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शनिवार, 26 जुलाई 2014

कुछ दिनों के लिये मुँह पर ताला लगाने थोड़ा अलीगढ़ की तरफ जा रहा हूँ

आज की ताजा खबर
बस बताने के लिये
यहाँ आ रहा हूँ
कल से कुछ दिनों
के लिये अपने
अखबार के दफ्तर में
ताला लगाने जा रहा हूँ
बहुत दिन हो चुके
कुऐं के अंदर ही
अंदर टर्राते हुऐ
गला रवाँ करने
के लिये निकल कर
बाहर आ रहा हूँ
कुछ दिन चैन की
बंसी बजा सकते हैं
बजाने बजवाने वाले
अपना तबला और
हार्मोनियम खुला हुआ
छोड़ कर जा रहा हूँ
बहुत हो चुकी बक बक
काम की बेकाम की
सब का दिमाग
खाने के बाद अब
अपने दिमाग को
थोड़ी सी हवा
लगाने के लिये
खुली हवा में साँस
लेने के लिये जा रहा हूँ
थोड़े थोड़े अंधे
सभी होना चाहते हैं
लोग इस जमाने के
बहुतों का बहुत कुछ
देख देख कर मैं भी
आँख पर कुछ दिन
पट्टी लगाना चाह रहा हूँ
खुश रहें आबाद रहें
पढ़ने पढ़ाने वाले
लौट कर आने
तक के लिये
सफेद पन्ने कुछ
खाली पतंग बनाने
के लिये छोड़
कर जा रहा हूँ
आते जाते रहियेगा
कुछ कहियेगा
कुछ लिखियेगा
टिप्प्णी वाले
बक्से का दान पात्र
खुला छोड़ कर जा रहा हूँ
‘उलूक’ जरूरत नहीं है
मेरे जाने से बहुत
खुश हो जाने की
काफी कर चुका है
तू भी उलूल जलूल
बहुत दिनों तक
इधर और उधर भी
तेरी कोटरी पर भी
टाट की एक पट्टी
चिपकाने जा रहा हूँ
जा रहा हूँ सोच कर
पूरा चला गया भी
मत सोच बैठना
कुछ दिनों के बाद
लौट कर फिर
यहीं आ रहा हूँ ।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

ध्वनी तरंगें अब रिश्ते जोड़ती और घटाती हैं

फोन की
घंटी बजती है
एक नया नम्बर
दिखता है
लड़की बात
शुरु करती है
लड़का जवाब
देता है
घर में एक नहीं
कई फोन हैं
कई तरह की
घंटियों की आवाजें
अलग अलग धुनें
अलग अलग
समय पर
सुनाई देती हैं
सब को पता
होती हैं
आदत में
जैसे शामिल
जैसे मन और
शरीर के लिये
जरूरी होती हैं
कभी राम धुन
बजती है
कभी गायत्री मंत्र
सुनाई देता है
घंटी बजना
शुरु करते ही
सुनने वाला
फोन सुनना
शुरु कर देता है
मंत्र या भजन
शुरु होते ही
बंद कर
दिया जाता है
फोन करने वाला
सीधे मुद्दे की
बात पर
आ जाता है
एक दूसरे को
समझने समझाने
के प्रयास शुरु
हो जाते हैं
बिना देखे ही
बहुत ही करीब
आ जाते हैं
फोन आते ही
लड़की घर की
छत पर
चली जाती है
कोई ध्यान
नहीं देता है
फोन की घंटी
बजना और
फोन आने की
आवृतियाँ ही
अडो‌स पड़ोस में
घर की बड़ती हुई
साख का संदेश
पहुँचाते हैं
शहरों की बात
ही अलग है
दूर पहाड़ों के
गाँवों में रोटी
शाम की बने
या ना बने
फोन तरह तरह के
पाये जरूर जाते हैं
बलिहारी सूचना तंत्र
और सूचना विज्ञान के
होकर सभी झूमते
और गाते हैं
पानी का नल
सड़क अस्पताल
स्कूल नहीं भी
होते हैं पर
मोबाईल के
विशालकाय टावर
गाँव गाँव में
लगे हुऐ दूर से ही
नजर आ जाते हैं
गाँव के ही किसी
एक धनाड्य के लिये
दुधारी एक गाय
हो जाते हैं
कहानी लड़की की
फोन से शुरु होती है
फोन पर ही
खतम हो जाती है
ज्यादा नहीं कुछ
ही दिनों में
लड़की भाग गई
की खबर आती है
उसके बाद ताजिंदगी
लड़की गाँव में
नजर नहीं आती है
कुछ दिन की ही
शांति रहती है
फिर कहीं और किसी
लड़की के फोन पर
एक अंजान आवाज
आना शुरु हो जाती है
सिलसिला जारी है
खबरें अखबार में
रोज ही आती हैं
वो बात अजीब भी
नहीं लगती है
जिसकी रोज की
आदत जैसी
हो जाती है ।

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

जिज्ञासाओं को शांत करने के लिये कुछ भी कर लिया जाता है

अब सब की
अपनी अपनी
सोच अपनी
तरह की होती है
एक की आदत
एक तरह की
तो दूसरे की
दूसरे तरह
की होती है
क्या किया जाये
अगर कोई तुमसे
रोज ही रास्ते में
टकराता है
अपना होता है
दुआ सलाम
करता है और
मुस्कुराता है
बस एक छोटी
सी बात को
समझना जरा
मुश्किल सा
हो जाता है
जब तुम्हारे ही
बारे में कुछ
प्रश्नों का
एक प्रश्नपत्र
बना कर
तुम्हारे ही
पड़ोसी से
सड़क पर कहीं
पूछ्ना शुरू
हो जाता है
पड़ोसी बेचारा
जब हल नहीं
ढूँढ पाता है
गूगल करके
भी हार जाता है
तुम्हारे अपनों के
प्रश्नो के प्रश्न पत्र
को लेकर तुमसे
ही हल करवाने
के लिये कुछ
फूल मिठाई
लेकर सुबह सुबह
तुम्हारे ही घर
पहुँच जाता है ।

