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रविवार, 31 अगस्त 2014

बन रही हैं दुकाने अभी जल्दी ही बाजार सजेगा

सपने देखने
में भी सुना है
जल्दी ही एक
कर लगेगा
सपने बेचने
खरीदने का
उद्योग इसका
मतलब कुछ
ऐसा लगता है
खूब ही फलेगा
और फूलेगा
लम्बी दूरी की
मिसाइल की
तरह बहुत दूर
तक मार करेगा
आज का देखा
एक ही सपना
कई सालों तक
जिंदा भी रहेगा
कुछ ही समय
पहले किसने
सोचा था ऐसा भी
इतनी जल्दी ही
ये होने लगेगा
कितनी बेवकूफी
कर रहे थे इससे
पहले के सपने
दिखाने वाले लोग
अब पछता रहे होंगे
सोच सोच के
टिकाऊ सपने
बना के दिखाने
वाले का धंधा
इतनी जोर शोर
से थोड़े से समय में
ही चल निकलेगा
सपने आते ही
आँख बंद करने
लगा था ‘उलूक’
भी कुछ दिनो से
लगता है ये सब
सुन कर अब
सोने के बाद
अपनी आँखे
आधी या पूरी
खुली रखेगा ।

चित्र: गूगल से साभार ।

शनिवार, 30 अगस्त 2014

कभी ‘कुछ’ कभी ‘कुछ नहीं’ ही तो कहना है

अच्छी तरह पता है
स्वीकार करने में
कोई हिचक नहीं है
लिखने को पास में
बस दो शब्द ही होते हैं
जिनमें से एक पर
लिखने के लिये
कलम उठाता हूँ
कलम कहने पर
मुस्कुराइयेगा नहीं
होती ही नहीं है
कहीं आज
आस पास
किसी के भी
दूर कहीं रखी
भी होती होगी
ढूँढने उसे
जाता नहीं हूँ
प्रतीकात्मक
मान लीजिये
चूहा इधर उधर
कहीं घुमाता ही हूँ
चूहा भी प्रतीक है
गणेश जी के
वाहन का जिसको
कहीं बुलाता नहीं हूँ
माउस कह लीजिये
आप ठीक समझें
अगर हिलाता
इधर से उधर हूँ
खाली दिमाग के
साथ चलाता भी हूँ
दो शब्द में एक
‘कुछ’ होता है
और दूसरा होता है
‘कुछ नहीं’
सिक्का उछालता हूँ
यही बात बस एक
किसी को बताता
कभी भी नहीं हूँ
नजर पड़ती है
जैसे ही कुछ पर
उसको लिखने
के लिये बस कलम
ही एक कभी
उठाता नहीं हूँ
लिखना दवा
होता नहीं है हमेशा
बीमार होना मगर
कभी चाहता नहीं हूँ
मछलियाँ मेरे देश
की मैंने कभी
देखी भी नहीं
मछलियों की
सोचने की सोच
बनाता भी नहीं हूँ
चिड़िया को चावल
खिलाना कहा था
किसी ने कभी
मछलियों को खिलाने
जापान भी कभी
जाता नहीं हूँ
समझ लेते है
‘कुछ’ को भी मेरे
और ‘कुछ नहीं’ को
भी कुछ लोग बस
यही एक बात कभी
समझ लेता हूँ
कभी बिल्कुल भी
समझ पाता नहीं हूँ ।


चित्र: गूगल से साभार ।

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

होते होते नहीं मजा तो है होने के बाद कुछ देर में कुछ कुछ कहने का

दिन भर की
बौखलाहटें
उथल पुथल
हुई सोच
बारिश के
बाद के छोटे
छोटे नाले
मटमैला पानी
उथली नदी
कंकड़ पत्थर
धूल धक्कड़
का साम्राज्य
पारदर्शी जल
के ज्ञान के
दर्शन का हरण
थोड़ी खलबली
कठिन एक परीक्षा
जल की खुद
की हलचल
की समीक्षा
बस इंतजार
और इंतजार
ठहराव तक
सवरने का
मिलावट के
कुछ कर
गुजरने का
मिट्टी के
दूर तक
कहीं बहने का
पत्थर का
गहराई में जा
ठहरने का
आहिस्ता आहिस्ता
तमाशा जल के
भरे पूरे यौवन
के खिलने का
एक दिन की
बात नहीं
रोज का काम
एक कफन
में एक जेब
सिलने का
पता चलना
उसी तरह
उथले पानी के
निथरने का
दिखना शुरु
होना आर पार
खबर छपना
ढके हुऐ
सब कुछ के
पारदर्शी होने का
अंदाज वही
हर बार
की तरह
वैसा हमेशा सही
कभी ऐसा भी
कभी कभी
कहीं कहीं
कह लेने का ।

