
बादलों ने सूरज
पर घेरा लगाया
कल को सुखा लूंगा बाकी
ये सोच कर वापस
घर के अंदर
उठा कर ले आया
इतनी शुरुआत
भी क्या कम है
महसूस हो रहा है
अभी भी इच्छा शक्ति
में कुछ दम है
पर आज तो मजबूरी है
धूप किताब को दिखाना
भी बहुत जरूरी है
आप के मन में
उठ रही शंका का
समाधान होना भी
उतना ही जरूरी है
जिस गीता को
आधी जिंदगी नहीं
कोई पढ़ पाया हो
उसके लिये गीता को
पढ़ना इतना कौन सा
जरूरी हो आया हो
असल में ये सब
आजकल के सफल
लोगों को देख कर
महसूस होने लगा है
जरूर इन लोगों ने
गीता को समझा है
और बहुत बार पढा़ है
सुना है कर्म और कर्मफल
की बात गीता में ही
समझायी गयी है
और यही सब सफलता
की कुंजी बनाकर
लोगों के द्वारा
काम में लायी गयी है
मैं जहाँ किसी
दिये गये काम को
करना चाहिये या नहीं
सोचने में समय लगाता हूँ
तब तक बहुत से लोगों
के द्वारा उसी काम को
कर लिया गया है की
खबर अखबार में पाता हूँ
वो सब कर्म करते हैं
सोचा नहीं करते हैं
इसीलिये फल भी
काम करने से पहले ही
संरक्षित रखते हैं
मेरे जैसे गीता
ज्ञान से मरहूम
काम गलत है या सही
सोचने में ही रह जाते हैं
काम होता नहीं है
तो फल हाथ में
आना तो दूर
दूर से भी नहीं
दिख पाते हैं
गीता को इसीलिये
आज बाहर निकलवा
कर ला रहा हूँ
कल से करूँगा
पढ़ना शुरू
आज तो धूप में
बस सुखा रहा हूँ ।

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

छोटी करना बात को नहीं सिखायेगा तो लम्बी को ही झेलने के लिये आयेगा

कबीर सूर तुलसी 
या उनके जैसे कई
और ने पता नहीं
कितना कुछ लिखा
लिखते लिखते इतना
कुछ लिख दिया
संभाले नहीं संभला
कुछ बचा खुचा
जो सामने था
उसपर भी ना जाने
कितनो ने कितना
कुछ लिख दिया
शोध हो रहे है
कार्यशालाऎं
हो रही हैं
योजनाऎं
चल रही हैं
परियोजनाऎं
चल रही हैं
एक विद्वान जैसे
ही बताता है
इसका मतलब ये
समझ में आता  है
दूसरा दूसरा मतलब
निकालने में तुरंत
ही जुट जाता है
स्कूल जब जाता था
बाकी बहुत कुछ
समझ में आ
ही जाता था
बस इनके
लिखे हुऎ
को समझने की
कोशिश में ही
बस चक्कर थोडा़
सा आ जाता था
कभी किसी
को ये बात
नहीं बता पाता था
अंकपत्र में भाषा में
पाये गये अंको से
सारा भेद पर
खुल ही जाता था
कोई भी इतना
सब कुछ अपने एक
छोटे से जीवन में
कैसे लिख ले
जाता होगा
ये कभी भी
समझ में नहीं
आ पाता था
ये बात अलग है
उनके लिखे हुऎ
का भावार्थ
निकालने में
अभी भी वही
हालत होती है
तब भी पसीना
छूट जाता था
मौका मिलता तो
एक बार
इन लोगों के
दर्शन करने
जरूर जाता
कुछ अपनी
तरफ से
राय भी जरूर
दे के आता
एक आईडिया
कल ही तैरता
हुआ दिख
गया था यहीं
उसी को
लेकर कोई
कहानी बना
सुना आता
क्यों इतनी
लम्बी लम्बी
धाराप्रवाह
भाषा में
लिखते चले
जा रहे हो
घर में बच्चे
नहीं हैं क्या
जो सारी दुनियाँ
के बच्चों का
दिमाग खा रहे हो
सीधे सीधे भी तो
बताया जा
सकता था
एक राम था
रावण को मार के
अपनी सीता को
वापस लेकर घर
तक आया था
फिर सीता को
जंगल में छोड़
कर आया था
किस को पता चल
रहा था कि बीच में
क्या क्या हो गया था
कोई बात नहीं
जो हो गया था
सो हो गया था
अब उसमें कुछ
नहीं रह गया था
इतना कुछ लिख गये
पर अपने बारे में
कहीं भी कुछ आप
नहीं कह गये
सारा का सारा
प्रकाश बाहर
फैला कर गये
पता भी नहीं चला
कैसे सारे अंदर के
अंधकारों पर इतनी
सरलता से विजय
पा कर गये
सब कुछ खुद ही
पचा कर गये
लेकिन एक बात
तो पक्की सभी को
समझा कर गये
लिखिये तो
इतना लिखिये
कि पढ़ने वाला
उसमें खो जाये
समझ में आ
ही जाये कुछ
तो अच्छा है
नहीं आये तो
पूरा ही पागल
हो कर जाये
कह नहीं पाये
इतना लम्बा
क्यों लिखते
हो भाई की
पढ़ते पढ़ते
कोई सो जाये |