बुधवार, 23 जुलाई 2014

क्योंकि खिड़कियाँ मेरे शहर के पुराने मकानों में अब लोग नई लगा रहे थे

अपने बच्चों को
समझाने में लगे हुऐ
एक माँ बाप
उनको उनसे उनकी
दिमाग की खिड़की
खोलने को कहते हुऐ
जोर लगा कर
कुछ समझा रहे थे
लग नहीं रहा था
कुछ ऐसा जैसे
बच्चे कुछ सुनना
भी चाह रहे थे
माँ बाप बच्चों की
तरफ देख कर
कुछ बोल रहे थे
बच्चे अपने घर के
पड़ोस के मकान
की खिड़कियों की
तरफ देख कर
मुस्कुरा रहे थे
खिड़कियों के बारे में
शायद माँ बाप से
ज्यादा पता था उनको
घर से लेकर स्कूल तक
जाते जाते रोज
ना जाने कितनी
खिड़कियों को खुलते
बंद होते देखते
हुऐ आ रहे थे
समझ रहे थे
स्कूल में गुरु लोग
खिड़कियों को
खोलने की विधि का
प्रयोग प्रयोगशाला
में करवाना चाह रहे थे
उसी बात को लेकर
घर के लोग
घर पर भी खिड़कियों
की बात कर कर के
दिमाग खा रहे थे
सोच रहे थे समझ रहे थे
हिसाब किताब भी
थोड़ा बहुत लगा रहे थे
पुराने मकानो की
खिड़कियों की तुलना
नये मकानो की
खिड़कियों से
किये जा रहे थे
माँ बाप की चिंताओं
को जायज मान ले रहे थे
देख रहे थे समझ रहे थे
पुरानी खिड़कियों के
कब्जे जंग खा रहे थे
खुलते जरूर थे
रोज ना भी सही
कभी कभी भी लेकिन
आवाजें तरह तरह की
खुलने बंद होने
पर बना रहे थे
खिड़कियाँ दरवाजे
समय के साथ
पुराने लोगों के
पुराने हो जा रहे थे
शायद इसी लिये
सभी लोग नयी
पौँध से उनकी
अपनी अपनी
खिड़कियों को खोल
कर रखने की अपेक्षा
किये जा रहे थे
‘उलूक’ की समझ में
नहीं आ रहा था कुछ भी
उसे उसके पुराने मकान
के खंडहर में खिड़की या
दरवाजे नजर ही
नहीं आ रहे थे ।

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

दुकानों की दुकान लिखने लिखाने की दुकान हो जाये

क्या ऐसा भी
संभव है
कि किसी दिन
लिखने लिखाने
के विषय ही
खत्म हो जायें
क्या लिखें
किस पर लिखें
कैसे लिखें
क्यों लिखें
जैसे विषय भी
दुकान पर किसी
बिकना शुरु हो जायें
लिखने लिखाने
के भी शेयर बनें
और स्टोक मार्केट में
खरीदे और बेचे जायें
लेखकों के बाजार हों
लेखकों की दुकान हों
लेखकों के मॉल हों
लेखक माला माल हों
लेखक ही दुकानदार हों
लेखक ही खरीददार हों
माँग और पूर्ति
के हिसाब से
लिखने लिखाने की
बात होना शुरु हो जाये
जरूरतें बढ़े
लिखने लिखाने
पढ़ने पढ़ाने की
लेखक व्यापारी और
लेखन बड़ा एक
व्यापार हो जाये
सपने देखने से
किसने किसको
रोका है आज तक
क्या पता
माईक्रोसोफ्ट या
गूगल की तरह
लिखना लिखाना
सरे आम हो जाये
‘उलूक’ नजर अपनी
गड़ाये रखना
क्या पता तेरे लिये भी
कभी अपनी उटपटांग
सोच के कारण ही
किसी लिखने लिखाने
वाली कम्पनी के
अरबपति सी ई ओ
होने का पैगाम आ जाये ।
(लेखकों की राय
आमंत्रित है
'उलूक' नहीं
गूगल पूछ रहा है
आजकल सबको
मेल भेज भेज कर :) )

सोमवार, 21 जुलाई 2014

प्रतियोगिता के लिये नहीं बस दौड़ने के लिये दौड़ रहा होता है

चले जा रहे हैं
दौड़ लगा रहे हैं
भाग रहे हैं
कहाँ के लिये
किसलिये
कहाँ जा कर पहुँचेंगे
अब ऐसे ही
कैसे बता देंगे
दौड़ने तो दो
सब ही तो दौड़ रहे हैं
बता थोड़े रहे हैं
मुल्ला की दौड़
मस्जिद तक होती है
पंडित जी की दौड़
मंदिर तक होने की
बात ना कहीं गई है
ना ही कहीं लिखी गई है
सुबह सुबह कसरत
के लिये दौड़ना
नाश्ता पानी कर के
दफ्तर को दौड़ना
दफ्तर से घर को
वापस दौड़ना भी
कहीं दौड़ने में आता है
असली दौड़ तो
दिमाग से होती है
उसी दौड़ के लिये
हर कोई दिमागी
घोड़ों को दौड़ाता है
अब बात उठती है
घोड़े दिखते तो नहीं हैं
दौड़ते हुऐ बाहर
आस पास किसी
के भी कहीं भी
शायद दिमाग में
ही चले जाते होंगे
दिमाग में कैसे
चले जाते होंगे
कितनी जगह
होती होगी वहाँ
जिसमें घोड़े जैसी
एक बड़ी चीज को
दौड़ाते होंगे
‘उलूक’ को सब का
तो नहीं पता होता है
उसके दिमाग में तो
उसका गधा ही हमेशा
उसके लिये
दौड़ रहा होता है
कहाँ जाना है
कहाँ पहुँचना है से
उसको कोई मतलब
ही नहीं होता है
उसका दौड़ना बस
गोल चक्करों में
हो रहा होता है
एक जगह से रोज
शुरु हो रहा होता है
घूमते घामते
उसी जगह फिर से
शाम तक पहुँच
ही रहा होता है
घोड़े दौड़ाने वाले
जरूर पहुँच रहे होते हैं
रोज कहीं ना कहीं
वो अलग बात है
लेकिन ‘उलूक’ का गधा
कहाँ पहुँच गया है
हर कोई अपने अपने
घोड़ों से जरूर
पूछ रहा होता है

