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सोमवार, 30 जून 2014

चिट्ठियाँ हैं और बहुत हो गई हैं

चिट्ठियाँ
इस जमाने की
बड़ी अजीब
सी हो गई हैं

आदत
रही नहीं
पड़े पड़े
पता ही
नहीं चला
एक दो
करते
बहुत बड़ा
एक कूड़े
का ढेर
हो गई हैं

कितना
लिखा
क्या क्या
लिखा
सोच समझ
कर लिखा
तौल परख
कर लिखा

किया
क्या जाये
अगर
पढ़ने वाले
को ही
समझ में
नहीं आ पाये
कि
उसी के
लिये ही
लिखी गई हैं
लिखने वाले
की भी
क्या गलती
उससे
उसकी नहीं
बस
अपनी अपनी
ही अगर
कही गई है

ऐसा भी
नहीं है कि
पढ़ने वाले
से पढ़ी
ही नहीं
गई हैं

आखों से
पढ़ी हैं
मन में
गड़ी हैं
कुछ
नहीं मिला
समझने
को तो
पानी में
भिगो कर
निचोड़ी
तक गई हैं

उसके
अपने लिये
कुछ नहीं
मिलने के
कारण कोई
टिप्पणी भी
नहीं करी
गई है

अपनी अपनी
कहने की
अब एक
आदत ही
हो गई है

चिट्ठियाँ हैं
घर पर
पड़ी हैं
बहुत
हो गई हैं

भेजने की
सोचे भी
कोई कैसे
ऐसे में
किसी को

अब तो
बस उनके
साथ ही
रहने की
आदत सी
हो गई है ।

रविवार, 29 जून 2014

काम की बात काम करने वाला ही कह पाता है

पहली तारीख को
वेतन की तरह
दिमागी शब्दकोश
भी जैसे कहीं से
भर दिया जाता है
महीने के अंतिम
दिनो तक आते आते
शब्दों का राशन
होना शुरु हो जाता है
दिन भर पकता है
बहुत कुछ
ऊपर की मंजिल में
पर शाम होते ही
कुछ कुलबुलाना
शुरु हो जाता है
इसीलिये शायद
अपने आप को
अच्छी बातों में
व्यस्त रखने को
कहा जाता है
सूखे हुऐ पेड़ के
ठूँठ पर बैठे हुऐ
‘उलूक’ से कुछ भी
नहीं हो पाता है
पता नहीं किस तरह
की बेरोजगारी ने
जकड़ा हुआ है उसे
हर शख्स के चेहरे में
उसे एक आईना
लगा हुआ दूर से
ही नजर आता है
कुछ कहने ना कहने
की बात ही नहीं उठती
देखने के लिये उसे
अपना ही चेहरा
बस नजर आता है
हर शाख पै उल्लू बैठा है
किसलिये और क्यों
कहा जाता है
इस बात को इसी तरह
वो बहुत अच्छी तरह
से समझ पाता है
शाम होते होते
दिन भर के पकाये
हुऐ कुछ कुछ में से
कुछ यहाँ बियाबान में
परोसने के लिये
चला आता है
वैसे भी एक ही जैसी
चीजों को दिन भर
देख देख कर कोई भी
बोर हो जाता है
कहते हैं माहौल
बदलने से थोड़ा सा
मूड भी हल्का
हो ही जाता है ।

शनिवार, 28 जून 2014

आओ फलों के पेड़ हो जायें

आओ फलों के
पेड़ हो जायें
खट्टे मीठे फलों
की खुश्बुओं
से लद जायें
कुछ तुम झुको
थोड़ा बहुत
कुछ हम भी
झुक जायें
अकड़ी हुई
सोच पर कुछ
चिकनाई लगायें
एक प्राण
निकला हुआ
शरीर ना बनकर
जिंदादिली से
जिंदा हो जायें
तैरना अपने
आप रहा
डूबने को
उतर जायें
एक सूखी लकड़ी
होने से बचें
कहीं कुछ हरा
कर जायें
कहीं कुछ भरा
कर जायें
आओ एक बार
फिर लौट लें
उसी रास्ते पर
फूलों से भरे
बागों के कुछ
चित्र फिर
खींच कर लायें
एक रास्ते के
एक कारवाँ के
हाथ पैर हो जायें
जोर आजमाईश
पर जोर ना लगायें
उसकी हथेली से
अपनी हथेली मिलायें
नमस्कार का
भाव हो जायें
आओ फिर से
कोशिश करें
थोड़ा तुम
आगे आओ
थोड़ा हम
आगे आ जायें
कड़क लकड़ी
बनने से बचें
झूलती गुलाब
की फूलों भरी
एक डाल हो जायें
आओ गले मिलें
गिले शिकवे मिटायें
कारवाँ बड़ रहा है
बटें और बांटे नहीं
पेड़ पर एक
लता बन कर
लिपट जायें
थोड़ा हम करें
थोड़ा तुम करो
बाकी सब के
मिलन के लिये
मैदान सजायें
आओ फलों के
पेड़ हो जायें ।

शुक्रवार, 27 जून 2014

बेकार की नौटंकी छोड़ कर कभी प्यार की बात भी कर

बात करना इतना
भी जरूरी नहीं
कभी काम की
बात भी कर
बहुत कर चुका
बेकार की बातें
कभी सरकार की
बात भी कर
जीना मरना
सोना उठना
खाना पीना
सबको पता है
इसकी उसकी
छोड़ कर कभी
अपनी और
अपने घर की
बात भी कर
कान पक गये
बक बक तेरी
सुनते सुनते
किसी एक दिन
चुप चाप रहने
की बात भी कर
सब जगह होता है
सब करते हैं
पुराने तरीकों को
छोड़ कुछ नये
तरीके से करने
वालों की
बात भी कर
खाली बैठे
बात ही बात में
कितने दिन
और निकालेगा
कुछ अच्छी बात
करने की भी सोच
कुछ नई बात करने
की बात भी
कभी ईजाद कर
‘उलूक’ तंग आ
चुका है शमशान
का अघोरी तक
लाशों की बात
छोड़ कर कभी
जिंदा लोगों
की बात भी कर ।

