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शनिवार, 30 नवंबर 2013

और ये हो गयी पाँच सौंवी बकवास

इससे पहले
उबलते
उबलते
कुछ
छलक
कर गिरे

और

बिखर जाये
जमीन पर
तिनका
तिनका

छींटे पड़े
कहीं सफेद
दीवार पर

और कुछ

काले पीले
धब्बे बनायें

लिख
लिया कर
मेरी तरह
रोज का रोज
कुछ ना कुछ
कहीं ना कहीं
किसी रद्दी
कागज के
टुकड़े पर
ही सही

कागज
में लिखा
बहुत
आसान
होता है
छिपा लेना
मिटा लेना
आसान
होता है
जला लेना

राख हवा
के साथ
उड़ जाती है
बारिश
के साथ
बह जाती है

बहुत कुछ
हल्का हो
जाता है

बहुत से
लोग
कुछ भी
नहीं कहते
ना ही उनका
लिखा हुआ
कहीं नजर
में आता है

और
एक तू है
जब भी
भीड़ के
सामने
जाता है

बहुत कुछ
लिखा हुआ
तेरे चेहरे
माथे और
आँखों में
साफ नजर
आ जाता है

तुझे पता
भी नहीं
चलता है
हर कोई
तुझे कब
और
किस समय
पढ़ ले
जाता है

मत
हुआ कर
सरे आम
नंगा
इस तरह से

जब कागज
में सब कुछ
लिख लिखा
कर आसानी
से बचा जाता है

कब से
लिख रहा
है “उलूक”
देखता
नहीं क्या
एक था
पन्ना कभी
जो आज
लिखते
लिखते
हजार का
आधा हो
जाता है ।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

कभी होता है पर ऐसा भी होता है

मुश्किल
हो जाता है
कुछ
कह पाना
उस
अवस्था में
जब सोच
बगावत
पर उतरना
शुरु हो
जाती है
सोच के
ही किसी
एक मोड़ पर

भड़कती
हुई सोच
निकल
पड़ती है
खुले
आकाश
में कहीं
अपनी मर्जी
की मालिक
जैसे एक
बेलगाम घोड़ी
समय को
अपनी
पीठ पर
बैठाये हुऐ
चरना शुरु
हो जाती है
समय के
मैदान में
समय को ही

बस
यहीं
पर जैसे
सब कुछ
फिसल
जाता है
हाथ से

उस समय
जब लिखना
शुरु हो
जाता है
समय
खुले
आकाश में
वही सब
जो सोच
की सीमा
से कहीं
बहुत बाहर
होता है

हमेशा
ही नहीं
पर
कभी कभी
कुछ देर के
लिये ही सही
लेकिन सच
में होता है

मेरे तेरे
उसके साथ

इसी बेबसी
के क्षण में
बहुत चाहने
के बाद भी
जो कुछ
लिखा
जाता है
उसमें
बस
वही सब
नहीं होता है
जो वास्तव में
कहीं जरूर
होता है

और जिसे
बस समय
लिख रहा
होता है
समय पढ़
रहा होता है
समय ही
खुद सब कुछ
समझ रहा
होता है ।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

सबूत होना जरूरी है ताबूत होने से पहले

छोटी हो
या बड़ी
आफत कभी
बता कर
नहीं आती है
और
समझदार लोग
हर चीज के
लिये तैयार
नजर आते है

आफत बाद
में आती है
उससे पहले
निपटने के
हथियार लिये
हजूर
दिख जाते हैं

जिनके लिये
पूरी जिंदगी
प्रायिकता का
एक खेल हो
उनको किस
चीज का डर

पासा फेंकते
ही छ:
हवा में ही
ले आते है

जैसे सब
कुछ बहुत
आसान होता है

एक लूडो
साँप सीढ़ी
या
शतरंज का
कोई खेल

ऐसे में ही
कभी कभी
खुद के अंदर
एक डर सा
बैठने लगता है

जैसे कोई
उससे
उसके होने
का सबूत
मांगने लगता है

पता होता है
सबूत सच का
कभी भी
नहीं होता है

सबूतों से तो
सच बनाया
जाता है

कब कौन कहाँ
किस हालत में
क्या करता हुआ
अखबार के मुख्य
पृष्ठ पर दिख जाये

बहुत से
ज्योतिष हैं यहाँ
जिनको इस
सबकी
गणना करना
बहुत ही सफाई
के साथ आता है

बस एक बात
सब जगह
उभयनिष्ठ
नजर आती है
जो किसी भी
हालत में
एक रक्षा कवच
फंसे हुऐ के लिये
बन जाती है

कहीं ना कहीं
किसी ना किसी
गिरोह से 

जुड़ा होना

नहीं तो क्या
जरूरत है
किसी सी सी
टी वी के
फुटेज की

जब कोई
स्वीकार
कर रहा हो
अपना अपराध
बिना शर्म बिना
किसी लिहाज

ऐसे में ही
महसूस होता है
किसी गिरोह से
ना जुड़ा होना
कितना दुख:दायी
हो सकता है

कभी भी कोई
पूछ सकता है
तेरे होने या ना
होने का सबूत

उससे पहले
कि बने
तेरे लिये भी
कहीं
कोई ताबूत

सोच ले
अभी भी
है कोई
सबूत कहीं
कि तू है
और
सच में है
बेकार
ही सही
पर है
यहीं कहीं ।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

उलूक का शोध ऊपर वाले को एक वैज्ञानिक बताता है

ऊपर वाला जरूर
किसी अंजान ग्रह
का प्राणी वैज्ञानिक
और मनुष्य उसके
किसी प्रयोग की
दुर्घटना से उत्पन्न
श्रंखलाबद्ध रासायनिक
क्रिया का एक ऐसा
उत्पाद रहा होगा
जो परखनली से
निकलने के बाद
कभी भी खुद
सर्व शक्तिमान के
काबू में नहीं रहा होगा
और अपने और अपने
ग्रह को बचाने के लिये
वो उस पूरी की पूरी
प्रयोगशाला को उठा के
दूर यहाँ पृथ्वी बना
कर ले आया होगा
वापस लौट के ना
आ जाये फिर से
कहीं उसके पास
इसीलिये अपने होने
या ना होने के भ्रम में
उसने आदमी को
उलझाया होगा
कुछ ऐसा ही आज
शायद उल्लूक की
सोच में हो सकता है
ये देख कर आया होगा
कि मनुष्य कोशिश
कर रहा है आज
खुद से परेशान
होने के बाद
किसी दूसरे ग्रह
में जाकर बसने
का विचार ताकि
बचा सके अपने
कुछ अवशेष
अपनी सभ्यता के
मिटने के देख
देख कर आसार
क्योंकि मनुष्य
आज कुछ भी
ऐसा करता हुआ
नहीं नजर आता है
जिससे महसूस हो सके
कि कहीं ऐसा कोई
ऊपर वाला भी
पाया जाता है
जैसे ऊपर वाले की
बातें और कल्पनाऐं
वो खुद ही यहाँ पर
ला ला कर फैलाता है
अपना जो भी
मन में आये
कैसा भी चाहे
कर ले जाता है
सामने वाले को
ऊपर वाले की
फोटो और बातों
से डराता है
कहीं भी ऐसा
थोड़ा सा 