सोमवार, 26 अगस्त 2013

राज्य शैक्षणिक पुरुस्कार बस दौ सौ अंको की है अब दरकार

मास्साब मिले  
पर बहुत ही
दिनों के बाद
हुई नमस्कार
पूछने लगा
उनके हाल चाल
मोटे ताजे बहुत
नजर आ रहे हो
मतलब बीमारी
से निपट के तो
नहीं आ रहे हो
जरूर कहीं
एल टी सी
पर घूम घाम
कर आ रहे हो
अरे नहीं बस
कुछ तैय्यारी
में लगा हुआ हूँ
इसलिये कहीं भी
नहीं जा रहा हूँ
अडो़स पडो़स की
शादी में भी बीबी
को भिजवा रहा हूँ
मर वर गया हो
कहीं कोई तो
बहाने कुछ नये
बना ले जा रहा हूँ
आन्दोलन सान्दोलन
से वैसे भी कोई नाता
क्या रखना हो रहा है
हड़तालियों के जुलूस
को देख कर पिछली
गली से दूसरी गली
को निकल जा रहा हूँ
अरे भाई तुम तो ऎसे
बता रहे हो जैसे कोई
पहाड़ सामने से आ कर
तुम्हारे खड़ा हो गया हो
और तुमसे उसे ना
उठाया जा रहा हो
जी नहीं ऎसा कुछ नहीं है
अब स्कूल के पाँच साल
की पढाई के मिलने
वाले हैं पच्चीस अंक
इसलिये घर पर
ट्यूशन की कक्षाऎं
चला रहा हूँ
पाँच अंक शीर्ष
अधिकारी देगा
उसके घर रोज
एक चक्कर
लगा रहा हूँ
पाँच अंक चयन समिती
के हाथ में होंगे
कौन होंगे इसमें शामिल
इसको पता लगाने का
जुगाड़ लगा रहा हूँ
रिजल्ट का रिकार्ड
भी रखना है सही
कैसे होगा ये सब
उसके लिये भी
दिमाग लगा रहा हूँ
गोपनीय होता है
यह सारा काम
अभी इस पत्ते को
आपके सामने नहीं
खोल पा रहा हूँ
छात्रों की खेल
प्रतियोगिता के भी
मिलने वाले हैं अंक
इसलिये छात्रों से
दूध घीं घर पर
ही मंगवा रहा हूँ
इसीलिये कुछ पहले
से स्वस्थ नजर मैं
तुमको आ रहा हूँ
अब तुमसे क्या छुपाना
राज्य शैक्षणिक पुरुस्कार
के लिये दौ सौ अंको
का करना पडे़गा
अब तो सभी को जुगाड़
इसलिये बिना अंको के
कैसे पहुँचा जाता है
सबसे ऊँची पायदान
ये राज नेताओं से
पूछने के लिये बीच
बीच में छुट्टी पर
राजधानी की तरफ
चला जा रहा हूँ
और क्या हाल चाल
हो रहे हैं देश के
ये तक भी आजकल
किसी से नहीं
पूछ पा रहा हूँ ।