गुरुवार, 26 जून 2014

एक बहुत बड़े परिवार में एक का मरना खबर नहीं होता है

किसलिये मायूस
और किसलिये
दुखी होता है
सब ही को बहुत
अच्छी तरह से
पता होता है
जिसका कोई
नहीं होता है
उसका खुदा
जरूर होता है
अपनी बात को
अपने ही खुदा
से क्यों नहीं
कभी कहता है
उसका खुदा तो
बस उसके लिये
ही होता है
खून का रंग भी
सब ही का
लाल जैसा
ही तो होता है
अच्छे का
खुदा अच्छा
और बुरे का
खुदा बुरा
नहीं होता है
आदमी का खून
आदमी ही
सुखाता है
इस तरह का
कुछ बहुत
ज्यादा दिन
भी नहीं चल
पाता है
क्यों मायूस
और दुखी
इस सब
से होता है
सब को बस
मालूम ही नहीं
बहुत अच्छी
तरह से
पता होता है
जिसका कोई
नहीं होता है
उसका खुदा
जरूर ही होता है
रोज मरता है
कोई कहीं ना कहीं
इस दुनियाँ में
घर में मर गया
कोई किसी के
से क्या होता है
किसी जमाने में
खबर आती थी
मर गया कोई
मरे मरे हों सब जहाँ
वहाँ खबर करने से
भी क्या होता है
उठी लहर के साथ
उठ बैठने वाला
फिर खड़ा होने को
लौट गया होता है
कत्ल होने से
रोज डरता है ‘उलूक’
मारने वाले का खुदा
उसके साथ होता है
जिसका कोई
नहीं होता है
उसका खुदा तो
जरूर होता है
मगर उसका
खुदा उसका
और इसका खुदा
बस इसका खुदा
ही होता है ।

बुधवार, 25 जून 2014

यूस एंड थ्रो करना आना भी बहुत बड़ी बात होता है

खुद के खुद
से उलझने
से पैदा हुई
उलझनो में
उलझने से
बेहतर होता है
दूसरे की
उलझनों में
खुद जाकर
उलझ लेना
किसी से
खुद का कुछ
खुद कभी नहीं
सुलझता है
उलझना
उलझनो का
उलझनो से
बहुत पुरानी
उलझन होती है
नये जमाने के
लोग आदी
होने लगे हैं
यूज एण्ड थ्रो के
और सबसे
अच्छी स्थिति
किसी और की
उलझन में
उलझ कर
समझ में
जितना आ
सके समझ
लेना होता है
करना कुछ
नहीं होता है
उसकी उलझन
को उसी को
बहुत अच्छी
तरह से
समझा कर
किनारे से
निकल लेना
होता है
अपनी उलझनों
को थ्रो करते हुऐ
दूसरे की उलझनो
को लपक लपक कर
यूज कर लेना ही
यूज एंड थ्रो
करना होता है
उलझनो को
अपनी जगह
उलझते
रहना होता है
सुलझने के लिये
कहीं कुछ
नहीं होता है
‘उलूक’ इसके बाद
किसने किस
से कहना होता है
उलझनों को
सुलझाने में
किसी का दिमाग
भी खराब होता है
हर चीज पर
मेड इन इंडिया
लिखा ही हो
जरूरी नहीं होता है
पड़ौसी देश चीन से
आजकल बहुत कुछ
इस तरह का ही
इसी लिये बहुतायत
में आयात होता है ।

मंगलवार, 24 जून 2014

रोज एक नई बात दिखती है पुराने रोज हो रहे कुछ कुछ में

ये पता होते
हुऐ भी कि
बीज हरे भरे
पेड़ पौँधे के
नहीं है जो
बो रहे हैं
उनसे बस
उगनी हैं
मिट्टी से
रेत हो चुकी
सोच में कुछ
कंटीली झाड़ियाँ
जिनको काटने
के लिये कभी
पीछे मुड़ के
भी किसी ने
नहीं देखना है
उलझते रहे
पीछे से आ रही
भीड़ की सोच
के झीने दुपट्टे
और होते रहे
बहुत कुछ
तार तार
समय के
आर पार
देखना शुरु
कर लेना
सीख लेने
से भी कुछ
नहीं होता
अपने से शुरु
कर अपने में
ही समाहित
कर लेने में
माहिर हो कर
कृष्ण हो चुके
लोगों को अब
द्रोपदी के चीर
के इन्ही सोच
की झड़ियों में
फंस कर उधड़ना
देख कर शंखनाद
करना कोई नई
बात नहीं है
तुझी को आदत
डालनी पड़ेगी
बहरे होने की
नहीं हो सकता
तो चीखना सीख
एक तेज आवाज
के साथ जो
आज के कृष्ण
के शंख का
मुकाबला कर सके
तू नहीं तो
कृष्ण ही सही
थोड़ा सा
खुश रह सके ।

सोमवार, 23 जून 2014

एक गुलाब और एक लाश पर आप का क्या होगा विचार (आज की परिकल्पना की एक कल्पना पर)

किस पहर
का गुलाब
सुबह सुबह
पूजा का समय
या ढलती शाम
सुर्ख लाल
सूरज की लाली
या आँखों में
उतरता हुआ खूँन
पीला पड़ा हुआ
या उजला सफेद
विधवा हुआ सा
लाश जिंदा या मरी हुई
पोस्टमार्टम करने के
बाद की हड़बड़ी
में सिली हुई
सुकून किस को
किस तरह का
खुश्बू का सड़ाध का
मुरझाती हुई
पँखुड़ियों का या
लाश से रिसते हुऐ
लाल रंग से
सफेद होते हुऐ
उसके कपड़े का
गुलाब एक पौंधे पर
हौले से हवा के
झोंके से हिलता हुआ
लाश पर बहुत से
फूलों और
अगरबत्तियों
की राख से योगी
बन सना हुआ
किसको अच्छी
लगती हैं लाशें
किसको अच्छे
लगते हैं गुलाब
अलग अलग पहर पर
एक अलग तरह
की आग अलग अंदाज
कहीं बस धुआँ
तो कहीं राख
खाली गुलाब
खाली आदमी
खाली सोच
आदमी के
हाथ में गुलाब
अंदर कुछ
खोलता हुआ
बाहर हाथ में
सुर्ख होता गुलाब
अंदर से धीरे से
बनती हुई एक लाश
किस को किस की
ज्यादा जरूरत
किसकी किससे
बुझती हो प्यास
गुलाब भी जरूरी है
और लाश भी
और देखने समझने
वाले की आँख भी
बस समझ में
इतना आना जरूरी
लाशें गुलाब बाँटे
और सुर्खी भी
साथ साथ
दोनो होना
संभव नहीं है
एक साथ ।