चित्र: गूगल से साभार ।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

आज ही के दिन क्रोध दिवस मनाया जाता है

अपनी कायरता
के सारे सच
हर किसी को
पता होते हैं
जरूरत नहीं
पड़ती है जिसकी
कभी किसी
सामने वाले को
समझाने की
सामने वाला भी
कहाँ चाहता है
खोलना अपनी
राज की पर्तों को
कौन हमेशा शांति
में डूबा रह पाता है
अच्छा रहता है
ढका रहे जब तक
चल सके सब कुछ
अपना अपना
अपने अपने
अंदर ही अंदर
पर हर कोई जरूर
एक सिकंदर
होना चाहता है
डर से मरने
से अच्छा
क्रोध बना या
दिखा कर
उसकी ढाल से
अपने को
बचाना चाहता है
सच में कहा गया है
और सच ही
कहा गया है
क्रोध वाकई में
कपटवेश में
एक डर है
अपने ही अंदर
का एक डर
जो डर के ही
वश में होकर
बाहर आकर
लड़ नहीं पाता है
वैसे भी कमजोर
कहाँ लड़ते हैं
वो तो रोज मरते हैं
रोज एक नई मौत
मरना कोई भी
नहीं चाहता है
केवल मौत के
नाम पर
डर डर कर
डर को भगाना
चाहता है
इसी कशमकश में
किसी ना किसी
तरह का एक क्रोध
बना कर उसे
अपना नेता
बना ले जाता है
वो और उसके
अंदर का देश
देश की तरह
आजाद हो जाता है
अंदर होता है
बहुत कुछ
जो बस उसके
डर को पता होता है
और बाहर बस
क्रोध ही आ पाता है
जो अपने झूठ को
छिपाने का एक
बहुत सस्ता सा
हथियार हो जाता है
बहुत सी जगह
बहुत साफ
नजर आता है
बहुत सी काली
चीजों को बहुत बार
झक सफेद चीजों से
ढक दिया जाता है ।

चित्र गूगल से साभार ।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

नजर टिक जाती है बहुत देर तक अंजाने में किसी की डायरी के एक पन्ने में बस यूँ ही कभी

ढूँढना शुरु करना
कभी कुछ
थोड़ी देर देखने
भर के लिये
खुद को अपने ही
आस पास से
हटा कर
दूर ले जाने
की मँशा के साथ
भटकते भटकते
रुकते हुऐ कदम
किसी के पन्ने पर
बस इतना सोच कर
कि ठीक नहीं रोज
अपनी ही बात को
लेकर खड़े हो जाना
दर्द बहुत हैं बिखरे
हुऐ गुलाबों की सुर्ख
पत्तियों से जैसे ढके हुऐ
बहुत कुछ है यहाँ
पता लगता भी है
कहीं किसी मोड़
पर आकर मुड़ा हुआ
पन्ना किसी किताब का
रोक लेता है कदमों को
और नजर गुजरती
किसी लाईन के बीच
पता चलता है खोया हुआ
किसी का समय और
रुकी हुई घड़ी जैसे
इंतजार में हो किसी
के लौटने के आने
की खबर के लिये
जानते बूझते किसी
के चले जाने की
एक सच्ची
बहुत दूर से
आई और गयी
खबर के झूठ हो
जाने की आस में
अपने गम बहुत
हल्के होते हुऐ
तैरते नजर आना
शुरु होते हैं और
नम कर देते हैं
आँखो को एक
आह के साथ जो
निकलती है एक
दुआ के साथ दिल से
खोये हुऐ के सभी
अपनों के लिये ।