रविवार, 25 अगस्त 2013

सीधा साधा एक लड़का था कभी मेरे स्कूल में भी पढ़ता था

पक्ष की कर 
नहीं तो विपक्ष
की ही कर
सरकार की कर
नहीं तो उसके
ही किसी एक
अखबार की कर
बात करनी है
तुझे अगर कुछ
तो इनमें से किसी
एक के ही
कारोबार की कर
किसने कहा था
गाँव के स्कूल को
छोड़ के बड़े
शहर के बड़े
स्कूल में चला जा
चला भी गया था
तो किसने कहा था
गाँव की ढपली वहाँ
जा कर बजा जा
अब भुगत
घर की पुलिस नहीं
बड़े शहर की
पुलिस ने भी नहीं
देश की पुलिस ने
पकड़ कर अंदर
तुझे करा दिया
सारे के सारे
अखबारों में फोटो
छाप के तुझे एक
माओवादी बता दिया
समझा ही नहीं
इतने साल मेरे
स्कूल में रहकर भी
अरे कांग्रेसी
ही हो जाता
नहीं हो पा
रहा था तो
भाजपा में
ही चला जाता
अब ना
इधर का रहा
ना उधर का रहा
बिना बात के
अंदर को जा रहा 
इधर होता
या उधर होता
कभी तो
तेरे पास भी
कोई पोर्टफोलियो
एक जरूर होता
अभी भी समय है
सुधर जा
अधिसंख्यक
चल रहे हैं
जिन रास्तों पर
उन रास्तों में
चलना शुरु हो जा
जो नियम ज्यादा
लोगों की जेब में
देखे जाते हैं
वो ही भगवान जी
तक के द्वारा भी
फौलो किये जाते हैं
इसकी भी हाँ
में हाँ मिला
उसकी भी हाँ
में हाँ मिला
अब जेल भी
चला गया
और बोलेगा
तमगा भी
कोई नहीं
मिलेगा
पक्ष या
विपक्ष के
लिये जेल 

जाता तो
राजनीतिक कैदी
एक हो जाता
क्या पता 

किसी दिन
कोई मंत्री संत्री
बनने का मौका भी
जेल के सार्टिफिकेट
से तू पा जाता
मेरे स्कूल में इतने
साल तू पढ़ा पर
हेम तूने गुरुओं से
इतना भी नहीं सीखा । 


शनिवार, 24 अगस्त 2013

रीढ़ वाला रीढ़ वाले का बिना रीढ़ वाला हुकुम का इक्का

चिढ़ लग जाती है 
जब कोई कहता है
स्पाइनलेस फैलो
लेकिन सच यही है
मुझे खुद पता नहीं है
मेरी रीढ़ की
हड्डी कहाँ है
अब वो सामने
तो होती नहीं है
पीछे होती है
दिखती भी नहीं है
लेकिन मुझे पता है
मैं स्पाइनलैस हूँ
इसको स्वीकार
भी करता हूँ
लोगों की रीढ़ की
हड्डी बहुत ही
मजबूत होती है
उनको नहीं दिखती है
मगर दूसरे को
तो दिखती है
बहुत मजबूत
होते हैं लोग
सब की बात
समझ जाते हैं
उनको मालूम
होता है कौन
लोग उनके
होते हैं
और कौन
खाली आ
के बेकार की
बाते बनाते हैं
मजबूत रीढ़
की हड्डी वाले
लोग कहीं ना कहीं
एक दूसरे के साथ
जरूर पाये जाते हैं
स्पाईनलैस नहीं होते हैं
इसलिये एक दूसरे
का साथ निभाते हैं
दूसरी तरफ स्पाइन्लैस
फैलोस होते हैं
उनसे अपनी हड्डी
संभाली नहीं जाती है
दूसरे की हड्डी को
संभालने के लिये
पता नहीं क्यों
चले जाते हैं
पर ये तो पक्का है
दो ही तरह के लोग
पाये जाते हैं
एक रीढ़ की हड्डी वाले
और एक मेरे जैसे जो
स्पाइनलैस कहलाते हैं
रीढ़ की मजबूत
हड्डी वाले
को पता होता है
उसके सामने जो
खड़ा होता है
वो उसी का जैसा
ही होता है इसलिये
उसका साथ देने में
उसको कुछ खतरा
कहीं नहीं होता है