रविवार, 20 जुलाई 2014

सब इनका किया कराया है फोटो लगा रहा हूँ इनको ढूँढ लो भाई

एक मित्र जब
दूर देश से आकर
मेरे घर पहुँचे
अपनी जिज्ञासा
को शांत करने
के लिये पूछ बैठे
भाई ये रोज रोज
लिखने लिखाने की
बात आपके दिमाग में
कब से और कैसे है आई
कुछ काम धन्धा नहीं है
क्या आपके पास
जो इस फालतू के
काम में भी आपने
अपनी एक टाँग है अढ़ाई
अब क्या बतायें
कैसे बतायें तुझे
मेरे भाई
कि एक करीबी मित्र
श्रीश्री 1008
अविनाश वाचस्पति जी
की है ये सारी लगी लगाई
कभी हो जाते हैं
अन्नाभाई
बहुत मन मौजी हैं
कभी बन जाते हैं
मुन्नाभाई
पता नहीं यहीं कहीं
कभी किसी दिन
चार पाँच साल पहले
कमप्यूटर ने ही
हमारी और उनकी
टक्कर थी करवाई
लिखने लिखाने के
खुद मरीज हैं पुराने
हमारे कुछ लिखे को
देख कर उनके दिमाग में
शायद कोई खुराफत
थी उस समय चढ़ आई
चढ़ा गये ‘उलूक’ को
झाड़ के पेड़ पर
लिखने लिखाने का
वाईरस कर गये थे सप्लाई
और तब से खुद तो
गायब हो गये
नहीं दिये कहीं दिखाई
‘उलूक’ चालू हुआ
तब से रुका नहीं
गाड़ी की थी उन्होने
लिखने की उसे
बिना ब्रेक के सप्लाई
बहुत देर हो चुकी
बात बहुत देर से
समझ में है आई
उसके बाद लिखना
बंद कर दो
जनता बोर हो चुकी है
लिखी उनकी चिट्ठी
पोस्ट आफिस तक
सुना है पहुँची भी है
पोस्ट्मैन ने
पता नहीं क्यों
 घर तक अभी तक
भी नहीं है पहुँचाई ।

शनिवार, 19 जुलाई 2014

नया होते रहने के चक्कर में पुराना भी नहीं रह पाता है

पुरानी होती हुई
चीजों से भी बहुत
भ्रांतियां पैदा होती हैं
एक समाचार पत्र
एक दिन के बाद
ही अपना मूल्य
खो देता है
रुपिये की जगह
कुछ पैसों का
हो लेता है
रद्दी कहलाता है
कबाड़ी मोल भाव
करके उठा ले जाता है
हाँ थैली बनाने के
काम जरूर आता है
कुछ देर के लिये
दुबारा जिंदा होकर
खड़ा हो जाता है
जिंदगी की बाजार में
जगह बनाने में
एक बार और
कामयाब हो जाता है
ऐसी एक नहीं
कई कई काम की चीजें
बेकाम की चीजों में
गिनी जाती हैं
कुछ कुछ दिन
कुछ कुछ ज्यादा दिन
की मेहमान नवाजी
पा जाती हैं और
कुछ चीजों को प्राचीन
बता दिया जाता है
कौड़ी के भाव से
खरीदी गई चीजों को
 हीरों के भाव से
ऊपर कहीं पहुँचा
दिया जाता है
और ये सब एक
पुराने होते चले
जा रहे आदमी के
द्वारा ही किया जाता है
उसे खुद पता
नहीं चलता है
कि वो कब
कितना पुराना
हो जाता है
हर चीज के भाव
तय करने वाले का
भाव अपने में ही
इतना नीचे
चला जाता है
उसे पता ही
नहीं चलता है
उसके खुद के लिये
कोई बाजार कहीं भी
नहीं रह जाता है
खरीदने की बात
अलग है उसे कोई
बेचना भी नहीं चाहता है
कल से आज होते हुऐ
कब कल आ जाता है
जिंदगी बेचने की
सोचने में लगे लगे
उसे पता भी
नहीं चल पाता है
कब नया जमाना
कब नया बाजार
कब नया मॉल
आ जाता है
दुनियाँ बेचने के
सपने बनाते बनाते
नये जमाने के
नये बेचने वालों
की भीड़ में कहीं
खो जाता है
बोली लग रही होती है
हर किसी चीज की
और उसे कबाड़ में
भी नहीं गिना जाता है
बहुत बेरहम होता है समय
उसकी मुस्कुराहट को
कौन समझ पाता है ।

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बहुत समय है फालतू का उसे ही ठिकाने लगा रहे हैं