रविवार, 22 जून 2014

सीख ले समय पर एक बात कभी काम भी आ जाती है

एक पत्थर में
बनता हुआ
दिखता है
एक आकार
और अपेक्षाऐं
जन्म लेना
शुरु करती हैं
बहुत तेजी से
और उतनी
ही तेजी से
मर भी जाती हैं
कुछ भी तो
नहीं होता है
पत्थर वहीं का
वहीं उसी तरह
जैसा था पड़ा
ही रहता है
अपेक्षाऐं फिर
पैदा हो जाती हैं
जिंदा रहती हैं
कुछ नहीं होता है
पूरी भी होती हैं
तब भी कुछ
नहीं होता है
एक बहुत
साफ साफ
दिखता हुआ
हिलता डुलता
जीवित आकर
भी पत्थर
होता है और
पता भी
नहीं होता है
अपेक्षाऐं पैदा
करवाता है
पालना पोसना
सिखाता है
उनके जवान
होने से पहले ही
खुद के हाथों
से ही कत्ल
करवाता है
मरे हुऐ पत्थर
और जिंदा पत्थर
में बस एक ही
अंतर नजर आता है
एक से अपेक्षाऐं
मरने के बाद भी
पैदा होना
नहीं छोड़ती हैं
और दूसरे से
अपेक्षाऐं बाँझ
हो जाती हैं
‘उलूक’ समझा
कुछ या नहीं
एक छोटी सी बात
बहुत ज्यादा
पढ़े लिखे होने
के बाद भी
आसानी से
समझ में
नहीं आ पाती है
पत्थर में
जीवन है
या जीवित ही
पत्थर है
अंतर ही नहीं
कर पाती है ।

शनिवार, 21 जून 2014

कहानी का सच सुना ना या सच की कहानी बता ना

बहुत से बहुत सारे
खूबसूरत लोग
बहुत कायदे से
शराफत से
रहने वाले लोग
बहुत ही अच्छे लोग
जिनके चमकते जूते में
ही नजर आ जाता हो
अपना चेहरा भी
बहुत दूर से
कपड़ों में ना कोई
सिलवट ना कोई
दाग धूल और धब्बा
चेहरे में बस
मुस्कुराना और
केवल मुस्कुराना
कुछ नहीं कहना
बस सिर हिलाना
किसी को भी
इस दृश्य को
देखने से ही
अच्छा महसूस होना
शुरु हो जाना
एक नहीं एक
के साथ दूसरा
दूसरे के साथ तीसरा
तीसरे के साथ चौथे
का जुड़ते चले जाना
बहुत होता है
उसके आसपास
जिसको इन सब
सलीकों को
सीखने का कभी भी
ना मिला हो
कोई बहाना
लेकिन किसी को
नहीं नजर आ पाता है
खूबसूरती के साथ
 इन सब का
फाँसी की गाँठ
लगी हुई एक रस्सी
को कोट की ऊपर की
जेब में छिपाना
बस एक सिरा जिसका
बाहर की तरफ
थोड़ा सा दिखाना
रोज कहीं किसी का
तिल तिल
कर मर जाना
किसी भी जनाजे का
सड़क से निकल
कर नहीं जाना
मौत की कोई खबर
अखबार में ना आना
ना कोई आहट
ना कोई शोर
ना कोई अफसाना
मुस्कुराहटें
अपनी जगह पर
रस्सियाँ
अपनी जगह पर
कितनी बारहवीं
कितनी तेरहवीं का
यूँ ही हो जाना
जूते की चमक से
चेहरे की दमक का
बढ़ता चले जाना
‘उलूक’ तेरे बस का
कुछ नहीं था कभी भी
तू फिर किसी दिन
पूछ्ने के लिये
यहां चले आना
अभी मस्त है जमाना
बिना आवाज की
चीखों का बहुत जगह
बज रहा है गाना
सोच जरा सा
फाँसी की गाँठ
वाली रस्सी को
दिखाने से
किसी को कभी
जेल पड़ा है जाना ।

शुक्रवार, 20 जून 2014

आभार वीरू भाई आपके हौसला बढ़ाने के लिये और आज का मौजू आपकी बात पर ।

सब कुछ उड़ता है वहाँ उड़ाने वाले जहाँ होते हैं


लेखन को पँख
लग गये हैं जैसे
उसने कहा
क्या उड़ता हुआ
दिखा उसे बस
यही पता नहीं चला
लिखा हुआ भी
उड़ता है
उसकी भी उड़ाने
होती हैं सही है
लेकिन कौन सी
कलम किस तरह
कट कर बनी है
कैसे चाकू से
छिल कर उसकी
धार बही है
खून सफेद रँग
का कहीं गिरा
या फैला तो नहीं है
किसे सोचना है
किसे देखना है
मन से हाथों से
होते होते कागज तक
उड़कर पहुँची है
छोटी सोच की
ऊड़ान है और
बहुत ऊँची है
किस जमीन में
कहाँ रगड़ने के
निशान छोड़ बैठी है
उड़ता हुआ जब
किसी को किसी ने
नहीं देखा है
तो उड़ने की बात
कहाँ से लाकर
यूँ ही कह दी गई है
पँख कटते है जितना
उतना और ऊँचा
सोच उड़ान भरती है
पूरा नहीं तो नापने को
आकाश आधा ही
निकल पड़ती है
पँख पड़े रहते हैं
जमीन में कहीं
फड़फड़ाते हुऐ
किसे फुरसत होती है
सुनने की उनको
उनके अगल बगल
से भी आते जाते हुऐ
उड़ती हुई चीजें
और उड़ाने किसे
अच्छी नहीं लगती हैं
‘उलूक’ तारीफ
पैदल की होती हुई
क्या कहीं दिखती है
जल्लाद खूँन
गिराने वाले नहीं
सुखाने में माहिर
जो होते हैं
असली हकदार आभार
के बस वही होते हैं
लिखने वाला हो
लेखनी हो या
लिखा हुआ हो
उड़ना उड़ाना हो
ऊँचाइ पर ले जा कर
गिरना गिराना हो
तूफान में कभी
दिखते नहीं कहीं भी
कभी भी तूफान लाने का
जिसको अनुभव
कुछ पुराना हो
असली कलाकार वो ही
और बस वो ही होते हैं
लिखने लिखाने वाले
तो बस यूँ ही कुछ भी
कहीं भी लिख रहे होते हैं
तेरी नजर में ही है
कुछ अलग बात
तेरे लिये तो उड़ने के
मायने ही अलग होते हैं ।

गुरुवार, 19 जून 2014

‘सात सौंवा पन्ना’