इसलिये इस तरह के लोग
कहीं ना कहीं साथ
दिखाई दे जाते हैं
अब एक स्पाइनलैस
क्या कर सकता है
जब स्पाइनलैस के
साथ स्पाइनलैस
ही नहीं आते हैं
सारे एक तरफ ही
खडे़ होते जाते हैं
मिल बैठ कर भी
कुछ नहीं कर पाते हैं
इसी लिये इस देश में
सारे रीढ़ की
हड्डी वाले लोग
कहीं ना कहीं
किसी कुर्सी
में बैठे हुऎ
नजर आते हैं
एक दूसरे की
मदद करते हैं
किसी की मदद
नहीं चाहते हैं
बिना रीढ़ की
हड्डी के लोग
कहीं लिख
रहे होते हैं
ज्यादातर अकेले
ही पाये जाते हैं | 




सुबह सुबह ताजी ताजी गरम गरम

विधायक जी ने 
जिलाधिकारी जी
को रात
को बारा बजे
जब दूरभाष लगाया
लड़खड़ाती आवाज
से उनकी उन्हे
आभास हो आया
पक्का ही डी एम
ने पव्वा है लगाया
विधायक जी ने
तुरंत ही
इस घटना को
आयुक्त को
जब बताया
आयुक्त ने भी पुष्टि
करने को डी एम
साहब को
फोन लगाया
भाई तुम्हारी
आवाज तो
लड़खड़ा रही है
तुमने पी हुई है
ऎसा कुछ
बता रही है
डी एम साहब को
बहुत जोर का गुस्सा
आना ही था वो आया
थोडी़ सी तो पी है
चोरी तो नहीं की है
जो बनता है बना डालो
मेडिकल चाहो तो
वो भी करवालो
ये सब मुझे ही
किसी ने
नहीं है बताया
मेरे घर में जितने
अखबार आते हैं
उनमें से एक के
मुख्य पृष्ठ पर है
मैं इसे पढ़ पाया
तब से कुछ भी
समझ में नहीं
आ रहा है
इस समाचार का
विश्लेषण दिमाग
नहीं कर पा रहा है
वैसे खाली फोन में
आवाज से कोई कैसे
पकड़ा जाता है
हर अधिकारी के घर में
सी सी टी वी क्यों नहीं
लगाया जाता है
खुश्बू का भी पता
चल जाया करे
क्या ऎसा कोई
इंस्ट्रूमेंट बाजार में
नहीं आता है
शुरुआत तो विधायक
निवास से ही
की जानी चाहिये
तस्वीर जनता तक
भी तो जानी चाहिये
खाली पडी़ विधायक
हास्टल के पीछे की
गली की बोतलें भी
किसी ने एक बार
ऎसी ही अखबार में
छपवा दी थी
बताया गया था
विरोधी दल के नेता ने
कबाडी़ से खरीद
के रखवा दी थी
फोटो खिंचवा के
अखबार के दफ्तर
को भिजवा दी थी
पता नहीं कुछ भी
समझ में नहीं
आ पा रहा है
शराब को आखिर
इतना बदनाम
क्यों किया जा रहा है
मुम्बई में फिर हुआ
है फिर से गैंग रेप
पर शराब की खबर को
उससे भी हाई टी आर पी
का बताया जा रहा है
आभारी रहूँगा अगर
आप में से कोई
मुझे समझा देगा
कि इस समाचार में
अखबार वाला क्या हमको
बताना चाह रहा है ।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