भी महसूस
नहीं होता है
शक्तिशाली
ऊपर वाला
कहीं कुछ
भी अपनी
चला पाता है
उसी तरह
जिस तरह आज
मनुष्य खुद
अपने विनाशकारी
आविष्कारों को
नियंत्रित करने में
अपने को
असफल पाता है
इस सब से
ऊपर वाले का
एक अनाड़ी
वैज्ञानिक होना
आसानी से क्या
सिद्ध नहीं
हो जाता है ।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

कर कुछ भी कर बात कुछ और ही कर

कुछ इधर
की बात कर
कुछ उधर
की बात कर

करना बहुत
जरूरी है
बेमतलब
की बात कर

समझ में
कुछ आये
कहा कुछ
और ही जाये
बातों की
हो बस बात
कुछ ऐसी ही
बात कर

इससे करे
तो उसकी
बात कर
उससे करे
तो इसकी
बात कर

जब हों
आमने
सामने
ये वो
तो मौसम
की बात कर

कुछ भी
करना
हो कर
जैसे भी
करना
हो कर

बात करनी
ही पड़े तो
कुछ नियम
की बात कर

थोड़ी चोरी
भी कर
कुछ
बे‌ईमानी
भी कर
बात पूरी
की पूरी
ईमानदारी
की कर

इसके पीने
की कर
उसके पीने
की कर
खुद के
बोतल में
गंगाजल
होने की
बात कर

कहीं भी
आग लगा
जो मन में
आये जला
बात
आसमान
से बरसते
हुऐ पानी
की कर

अपनी भूख
को बढ़ा
जितना खा
सकता है खा
बात भूखे
की कर
बात गरीबों
की कर

 बात
करनी है
जितनी भी
चाहे तू कर
बात करने
पर ही
नहीं लगता
है कर
यहां कोई
बात कर
वहां कोई
बात कर
बाकी पूछे
कोई कभी
कहना ऊपर
वाले से डर ।

सोमवार, 25 नवंबर 2013

मत बताना नहीं मानेंगे अगर कहेगा ये सब तू ही कह रहा था

पिछले दो दिन
से यहाँ दिखाई
नही दे रहा था
पता नहीं कहाँ
जा कर किस को
गोली दे रहा था
खण्डहर में उजाला
नहीं हो रहा था
दिये में बाती
दिख रही थी
तेल पता नहीं
कौन आ कर
पी रहा था
आसमान नापने
का ठेका कहीं
हो रहा था
खबर सच है
या झूठ मूठ  
पता करने
के लिये

उछल उछल
कर 
कुँऐ की
मुंडेर 
छू रहा था
बाहर के उजाले
का क्या कहने
हर काला भी
चमकता हुआ
सफेद हो रहा था
किसी के आँखों में
सो रहे थे सपने
कोई सपने सस्ते 
में बेच कर भी
अमीर हो रहा था
सोच क्यों नहीं
लेता पहले से 
कुछ ‘उलूक
अपने कोटर से
बाहर निकलने
से पहले कभी
अपने और अपनो
के अंधेरों में
तैरने के आदी
मंजूर नहीं करेंगे
सुबह होती दिख
रही थी कहीं
बहुत नजदीक से
और वाकई में तू
देख रहा था और
तुझे सब कुछ
साफ और
बहुत साफ
दिन के
उजाले सा
दिखाई भी
दे रहा था ।

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

घबरा सा जाता है गंदगी लिख नहीं पाता है

कितनी अजीब  
सी बात है
अब है तो है
अजीब ही सही
सब की बाते
एक सी भी तो
नहीं हो सकती
हमेशा ही
कोई खुद
अजीब होता है
उसकी बातों में
लेकिन बहुत
सलीका होता है
कोई बहुत
सलीका दिखाता है
बोलना शुरु होता है
तो अजीब पना
साफ साफ चलता
हुआ सा दिख जाता है
किसी के साथ
कई हादसे ऐसे
होते ही रहते हैं
वो नहीं भी
सोचता अजीब
पर बहुत से लोग
उसे कुछ अजीब
सोचने पर
मजबूर कर देते हैं
थोड़ा अजीब ही
सही पर कुछ अजीब
सा सभी के
पास होता ही है
गंदगी भी होती है
सब कुछ साफ
जो क्या होता है
पर साफ सुथरे
कागज पर जब
कोई कुछ टीपने
के लिये बैठता है तो
गंदगी चेपने की
हिम्मत ही
खो देता है
हर तरफ
सब लोगों के
सफाई लिखे हुए
सजे संवरे कागज
जब नजर आते है
लिखने वाले
के दस्ताने
शरमा शरमी
निकल आते है
अपने आस पास
और अपने अंदर
की गंदगी से
बचे खुचे सफाई
के कुछ टुकड़े
ढूंढ लाते है
सब सब की
तरह लिखा
जैसा हो जाता है
रोज सफाई
लिखने वाले को
तो बहुत सफाई से
लिखना आता है
पर ‘उलूक’ के लिखे
के किनारे में कहीं
एक गंदगी का धब्बा
उस पर खुल कर
ठहाके लगाना
शुरू हो जाता है ।