भाई जी
क्या बात है
आजकल दिखाई
भी नहीं देते हो
हम तो रोज
उसी रास्ते पर
चल रहे हैं
उसी तरह से
सदियों से
आप क्यों अपने
रोज ही रास्ते
बदल देते हो
आया जाया करो
देखा दिखाया करो
तबियत बहल जाती है
हमारी तो इस तरह
आप भी कुछ
अपनी भी तो
कभी बहलाया करो
मिलोगे नहीं तो
अलग थलग
पड़ जाओगे
भूल जायेंगे लोग
याद ही नहीं आओगे
बताओ तो जरा
कहाँ रह जाते हो
आजकल
कुछ खबर ही
नहीं मिलती
पूछ्ते रहते हैं
हम सब से
अपने अगल
और बगल
कोई कह रहा था
कुछ नये अजीब से
काम से लगे हो
बताओ हम भी सुने
क्या नया खोदने
और बोने में लगे हो
अजी कुछ भी नहीं
बस कुछ नहीं
करने के तरीके
खोजने की कोशिश
जैसी हो रही है
तुम्हारे रास्तों में
अब हमारी जरूरत
किसी को भी जरा
सा भी नहीं हो रही है
एक नये रास्ते पर
अब लोग आ जा रहे हैं
जिनको कुछ नहीं
आता है जरा भी
उनसे कुछ नहीं
ढेर सारा लिखवा रहे हैं
हम भी हो लिये हैं
साथ भीड़ में घुसकर
कुछ नहीं पर कुछ कुछ
लिखना लिखाना
बस करा रहे हैं ।

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

सभी के होते हैं रिश्ते सभी बनाना चाहते हैं

कंकड़ पत्थर की
ढेरी के एक 
कंकड़
जैसे हो जाते हैं
रिश्ते साथ रहते हुऐ
भी अलग हो जाते हैं
जब इच्छा होती है
इस ढेरी से उस ढेरी
में डाल दिये जाते हैं
पता चल जाता है
आकार प्रकार और रंग से
अभी तक कहीं और थे
अभी अभी कहीं
और पाये जाते हैं
रस्सी नहीं होते हैं
गांठो में नहीं
बांधे जाते है
खोलने बांधने के
मौके जबकि बहुत बार
सामने से आते हैं
मिलने जुलने से लेकर
बिछोह होने तक
रिश्ते गरम से होते हुऐ
कब ठंडे हो जाते हैं
जबकि रिश्ते आसमान से
गिरते जल की ऐसी
बूँदे भी हो सकते हैं
गिरते गिरते ही
एक दूसरे में जो
आत्मसात हो जाते हैं
नहीं संभव होता है
अलग कर पाना
पानी में से पानी को
अलग कर पाना
अभी तक यहाँ कहीं
भी नहीं सिखाते हैं
अपनी अपनी की धुन
में नाचती अपनी
जिंदगी में कब हम
बूँद बन कर आसमान
से नीचे की ओर
गिरते हुऐ आते हैं
किसी दूसरी बूंद में
मिलने से पहले ही
कब पत्थर हो जाते है
जानते है समझते हैं
पर समझना ही
कहाँ चाहते हैं
एक ढेरी के
कंकड़ो में गिरकर
इधर से उधर
लुढ़कते लुढ़कते
किसी दूसरी ढेरी
में पहुँच जाते है
रिश्ते पानी की
बूँदें नहीं हो पाते हैं ।

बुधवार, 16 जुलाई 2014

ध्यान हटाना भी कभी बहुत जरूरी होता है

कहाँ लिखा जाता है
उस सब में से
थोड़ा सा भी कुछ
जो हिलोरें मार
रहा होता है
भावों की उमड़ती
उन नदियों के साथ
जो भावों के समुद्र में
मिलते हुऐ भी
शांत होती हैं
लहरें उठती जरूर हैं
पर तबाही नहीं
कहीं होती है
जहाँ जिस किसी
के पास सुकून होता है
लहरों के लहरों से
मिलने का मौका
बहुत भाव पूर्ण होता है
सूखे हुऐ नैनो में भी
कहीं किसी कोने में
नमी होना जैसा
महसूस होता है
मतलब साफ कि
रोना होता है लेकिन
रोना शोक का नहीं
चैन का होता है
रोना उसे भी होता है
जिसके नैनों में बस
पानी और पानी होता है
 नदियों का समुद्र से
मिलन भयानक होता है
लहरें भी होती हैं
तबाही भी होती है
रोने रोने का अंतर
बहुत ही सूक्ष्म होता है
लिखने लिखने का
अंतर भी इतना ही होता है
सब कुछ साफ साफ
कभी नहीं लिख पाता है
एक लिखने वाला
इधर का छोड़ कर
उधर के ऊपर ही
लिख लेने से
पूरा नहीं तो
अधूरा ही सही
बैचेनी को चैन
महसूस होता है
रोज की बात
अलग होती है
बरसों में कभी
सावन हँस नहीं
बस रो रहा होता है
'उलूक' को कोई
सुने ना सुने
आदतन अपनी
कुछ ना कुछ
कह ही रहा होता है ।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

जब उधार देने में रोया करते हो तो किसलिये मित्र बनाया करते हो

मित्र बनते हो
सबसे कहते
फिरते हो
दिखाते हो
बहुत कुछ
सीना खोल
कर फिरते हो
सामने से कुछ
पीछे से कुछ
और और करते हो
जान तक देने
की बात सुनी
गई है कई बार
तुम्हारे मुँह से
चाँद तारे तोड़
कर लाने की
बात करते हो
कितने बेशरम
हो तुम यार
थोड़ा सा पैसा ही
तो मांगा उधार
देने से मुकरते हो
साल में एक बार
नहीं चार पाँच बार
एक सी बात करते हो
एक माँगने पर
आधा दिया करते हो
कहाँ बेच कर आते
हो मानवता को
एक साल
होता नहीं है
वापस माँगना
शुरु करते हो
सच में बहुत ही
बेशरम हो यार
उधार देने में
बहुत ज्यादा
पंगा करते हो
कमजोर दिल के
मालिक हो और
मर्द होने का
दावा करते हो
दो चार बार मांग
लिया क्या उधार
पाँचवी बार से
गायब हो जाना
शुरु करते हो
मित्र होने का
दम भरते हो
सच में बहुत ही
बेशरम हो यार
यारों के यार
होने का दम
इतना सब होने
के बाद भी
भरते हो ।

सोमवार, 14 जुलाई 2014

बात बनाने की रैसेपी या कहिये नुस्खा

अवयय:

थोड़े पैसे खर्चे के लिये,
एक दो संस्थाये
कुछ देने के लिये,
चार पाँच एक सी
सोच की नामचीन हस्तियाँ,
बिना किराये का हॉल या बारात घर, एक मेज, चार पाँच गद्दीदार कुर्सियाँ, दरी,
प्लास्टिक की कुछ और कुर्सियाँ,  कुछ अखबार वाले मित्र, घर का ही कोई एक फोटोग्राफर, सरकारी कँप्यूटर, प्रिटर, फैक्स, इंटर्नेट कनेक्शन, थोड़े रिश्तेदार, कुछ नासमझ बेवकूफ लोग भीड़ बनाने के लिये और सबसे महत्वपूर्ण एक गरम गरम बिकने वाला मुद्दा | 


 बनाने की विधि:

बात पर बात
बनाने की बिधि
सबसे आसान होती है
थोड़ा सा दिमाग
अगर हो तो
बनी हुई बात
बहुत स्वादिष्ट
और बिकने में
तूफान होती है
एक गरम मुद्दा
पर्यावरण, वृक्षारोपण,
 ग्लोबल वार्मिंग,
 ब्लात्कार या कोई भी
अपनी इच्छा अनुसार
पकड़ कर शुरु हो जाइये
धीमे धीमे ही
पकानी होती हैं बातें
जरा सा भी
मत घबराइये
अपनी जैसी सोच के
चार नामचीन
आदमियों को पटाइये
चार कुर्सियों के सामने
एक मेज लगाइये
सामने से फोटो
खिँचवानी है
पीछे की भीड़ कम हो
तो नही दिखानी है
ना ही बतानी है
काम सारा मुफ्त में
सरकारी करवा ले जाइये
बिल विल गैर सरकारी
ठप्पों के बनवाइये
अखबारी दोस्त
कब काम आयेंगे
बात की बात पर
बाकी बातें उनसे
लिखवा कर अखबार
के फ्रंट पेज
पर छपवाइये
फोटोकापी
अखबार की
सौ एक करके
ऊपर को और
कहीं भिजवाइये
बात पकानी बहुत
आसान होती है
जितनी चाहे
पका ले जाइये
करना कहाँ कुछ
किसी को होता है
बातें करना
और बनाना
सबसे जरूरी
होता है
अच्छे दिनों कि
कितनी सारी
बाते हुई है
आज तक
जरा पीछे
जा कर देख
कर आइये
पेड़ कहीं नहीं
लगाने होते हैं
मन के अंदर
ही अपने
जितने चाहे
जंगल बनाइये
संजीव कपूर को
खाना बनाने
के लिये याद
 कर रहा है
आज के दिन
पूरा भारत देश
‘उलूक’ को बातूनी
का ही सही
एक तमगा
दे जाइये।

रविवार, 13 जुलाई 2014

क्या किया जाये कैसे बताऊँ कि कुछ नहीं किया जाता है

कहना तो नहीं
पड़ना चाहिये कि
मैं शपथ लेता हूँ
कि लेखक और
कवि नहीं हूँ
कौन नहीं लिखता है
सब को आता है लिखना
बहुत कम ही होते हैं
नाम मात्र के जो
लिख नहीं पाते हैं
लेकिन बोल सकते हैं
इसलिये कुछ ना
कुछ हल्ला गुल्ला
चिल्लाना कर ही
ले जाते हैं
अब लिखते लिखते
कुछ ना कुछ
बन ही जाता है
रेखाऐं खींचने वाला
टेढ़ी मेढ़ी तक
मार्डन आर्टिस्ट
एक कहलाता है
कौन किस मनोदशा
में क्या लिखता है
कौन खाली मनोदशा
ही अपनी लिख पाता है
ये तो बस पढ़ने और
समझने वाले को ही
समझना पड़ जाता है
एक ऐसा लिखता है
गजब का लिखता है
लिखा हुआ ही उसका
एक तमाचा मार जाता है
लात लगा जाता है
‘उलूक’ किसी की
 मजबूरी होती है
सब जगह से जब
तमाचा या लात
खा कर आता है
तो कुछ ना कुछ
लिखने के लिये
बैठ जाता है
बुरा और हमेशा बुरा
लिखने की आदत
वैसे तो बहुत
अच्छी नहीं होती है
पर क्या किया जाये
जब सड़क पर
पड़ी हुई गंदगी को
सौ लोग नाँक भौं
सिकौड़ कर थूक कर
किनारे से उसके
निकल जाते हैं
कोई एक होता ही है
जो उस गंदगी को
हाथ में उठाकर
घर ले आता है
और यही सब उसके
संग्राहलय का एक
महत्वपूर्ण सामान
हो जाता है
जो है सो है और
सच भी है
सच को सच
कहने से बबाल
हो ही जाता है
कविता तो कवि
लिखता है
उसको कविता
लिखना आता है ।

शनिवार, 12 जुलाई 2014

लिखने की भी क्लास होती है लिखते लिखते पता हो ही जाता है

कहीं भी कोई
जमीनी हकीकत
नहीं दिखती है
किसी भी पन्ने में
वैसे दिखनी भी
नहीं चाहिये
जो हकीकत है
वो सोच में
नहीं होती है
कहीं भी किसी के
उसके होने ना
होने का पता
कुछ हो जाने
के बाद ही
चलता है
मिट्टी से लिख
देने से कोई
जमीन से थोड़ा
जुड़ा हुआ दिखने
लग जाता है
खूबसूरत और
मासूम चेहरे से ही
ज्यादातर आदमी
धोखे में आ जाता है
कर नहीं सकता है
मान लिया कुछ ऊँचा
हाई क्लास की सोच
को सोचने में खाली
जेब से क्या
चला जाता है
कहा क्या किसी ने
ऊँची सोच का कोई
सरकारी कर कहीं
लगाया जाता है
याद करता क्यों नहीं
अपने से पहली
एक पीढ़ी को
और देखता क्यों नहीं
एक आगे की सीढ़ी को
कितना बदल चुका है
सब कुछ समाज में
भाई समझा कर
कुछ पाने के लिये
ये जमाना अब
कुछ भी कर
लेना चाहता है
एक तू बेशरम है
‘उलूक’
निकल कोशिश तो कर
तेरे कुछ भी लिखे में
बस वही मिडिल क्लास
नजर आता है और
तेरा सब कुछ लिखा
इसी तरह कब
कूड़ेदान में फैंकने
के लायक हो जाता है
देखने वाला कहता
कुछ नहीं है पर
इशारों में बहुत कुछ
बता ही जाता है ।