आदत अगर हो खराब तो हो ही जाती है बकवास

मैने तो सोचा था
आज तू नहीं आयेगा
थक गया होगा
आराम करने को
कहीं दूर चला जायेगा
चार सौ पन्ने
भर तो चुका है
अपनी बकवासों से
कुछ रह नहीं गया
होगा बकाया तेरे पास
शायद तुझसे अब कुछ
नया नहीं कहा जायेगा
ऎसा कहाँ हो पाता है
जब कोई कुछ भी
कभी भी कहीं भी
लिखना शुरु जाता है
कहीं ना कहीं से
कुछ ना कुछ
खोद के लिखने के
लिये ले आता है
अब इतना बड़ा देश है
तरह तरह की भाषाऎं
हैं और हैं बोलियाँ
हर गली मोहल्ले के
अपने तीज त्योहार
हर गाँव हर शहर की
अपनी अपनी होती हैं
रंगबिरंगी टोलियाँ
कोई देश की बात को
बडे़ अखबार तक
पहुँचा ले जाता है
सारे अखबारों का
मुख्य पृष्ठ उस दिन
उसी खबर से
पट जाता है
पता कहाँ कोई
कर पाता है कि
खबर वाकई में
कोई एक सही ले
कर यहाँ आता है
सुना जाता है
इधर के सबसे
बडे़ नेता को कोई
बंदर कह जाता है
बंदर की टीम का
कोई एक सिकंदर
खुंदक में किसी
को फंसाने के लिये
सुंदर सा प्लाट
बना ले जाता है
उधर का बड़ा नेता
बंदर बंदर सुन कर
डमरू बजाना
शुरु हो जाता है
साक्षात शिव का 
रुप हो जाता है
तांडव करना
शुरु हो जाता है
अब ये तो बडे़
मंच की बड़ी बड़ी
रामलीलाऎं होती है
हम जैसे कूप मंडूकों
से इस लेवल तक
कहाँ पहुँचा जाता है
हमारी नजर तो
बडे़ लोगों के
छोटे छोटे चाहने
वालों तक ही
पहुंच पाती है
उनकी हरकतों को
देख कर ही हमारी
इच्छाऎं सब हरी
हो जाती हैं
किसी का लंगोट
किसी की टोपी के
धूप में सूखते सूखते
हो गये दर्शन की सोच
ही हमें मोक्ष दिलाने
के लिये काफी
हो जाती हैं
सबको पता है
ये छोटी छोटी
नालियाँ ही मिलकर
एक बड़ा नाला
और बडे़ बडे़
नाले मिलकर ही
देश को डुबोने
के लिये गड्ढा
तैय्यार करवाती हैं
कीचड़ भरे इन्ही
गड्ढों के ऊपर
फहरा रहे झकाझक
झंडों पर ही लेकिन
सबकी नजर जाकर
टिक जाती है
सपने बडे़ हो जाते हैं
कुछ सो जाते हैं
कुछ खो जाते हैं
झंडे इधर से
उधर हो जाते हैं
नालियाँ उसी जगह
बहती रह जाती हैं
उसमें सोये हुऎ
मच्छर मक्खी
फिर से भिनभिनाना
शुरु हो जाते हैं
ऎसे में जो
सो नहीं पाते
जो खो नहीं जाते
वो भी क्या करें
अपनी अपनी
बकवासों को लेकर
लिखना पढ़ना
शुरु हो जाते हैं ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

चार सौवाँ पन्ना : समर्पित तुझे तीसरी पुण्यतिथि पर गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’



जल जंगल जमीन
जानवर और
जनसरोकार
इन सबको
आत्मसात किया
हुआ एक जनकवि
रंगकर्मी गायक
और साहित्यकार
हिमालय सा
विशाल व्यक्तित्व
उत्कृष्ट संप्रेषण कला
कोमल हृदय
जैसे सरस्वती
का हो अवतार
आज तेरी तीसरी
पुण्यतिथि पर ये
घृष्टता करने की
कोशिश कर रहा हूँ
गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’
आज का ये
पन्ना तुझ को
दिल से समर्पित
कर रहा हूँ
पता है मुझे
सूरज को
एक दिया
दिखाने की
बस कोशिश
कर रहा हूँ
तू तो है एक
विशाल सागर
जनमानस में
हमेशा ही रहेगा
जीते जी तुझसे
नहीं हुई मुलाकात
कभी इसका बहुत
अफसोस रहेगा
तेरे किस आयाम
की बात की जाये
पता नहीं कहाँ
कौन सी चीज
मुझ से छूट जाये
तूने अपने गीतों से
जनमानस को
हमेशा ही सहलाया
भूत बताया और
वर्तमान बताया
तेरे ही जनगीतों
ने केदारनाथ
हादसे का भविष्य 
साफ साफ बताया
तेरी कविताओं ने
जन जन में आशा
का दीप जलाया
तेरे ही शब्दों में (अनुवाद)
"क्यों उदासी
ले कर आता है
क्यों मुहँ तू
अपना झुकाता है
किसलिये घुटने
जमीन पर टिकाता है
ऎसा हमेशा ही
नहीं हो जाता है
जल्दी ही देखेगा
सामने अपने
अच्छा दिन भी
जरूर आता है"
सरकारी और
सरकारी कुनबा
तुझे कभी सम्मानित
नहीं कर पाया
पर उसे कहाँ
जरूरत थी
इस सम्मान की
जिसने जीवन व्यापन
के लिये रिक्शा
तक हो चलाया
लगी लगाई नौकरी
को तक जन
आन्दोलनों की खातिर
लात मारने में
एक मिनट का समय
भी नहीं लगाया
ऎसा कौन सा
आन्दोलन था
जो तेरे गीतों के
बोलों के बिना
ही हो चल पाया
जन जन के
मानस में जितना
स्थान तूने
अपना बनाया
उसके सामने
हर सम्मान
बौना हो आया
माना आज तू
नहीं है शरीर से
कहीं हमारे आस पास
तेरे गीतों ने
तेरे होने का अहसास
हमेशा ही है दिलाया
आभार जयमित्र सिंह बिष्ट
और मनमोहन चौधरी
आज मुझे ‘गिर्दा’
से आपने सच में
है रुबरू करवाया !