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

कभी तो लिख दिया कर यहाँ छुट्टी पे जा रहा है

बटुऐ की चोर जेब में
भरे हुऐ चिल्लर जैसे
कुछ ना कुछ रोज लेकर
चने मूंगफली की
रेहड़ी लगाने में तुझे
पता नहीं क्यों इतना
मजा आता है
कितना कुछ है
लोगों के पास
भरी हुई जेबों में जब
पिस्ते काजू बादाम
दिखाने के लिये
किसे फुरसत है तेरी
मूंगफली के छिक्कल
निकाल कर दो चार दाने
ढूढ निकाल कर खाने की
एक दिन की बात नहीं है
बहुत दिनों से तेरा ये टंटा
यहाँ चला आ रहा है
करते चले जा तू
मदारी के करतब
खुद को खुद
का ही जमूरा
तुझे भी मालूम है
पता नहीं किस के लिये
यूं बनाये जा रहा है
कभी सांस भी
ले लिया कर
थोड़ी सी देर
के लिये ही सही
नहीं दिखायेगा
कभी कुछ तो
कौन यहाँ पर
लुटा या मरा
जा रहा है
कुछ नहीं
होगा कहीं पर
हर जगह खुदा का
कोई ना कोई बंदा
उसी के कहने पर
वो सब किये
जा रहा है
जिसे लेकर रोज
ही तू यहां पर
आ आ कर
टैंट लगा रहा है
आने जाने वालों का
दिमाग खा रहा है
अब भी सुधर जा
नहीं तो किसी दिन
कहने आ पहुंचेगा यहाँ
कि खुदा का कोई बंदा
तेरी इन हरकतों के लिये
खुदा के यहाँ आर टी आई
लगाने जा रहा है और
ऊपर वाला ही अब तेरी
वाट लगाने के लिये
नीचे किसी को
काम पर लगा रहा है ।

बुधवार, 20 नवंबर 2013

कोई तो लिखे कुछ अलग सा लगे

कभी कुछ
अलग सा
कुछ ऐसा
भी लिख
जिसे नहीं
पढ़ने वाला
भी

थोड़ा सा
पढ़ सके
कुछ ऐसा
जो किसी
झूमती हुई
कलम से
रंगबिरंगी
स्याही से
इंद्रधनुष
सा
लिखा हुआ
आसमान
पर दिखे

कुछ देर
के लिये
ही सही

रोज की
चिल्ल पौं से
थोड़ी देर के
लिये सही
आँख कान
नाक हटे

नहीं पीने
वाले को
कुछ पीने
जैसा लगे
नशा सा
लिखा हो
नशा ही
लिखा हो

पढ़े कोई
तो झूमती
हुई कलम
सफेद कागज
के ऊपर
इधर उधर
लहराती
सी दिखे

हर कोई
शराबी हो
ये जरूरी नहीं
नशा पढ़ के
हो जाने में
कोई खराबी नहीं

लिख मगर
ऐसा ही
कुछ
पढ़े कोई
तो पढ़ता
ही रहे

पढ़ के
हटे कुछ
लड़खड़ाये
इतना नही
कि
जा ही गिरे

रोज ही के
लिये नहीं
है गुजारिश
पर लिखे

कभी किसी
दिन ऐसा
कुछ भी हो
कहीं कुछ
अलग
सा दिखे
अलग सा
कुछ लगे

मुझे
ना सही
तुझे
ही लगे ।

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

ये तो होना ही था

जो हो रहा था
अच्छा हो रहा था
जो हो रहा है
अच्छा हो रहा है
जो आगे होगा
वो अच्छा ही होगा
बस तुझे एक बात का
ध्यान रखना होगा
बंदर के बारे में
कुछ भी कभी भी
नहीं सोचना होगा
बहुत पुरानी कहावत है
मगर बड़े काम की
कहावत नजर आती है
जब मुझे अपने
दिमाग में घुसी
भैंस नजर आती है
अब माना कि
अपनी ही होती है
पर भैंस तो भैंस होती है
उसपर जब वो किसी के
दिमाग में घुसी होती है
जरा जरा सी बात पर
खाली भड़क जाती है
कब क्या कर बैठे
किसी को बता कर
भी नहीं जाती है
दूसरों को देख
कर लगता है
उनकी भी कोई
ना कोई तो भैंस
जरूर होती होगी
तो मुझे खाली क्यों
चिंता हो जाती है
अपनी अपनी
भैंस होती है
जिधर करेगा मन
उधर को चली जाती है
अब इसमें मुझे
चिढ़ लग भी जाती है
तो कौन सी बड़ी
बात हो जाती है
लाईलाज हो बीमारी तब
हाथ से निकल जाती है
अखबार की खबर से
जब पता चलता है
कोई भी ऐसा नहीं है
मेरे सिवाय यहाँ पर
जिसके साथ इस तरह
की कोई अनहोनी
होती हुई कभी यहां
पर देखी जाती है
होती भी है किसी के
पास एक भैंस
वो हमेशा तबेले में
ही बांधी जाती है
सुबह सुबह से इसी
बात को सुनकर
दुखी हो चुकी मेरे
दिमाग की भैंस
पानी में चली जाती है
तब से भैंस के जाते ही
सारी बात जड़ से
खतम हो जाती है
परेशान होने की
जरूरत नहीं
अगर आपके
समझ में 'उलूक'
की बात बिल्कुल
भी नहीं आती है ।

सोमवार, 18 नवंबर 2013

तारा टूटे कहीं तो भगवान करे उसे बस माँ देखे

ऐसा बहुत
बार हुआ है

आसमान से
टूटता हुआ
एक तारा
नीचे की ओर
उतरता हुआ
जब दिखा है

गूंजे हैं कान में
किसी के कहे
हुऐ कुछ शब्द

तारे को टूटते
हुऐ देखना बहुत
अच्छा होता है

सोच लो
मन ही मन कुछ

कभी ना कभी
जरूर पूरा होता है

बहुत याद
आती है उसकी
और पड़ जाते हैं सोच

क्यों
और किसलिये
उसने ऐसा हमेशा
कहा होता है

तब दुनिया का
एक सब से
खूबसूरत चेहरा
सामने होता है

पुराने
दिनों की बात
आ जाती है
अचानक याद

बहुत से तारे
टूटते हुऐ
एक साथ
आसमान से
गिरते हुऐ
फुलझड़ी
की तरह
देखे थे
किसी एक रात