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

अलबर्ट पिंटो को गुस्सा आज भी आता है


अल्बर्ट पिंटो
और उसका गुस्सा
बहुत पुराना
है किस्सा
क्या है क्यों है
किसको पता है
किसको नहीं पता है
लेकिन गुस्सा आता है
सबको आता है
किसी को कम
किसी को ज्यादा
कोई बताता है
कोई नहीं बताता है
कोई खुश होता है
गुस्सा खाता है
और पचाता है
अलग अलग
तरह के गुस्से
दिखते भी हैं
चलने के तरीके में
टहलने के तरीके में
बोलने के तरीके में
तोलने के तरीके में
कम उम्र में
हो सकता है
नहीं आ पाता है
पर देखते समझते
घर से लेकर
बाजार तक परखते
सीख लिया जाता है
गुस्सा नजर आना
शुरु हो जाता है
लिखे हुऐ में
नहीं लिखे हुऐ में
कहे हुऐ में
चुप रहे हुऐ में
अच्छा होता है
अगर दिखता रहे
कहीं भी सही
पकता रहे
उबलता रहे
खौलता रहे

चूल्हे में चढ़े
एक प्रेशर कूकर
की तरह बोलता रहे
नहीं तो कहीं
किसी गली में
समझ ले
अच्छी तरह
उलूक
अपने ही सिर के
बाल नोचता हुआ
खींसें निपोरता हुआ
एक अलबर्ट पिंटो
हो जाता है
और किसी को
पता नहीं होता है
उसको गुस्सा
क्यों आता है ।

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

समय अच्छा या बुरा समय की समझ में खुद नहीं आ रहा होता है


समय को लिखने
वाले लोगों को
ना तो फुरसत होती है
ना ही कुछ लिखने
लिखाने का समय
उनके पास होता है
अवकाश के दिन भी
उनका समय समय
को ही ठिकाने
लगा रहा होता है
कोई चिंता कोई
शिकन नहीं होती है कहीं
कुछ ऐसे लोगों के लिये
जिनकी नजर में
लिखना लिखाना
एक अपराध होता है
और दूसरी ओर
कुछ लोग समय
के लिये लिख
रहे होते हैं
उन को आभास
भी नहीं होता है
और समय ही
उनको ठिकाने
लगा रहा होता है
समय समय की बातें
समय ही समझ
पा रहा होता है
एक ओर कोई
लिखने में समय
गंवा रहा होता है
तो दूसरी ओर
कुछ नहीं लिखने वाला
समय बना रहा होता है
किसका समय बर्बाद
हो रहा होता है
किसका समय
आबाद हो रहा होता है
‘उलूक’ को इन सब से
कुछ नहीं करना होता है
उस की समझ में
पहले भी कुछ
नहीं आया होता है
आज भी नहीं
आ रहा होता है ।

बुधवार, 9 जुलाई 2014

बात अगर समझ में ही आ जाये तो बात में दम नहीं रह जाता है

एक छोटी सी बात को 
थोड़े से ऐसे शब्दों में
कहना क्यों नहीं सीखता है
जिसका अर्थ निकालने में
समझने में ताजिंदगी
एक आदमी शब्दकोषों
के पन्नों को आगे पीछे
पलटता हुआ एक नहीं
कई कई बार खीजता है
बात समझ में आई या नहीं
यही नहीं समझ पाता है
जब बात का एक सिरा
एक हाथ में और
दूसरा सिरा दूसरे हाथ में
उलझा हुआ रह जाता है
छोटी छोटी बातों को
लम्बा खींच कर
लिख देने से कुछ
भी नहीं होता है
समझ में आ ही गई
अगर एक बात
बात में दम ही
नहीं रहता है
कवि की सोच की तुलना
सूरज से करते रहने
से क्या होता है
सरकारी आदेशों की
भाषा लिखने वाले
होते हैं असली महारथी
जिनके लिखे हुऐ को
ना समझ लिया है
कह दिया जाता है
ना ही नहीं समझ में
आया है कहा जाता है
और ‘उलूक’ तू अगर
रोज एक छोटी बात को
लम्बी खींच कर
यहाँ ले आता है
तो कौन सा कद्दू में
तीर मार ले जाता है ।

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

मुक्ति के मार्ग चाहने वाले के हिसाब से नहीं होते हैं

एक दिन के
पूरे होने से
जिंदगी बढ़ी
या कम हुई
ऊपर वाले के
यहाँ आवेदन
करने के
हिसाब से तो
अनुभव में
इजाफा
हुआ ही कहेंगे
नीचे वालों के
हिसाब से
देखा जाये
तो जगह
खाली होने के
चाँस बढ़ने
से दिन
कम ही होंगे
गणित जोड़
घटाने का
गणित के
नियमों के
हिसाब से
नहीं होगा
अपनी सुविधा
के हिसाब
से होगा
जो कुछ
भी होगा
या होना होगा
वैसे भी दिन
गिनने वाले
कम ही होते हैं
बाकी सारे
हिसाब किताब
के ऊपर
टाट रखकर
बैठे होते हैं
फर्क किसे
पड़ता है
थोड़ा भी
उनके हिसाब
किताब में
दिन आधे या
पूरे होते हैं
बाकी सभी
के लिये
मुक्ति के
कहीं भी
कोई भी मार्ग
कहीं भी
नहीं होते हैं
सब मिलकर
काँव काँव
कर लेते हैं
एक ही
आवाज में
मजे की बात
है ना ‘उलूक’
जो कौए भी
नहीं होते हैं ।