पता नहीं चला
होते होते
कब हो गये
एक दो करते
सात सौ
करीने से
लगे हुऐ पन्ने
एक के बाद एक
बहुत सी बिखरी
दास्तानों के
अपने ही
बही खातों से
लाकर यहाँ
बिखराते बिखराते
बिखरे या सम्भले
किसे मालूम
पर कारवाँ बन
गया एक जरूर
सलीके दार
पन्नों का
सुबह से शुरु हुआ
बिना थके चलने
में लगा हुआ
शाम ढलने की
चिंता को
कहीं मीलों
पीछे छोड़कर
जिंदगी की किताबों
के पुस्तकालय में
पड़ी हुई धूल भरी
बिखरी हुई किताबों
के जखीरे बनाता हुआ
जिसे कभी जरूरत
नहीं पड़ेगी पलटने
की खुद तुझे ‘उलूक’
जिसे अभी मीलों
चलना है
बहुत कुछ
बिखरते हुऐ
को यहाँ ला कर
बिखेरने के लिये
कल परसों
और बरसों
यहाँ इस जगह पर
सात सौ से
सात हजार के
सफर में
बस इस उम्मीद
के साथ कि
बहुत कुछ बदलेगा
बहुतों के लिये
और बहुत कुछ
बिखरेगा भी
तेरे यहाँ ला कर
बिखेरने के लिये ।

बुधवार, 18 जून 2014

पुरानी किताब का पन्ना सूखे हुऐ फूल से चिपक कर सो रहा था

वो गुलाब पौंधे पर
खिला हुआ नहीं था
पुरानी एक किताब के
किसी फटे हुऐ अपने
ही एक पुराने पेज पर
चिपका हुआ पड़ा था
खुश्बू वैसे भी पुराने
फूलों से आती है कुछ
कहीं भी किसी फूल
वाले से नहीं सुना था
कुछ कुछ बेरंंगा
कुछ दाग दाग
कुछ किताबी कीड़ोंं
का नोचा खाया हुआ
बहुत कुछ ऐसे ही
कह दे रहा था
फूल के पीछे कागज
में कुछ भी लिखा हुआ
नहीं दिख रहा था
ना जाने फिर भी
सब कुछ एक आइने
में जैसा ही हो रहा था
बहुत सी आड़ी तिरछी
शक्लों से भरा पड़ा था
खुद को भी पहचानना
उन सब के बीच में कहीं
बहुत मुश्किल हो रहा था
कारवाँ चला था
दिख भी रहा था
कुछ धुंंधला सा
रास्ते में ही कहीं
बहुत शोर हो रहा था
बहुत कुछ था
इतना कुछ कि पन्ना
अपने ही बोझ से जैसे
बहुत बोझिल हो रहा था
कहाँ से चलकर
कहाँ पहुंंच गया था
‘उलूक’
बिना पंखों के धीरे धीरे
पुराने एक सूखे हुऐ
गुलाब के काँटो को
चुभोने से भी दर्द
थोड़ा सा भी
नहीं हो रहा था
कारवाँ भी पहुँचा होगा
कहीं और किसी
दूसरे पन्ने में किताब के
कहाँ तक पहुँचा
कहाँ जा कर रुक गया
बस इतना ही पता
नहीं हो रहा था ।

मंगलवार, 17 जून 2014

भ्रम कहूँ या कनफ्यूजन जो अच्छा लगे वो मान लो पर है और बहुत है

भ्रम कहूँ
या
कनफ्यूजन

जो
अच्छा लगे
वो
मान लो

पर हैंं
और
बहुत हैंं

क्यों हैंं
अगर पता
होता तो
फिर
ये बात
ही कहाँ
उठती

बहुत सा
कहा
और
लिखा
सामने से
आता है
और
बहुत
करीने से
सजाया
जाता है

पता कहाँ
चलता है
किसी और
को भी है
या नहीं है
उतना ही
जितना
मुझे है

और मान
लेने में
कोई शर्म
या झिझक
भी नहीं है
जरा सा
भी नहीं

पत्थरों के
बीच का
एक पत्थर
कंकणों
में से एक
कंकण
या
फिर रेत
का ही
एक कण
जल की
एक बूँद
हवा में
मिली हुई
हवा
जंगल में
एक पेड़
या
सब से
अलग
आदमियों
के बीच
का ही
एक आदमी
सब आदमी
एक से आदमी
या
आदमियों के
बीच का
पर एक
अलग
सा आदमी

कितना पत्थर
कितनी रेत
कितनी हवा
कितना पानी
कितने जंगल
कितने आदमी

कहाँ से
कहाँ तक
किस से
किस के लिये

रेत में पत्थर
पानी में हवा
जंगल में आदमी
या
आदमीं में जँगल

सब गडमगड
सबके अंदर
बहुत अंदर तक

बहुत तीखा
मीठा नशीला
बहुत जहरीला
शांत पर तूफानी
कुछ भी कहीं भी
कम ज्यादा
कितना भी
बाहर नहीं
छलकता
छलकता
भी है तो
इतना भी नहीं
कि साफ
साफ दिखता है