चित्र: साभार http://apiemistika.lt/ से

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

बिल्ली जब जाती है दिल्ली चूहा बना दिया जाता सरदार है

नदी है नावें है
बारिश है बाढ़ है
नावें पुरानी हैं
छेद है पानी है
पतवार हैं
हजार हैं
पार जाने को
हर कोई भी
तैयार है
बैठने को
पूछना नहीं है
कुर्सियों की
भरमार है
गंजे की कंघी है
सपने के बालों
को रहा संवार है
लाईन है दिखानी है
पीछे के रास्ते
पूजा करवानी है
बारी का करना
नहीं इंतजार है
नियम हैं कोर्ट है
कचहरी है वकील हैं
दावे हैं वादे हैं
वाद हैं परिवाद हैं
फैसला करने को
न्यायाधीश तैयार है
भगवान है पूजा है
मंत्र हैं पंडित है
दक्षिणा माँगने का
भी एक अधिकार है
पढ़ना है पढ़ाना है
स्कूल जरुरी जाना है
सीखने सिखाने का
बाजार गुलजार है
धोती है कुर्ता है
झोला है लाठी है
बापू की फोटो है
मास्साब तबादले
के लिये पीने
पिलाने को खुशी
खुशी तैयार है
‘उलूक’ के पास
काम नहीं कुछ
अड़ोस पड़ोस
की चुगली का
बना लिया
व्यापार है ।

सोमवार, 25 अगस्त 2014

गलतफहमी में ही सही लेकिन कभी कोई ऐसे ही कुछ समझ चुका है जैसा नजर आने लगता है थोड़ी देर के लिये ही सही

कुछ तो अच्छा
ही लगता होगा
एक गूँगे बहरे को
जब उसे कुछ देर
के लिये ही सही
महसूस होता होगा
जैसे उसके इशारों को
थोड़ा थोड़ा उसके
आस पास के
सामान्य हाथ पैर
आँख नाक कान
दिमाग वाले
समझ रहे हों के
जैसे भाव देना
शुरु करते होंगे
समझ में आता
ही होगा किसी
ना किसी को कि
एक छोटी सी
बात को बताने
के लिये उसके
पास शब्द कभी
भी नहीं होते होंगे
कहना सुनना बताना
सब कुछ करना
होता होगा उसे
हाथ की अँगुलियों
से ही या कुछ कुछ
मुँह बनाते हुऐ ही
बहुत खुशी झलकती
होगी उसके चेहरे पर
बहुत सारे लोग नहीं भी
बस केवल एक ही
समझ लेता होगा
उसकी बात को
उसके भावों को
या दर्द और खुशी
के बीच की उसकी
कुछ यात्राओं को
सोच भी कभी कभी
एक ऐसा बहुत छोटा
सा बच्चा हो जाती है
जो एक टेढ़ी मेढ़ी
लकड़ी को एक
खिलौना समझ
कर ताली बजाना
शुरु कर देता हो
कुछ भी कैसे
भी कहा जाये
सीधे सीधे ना सही
कुछ इशारों
में ही सही
जरूरी नहीं है
अपनी बात को
कहने के लिये
एक कवि या लेखक
हो जाना हमेशा ही
लेकिन बिना पूँछ
के बंदर के नाच पर
भी कभी किसी दिन
देखने वाले जरूर
ध्यान देते हैं अगर
वो रोज नाचता है
‘उलूक’ किसी दिन
तुझे इस तरह का
लगने लगता है
कुछ कुछ अगर
खुश हो लिया कर
तू भी थोड़ी देर
के लिये ही सही ।

रविवार, 24 अगस्त 2014

आईने के पीछे भी होता है बहुत कुछ सामने वाले जिसे नहीं देख पाते हैं

कहा जाता रहा है
आज से नहीं
कई सदियों से
सोच उतर
आती है शक्ल में
दिल की बातें
तैरने लगती हैं
आँखों के पानी में
हाव भाव चलने बोलने
से पता चल जाता है
किसी के भी
ठिकाने का अता पता
बशर्ते जो बोला या
कहा जा रहा हो
वो स्वत: स्फूर्त हो
बस यहीं पर वहम
होना शुरु हो जाता है
दिखने लगता है
पटेल गाँधी सुभाष
भगत राजगुरु और
कोई ऐसी ही
शख्सियत उसी तरह
जैसे बैठा हो कोई
किसी सनीमा हॉल में
और चल रही हो
पर्दे पर कोई फिल्म
हो रही हो विजय
सच की झूठ के ऊपर
वहम वहम बने रहे
तब तक सब कुछ
ठीक चलता है
जैसे रेल चल रही
होती है पटरी पर
लेकिन वहम टूटना
शुरु होते ही हैं
आईने की पालिश
हमेशा काँच से
चिपकी नहीं
रह पाती है
और जिस दिन से
काँच के आर पार
दिखना शुरु
होने लगता है
काँच का टुकड़ा
आईना ही
नहीं रहता है
काँच का टुकड़ा
एक सच होता है
जो आईना कभी भी
नहीं हो सकता है
उसे एक सच
बनाया जाता है
एक काँच पर
पालिश चढ़ा कर
बहुत कम होते हैं
लेकिन होते हैं
कुछ बेवकूफ लोग
जो कभी भी कुछ
नहीं सीख पाते हैं
जहाँ समय के साथ
लगभग सभी लोग
थोड़ा या ज्यादा
आईना हो ही जाते हैं
उनके पार देखने की
कितनी भी कोशिश
कर ली जाये
वो वही दिखाते हैं
जो वो होते ही नहीं है
और ऐसे सारे आईने
एक दूसरे को
समझते बूझते हैं
कभी एक दूसरे के
आमने सामने
नहीं आते हैं
जहाँ भी देखिये
एक साथ एक दूसरे
के लिये कंधे से कंधा
मिलाये पाये जाते हैं ।