बुधवार, 21 अगस्त 2013

हत्या हुई है एक चिन्तक की चिन्ता किसे है

चिन्तक डा. नरेंद्र दाभोलकर
की हत्या पर आना
शुरु हो गये हैं वक्तव्य
नृशंश हुई है हत्या
अब कह रहे हैं लोग
समाज की भलाई
की सोच लेकर चल
रहे होते हैं लोग
ऎसे लोगों की ही
हत्या सरेआम कर
रहे होते हैं लोग
कोशिश रोज ही
की जाती है
हत्याऎं होती रहें
ऎसे लोगों के
विचारों की
विचार ज्यादा
शक्तिशाली
हो जाते हैं
काबू में आने से
इन्कार कर जाते हैं
ऎसे में बौखला
जाते हैं लोग
पहले बहुत
कम होता था
संचार माध्यम
ऎसा नहीं था
पता भी कहाँ
चलता था
अब तुरंत बात
फैला देते हैं लोग
अब तो रोज ही
बेखौफ हत्या
करने लगे हैं लोग
बने हुऎ हैं
इसपर भी
मूकदर्शक लोग
बस वक्तव्य
देने में नहीं
कतराते हैं लोग
विचार जब तक
जिंदा रहते हैं
विचार को अनदेखा
कर जाते हैं लोग
निर्विकार भाव दिखा
कर विचार से
कतराते हैं लोग
इसी श्रृंखला में
आज एक सामाजिक
विचारक का मुंह
बंद करा गये हैं लोग
पता चलते ही
श्रद्धांजलि देना शुरु
कर इतिश्री करने
की तरफ जाने
लगे हैं लोग
शर्म आ रही हो
उन्हे बहुत ही
जैसे शरमाने
लगे हैं लोग
कहीं दूसरी ओर
विचारों को कत्ल
करने की नई
योजना बनाने
शुरु हो गयें है लोग ।