कुछ और
बात कर
लेते हैं चलो

किसी को
कुछ इस
तरह से
बताने से भी
बहुत बढ़ता है

बहुत है
मुझे है
और किसी
को है
पता नहीं
है या नहीं

भ्रम कहूँ
या
कनफ्यूजन
जो
अच्छा लगे
वो
मान लो
पर है
और
बहुत है ।

सोमवार, 16 जून 2014

किसी दिन बिना दवा दर्द को छुपाना भी जरूरी हो जाता है

नदी के बहते
पानी की तरह
बातों को लेने वाले
देखते जरूर हैं
पर बहने देते हैं
बातों को
बातों के सहारे
बातों की नाँव हो
या बातें किसी
तैरते हुऐ पत्ते
पर सवार हों
बातें आती हैं
और सामने से
गुजर जाती है
और वहीं पास में
खड़ा कोई उन
बातों में से बस
एक बात को
लेकर बवंडर
बना ले जाता है
कब होता है
कुछ होते होते
धुआँ धुआँ सा
धुआँ हो जाताहै
बस एक उसे
ही नजर आता है
बैचेनी एक होती है
पर चैन खोना
सबको नहीं आता है
उसी पर मौज
शुरु हो जाती है
किसी की और
कहीं पर किसी का
खून सूखना
शुरु हो जाता है
अब इसी को तो
दुनियाँ कहा जाता है
उँगलियाँ जब
मुड़कर जुड़ती हैं
मुट्ठी की मजबूती
का नमूना सामने
आ जाता है
पर सीधाई को
शहीद करने के बाद
ही इसे पाया जाता है
कौन इस बात
पर कभी जाता है
हर किसी के लिये
उसकी अपनी
प्रायिकताऐं
मजबूरी होती है
उसी के सहारे
वो अपना आशियाँना
बनाना चाहता है
कौन खम्बा बना
कौन फर्श
किस ने छत पे
निसार दिया खूँन
इस तरह से
कहाँ देखा जाता है
काम होना ही
बहुत जरूरी होता है
काम कभी कहीं
नहीं रुकता है
उसकी भी मजबूरी
कह लीजिये उसे
पूरा होना कम से
कम आता है
‘उलूक’ तुझे भी
कुछ ना कुछ
कूड़ा रोज लाकर
बिखेरना होता है यहाँ
बहुत जमा हो
जायेगा किसी दिन
फिकर कौन करता है
वहाँ जहाँ बुहारने वाला
कोई नहीं पाया जाता है ।

रविवार, 15 जून 2014

पिताजी आइये आपको याद करते है आज आप का ही दिन है

आधा महीना जून
का पूरा हुआ
पता चलता है
पितृ दिवस होता है
इस महीने में
कोई एक दिन
नहीं होता है
कई दिन होते हैं
अलग अलग जगह पर
अपने अपने हिसाब से
क्या गणित है इसके पीछे
कोशिश नहीं की
जानने की कभी
गूगल बाबा को
भी पता नहीं होता है
यूँ  भी पिताजी को गुजरे
कई बरस हो गये
श्राद्ध के दिन पंडित जी
याद दिला ही देते है
सारे मरने पैदा होने
के दिनों का उनके
पास लेखा जोखा
किसी पोटली में
जरूर बंधा होता है
आ जाते है सुबह सुबह
कुछ तर्पण कुछ मंत्र
पढ़ कर सुना देते हैं
अब चूंकि खुद भी
पिता जी बन चुके हैं
साल के बाकी दिन
बच्चों की आपा धापी
में ही बिता देते हैं
पिताजी लोग शायद
धीर गंभीर होते होंगे
अपने पिताजी भी
जब याद आते हैं
तो कुछ ऐसे जैसे
ही याद आते हैं
बहुत छोटे छोटे
कदमों के साथ
मजबूत जमीन ढूँढ कर
उसमें ही रखना पाँव
दौड़ते हुऐ कभी नहीं दिखे
हमेशा चलते हुऐ ही मिले
कोई बहुत बड़ी इच्छा
आकाँक्षा होती होगी
उनके मन में ही कहीं
दिखी नहीं कभी भी
कुछ सिखाते नहीं थे
कुछ बताते नहीं थे
बस करते चले जाते थे
कुछ ऐसा जो बाद में
अब जा कर पता चलता है
बहुत कम लोग करते हैं
ज्यादातर अब कहीं भी
वैसा  कुछ नहीं होता है
गाँधी जी के जमाने
के आदमी जरूर थे
गाँधी जी की बाते
कभी नहीं करते थे
और समय भी हमेशा
एक सा कहाँ रहता है
समय भी समय के साथ
बहुत तेज और तेज
बहने की कोशिश
करता रहता है
पिताजी का जैसा
आने वाला पिता
बहुत कम होता
हुआ दिखता है
क्या फर्क पड़ता है
पिताजी आयेंगे
पिताजी जायेंगे
बच्चे आज के कल
पिताजी हो जायेंगे
अपने अपने पिताजी
का दिन भी मनायेंगे
भारतीय संस्कृति में
बहुत कुछ होने से
कुछ नहीं कहीं होता है
एक एक करके
तीन सौ पैंसठ दिन
किसी के नाम कर के
गीत पश्चिम या पूरब से
लाकर किसी ना किसी
बहाने से किसी को
याद कर लेने की दौड़
में हम अपने आप को
कभी भी दुनियाँ में
किसी से पीछे होता
हुआ नहीं पायेंगे
‘उलूक’ मजबूर है
तू भी आदत से अपनी
अच्छी बातों में भी
तुझे छेद हजारों
नजर आ जायेंगे
ये भी नहीं
आज के दिन ही
कुछ अच्छा सोच लेता
डर भी नहीं रहा कि
पिताजी पितृ दिवस
के दिन ही
नाराज हो जायेंगे।

शनिवार, 14 जून 2014

एंटी करप्शन पर अब पढ़ाई लिखाई भी होने जा रही है

बड़ी खबर है
रहा नहीं गया
कुछ और लिखने
की सोचने की
जरूरत ही
नहीं पड़ी आज
अखबार की खबर
से ही बहुत
कुछ मिल गया
अच्छे दिन जब
आने ही वाले हैं
इसीलिये अच्छी
खबरें भी आ रही हैं
बहुत कुछ होने
जा रहा है
आने वाले दिनो में
बता रही हैं
असली बात तो
इन्ही बातों में
रह जा रही है
खुशी होने से
कलम भी भटक
कर उधर को
चली जा रही है
तो सुनिये
खबर ये आ रही है
विश्वविध्यालय
पढ़ायेंगे एंटी
करप्शन का पाठ
मानव संसाधन
मंत्रालय की मंशा
कुछ इस तरह
का बता रही है
डिग्री कोर्सों में होगा
एंटी करप्शन
का टापिक
ये बात समझ में
बहुत अच्छी तरह
से आ रही है
पर्यावरण पढ़ाना
शुरु किया था
कुछ साल पहले
उसे पढ़ाने के लिये
पढ़ाने वाले को
कुछ भी पढ़ने की
जरूरत कहाँ
हो जा रही है
कामर्स विषय वाली
कामर्स विभाग में
पर्यावरण पढ़ा
ले जा रही है
इतिहास भी होता है
पर्यावरण में
इतिहास वाली
अपने विभाग में
बता पा रही है
करप्शन पर भी
किसी ट्रेनिग की
जरूरत नहीं पढ़ेगी
विश्वविध्यालयों के
लोगों को भी
करप्शन का कोर्स
जहाँ की जनता
बहुत पहले से समझ
और समझा रही है
अच्छा है कुछ लोगों की
ऊपरी आय कर लेने
के लिये एक और रास्ता
अच्छे दिन लाने वाली
एक अच्छी सरकार
जल्दी ही लाने जा रही है ।