उसने और
मैंने साथ साथ

इतने सारे
टूटते हुऐ तारे
जैसे बरसात
हो गई हो

जाहिर करनी
है मन ही मन
कोई इच्छा
भी इस समय
जैसे याद ही
नहीं रह गई हो

कब इतना समय
आगे निकल गया
पता ही नहीं चला

कल रात
देख रहा था
आसमान की ओर

एक टूटता
हुआ तारा
आ रहा था
जैसे जैसे
नीचे की ओर

मुझे याद
आ रही थी
उसकी इच्छायें

पता नहीं
कितनी
पूरी हुई होंगी

आज जब वो
पास में नहीं है

जरूर कहीं
ना कहीं से
तारे को
टूटते हुऐ
जरूर देख
रही होंगी

क्योंकि
मेरी इच्छायें
उस समय भी
पूरी हो जाती थी

जब तारे के
टूटते समय
तुम पास
खड़ी होती थी

आज भी
पूरी होती है
तब भी जब
तुमको गये हुऐ
भी बरसों हो गये

पता नहीं
कितनों की
इच्छायें पूरी
हो जाती हैं
एक माँ
जब भी तारे
को टूटते
देखती है

आज भी माँ
जब भी कोई
तारा टूटता है
मुझे कोई इच्छा
नहीं याद आती है

उस समय
बस और बस
मुझे तुम्हारी बहुत
याद आती है ।

रविवार, 17 नवंबर 2013

कंंधा नहीं लगायेगा तो ऊपर क्या है कैसे देख पायेगा

पता ही
नहीं चलता
कब कहाँ
किसी को
क्या नजर
आ जाये

किस
हाल में
किसी को
किसी
के लिये
क्या कुछ
करना ही
पड़ जाये

समझाता भी
कौन है यहां
किताबों से
बाहर की बातें

जो समझ में
आसानी से
किसी के
यूं ही आ जाये
कंंधा लगाये हुऐ

कुछ लोगों के
कंंधे पर चढ़ा
हुआ कोई
उँचाई पर
कुछ ढूंंढने
के लिये
जब चला जाये

क्या दिखा
क्या मिला
नीचे उतरने
पर भी
कंंधे दिये
हुओं को
तक भी
ना बताये

कंंधे
 लगाये
हुओं को
इस बात से
कोई मतलब
ही ना रह जाये

एक उतरा
नहीं नीचे
दूसरा कंंधों
पर चढ़ कर
ऊपर देखना
शुरु हो जाये

चढ़ना उतरना
चल रहा हो
ऊपर जाता
हुआ मगर
कोई नजर
कभी कहीं
भी नहीं आये

शायद हो
दही की मटकी
ऊपर कहीं
हुई लटकी
हिम्मत फोड़ने
की ऐसे में
कोई क्यों और
कैसे कर पाये

इंतजार में हो
सब कन्हैया के
सभी 
कंंधे
पै लगे हो

इसीलिये
अपना भी 
कंंधा लगाये
'उलूक'
देखे खुद
समझे खुद
और खुद को
खुद ही
ये समझाये

किसी की
समझ में इसमें
कुछ और
अगर आ जाये
तो बहुत
मेहरबानी होगी
पक्का बताये
जरूर बताये ।

शनिवार, 16 नवंबर 2013

बहुत कुछ बहुत जगह पर लिखा पाता है पढ़ा लेकिन किसी से सब कहाँ जाता है !

कुछ ना कहते हुऐ
भी बहुत कुछ
बोलती आँखोंं से
कभी आँखे अचानक
ना चाहते सोचते
मिल जाती हैं
और एक सूनापन
बहुत गहराई से
निकलता हुआ
आँखों से आँखो
तक होता हुआ
दिल में समा जाता है
एक नहीं
कई बार होता है
एक नहीं
कई लोग होते हैं
ना दोस्त होते हैं
ना दुश्मन होते हैं
पता नहीं फिर भी
ना जाने क्यों
महसूस होता है
अपनी खुद की
खुद से नजदीकियों
से भी बहुत
नजदीक होते हैं
बहुत कुछ
लिखा होता है
दिखता है
बहुत कुछ साफ
आँखों में ही
लिखा होता है
महसूस होता है
पानी में लिखना भी
किसी को आता है
ऐसा कुछ लिखा
जैसा पहले कहीं भी
किसी किताब में
लिखा हुआ नजर
नहीं आता है
इतना सब
जहाँ किसी को
एक मुहूरत में ही
पढ़ने को मिल जाता है
कितना कुछ
कहाँ कहाँ
सिमटा हुआ है
इस जहाँ में
कौन जान पाता है
ना लिख
सकता है कोई कहीं
ना ही कहीं वैसा
लिखा सा
नजर आता है
बाहर से
ढोना जिंदगी तो
हर किसी को आना
जीने के लिये फिर भी
जरूरी हो जाता है
अंदर से इतना भी
ढो सकता है कोई
ना सोचा जाता है
ना ही कोई इतना
सोचना ही चाहता है
पढ़ ही लेना शायद
बहुत हो जाता है
लिखना चाह कर भी
वैसा कौन कहाँ कभी
लिख ही पाता है ।

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

जिसके लिये लिखा हो उस तक संदेश जरूर पहुँच जाता है !

पता नहीं क्या क्या और
कितना कितना बदला है
कितना और बदलेगा
और क्या फिर हो जायेगा
सुना था कभी राम थे
सीता जी थी
और रावण भी था
बंदर तब भी
हुआ करते थे
आज भी हैं
ऐसी बहुत से
वाकयों से
वाकिफ होते होते
कहां से कहां आ गये
बस कुछ ही
दिन हुऐ हों जैसे
छोटे शहर में
छोटी सी बाजार
चाय की
दुकानों में जुटना
और बांट लेना बहुत कुछ
यूं ही बातों ही बातों में
आज जैसे
वही सब कुछ
एक पर्दे पर आ गया हो
बहुत कुछ है
कहीं किसी के
पास आग है
किसी के
पास पानी है
कोई
आँसुओं के सैलाब में
भी मुस्कुरा रहा है
कोई
जादू दिखा रहा है
कहीं
झगड़ा है
कहीं
समझौता है
दर्द खुशी
प्यार इजहार
क्या नहीं है
दिखाना बहुत
आसान होता है
इच्छा होनी चाहिये
कुछ ना कुछ
लिखा ही जाता है
अब चाय की वो दुकान
शायद यहाँ आ गयी है
हर एक पात्र
किसी ना किसी में
कहीं ना कहीं
नजर आता है
हर पात्र के पास
है कुछ ना कुछ
कहीं कम
कहीं कहीं तो बहुत कुछ
चाय तो अब
कभी नहीं दिखती
पर सूत्रधार
जरूर दिख जाता है
कहानी कविता
यात्रा घटना दुर्घटना
और पता नहीं क्या क्या
सब कुछ
ऐसे बटोर के ले आता है
जैसे महीन
झाड़ू से एक सुनार
अपने छटके हुऐ
सोने के चूरे को
जमा कर ले जाता है
एक बात को लिखना जहां
बहुत मुश्किल हो जाता है
धन्य हैं आप
कैसे इतना कुछ
आपसे इतनी
आसानी से हो जाता है
आप ही के
लिये हैं ये उदगार
मुझे पता है
आप को सब कुछ
यहां पता चल जाता है ।