सोमवार, 7 जुलाई 2014

आता रहे कोई अगर बस प्रश्न पूछने के लिये आता है

बेशरम
भिखारी को
भी शरम
आती जाती है
जब कोई
पूछना शुरु
हो जाता है
उन सब
चीजों के
बारे में
जो नहीं
होती हैं
पास में
पूछने
वाले के

पास होते हैं
हकीकत
से लेकर
सपने सभी

जो भी मिल
जाता है
आज
बाजार में
नकद की
जरूरत
होती ही नहीं
सब कुछ
उपलब्ध
है जब
उधार में

उधारी का रहना
उधारी का गहना
उधारी की सवारी
उधारी की खुमारी
उधारी के ख्वाब
उधारी का रुआब

और
एक बेचारा
सपनों का मारा
जाती है उसकी
मति भी मारी
नहीं ले
पाता है जब
कुछ भी उधारी

झेलता है
प्रश्नो की
तीखी बौछार
पूछ्ने वाला
पूछना कुछ
नहीं चाहता है
बैचैनी उधारी
के साथ
मुफ्त में नकद
खरीद लाता है
चैन उधार में
मिलता नहीं कहीं

उस भिखारी
से पूछने
चला आता है
जो उधारी
नहीं ले पाता है
चैन से पीता है
चैन से खाता है

‘उलूक’
अपनी नजर
से ही
देखा कर
खुद को

किसी की
नजर में
किसी के
भिखारी
हो भी
जाने से
कौन
भीख में
चैन दे
पाता है
उधारी की
बैचेनी
खरीद कर
क्यों
अपनी नींद
उड़ाना
चाहता है
पूछ्ने से
क्या डरना
अगर कोई
पूछ्ने भी
चला
आता है ।

रविवार, 6 जुलाई 2014

साँप जहर और डर किसका ज्यादा कहर

साँप को देखकर
अत्यधिक भयभीत
हो गई महिला के
उड़े हुऐ चेहरे
को देखकर
थोड़ी देर के लिये
सोच में पड़ गया
दिमाग के काले
श्यामपट में
लिखा हुआ सारा
सफेद जैसे काला
होते हुऐ कहीं
आकाश में उड़ गया
साँप आ ही रहा
था कहीं से उसी
तरह सरसराता
हुआ निकल गया
हुआ कुछ किसी
को नहीं बस
माहौल थोड़ी देर
के लिये उलटा पुल्टा
होते होते डगमगाता
हुआ जैसे संभल गया
जहर था साँप के अंदर
कहीं रखा हुआ
उसे उसी तरह वो
कंजूस अपने साथ
लेकर निकल गया
महिला ने भी चेहरे
का रंग फिर बदला
पहले जैसा ही
कुछ ही देर में
वैसा ही कर लिया
रोज बदलता है
मेरे चेहरे का रंग
किसी को देखकर
अपने सामने से
शीशे ने भी
देखते देखते इससे
सामंजस्य कर लिया
साँप के अंदर के जहर
के बारे में सब ने
सब कुछ पता कर लिया
उसके अंदर कुछ भी नहीं
फिर कैसे साँप के जहर
से भी बहुत ज्यादा
बहुत कुछ करते ना
करते कर लिया
‘उलूक’ समझा कर
रोज मरने वाले से
अच्छा होता है
एक ही बार मर कर
पतली गली से जो
एक बार में ही
निकल लिया ।

शनिवार, 5 जुलाई 2014

रस्म है एक लिखना लिखाना जो लिखना होता है वो कभी नहीं लिखना होता है



रोज लिखना
जरूरी है क्या
क्यों लिखते हो रोज
ऐसा कुछ जिसका
कोई मतलब नहीं होता है
कभी देखा है
लिखते लिखते लेखक
खुद के लिखे हुऐ का
सबसे पुराना सिरा
बहुत पीछे
कहीं खो देता है
क्या किया
जा सकता है
वैसे तो एक
लिखने वाले ने
कुछ कहने के
लिये ही लिखना
शुरु किया होता है
लिखते लिखते
कलम बहुत दूर
तक चली आती है
कहने वाली बात
कहने से ही
रह जाती है
सच कहना कहाँ
इतना आसान होता है
कायर होता है बहुत
कहने वाला
कुछ कहने के लिये
बहुत हिम्मत और
एक पक्का जिगर
चाहिये होता है
लगता नहीं है
खुद को इस
नजर से देखने में
उसे कहीं कोई
संकोच होता है
उसे बहुत अच्छी
तरह से पता होता है
सच को सच सच
लिख देने का
क्या हश्र होता है
किसी का उसी के
अपने ही पाले पौसे
उसके ही चारों ओर
रोज मडराने वाले
चील कौओं गिद्धों के
नोच खाये जाने की
खबर आने में कोई
संदेह नहीं होता है
बाकी जोड़ घटाना
गुणा भाग
जो कुछ भी होता है
इस आभासी दुनियाँ में
सब कुछ आभासी
लिखने तक ही
अच्छा होता है
सच को देखने
सच को समझने
और सच को सच
कहने की इच्छा
रखने वाला ‘उलूक’
तेरे जैसे की ही बस
सोच तक ही
में कहीं होता है
उसके अलावा अगर
ऐसा ही कोई दूसरा
कहीं ओर होता है
तो उसके होने से
कौन सा कहीं
कुछ गजब होता है
लिखना लिखाना
तो चलता रहता है
जो कहना होता है
वो कौन कहाँ
किसी से सच में
कह रहा होता है ।