शुक्रवार, 13 जून 2014

गौण ही है पर यही है बताने के लिये आज भी

उसके चेहरे पर
शिकन नहीं है
सुना है उसकी
शोध छात्रा ने
शिकायत की है
छेड़ छाड़ की
अच्छे दिन
लाने वाले लोगों
को वैसे भी
देश देखना है
ये बातें तो
छोटे लोग
करते हैं तेरे जैसे
कोई हल्ला गुल्ला
जब नहीं है कहीं
कोई एफ आई आर
नहीं है कोई कहीं
कोई सबूत नहीं है
फिर अगर कोई
खुले आम बिना
किसी झिझक
मुस्कुराते हुऐ
घूमता है तो
तेरे को काहे
चिढ़ लग रही है
लड़के लड़कियाँ
परीक्षा दें या
मोमबत्तियाँ लेकर
शहर की गलियों में
शोर करने निकल पड़े
निर्भया होने से
तो बच ही गई है  
वैसे भी जब तक
कोई अपराध
सिद्ध नहीं हो जाता है
अपराध कहाँ और कब
माना जाता है
और  अगर
घर की बात
घर में रहे तो
अच्छा होता है
‘उलूक’ तुझे तो
इस सब के बारे में
सोच कर ही
झुर झुरी
हो जाया करती है
उनको पता चल गया
तू सोच रहा है
तो बबाल हो जायेगा
उसने किया है
तो होने दे
बड़े आदमी के बड़े हाथ
और सारे आस पास के
बड़े लोग उसके साथ
तू अपनी गुड़ गुड़ी
खुशी से यहाँ छाप
सिर खुजा और उसको
मौज करते हुऐ
रोज का रोज देखता जा
फाल्तू की अपनी बात
उलूक टाइम्स में
ला का कर सजा ।

गुरुवार, 12 जून 2014

हद नहीं होती जब हदों के साथ उसे पार किया जाता है

हदें पार करना
आसान होता है
बस समझने तक
सालों गुजर जाते हैं
पिता जी किया करते थे
बस हद में रहने की बात
शायद उस समय
नहीं की जाती होंगी
पार हदें उस तरह से
जिस तरह से पार
कर ली जाती हैं आज
बहुत आसान होता है
हदों को पार कर ले जाना
यूँ ही खेल खेल में
बनाना होता है बहुमत
दिखाना भी होता है
वो सब गलत होता है
जो अकेले अकेले में
एक अकेले ने
कर लिया होता है
और पिताजी
आप भी तो अकेले
ही हुआ करते थे
लिये धनुष और तीर
अपने विचारों का
अपने ही हाथ
सीखने वाला भी
अकेला रहा करता था
कभी भी नहीं
बन पाता था बहुमत
एक और एक
दो की बातों का
समझ में आने
लगा है अब
पार करने का
तरीका हदों को
सीखा नहीं जाता है
लेकिन बस सलीका
बहुमत बनाने का
समझ में आती है
बहुत छोटी सी एक बात
जो अकेले किया जाता है
वो सही कभी नहीं होता
गलत हो जाता है
बहुमत के द्वारा
एक अकेले को
हद में रहना लेकिन
बहुत आसानी से
सिखा दिया जाता है
और उसी हद को
बहुत प्यार से
बहुमत बना के
बहुत सी हदों के
साथ साथ शहीद
कर दिया जाता है
'उलूक' अकेला चना
बस एक चना
ही रह जाता है।

बुधवार, 11 जून 2014

रोज होती है मौत रोज ही क्रिया कर्म रोज बनती हैं अस्थियाँ

रोज होती
है मौत
रोज ही
क्रिया कर्म
रोज बनती हैं
अस्थियाँ
विसर्जित
होने के लिये

जिनको
कभी भी
नहीं मिलना
होता है
कोई संगम
प्रवाहित
होने के लिये

कपड़े से
मुँह बंद
कर रख
दी जाती हैं
मिट्टी के
घड़े में
रखी हुई हैं
सोच कर
अपने ही
अगल
बगल कहीं

महसूस
करने
के लिये
कि
हैंं आस
पास कहीं

दिखते
रहने
के लिये
पर
दिखाई
नहीं
जाती हैं

किसी
को भी
कभी भी
इसलिये
नहीं कि
कोई
दिखाना
नहीं चाहता है

बल्कि
इसलिये
कि
दिखा नहीं
पाता है

सभी के
पास होते हैं
अपने अपने
अस्थियों के
गले गले
तक भरे
मिट्टी के
कुछ घड़े
फोड़ने
के लिये

पर
ना तो
घड़ा
फूटता
है कभी
ना ही
राख
फैलती
है कहीं
किसी
गंगाजल में
प्रवाहित
होने के लिये

बस
एक के
बाद एक
इकट्ठा
होते चले
जाते हैं
अस्थियों
के घड़े
कपड़े से
मुँह बंद
किये हुऐ

जिसमें
अस्थियाँ
हड्डियों
और माँस
की नहीं
एक सोच
की होती हैं

और
रोज ही
किसी पेड़
पक्षी या
आसपास
उड़ती
धूल मिट्टी
की बात
को लेकर
लिख ही
लेता है
कोई
यूँ ही कुछ
और
रोज बढ़
जाता है
एक अस्थि
का घड़ा
अगल
बगल कहीं
कपड़े से
बंधा हुआ
बंद किये
हुऐ एक
सोच को
जो बस
दफन होने
के लिये
ही जन्म
लेती है ।

मंगलवार, 10 जून 2014

ऐसे में क्या कहा जाये जब ऐसा कभी हो जाता है

कभी कभी सोच सोच
कर भी कुछ लिख लेना
बहुत मुश्किल हो जाता है
जब बहुत कुछ होते हुऐ भी
कुछ भी कहीं भी
नहीं नजर आ पाता है
औकात जैसे विषय पर
तो कतई कुछ नहीं
शब्द के अर्थ ढूँढने
निकल भी लिया जाये
तब भी कुछ भी हाथ
में नहीं आ पाता है
सब कुछ सामान्य सा
ही तो नजर आता है
कोई हैसियत कह जाता है
कोई स्थिति प्रतिष्ठा या
वस्तुस्थिति बताता है
पर जो बात औकात में है
वो मजा शब्दकोश में उसके
अर्थ में नहीं आ पाता है
जिसका आभास एक नहीं
कई कई बार होता
चला जाता है
कई कई तरीकों से
जो कभी खुद को खुद
से पता चलती है
कभी सामने वाले की
आँखो की पलकों के
परदों में उठती
गिरती मचलती है
कुछ भी हो औकात
पद प्रतिष्ठा या स्थिति
नहीं हो सकती है
कभी कुछ शब्द
बस सोचने के लिये
बने होते हैं यूँ ही
सोचते ही आभास
करा देते हैं
बहुत गहरे अर्थों को
उन्हे बस स्वीकार
कर लेना होता है
‘उलूक’ हर शब्द का
अर्थ कहीं हो
समझने के लिये
हमेशा जरूरी
नहीं हो जाता है
महसूस कर लेना
ही बहुत होता है
कुछ इसी तरह भी
जो जैसा होता है
वैसा ही समझ
में भी आता है
औकात का अर्थ
औकात ही रहने
दिया जाना ही
उसकी गरिमा
को बढ़ाता है
सही मानों में
कभी कभी
शब्द ही उसका
एक सही अर्थ
हो जाता है ।