शनिवार, 23 अगस्त 2014

खुद को भी पता कहाँ कुछ भी होता है कहाँ किस समय कौन क्या किस के लिये इस तरह भी कह देता है

यूँ ही कुछ भी
कहीं भी
कहने वाला
नहीं कह देता है
हर किसी की
आदत सब कुछ
हर किसी से
कह देने की भी
नहीं होती है
कुछ कहने के
बारे में किसी से
कुछ पूछ लेना
कहने से पहले भी
बहुत जरूरी
नहीं होता है
फिर भी मन
करता है कह
लेना सब कुछ
सब से चिल्ला
चिल्ला कर
पर कौन कितना
बहरा होता है
देखने से कुछ भी
पता नहीं होता है
सब सामान्य
सा दिखता है
सामने वाला भी
अपने जैसा ही
आम लगता है
किसी का भी
होता होगा आदमी
लेबल लगा कर
कोई भी बेवकूफ
जनता के बीच
खड़ा नहीं होता है
इतना तो पक्का
ही होता है
घाव छोटा हो
या कुछ बड़ा भी
किसी ना किसी
के पास कहीं ना कहीं
जरूर बना होता है
बात उसी की
लेकर कहने के लिये
ही खड़ा होता है
माईक के सामने
शुरु करते ही
सब कुछ भूल कर
अपनी नहीं किसी
बड़ी तूफानी
शैतानी आत्मा
को जामा अच्छाई
का औढ़ा कर
अपनी सोच में
ओहदा भगवान
का दे देता है
अपनी बात किसी
और दिन कहने
के लिये रख कर
सबको पागल
बनाने वाले पागल
को भगवान तक
कह ही देता है
आज सोच बैठा
था ‘उलूक’ भी
कहने की सब कुछ
सब से यहाँ आकर
नहीं कह सका
रोज की तरह
सब को पता है
कुछ नहीं कहता है
बस कुछ कुछ
यूँ ही हमेशा
इसी तरह से
आ आ कर
कहने की सूचना
जरूर दे देता है
कुछ भी कहीं भी
यूँ ही कभी भी
किसी से भी
तो नहीं कह
देना होता है ।
 
   

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

आभासी असली से पार पा ही जाता है

असली दुनियाँ अपने
आस पास की
निपटा के आता है
लबादे एक नहीं
बहुत सारे
प्याज के छिलकों
की तरह के कई कई
रास्ते भर उतारता
चला जाता है
घर से चला होता है
सुबह सुबह
नौ बजे का
सरकारी सायरन
जब भगाता है
कोशिश ओढ़ने की
एक नई
मुस्कुराहट
रोज आईने
के सामने
कर के आता है
शाम होते धूल
की कई परतों
से आसमान
अपने सिर
के ऊपर का
पटा पाता है
होता सब वही है
साथ उसके
जिसके बारे में
सारी रात
और सुबह
हिसाब किताब
रोज का रोज
बिना किसी
कापी किताब
और पैन के
लगाता है
चैन की बैचेनी से
दोस्ती तोड़ने की
तरकीबें खरीदने
के बाजार अपनी
सोच में सजाता है
रोज होता है शुरु
एक कल्पना से
दिन हमेशा
संकल्प एक नया
एक नई उम्मीद
भी जगाता है
लौटते लौटते
थक चुकी होती है
असली दुनियाँ
हर तरफ आभासी
दुनियाँ का नशा
जैसे काँच के
गिलास ले कर
सामने आ जाता है
लबादे खुल चुके
होते हैं सब
कुछ गिर चुके होते हैं
कब कहाँ अंदाज
भी नहीं सा कुछ
आ पाता है
जो होता है
वो हो रहा होता है
और होता रहेगा
उसी तरह असली
के हिसाब से
नकली होने का
मजा आना शुरु
होते ही आभासी
का सुरुर चारों
तरफ छा जाता है ।