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

मत कह बैठना कहानी में आज मोड़ है आ रहा

मकड़ी के
जाले में फंसी
फड़फड़ाती
एक मक्खी

छिपकली
के मुँह से
लटकता
कॉकरोच

हिलते डुलते
कटे फटे केंचुऐ

खाने के लिये
लटके छिले हुऐ
सांप और मेंढक

गर्दन कटी
खून से सनी
तड़फती
हुई मुर्गियाँ

भाले से
गोदे जा रहे
सुअर के
चिल्लाने
की आवाज

शमशान घाट
से आ रही
मांस जलने
की बदबू

और भी
ऐसा बहुत कुछ

पढ़ लिया ना
अब दिमाग
मत लगाना

ये मत सोचना
शुरु हो जाना

लिखने वाला
आगे अब
शायद है कुछ
नई कहानी
सुनाने वाला

ऐसा कुछ
कहीं नहीं है
सूंई से लेकर
हाथी तक पर
बहुत कुछ
जगह जगह
यहां है लिखा
जा रहा

अपनी अपनी
हैसियत से
गधे लोमड़ी
पर भी फिलम
एक से एक
कोई है
बनाये जा रहा

पढ़ना जो
जैसा है चाहता
उसी तरह
की गली में
है चक्कर
लगा रहा

लेखक की
मानसिक
स्थिति को
कौन यहां
सही सही
पहचान
है पा रहा

कभी एक
अच्छे दिन
दिखाई दी थी
सुन्दर व्यक्तित्व
की मालकिन एक
चाँद से उतरते हुऐ

वही दिख रही थी
झाड़ू पर बैठ कर
चाँद पर उड़ती हुई
एक चुड़ैल जैसे
कुछ करतब करते हुऐ

मूड है
बहुत खराब
'उलूक'
का बेहिसाब
कुछ ऐसा
वैसा ही
है आज

जैसा लिखा
हुआ तुझे
यहाँ नजर
है आ रहा ।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

विनती

खाली घूमने
आते हैं
ना आयें
कहीं और
चले जायें
टिप्पणी का
बाजार ना
ही बनायें
लिखा हुआ
पढ़े पूरा
समझ में
नहीं आये
तो लिखें
नहीं समझ पाये
हिम्मत करें
कहें कूड़ा है
जो लिखा है 

खुद कूड़ा
ना फैलायें
ना ही कोई
फैलानें पाये
इतना साहस
पैदा कर
सकते हैं
तो यहाँ आयें
जरूर आयें।

चारा लूटने पर तो नहीं बोला था कि घबराहट सी हो जाती है

बहुत बैचैनी है तुझे
कभी कभी समझ से
बाहर हो जाती है
अपनी अपनी सबकी
हैसियत होती है
दिखानी भी बहुत
जरूरी हो जाती है
जरूरत की
होती हैं चीजें
तभी उधार लेकर
भी खरीदी जाती हैं
कौन सा देना होता है
किसी को
एक साथ वापस
कुछ किश्तें ही तो
बांध दी जाती हैं
गर्व की बात हो जाये
कोई चीज
किसी के लिये
ऐसे वैसे ही बिना
जेब ढीली किये तो
नहीं हो जाती है
जब जा रही हो
बहुत ही दूर कहीं
पगड़ी देश की
क्या होना है
रास्ते में थोड़ा सा
सर से नीचे अगर
खिसक भी जाती है
लाख करोड़ की कई
थैलियां यूं ही इधर से
उधर हो जाती हैं
ध्यान भी
नहीं देता कोई
ऐसे समाचारों पर
जब रोज ही
आना इनका
आम सी बात
हो जाती है
महान है गाय
तक जहां की
करोड़ों की
घास खा जाती है
तीसरी कक्षा
तक पहुंचने
के बाद ही तो
लड़खड़ाया है
वो भी थोड़ा सा
की खबर
देश की धड़कन को
अगर कुछ बढ़ाती है
तेरा कौन सा क्या
चला जाने वाला है
इस पर
यही बात मेरे
बिल्कुल भी
समझ में
नहीं आती है ।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

चेहरे को खुद ही बदलना आखिर क्यों नहीं आ पाता है

घर के चेहरे
की बात करना 
फालतू
हो जाता है
रोज देखने की
आदत जो
पड़ जाती है
याद जैसा
कुछ कुछ
हो ही जाता है
किस समय
बदला हुआ है
थोड़ा सा भी
साफ नजर में
आ जाता है
मोहल्ले से
होते हुऐ
एक चेहरा
शहर की
ओर चला
जाता है
भीड़ के
चेहरों में
कहीं जा
कर खो
भी अगर
जाता है
फिर भी
कभी दिख
जाये कहीं
जोर डालने
से याद
आ जाता है
चेहरे भी
चेहरे
दर चेहरे
होते हुऐ
कहीं से
कहीं तक
चले जाते हैं

कुछ टी वी
कुछ अखबार
कुछ समाचार
हो जाते हैं
उम्र का
असर
भी हो
तब भी
कुछ कुछ
पहचान ही
लिये जाते हैं
समय के
साथ
कुछ चेहरे
बहुत कुछ
नया भी
करना
सीख ही
ले जाते हैं
पहचान
बनाने
के लिये
हर चौराहे
पर
चेहरा अपना
एक टांक
कर आते हैं
कुछ चेहरों
को
चेहरे बदलने
में महारथ
होती है
एक चेहरे
पर
कई कई
चेहरे
तक लगा
ले जाते हैं
'उलूक'
देखता है
रोज ऐसे
कई चेहरे
अपने
आस पास
सीखना
चाहता है
चेहरा
बदलना
कई बार
रोज
बदलता है
इसी क्रम में
घर के
साबुन
बार बार
रगड़ते
रगड़ते
भी कुछ
नहीं हो
पाता है

सालों साल
ढोना एक
ही चेहरे को
वाकई
कई बार
बहुत बहुत
मुश्किल सा
हो जाता है !