सोमवार, 9 जून 2014

दुनियाँ है रंग अपने ही दिखाती है

भैंस के बराबर
काले अक्षरों को
रोज चरागाह पर
चराने की आदत
किसी को हो जाना
एक अच्छी बात है
अक्षरों के साथ
खेलते खेलते
घास की तरह
उनको उगाना
शुरु हो जाना
बहुत बुरी बात है
बिना एक सोच के
खाली लोटे जैसे
दिमाग में शायद
हवा भी रहना
नहीं चाहती है
ऐसे में ही सोच
खाली में से
खाली खाली ही
कुछ बाहर निकाल
कर ले आती है
उसी तरह से जैसे
किसी कलाकार की
कूँची किसी एक को
एक छोटा सा झाड़ू
जैसा नजर आती है
साफ जगह होने से
कुछ नहीं होता है
झाड़ने की आदत
से मजबूर सफाई
को तक बुहारना
शुरु हो जाती है
बहुत कुछ होता है
आसपास के लोगों
के दिमाग में
और हाथ में भी
पर मंद बुद्धी का
क्या किया जाये
वो अपनी बेवकूफियों
के हीरों के सिवाय
कुछ भी देखना
नहीं चाहती है
और क्या किया जाये
‘उलूक’ तेरी इस
फितरत का जो
सोती भी है
सपने भी देखती है
नींद में होने के
बावजूद आँखे
पूरी की पूरी खुली
नजर भी आती हैं ।

रविवार, 8 जून 2014

ऊबड़ खाबड़ में सपाट हो जाता है सब कुछ

कई सालों से कोई
मिलने आता रहे हमेशा
बिना नागा किये
निश्चित समय पर
एक सपाट चेहरे के साथ
दो ठहरी हुई आँखे
जैसे खो गई हों कहीं
मिले बिना छुऐ हाथ
या बिना मिले गले
बहुत कुछ कहने के लिये
हो कहीं छुपाया हुआ जैसे
पूछ्ने पर मिले हमेशा
बस एक ही जवाब
यहाँ आया था
सोचा मिलता चलूँ
वैसे कुछ खास
बात नहीं है सब ठीक है
अपनी जगह पर जैसा था
बस इसी जैसा था पर
उठते हैं कई सवाल
कैसे कई लोग
कितना कुछ जज्ब
कर ले जाते हैं
सोख्ते में स्याही की तरह
पता ही नहीं चलता है
स्याही में सोख्ता है
या सोख्ता में
स्याही थोड़ी सी
पर काला कुछ नहीं होता
कुछ भी कहीं जरा सा भी
कितने सपाट हो लेते हैं कई लोग
सब कुछ ऊबड़ खाबड़
झेलते झेलते सारी जिंदगी ।

शनिवार, 7 जून 2014

लट्टू को घूमना होता है यहाँ होता है या वहाँ होता है

एक जमघट
के लट्टू का
निकल कर
कुछ दिन
किसी और जगह
दूसरे जमघट में
जा कर घूम लेना
देख लेना एक नई
भीड़ के तौर तरीके
अच्छा होता है
कुछ देर के
लिये ही सही
लट्टू को जैसे कुछ
फुरसत मिल जाती है
सोचने से नहीं
घूमने से
वैसे भी लट्टू कुछ
नहीं सोचता है
यहाँ होता है या
वहाँ होता है
लट्टू बने होते हैं
बस और बस
घूमने के लिये
रुके हुऐ लट्टू
अच्छे नहीं लगते
लट्टू को घूमते देखना
लट्टुओं को बहुत
पसंद आता है
लट्टू घूमता रहे
सामने सामने
पता रहता है
किधर से घूमता हुआ
किधर चला जाता है
परेशानी तब शुरु होती है
जब एक भीड़ के लिये
नाचने वाला लट्टू
कुछ देर के लिये
आँखों से ओझल
हो जाता है
बैचेनी शुरु होती है
बढ़ती है और
रहा नहीं जाता है
लट्टुओं को बहुत
राहत मिलती है
लट्टू जब लौट
कर आता है
अपने पुराने
लट्टुओं के बीच और
घूमना शुरु हो जाता है
जैसे हमेशा घूमता है
लट्टु लट्टुओं के लिये
रोज के अपने
जाने पहचाने
लट्टुओं के बीच ।

शुक्रवार, 6 जून 2014

कुछ कहने के लिये बस कुछ कह लेना है

जो होना है
वो तो होना है
होगा ही
होने देना है
किसी से कहने
से कुछ होगा
किसे इस पर
कुछ पता होना है
उनकी यादों की
यादों को सोने
ही देना है
सपने किसी
के आते भी हों
तो आने देना है
बस कुछ दिनो
की बात और है
रुके रहना है
रोने वाले की
आदत होती है
रोने की उसे
रोने देना है
जिसके हाथों में
होती है हमेशा
खुजली बस उसी
के हाथ में
हथौड़ा ला कर
दे देना है
खोदने वालों को
मिल चुका है
बहुत खोदने
का काम अब
किसी और को
नहीं देना है
अंदर की बात
को अंदर ही
रहने देना है
बाहर के तमाशे
करने वालों को
करते रहने का
इशारा देना है
बहुत कुछ
हो रहा है
बहुत कुछ
अभी होना ही
होना है
‘उलूक’ तू
रोता कलपता
ही अच्छा लगता है
तेरे हँसने के
दिन आने में
अभी महीना है ।