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

अकेले अपनी बातें अपने मुँह के अंदर ही बड़बड़ाते रह जाते हैं

परेशानी खुद
को भी होती है
परेशानी सब
को भी होती है
जब कोई खुद
अपने जैसा
होने की ही
कोशिश करता है
और सबका
जैसा होने से
बचता रहता है
बकरी की माँ
बहुत ज्यादा दिन
खैर नहीं मना पाती है
खुद के द्वारा
खुद ही हलाल
कर दी जाती है
सब के द्वारा
तैयार किया गया
रास्ता हमेशा ही
सीधा होता है
कोई खड़पेंच
उसमें कहीं भी
नहीं होता है
सब एक दूसरे के
सहारे पार हो जाते हैं
गँगा नहाये बिना ही
बैकुँठ पहुँचा
दिये जाते है
अपनी मर्जी से
अपने टेढ़े मेढ़े
रास्ते में जाने वाले
बस चलते ही
रह जाते हैं
रास्ता होता है
बस उनके साथ
रास्ते के साथ
ही रह जाते हैं
चलना शुरु
जरूर करते हैं
लेकिन पहुँच
कहीं भी
नहीं पाते हैं
‘उलूक’ किसी को
कहीं भी पहुँचाने
के लिये अकेले
चलने वाले
कभी भी
काम में नहीं
लाये जाते हैं
सब के साथ
सब की
मर्जी के बिना
ईश्वर भी मंदिर
में बैठे रह जाते हैं ।

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

किसी ने तो देखा सुना होगा किसी का ढोलक या सितार हो जाना

लकड़ी पर चढ़ी 
एक मरे जानवर
की खाल हो
खूँटियों पर कसे
कुछ लोहे के तार हों
कर्णप्रिय संगीत
लहरियाँ हों
ढोलक हो
सितार हो
जिंदा शरीर
के गले से
निकलता
सुरीला संगीत हो
नर्तकी के
कोमल पैरों में
बंधे घुँघरूओं
की खनकती
आवाज हो
जरूरी होता है
कहीं ना कहीं
कुछ खोखला होना
और होना होता है
किसी को पारंगत
पीटने में या
खींचनें में
आना होता है
खोखलेपन से
निकलते हुऐ
खालीपन को
दिशा देना
आसान नहीं होता है
अपने अंदर से
निकलती हुई
आवाजों को खुद
ही सुनना और
खुद ही समझना
कुछ काम नहीं आता
जिंदगी का पीटने
और खींचने में
पारंगत हो जाना
कौन बता पाता है
उसे कब समझ
में आता है
अपने खुद के ही
अंदर का सबकुछ
खाली हो जाना
और उसी पल
खालीपन से
सब कुछ
भर भरा जाना
खोखला हो जाने
के बावजूद भी
संगीत का बहुत ही
बेसुरा हो जाना ।

बुधवार, 2 जुलाई 2014

श्रद्धांजलि मौन होती है जाने वाला सुकून से चल देता है (सुशील, रायपुर, के निधन पर)

मृत्यू तो रोज 
ही होती है
रोज मरता है
एक आदमी
कहीं अंदर से
या बाहर से
आभास होता है
परवाह नहीं
करता है
सूखी हुई
आँखों से कुछ
टपकता भी है
ना नमकीन
होता है ना
मीठा होता है
बस कुछ होने
भर का एक
अहसास होता है
चिर निद्रा में
उसे भी सोना
ही होता है जो
उम्र भर सोने
की कोशिश में
लगा रहता है
ऐसी एक नहीं
ढेर सारी मौतों
का कोई भी
प्रायश्चित कहीं
भी नहीं होता है
इन सभी मृत्युओं
के बीच अपने किसी
बहुत नजदीकी
की मृत्यू से
आहत जब
कोई होता है
कोई शब्द
नहीं होता है
बस एक
मौन रोता है ।

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

सार्वभौमिक है प्रश्न वाचक चिन्ह भाषा कुछ और होने से क्या हो जाता है

बहुत सारे प्रश्न 
ऐसे ही रोज
बेकार के समय
में उठते हैं
साबुन के
बुलबुलों की तरह
और फूट जाते हैं
काले सफेद
रंग बिरंगे
सुंदर कुरूप
लुभावने डरावने
और पता नहीं
कैसे कैसे
हर बुलबुला
छोड़ जाता है
एक प्रश्न चिन्ह
और वही
प्रश्न चिन्ह कहीं
किसी और प्रश्न के
बुलबुले में जा कर
लटक जाता है
ऐसे प्रश्नों के
उत्तर भी
होते हैं या नहीं
पता नहीं चल पाता है
आज तक किसी को
लिखते हुऐ नहीं देखा
कहीं भी अपने
ऐसे ही प्रश्नो को
सब के पास
सबके अपने अपने
प्रश्न होते हैं
पूछ्ना तो बहुत
दूर की बात
कोई दिखाना तक
नहीं चाहता है
शायद छपे कभी
कोई ऐसे ही प्रश्नों
की कोई किताब कहीं
और पता चले
अलग अलग तरह के
लोगों के अपने अपने
अलग अलग प्रश्न
क्योंकि आपस में
मिलजुल कर किये
काम से बहुत कुछ
बहुत बार निकल
कर आता है
‘उलूक’ के लिये तो
प्रश्न हमेशा ही
ब्रह्म हो जाता है
बस दूसरों में से
प्रश्न खोदने वाले
लोगों के लिये
एक प्रश्न जैसे
किसी का आखेट
करना हो जाता है
प्रश्न ही बुझाता है
उनकी रक्त पिपासा
प्रश्न पूछते ही
ऐसे लोगों के चेहरे पर
रक्त दौड़ जाता है
ऐसा रक्तिम चेहरा
और संतोष भाव ही
उनको ईश्वर
तुल्य बनाता है
वो बात अलग है
उनके ईश्वर बनते ही
सामने वाला डरना
शुरु हो जाता है
पर किसी का
विद्वान होना भी
यहीं पर उसके
प्रश्नो के कुदाल
से ही नजर आता है
क्योंकि उनके पास
तो बस उत्तर
ही होते हैं
किसी को इस
बात से क्या करना
अगर वो खुद को
प्रश्न वाचक चिन्ह
के साथ लटका
हुआ हमेशा पाता है ।

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