सोमवार, 11 नवंबर 2013

उलझन उलझी रहे अपने आप से तो आसानी हो जाती है

उलझाती है
इसीलिये तो
उलझन
कहलाती है

सुलझ गई
किसी तरह
किसी की तो
किसी और
के लिये यही
बात एक
उलझन
हो जाती है

अब उलझन का
क्या किया जाये
कुछ फितरत में
होता है किसी के
उलझना किसी से

कुछ के नहीं होती है
अगर कोई उलझन
पैदा कर दी जाती हैं
उलझने एक नहीं कई

कहीं एक सवाल
से उलझन
कहीं एक बबाल
से उलझन

किसी के लिये
आँखें किसी की
हो जाती हैं उलझन

किसी के लिये
जुल्फें ही बन
जाती हैं उलझन

सुलझा हुआ
है कोई कहीं
तो आँखिर है कैसे
बिना यहां
किसी उलझन

उलझनों का
ना होना किसी
के पास ही
एक आफत
हो जाती है

अपनो को तक पसंद
नहीं आती है ये बात

इसीलिये पैर
उलझाये जाते है
किसी के किसी से

घर ही के अपने
बनाते हैं कुछ
ऐसी उलझन

सबकी होती है
और जरूर होती है
कुछ ना कुछ उलझन

अपनी अपनी अलग
तरह की उलझन
देश की उलझन
राज्य की उलझन
शहर की उलझन
मौहल्ले घर
गली की उलझन

उलझन होती है
होने से भी
कुछ नहीं होता है
वो अपनी जगह
अपना काम करती है
उलझाने का

पर उलझने को कौन
कहाँ तैयार होता है
अपनी उलझन से
उसे तो किसी
और की उलझन
से प्यार होता है

सारी जिंदगी
उलझने यूं ही
उलझने रह जाती हैं

सबकी अपनी
अपनी होती हैं
कहाँ फंसा पाती हैं

अपनी जुल्फों को
देखने के लिये
आईना जरूरी होता है
सामने वाले की जुल्फ
साफ नजर आती है

आसानी से
सुलझाई जाती हैं
अपनी उलझन
अपने में ही
उलझी रह जाती है ।

रविवार, 10 नवंबर 2013

सोच तो होती ही है सोच

अपनी अपनी
होती है सोच

सुबह होते
अंगडाई सी
लेती है सोच

सुबह की
चाय के कप
से निकलती
भाप होती
है सोच

दूध की
दुकान की
लाईन में
हो रही
भगदड़
से उलझ रही
होती है सोच

दैनिक
समाचार
पत्रों के प्रिय
हनुमानों की
हनुमान
चालीसा
पढ़ रही
होती
है सोच

काम पर
जाने के
उतावले पन
में कहीं
खो रही
होती है सोच

दिन
होते होते
पता नहीं क्यों
बावली हो रही
होती है सोच

कहां कहां
भटक रही
होती है
बताने
की बात
जैसी नहीं हो
रही होती है सोच

शाम
होते होते
जैसे कहीं
कुछ खुश
कहीं
कुछ उदास
कहीं
कुछ थकी
कहीं
कुछ निराश
हो रही
होती है सोच

जब घर
को वापस सी
लौट रही
होती है सोच

रात
होते होते
ये भी होता है
जैसे किसी की
किसी से
घबरा रही
होती है सोच

कौन
बताता है
अगर बौरा रही
होती है सोच

सुकून
का पल
बस वही होता है

जब यूं ही
उंघते उंघते
सो जा रही
होती है सोच

पता किसे
कहाँ होता है
सपनों में क्या
आज की रात
दिखा रही है सोच

मुझे
अपनी समझ
में कभी भी
नहीं आती

क्या
तुझे समझ
में कुछ आ
रही है सोच ।

शनिवार, 9 नवंबर 2013

कई बार होता है लम्हे का पता लम्हे को नहीं होता है

कुछ तो जरूर होता है
हर किसी के साथ
अलग अलग सा
कितने भी अजीज
और कितने भी पास हों
जरूरी नहीं होता है
एक लम्हे का
हो जाना वही
जैसा सोच में हो
एक लम्हे को
होना ही होता है
किसी लिये कुछ
और किसी के लिये
कुछ और ही
अपने खुश लम्हे
को उसके उदास
लम्हे में बदल लेना
ना इसके हाथ
में होता है
ना ही उसके
हाथ में होता है
कहते हैं आत्मा में
हर एक के
भगवान होता है
और जब इसके हाथ में
उसका हाथ होता है
एक दूसरे के बहुत ही
पास में होता है
लम्हा एक होता है
इसके लिये भी
और उसके लिये भी
बस इसका लम्हा
उसके लम्हे के पास
कहीं नहीं होता है
ना इसे पता होता है
ना उसे पता होता है
एक लम्हे को अपने
से ही कैसा ये
विरोधाभास होता है ।

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

फसल तो होती है किसान ध्यान दे जरूरी नहीं होता है

ना कहीं खेत होता है
ना ही कहीं रेत होती है
ना किसी तरह की खाद की
और ना ही पानी की कभी
कहीं जरूरत होती है
फिर भी कुछ ना कुछ
उगता रहता है
हर किसी के पास
हर क्षण हर पल
अलग अलग तरह से
कहीं सब्जी तो कहीं फल
किसी को काटनी
आती है फसल
किसी को आती है
पसंद बस घास उगानी
काम फसल भी आती है
और उतना ही घास भी
शब्दों को बोना हर किसी के
बस का नहीं होता है
इसके बावजूद कुछ ना कुछ
उगता चला जाता है
काटना आता है जिसे
काट ले जाता है
नहीं काट पाये कोई
तब भी कुछ नहीं होता है
अब कैसे कहा जाये
हर तरह का पागलपन
हर किसे के बस
का नहीं होता है
कुकुरमुत्ते भी तो
उगाये नहीं जाते हैं
उग आते हैं अपने आप
कब कहाँ उग जायें
किसी को भी
पता नहीं होता है
पर कुछ कुकुरमुत्ते
मशरूम हो जाते हैं
सोच समझ कर अगर
कहीं कोई बो लेता है
रेगिस्तान हो सकता है
कैक्टस दिख सकता है
कोई लम्हा कहा जा सके
कहीं एक बंजर होता है
बस शायद ऐसा ही
कहीं नहीं होता है ।