गुरुवार, 5 जून 2014

कभी कुछ इस तरह भी कर लिया जाये

अब रोने चिल्लाने
पर कैसे गीत
या गजल
लिखी जाये
बस यूँ ही ऐसे ही
क्यों ना कुछ
रो लिया जाये
चिल्ला लिया जाये
वैसे भी कौन
पढ़ या गा रहा है
रोने चिल्लाने को
सब फालतू है
दिखाने को
बस ऐसे ही
जैसा है
रहने ही दिया जाये
कोई खरोंचने
में लगा हो
चिपकी हुई
कढ़ाई में
से मलाई
उसकी कुछ मदद
क्यों ना करने
को चला जाये
चाकू जंक लगा
साफ कर
चमका लिया जाये
अब हो रहा है
जो भी कुछ
नया तो नहीं
होने जा रहा
पुराने घाव को
धो पोछ कर
फिर से ढक
लिया जाये
बहुत कुछ
कहने से
कुछ नहीं
कहीं होने वाला
बस इतना कहने
के बाद जोर जोर से
गला फाड़ कर
हंस लिया जाये
‘उलूक’ बहुत
हो चुकी बकवास
चुपचाप क्यों ना
कहीं किसी और
को चाटने के
लिये अब यहाँ से
खिसक लिया जाये ।

बुधवार, 4 जून 2014

पूँछ नहीं हिला रहा है नारज नजर आ रहा है

मेरे पालतू कुत्ते
ने मुझ से
कुछ कहा तो नहीं
कहेगा भी कैसे
कुत्ते कहाँ
कुछ कहते हैं
मुझे लग रहा है
बस यूं ही कि
शायद वो
बहुत नाराज है
वैसे उसने कहीं
कुछ लिखा
भी नहीं है
इस बारे में
लिखेगा भी कैसे
कुत्तों का
फेसबुक एकाउंट
या ब्लाग
नहीं होते हैं
कुत्ते भौंकते
जरूर हैं
उसके भौँकने में
वैसे कोई फर्क
तो नहीं है
पर मुझे
लग रहा है
कुछ अलग
तरीके से
भौँक रहा है
ये सब
मैं सोच रहा हूँ
कुत्ता नहीं
सोच रहा है
कुत्ते सोचते
भी हैं या नहीं
ये मुझे पक्का
कहाँ पता है
ऐसा शायद
इस कारण
हो रहा है
पड़ोसी ने
कुत्ते से शायद
कुछ कहा है
जिस पर मैंने
ध्यान नहीं
दिया है
बस मुझे ही
लग रहा है
मालिक अपने
वफादार के लिये
कुछ नहीं
कर पा रहा है
अपने दुश्मनो से
अपने को
बचाने के लिये
कुत्ते को सामने
मगर ले आ रहा है
इसीलिये कुत्ते
को शायद गुस्सा
आ जा रहा है
पर वो ये सब भी
कहाँ 
बता रहा है ।

मंगलवार, 3 जून 2014

अपना समझना अपने को ही नहीं समझा सकता

उसने कुछ लिखा
और मुझे उसमें
बहुत कुछ दिखा
क्या दिखा
अरे बहुत ही
गजब दिखा
कैसे बताऊँ
नहीं बता सकता
आग थी आग
जला रही थी
मैं नहीं
जला सकता
उसके लिखे में
आग होती है
पानी होता है
आँधी होती है
तूफान होता है
नहीं नहीं
कोई जलजला
मैं यहाँ पर
लाने का रिस्क
नहीं उठा सकता
पता नहीं
वो लिखा भी
है या नहीं
जो मुझे दिखा है
किसी को बता
भी नहीं सकता
इसी तरह रोज
उसके लिखे
को पढ़ता हूँ
जलता हूँ
भीगता हूँ
सूखता हूँ
हवा में
उड़ता हूँ
और भी बहुत
कुछ करता हूँ
सब बता के
खुले आम
अपनी धुनाई
नहीं करवा सकता ।

सोमवार, 2 जून 2014

एक रेल यहाँ भी रेलमपेल

लिखता चलना
इस तरह कि
बनती चली जाये
रेल की पटरी
और हों पास में
ढेर सारे शब्द
बन सकें जिनके
इंजन और डब्बे
और बैठने के
लिये भी हो
कुछ ऐसे शब्द
जिनको बैठाया
जा सके शब्दों
की ही बनी
सीटों पर
शब्दों की
ही बर्थ हो
सोने के लिये
भी हो शब्द
कुछ रात
भर के लिये
शब्दों के
सपने बने
रेल के डब्बों
के अंदर ही
और सुबह
हो जाये
उसके बाद
ही उठें शब्द
के ही प्रश्न
भी नींद से
कहाँ तक
पहुँचाई जा
सकती है
ऐसी रेल
जहाँ बहुत ही
रेलमपेल हो
शब्दों की बनी
डब्बों की छत पर
शब्दों के ऊपर
चढ़े शब्द हों
हाल हो
भारतीय रेल
का ही जैसा
सब कुछ
गंतव्य तक
पहुँचने ना
पहुँचने का
वहम ही
वहम हो
कुछ हो
या ना हो कहीं
बस यात्रा करते
रहने का जुनून हो
सोचने में
क्या हर्ज है
जब शब्द ही
टी टी और
शब्द ही चला
रहे रेल हों ।

रविवार, 1 जून 2014

जैसा यहाँ होता है वहाँ कहाँ होता है

कभी कभी बहुत
अच्छा होता है
जहाँ आपको
पहचानने वाला
कोई नहीं होता है
कुछ देर के
लिये ही सही
बहुत चैन होता है
कोई कहने सुनने
वाला भी नहीं
कोई चकचक
कोई बकबक नहीं
जो मन में आये करो
कुछ सोचो
कुछ और लिख दो
शब्दों को उल्टा करो
सीधा कर कहीं
भी लगा दो
किसे पता
चल रहा है कि
अंदर कहीं कुछ
और चल रहा है
कोई भी किसी को
देख भी नहीं
रहा होता है
सच सच
सब कुछ सच
और साफ साफ
बता भी देने से
कोई मान जो
क्या लेता है
वैसे भी हर जगह
का मौसम
अलग होता है
सब की अपनी
लड़ाईयाँ
सबके अपने
हथियार होते हैं
किसी के दुश्मन
किसी और के
यार होते है
पर जो भी होता है
यहाँ बहुत
ईमानदारी
से होता है
बेईमानी कर
भी लो थोड़ा
बहुत कुछ अगर
तब भी किसी को
कुछ नहीं होता है
सबको जो भी
कहना होता है
अपने लिये
कहना होता है
अपना कहना
अपने लिये
उसी तरह से
जैसे अपना खाना
अपना पीना
होता है ।

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