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

750वाँ उलूक चिंतन: आज के 'ब्लाग बुलेटिन' पर: “फिर किसी की किसी को याद आती है और हम भी कुछ गीले गीले हो लेते हैं”

कदम रोक लेते हैं
आँसू भी पोछ लेते हैं
तेरे पीछे नहीं
आ सकते हैं
पता होता है
आना चाहते हैं
मगर कहते कहते
कुछ अपने ही
रोक लेते हैं
जाना तो हमें भी है
किसी एक दिन के
किसी एक क्षण में
बस इसी सच को
झूठ समझ समझ कर
कुछ कुछ जी लेते हैं
यादें होती हैं कहीं
किसी कोने में
मन और दिल के
जानते बूझते
बिना कुछ ढकाये
पूरा का पूरा
ढका हुआ जैसा ही
सब समझ लेते हैं
कुछ दर्द होते है
बहुत बेरहम
बिछुड़ने के
अपनों से
हमेशा हमेशा
के लिये
बस इनहीं
दर्दों के लिये
कभी भी कोई
दवा नहीं लेते हैं
सहने में ही होते हैं
आभास उनके
बहुत पास होने के
दर्द होने की बात
कहते कहते भी
नहीं कहते हैं
कुछ आँसू इस
तरह के ठहरे हुऐ
हमेशा के लिये
कहीं रख लेते हैं
डबडबाते से
महसूस कर कर के
किसी भी कीमत पर
आँख से बाहर
बहने नहीं देते हैं
क्या करें ऐ गमे दिल
कुछ गम ना जीने
और ना कहीं
मरने ही देते हैं
बहुत से परदे कई
नाटकों के जिंदगी
भर के लिये ही
बस गिरे रहते हैं
जिनको उठाने
वाले ही हमारे
बीच से पता नहीं कब
नाटक पूरा होने से
बस कुछ पहले ही
रुखसती ले लेते हैं ।

बुधवार, 20 अगस्त 2014

होते होते कुछ हो गये का अहसास ही काफी हो जाता है

उम्र के साथ ही
हो जरूरी नहीं
समय के साथ
भी हो सकती है
इश्को मुहब्बत
की बात तुक में हो
या अतुकाँत हो
अंदर कही उबल
रही हो या फिर
कहीं चुपचाप
बैठी शांत हो
खड़ी पहाड़ी के
ऊपर उँचाई पर
बैठ कर नीचे से
आती हुई
सरसराती हवा जब
बात करना शुरु
कर देती है
उसके बाद कहाँ
पता चल पाता है
आभास भी
नहीं होता है
कुछ देर के लिये
समय जैसे पानी में
घुलती हुई सफेद
दूध की एक
धार हो जाता है
सारा जहर धीरे धीरे
निकलता हुआ
आत्मा का जैसे
आत्मा के नीले
पड़े हुऐ शरीर से
निकल कर
सामने से होता हुआ
दूर घाटी में बहती हुई
नदी में समा जाता है
शिव नहीं हो सकता
आदमी कभी भी
नहीं सह सकता है
आस पास फैले हुऐ
जहर की जरा सा
आँच को भी जरा सी
जानते बूझते तैरता है
डूबता उतराता है
जहर और जहरीला
हो जाता है
नीलकंठ की कथा
दोहराने कलियुग में
वैसे भी कोई
बहरूपिया ही
नाटक के एक पात्र के
रूप में ही आ पाता है
कुछ भी हो शहर से दूर
पहाड़ी के नीचे से ऊपर
की ओर बहती हवा में
कुछ देर के लिये ही सही
थोड़ा बहुत ही सही
बैठा या खड़ा हुआ
पत्थर पर एक भीड़ से
निकला हुआ पत्थर
पिघल नहीं भी पाता है
पर कहीं कुछ मुलायम
सा हो जाने का अहसास
ही बस अनमोल हो जाता है ।