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

पता कहाँ होता है किसे कौन कहाँ पढ़ता है

साफ सुथरी
सफेद एक
दीवार के
सामने
खड़े होकर
बड़बड़ाते हुऐ
कुछ कह
ले जाना
जहाँ पर
महसूस
ही नहीं
होता हो
किसी
का भी
आना जाना
उसी तरह
जैसे हो एक
सफेद बोर्ड
खुद के पढ़ने
पढ़ाने के लिये
उस पर
सफेद चॉक से
कभी कुछ
कभी सबकुछ
लिख ले जाना
फर्क किसे
कितना
पड़ता है
लिखने वाला
भी शायद ही
कभी इस
पर कोई
गणित 
करता है
भरे दिमाग
के कूड़े के
बोझ को
वो उस
तरह से
तो ये
इस तरह
से कम
करता है
हर अकेला
अपने आप
से किसी
ना किसी
तरीके से
बात जरूर
करता है
कभी समझ
में आ
जाती हैं
कई बातें
इसी तरह
कभी बिना
समझे भी
आना और
जाना पड़ता है
दीवार को
शायद पड़
जाती है
उसकी आदत
जो हमेशा
उसके सामने
खड़े होकर
खुद से
लड़ता है
एक सुखद
आश्चर्य से
थोड़ी सी झेंप
के साथ
मुस्कुराना
बस उस
समय पड़ता है
पता चलता है
अचानक
जब कभी
दीवार के
पीछे से
आकर
तो कोई
हमेशा ही
खड़ा हुआ
करता है ।

बुधवार, 6 नवंबर 2013

तुझे पता है ना तेरे घर में क्या चल रहा है !

वो जब भी
मिलता है
बस ये
पूछ लेता है
कैसा
चल रहा है
वैसा ही है या
कहीं कुछ
बदल रहा है
हर बार मेरा
उत्तर होता है
भाई ठीक
कुछ भी तो
नहीं चल रहा है
वैसा अब
यहाँ पर तो
कहीं नहीं
दिख रहा है
उसका
वैसे से क्या
मतलब होता
आया है
मैं आज
तक नहीं
समझ
पाया हूँ
उसके यहाँ
ऐसा लगता
रहा है हमेशा
कुछ स्पेशियल
ही हमेशा
चल रहा है
हम दोनो
जब साथ
साथ थे तो
हमने एक
दूसरे से कभी
नहीं पूछा
कैसा चल
रहा है
लगता था
मुझे पता
है जो कुछ
इसको भी
पता होगा
जो चल
रहा है
वो बैठा है
या कहीं
उछल रहा है
अब मैं
यहाँ हूँ
और वो
कहीं और
चल रहा है
उसके यहाँ
का ना मैंने
पूछा कभी
ना ही मुझे
कुछ कहीं से
कुछ पता
चल रहा है
और वो
हमेशा ही
मौका मिलते
ही पूछ लेता
है यूं ही
कैसा चल
रहा है
मुझे मेरे
देश से बहुत
प्यार है और
वो बहुत ही
सही चल
रहा है
लेकिन
क्या करूं
कहीं एक
पतला उछल
रहा है
कहीं दूसरा
मोटा उछल
रहा है
दोनो के
बीच में
कहीं पिस
ना जाये मेरा
हिन्दुस्तान
सोच सोच
कर मेरा
दिल उछल
रहा है
वो सब कृपया
ध्यान ना दें
जिनके यहाँ
सब कुछ
हमेशा ठीक
चलता है
और अभी
भी सब कुछ
ठीक चल
रहा है ।

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

उस पर क्यों लिखवा रहा है जो हर गली कूंचे पर पहुंच जा रहा है

लिख तो
सकता हूँ
बहुत कुछ
उस पर
पर नहीं
लिखूंगा
लिख कर
वैसे भी
कुछ नहीं
होना है
इसलिये
मुझ से
उस पर
कुछ लिखने
के लिये
तुझे कुछ
भी नहीं
कहना है
सबके अपने
अपने फितूर
होते हैं
मेरा भी है
सब पर कुछ
लिख सकता हूँ
उसपर भी
बहुत कुछ
पर क्यों लिखूं
बिल्कुल
नहीं लिखूंगा
अब पूछो
क्यों नहीं
लिखोगे भाई
जब एक
पोस्टर जो
पूरे देश की
दीवार पर
लिखा जा
रहा है और
हर कोई
उसपर
कुछ ना कुछ
कहे जा रहा है
तो ऐसे पर
क्या कुछ
लिखना जिसे
देख सब रहे हैं
पर पढ़ कोई भी
नहीं पा रहा है
मेरा इशारा उसी
तरफ जा रहा है
जैसा तुझ से
सोचा जा रहा है
उसे देखते ही मुझे
अपने यहाँ का वो
याद आ रहा है
होना कुछ
नया नहीं है
पुराने पीतल
पर ही सोना
किया जा रहा है
कुछ दिन
जरूर चमकेगा
उसके बाद
सब वही
जो बहुत
पुराने से
आज के नये
इतिहास तक
हर पन्ने में
कहीं ना कहीं
नजर आ रहा है
गांधी की
मूर्तियों से
काम निकलना
बंद हो भी
गया तो परेशान
होने की कोई
जरूरत नहीं
उन सब को
कुछ दिन
के लिये
आराम दिया
जा रहा है
खाली जगह
को भरने
के लिये
सरदार पटेल
का नया
सिक्का
बाजार में
जल्दी ही
लाया जा
रहा है | 