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

आपको रक्षाबन्धन की बधाई मुझे तो गुब्बारे की याद है आई

सोच रहा था आज
घर लौट कर
रक्षाबन्धन पर ही
थोड़ा कुछ लिख
लिया जायेगा
पर कहाँ पता था
कालेज में कोई
बात बात में
एक गुब्बारे की
याद दिलायेगा
चलिये कोई बात
नहीं आप रक्षाबन्धन
धूमधाम से मनाइये
गुब्बारा मेरे लिये
ज्यादा महत्वपूर्ण है
उससे मेरा ध्यान
ना हटवाइये
रक्षाबन्धन पर तो
बहुत से लोग
लिख ले जायेंगे
आप उन सब
को पढ़ने को
जरूर जायेंगे
पर गुब्बारे की
बात को कहना
हम तो नहीं
ही छोड़ पायेंगे
आज ही कहेंगे
और आज ही
यहाँ पर बतायेंगे
अब आप भी कहेंगे
भाई इसे आज
ऎसा क्या हो गया
ऎसा कौन सा
गुब्बारा है
जिसकी याद
आते आते ये
खुद गुब्बारा
गुब्बारा सा
हो गया
सच तो ये है
किसे पता था
भगवान बहुत
अप्रत्याशित
भी हो जायेगा
गुब्बारे की थैली
में से किसी भी
गुब्बारे को
हवा दे जायेगा
यही गुब्बारा
एक बार जो
हवा में जा के
उड़ जायेगा
फिर कहाँ लौट
के जमीन पर
वापस आ पायेगा
पर ऎसे गुब्बारे
भी तो कहीं अभी
तक नहीं पाये जाते हैं
जो हवा भरवाने के बाद
बहुत लम्बे समय तक
हवा में ही रह पाते हैं
राकेट होने लायक
हवा भरवाने की
कोशिश भी करते हैं
जोर भी इसके लिये
बहुत लगाते हैं
पर ज्यादा हवा
भर जाने से
उससे पहले ही
फूट जाते हैं
ऎसे फटे गुब्बारों को
थैली के गुब्बारे फिर
कहाँ मुँह लगाते हैं
गुब्बारे और उसमें
और हवा भर रहे
पम्पों पर मेरा
जब ध्यान गया
इस बात ने मुझे
तब बहुत ही
परेशान कर दिया
आप रक्षाबन्धन
की बहुत बहुत
बधाईयां ले लो
मुझे तो गुब्बारे
की ही बात
बस कहनी थी
कल के लिये
नहीं रुका गया
सब कुछ आज ही
आकर के कह गया ।

सोमवार, 19 अगस्त 2013

मछली एक भी जिंदा रहेगी तालाब की मुसीबत बनेगी !

तुझे बहुत
दिनो से 

कुछ हो
रहा है
ऎसा कुछ
मुझे
महसूस
हो रहा है

बहुत सी
बातेंं लोग
आपस में
कर रहे हैं
तेरे सामने
कहने से
लगता है
डर रहे हैं

मेरी 

समझ में
थोड़ा 
थोड़ा 
कुछ
आ रहा है

आजकल तू
हर जगह
गाडी़ के
ब्रेक और
एक्सीलेटर
अपने
हाथ में
लेकर क्यों
जा रहा है

किसी के
पीछे
पहुँच कर
ब्रेक लगा
रहा है
किसी के
आगे से
एक्सीलेटर
जोर से
दबा रहा है

समझता
क्यों नहीं
ऎसे क्या
किसी को
तू रोक
पायेगा
जो कर
रहे हैं
खुले आम
बहुत कुछ
काबू में
ऎसे ही
कर ले
जायेगा
और
क्या
ऎक्सीलेटर
दे कर
किसी को
भी तू
चला ले
जायेगा

खाली खाली
किसी से
ऎसी क्यों
उम्मीदें
अपनी
जगायेगा
जो किसी
को रोकने
तेरे साथ
दौड़ा 
दौड़ा
चला आयेगा 

ईमानदार
होने का
मतलब
बेशरम
होना
होता है
ये बात
ना जाने
तू कब
समझ में
अपनी
लायेगा

शरम
तो बस
एक
बेशरम
को ही
आती है
जो सामने
सामने 
चेहरे पर
झलक
जाती है

तेरी सूरत
हमेशा
से रोनी
नजर
आती है

नजर डाल
उस तरफ
ही सारी
लाली
चली
जाती है

दर्द
बढ़ते बढ़ते
दवा हो
जाता है

ये ही सोच
के तू भी
थोड़ा सा
बेशरम
क्यों नहीं
हो जाता है

तेरी सारी
परेशानियां
उस दिन
खत्म हो
जायेंगी
जिस दिन
से तुझे
भी शरम
थोड़ी आनी
शुरु हो
जायेगी

सारी
मछलियाँ
तालाब की 
तब एक
सी हो जायेंगी

एक सड़ी
मछली
गंदा करती
है तालब
वाली
कहावत
ही बेकार
हो जायेगी

उसी
दिन से
पाठ्यक्रम
में नई
लाईने
डाल दी
जायेंगी

जिस दिन
सारी
मछलियाँ
सड़ा दी
जाती हैं
तालाब
की बात
उस दिन
के बाद से
बिल्कुल
भी कहीं
नहीं की
जाती है ।

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