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

जो होता नहीं कहीं उसी को ही दिखाने के लिये कुछ नहीं दिखाना पड़ता है

बैठे ठाले का
दर्शन है बस
चिंतन के किसी
काम में कभी भी
नहीं लाना होता है
खाली दिमाग
को कहते हैं
दिमाग वाले
शैतान का एक
घर होता है
ऐसे घरों की
बातों को
ध्यान में नहीं
लाना होता है
सब कर रहे
होते हैं लागू
अपने अपने
धंधों पर
धंधे पर ही बस
नहीं जाना होता है
बहुत देर में आती है
बहुत सी बातें
गलती से समझ में
सबको आसानी से
समझ में आ जाये
ऐसा कभी भी कुछ
नहीं समझाना होता है
एक ही जैसी बात है
कई कई बातों में
घुमा फिरा के फिर
उसी जगह पर
चले जाना होता है
सबके सब कर
रहे होते हैं
गांंधी दर्शन के
उल्टे पर शोध अगर
मान्यता पाने के लिये
शामिल हो ही
जाना पड़ता है
घर में सोते रहिये
जनाब चादर ओढ़ कर
दिन हो या रात हो
अखबार में कसरत
करता हुआ आदमी
एक दिखाना पड़ता है
कभी तो चावल के
दाने गिन भी लिया
कर ‘उलूक’ दिखाने
के लिये ही सही
रोज रोज कीड़े
दिखाने वाले को
बाबा जी का भोंपू
बजा कर शहर से
भगाना पड़ता है ।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

नहीं लिख पाउंगा उसके लिये कुछ भी जिसके जलवे में आदमी बन के कोई शामिल होता है

दिमाग से
लिखना
मन की
बात
लिखना
किताब से
लिखना
अखबार में
छपने छपाने
के लिये
लिखना

अलग अलग
होता है भाई
क्यों परेशान
होता है

डाक्टर ने
नहीं कहा है
पढ़ने के लिये

वो सब कुछ
जो इस
दुनिया में
हर जगह
किसी भी
दीवार पर
ऐरे गैरे
नत्थू खैरे
ने लिखा
या लिखवा
दिया होता है

पैजामे और
टोपी देख कर
लिखने वाले
की बात पर
क्यों चला जाता है

यहाँ
हर कोई
बिना कपड़े
का ही आता है

जैसा होता है
उसी तरह
आता है

अपने हिसाब
किताब को
देख कर
दुनियाँ को
पागल बनाता है

कपड़े के बिना
जो होता है उसे
गूगल का
शब्द कोश
क्या कहता है
उससे क्या करना
सीधे सीधे कह देना
अच्छा नहीं होता है

दुनियाँ
ऐसे लोगों
से ही चल रही है

एक तू है
‘उलूक’
अपनी
बेवकूफियों को
हरे पत्तों से ढकने
में लगा रहता है

अखबार
में छपे
कबूतरों
के मनन
चिंतन से
परेशान
मत हुआ कर

कबूतर अपने
घोंसले में
अपनी ही बीट
पर सोता है

जनता
उस की
तरह की ही
उस की
वाह वाही मे
लगी रहती है

जिनको पता
सब होता है
वो उनकी तरह
का ही होता है

अल्पसंख्यक
बस एक
संख्या है
उसी ने
बिल्ली की
तरह खंभा ही
तो बस एक
नोचना होता है ।

रविवार, 17 अगस्त 2014

हे कृष्ण जन्मदिन की शुभकामनाऐं तुम्हें सब मना रहे हैं और जिसे देने तुम्हें सारे कंस मामा भी हमारे साथ ही आ रहे हैं

दो ही दिन हुऐ हैं
जश्ने आजादी
का मनाये हुऐ
हे कृष्ण
आज तेरा जन्म दिन
मनाने का अवसर
हम पा रहे हैं
दिन भर का व्रत
करने के बाद
शाम होते होते
दावत फलाहार
की तुझे भोग
लगा कर खुद खा
और बाकी को
साथ में भी
खिला पिला रहे हैं
दादा दादी माँ पिताजी
से बचपन में सुनी
कहानियाँ याद
साथ साथ करते
भी जा रहे हैं
कितने मारे
कितने तारे
गिनती करने में
आज भी याद
नहीं आ पा रहे हैं
सभी का हो चुका
था संहार सुना था
कुछ बचे थे
शायद भले लोग
कुछ गायें कुछ ग्वाले
कुछ बाँसुरी की
धुन और तानें
आज भी सुन
और सुना रहे हैं
आज ही की
बात नहीं है कृष्ण
तेरे बारे में
सुनते सुनते
अब खुद अपने
जाने के दिनों के
बारे में भी कुछ
सोचते जा रहे हैं
नहीं हुई भेंट तुझसे
कहीं घर में मंदिर में
रास्ते में आदमी
ही आदमी आते जाते
भीड़ दर भीड़
हम खुद ही
खोते जा रहे हैं
कंस से लेकर
शकुनि ही शकुनि
घर से लेकर
मंदिर तक में
नजर आ रहे हैं
गीता देकर गये थे
तुम अपनी याद
दिलाने के लिये
पाप करने के बाद
शपथ उसी पर आज
हम हाथ रख कर
खा रहे हैं खिला रहे हैं
हैप्पी बर्थ डे कृष्ण जी
कहने हमेशा हर साल
याद कर लेना तुम भी
सभी संहार किये गये
उस समय के और
इस समय के हो चुके
तुम्हारे भक्त गण
मेरे साथ मेरे आस पास
मिलकर हरे कृष्ण हरे कृष्ण
गाते गाते तालियाँ
भी साथ में बजा रहे हैं ।
       