सोमवार, 4 नवंबर 2013

लक्ष्मी को व्यस्त पाकर उलूक अपना गणित अलग लगा रहा था

निपट गयी जी
दीपावली की रात
पता अभी नहीं चला
वैसे कहां तक
पहुंची देवी लक्ष्मी
कहां रहे भगवन
नारायण कल रात
किसी ने भी नहीं करी
अंधकार प्रिय
उनके सारथी
उलूक की
कोई बात
बेवकूफ हमेशा
उल्टी ही
दिशा में
चला जाता है
जिस पर कोई
ध्यान नहीं देता
ऐसा ही कुछ
जान बूझ कर
पता नहीं
कहां कहां से
उठा कर
ले आता है
दीपावली की
रात में जहां
हर कोई दीपक
जला रहा था
रोशनी चारों तरफ
फैला रहा था
अजीब बात
नहीं है क्या
अगर उसको
अंधेरा बहुत
याद आ रहा था
अपने छोटे
से दिमाग में
आती हुई एक
छोटी सी बात
पर खुद ही
मुस्कुरा रहा था
जब उसकी समझ
में आ रहा था
तेज रोशनी
तेज आवाजें
साल के
दो तीन दिन
हर साल
आदमी कर
उसे त्योहार
का एक नाम
दे जा रहा था
इतनी चकाचौंध
और इतनी
आवाजों के बाद
वैसे भी कौन
देख सुन पाने की
सोच पा रहा था
अंधा खुद को
बनाने के बाद
इसीलिये तो
सालभर
अपने चारों
तरफ अंधेरा
ही तो फैला
पा रहा था
उलूक कल
भी खुश नहीं
हो पा रहा था
आज भी उसी
तरह उदास
नजर आ रहा था
अंधेरे का त्योहार
होता शायद
ज्यादा सफल
उसे कभी कोई
क्यों नहीं
मना रहा था
अंधेरा पसंद
उलूक बस
इसी बात को
नहीं पचा
पा रहा था । 

रविवार, 3 नवंबर 2013

एक बच्चे ने कहा ताऊ मोबाइल पर नहीं कुछ लिखा

अपने पास है नहीं
भाई ऐसी चीज पर
लिखने को
कह जाता है
अभी तक पता नहीं
हाथ ही में क्यों है
दिमाग के अंदर ही
क्यों नहीं फिट कर
दिया जाता है
मर जायेगा
अगर नहीं पायेगा
हर कोई ऐसा जैसा
ही दिखाता है
छात्र छात्राओं की
कापी पैन और
किताब हो जाता है
पंडित मंत्र
पढ़ते पढ़ते
स्वाहा करना ही
भूल जाता है
पढ़ाना शुरु बाद
में होता है शिक्षक
कक्षा के बाहर
पहले चला जाता है
लौट कर आने
तक समय ही
समाप्त हो जाता है
मरीज की सांस
गले में अटकाता है
चिकित्सक आपरेशन के
बीच में बोलना जब
शुरु हो जाता है
बड़ी बड़ी मीटिंग होती है
कौन कितना बड़ा आदमी है
घंटी की आवाज से ही
पता चल जाता है
टैक्सी ड्राइवर मोड़ों पर
दिल जोर से धड़काता है
आफिस के मातहत को
साहब का नंबर साफ
बिना चश्में के दिख जाता है ‌‌
जवाब नहीं देना चाहता है
जेब में होता है पर
घर छोड़ के आया है
कह कर चला जाता है
कामवाली बाई से
बिना बात किये
नहीं रहा जाता है
बर्तनो में बचा साबुन
खाने को जैसे
मुंह के अंदर ही
धोना चाहता है
सड़क पर चलता
आदमी एक सिनेमाघर
अपना खुद हो जाता है
सब की बन रही होती है
अपनी ही फिल्म
दूसरे की कोई नहीं
देखना चाहता है
बहुत काम की चीज है
सब की एक
राय बनाता है
होना अलग बात है
नहीं होना
ज्यादा फायदेमंद
बस एक गधे को
ही नजर आता है
धोबी के पास होने
पर भी वो बहुत
खिसियाता है
गधा खुश हो कर
बहुत मुस्कुराता है
धोबी ढूँढ रहा था
बहुत ही बेकरारी से
जब कोई आकर
उसे बताता है
इससे भी लम्बी
कहानी हो सकती है
अगर कोई
मोबाइल पर
कुछ और भी
लिखना चाहता है ।

शनिवार, 2 नवंबर 2013

कुछ भी कभी भी कहीं भी प्रेरणा दे जाता है

कमप्यूटर स्क्रीन पर ब्लिंक
करता हुआ कर्सर
दिल की धड़कन के साथ
आत्मसात हो जाता है
पता चलता है ये
जब कभी अचानक
महसूस होने लग जाता है
जैसे शब्द खुद वही
गड़ता चला जाता है
टंकित हाथ की अंगुलियों
से उसे करवाता है
हौले से कुछ दिल और
दिमाग पर छा जाता है
दिखता है सामने से
लिखता हुआ जैसे
कलम की एक
नोक हो जाता है
लिखने वाला जैसे
उसके इशारे का बस
गुलाम हो जाता है
कमप्यूटर में सामने से
खुले एक पन्ने पर
झपझपाता हुआ
कर्सर दिल
अजीज हो जाता है
स्वागत करता है
खुले हुऐ पन्ने में
सबसे पहले मिलने
को चला आता है
बात शुरु
भी करता है
लिखनेवाला
थक जाता है
और वो एक बात
के पूरी होते ही
उतनी ही उर्जा के
साथ फिर से
झपझपाना
शुरु हो जाता है
कुछ और कहो ना
जैसे कहना चाहता है ।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

एक जैसा महसूस हो सबको जरूरी नहीं होता

रंग रोगन साफ
सफाई और घर
गन्ने की बनी
सुंदर सी लक्ष्मी
गणेश पूजा अर्चना
मिट्टी के दिये
तेल बाती मोमबत्तियां
चकरी फुलझड़ियां
सजी संवरी गृहणियां
उत्साह से सरोबार
बच्चे जवान बुड्ढे
बुड़िया लड़के लड़कियां
मन के अंदर जगमगाहट
झिलमिलाती बाहर
की रोशनियाँ
सजे हुऐ लबालब
भरे हुए बाजार
बर्तन भांडे कपड़े
लत्तों की भरमार
ये सब देखा था
कुछ ही दिन पहले
की जैसी हो बात
आज भी बहुत कुछ
वहीं का वहीं है
मशीन उगलने
लगी हैं लक्ष्मी
रोशनी से आँखें
चकाचौंध हैं
पठाके हैं कान फोड़
आवाज है धुआं है
घबराहट है जैसे
रुक रही सांस है
दीपावली रोशनी का
खुशी का त्योहार
तब भी था अब भी है
बस बदली बदली
लगता है एक ही चीज
पहले जहां होता था
इंतजार किसी के
आने का बेकरारी से
इंतजार आज भी होता है
पर बैचेनी के साथ
उतना ही उसी के
आकर चले जाने का ।

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