गुरुवार, 14 अगस्त 2014

सरकारी त्योहार के लिये भी अब घर से लाना जरूरी एक हार हो गया

रोज उलझना
झूठ से फरेब से
बे‌ईमानी से
भ्रष्टाचार की
किसी ना किसी
कहानी से
सपना देखना
खुशी पाने का
ज्यादा से ज्यादा
नहीं तो कम से कम
एक को सही
अपना गुलाम
बना कर जंजीर
डाल कर नचाने से
इच्छा करना
पूरी करने की
अपनी अपूर्त
अतृप्त आकाँक्षाओं की
बिना बताये
समझाये आस
पास की जनता
को समझ कर बेवकूफ
गर्व महसूस करना
मुँह पर आती कुटिल
मुस्कुराहट को
छुपाने से
किसने देखी
कब गुलामी
कौन कब और कहाँ
आजाद हो गया
किसने लिखी
ये सब कहानी
सपना किसका
साकार हो गया
समझते समझते
बचपन से लेकर
पचपन तक का
समय कब
पार हो गया
तीन सौ चौंसठ
दर्द भरे नगमों को
सुनने का पुरुस्कार
एक दिन झंडा
उठा कर सब कुछ
भूल जाने के लिये
सरकार का एक
सरकारी त्योहार हो गया
कुछ कहेगा तो
वो कहेगा तुझसे
‘उलूक’ देशभक्त
होने और दिखाने का
एक दिन तो मिलता
है पूरे सालभर में
भाषण मूल्यों के
झंडा लहरा कर
देने के बाद का
उन सब का कभी
का तैयार हो गया
तुझे क्या हो जाता
है हमेशा ही ऐसा
अच्छे आने वाले
समय में भी बेकार
बोल बोल कर
लगता है आजाद
होने से पहले ही
तू बहुत और बहुत
बीमार हो गया ।

बुधवार, 13 अगस्त 2014

आज ही छपा है अखबार में कहने को कल परसों भी कह दिया है

पूरे पके और
सूखे हुऐ कददू
को हाथ में
लेकर संकल्प
ले लिया है
ना खुद खाउँगा
ना खाने दूँगा
बहुत जोर से
बहुत बड़ा एक
लाउडस्पीकर
हाथ में लेकर
कह दिया है
सावधान बड़ा
खाने वालो
खाना पीना
दिखना कहीं
किसी को भी
नजर भूल से
भी नहीं
आना चाहिये
बहुत पुराना
खा चुके मोटे
लोगों को भी
अपना भार अब
घटाना चाहिये
सब कुछ
बदल डालूँगा
एक नहीं कई कई
बार कह दिया है
खाने पीने को
छोड़ कर बाकी
सब कुछ कर लेने
का लाइसेंस बस
अपने ही ईमानदारों
को ही दिया है
अभी तो बस
बड़े बड़े खाने वालों
के लिये सी सी कैमरे
लगाये जा रहे हैं
कद्दू के अंदर
पनप रहे कीड़े
कौन सा किसी को
बाहर से कहीं
नजर आ रहे हैं
छोटे मोटे बिल पर्चे
टी ऐ डी ऐ कमीशन
सब हजार दस हजार
तक के अभी पाँच साल
तक नोटिस में
नहीं लिये जायेंगे
अगले पाँच साल में
छोटे खाने वाले भी
ट्रेनिंग रिफ्रेशर कोर्सेस
के लिये बुला लिये जायेंगे
अभी चोगे धो धुला के
स्त्री कर करा कर
शरीर पे डालना ही
सिखाया जा रहा है
मैले मन को धोने
धुलाने का पाउडर भी
जल्दी ही चीन या
अमेरिका का ही
आने जा रहा है
देश भक्तो
बेकार की
फालतू बातों में
ध्यान क्यों
लगा रहे हो
पंद्रह अगस्त
दो ही दिन के
बाद आ रहा है
इतनी बड़ी बात
भूल क्यों
जा रहे हो
खाना पीना
पीना खाना
होता रहता है
कम बाकी कल
परसों भी हो
ही जायेगा
अभी झंडे बेचने हैं
उनको बेचने और
खरीदने को कौन
कहाँ से आयेगा
कहाँ को जायेगा
चीन से बन कर
भी आता है तो
क्या होता है
झंडा ऊँचा रहे हमारा
अपने देश में ही
गाया जायेगा ।

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

गधा घोड़ा नहीं हो सकता कभी तो क्या गधा होने का ही फायदा उठा

लिखने लिखाने के
राज किसी को
कभी मत बता
जब कुछ भी
समझ में ना आये
लिखना शुरु हो जा
घोड़ों के अस्तबल
में रहने में कोई
बुराई नहीं होती
जरा भी मत शरमा
कोई खुद ही समझ ले
तो समझ ले
गधे होने की बात
को जितना भी
छिपा सकता है छिपा
कभी कान को
ऊपर की ओर उठा
कभी पूँछ को
आगे पीछे घुमा
चाबुकों की फटकारों
को वहाँ सुनने से
परहेज ना कर
यहाँ आकर आवाज की
नकल की जितनी भी
फोटो कापी चाहे बना
घोड़े जिन रास्तों से
कभी नहीं जाते
उन रास्तों पर
अपने ठिकाने बना
घोड़ो की बात पूरी नहीं
तो आधी ही बता
जितना कुछ भी
लिख सकता है
लिखता चला जा
उन्हें कौन सा
पढ़ना है कुछ भी
यहाँ आकर
इस बात का फायदा उठा
सब कुछ लिख भी गया
तब भी कहीं कुछ
नहीं है कहीं होना
घोड़ों को लेखनी
की लंगड़ी लगा
बौद्धिक अत्याचार
के बदले का इसी
को हथियार बना
घोड़ों की दौड़ को
बस किनारे से
देखता चला जा
बस समझने की
थोड़ा कोशिश कर
फिर सारा हाल
लिख लिख कर
यहाँ आ कर सुना
वहाँ भी कुछ नहीं
होना है तेरा
यहाँ भी कुछ
नहीं है होना
गधा होने का
सुकून मना
घोड़ों के अस्तबल
का हाल लिख लिख
कर दुनियाँ को सुना
गधा होने की बात
अपने मन ही मन
में चाहे गुनगुना।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

किसलिये कोई लिखने लिखाने की दवा का बाजार चुनता है

कौन है जो
नहीं लिखता है
बस उसका लिखा
कुछ अलग सा
इसका लिखा कुछ
अलग सा ही
तो दिखता है
वैसे लिखने लिखाने
की बातें पढ़ा लिखा
ही करता है
वो गुलाब देख
कर लिखता है
जो रोज नहीं
खिलता है
बस कभी कभी
ही दिखता है
किसी का लिखा
पिटने पिटाने के
बाद खिलता है
एक दिन की
बात नहीं होती है
रोज का रोज पिटता है
सेना का सिपाही
नहीं बनता है
कायरों को वैसे भी
कोई नहीं चुनता है
लिखने लिखाने
का मौजू यहीं
और यहीं बनता है
हर फ्रंट पर उसका
सिपाही अपनी
बंदूक बुनता है
गोलियाँ भी
उसकी होती है
लिखने वाला बस
आवाज सुनता है
मार खाने से
पेट नहीं भरता है
मार खा खा कर
शब्द चुनता है
लिखने लिखाने
की बातों का कनिस्तर
बस मार खाने
से भरता है
उनके साये और
आसरे पर
 लिखने वाला
पुरुस्कार चुनता है
सब से हट कर
लिखने का खामियाजा
तिरस्कार चुनता है
एक ही नहीं
सारे के सारे फ्रंट पर
पिट पिटा कर
‘उलूक’ कुछ
तार बुनता है
वहाँ भी नहीं
सुनता है कोई
यहाँ भी नहीं सुनता है
लिखना लिखाना
बहुत आसान होता है
बहुत आसानी से
लिखता है कोई
कुछ भी कभी भी
जो डरते डरते
हुऐ हर जगह
की हार चुनता है
बिना बेतों की
मार चुनता है
लेखक डरता है
डरपोक होता है
लड़ता तो है पर
कलम चुनता है
बस तलवार देख
कर आँखें ही
तो बंद करता है ।

रविवार, 10 अगस्त 2014

कभी उनकी तरह उनकी आवाज में कुछ क्यों नहीं गाते हो

गनीमत है कवि
लेखक कथाकार
गीतकार या इसी
तरह का कुछ
हो जाने की सोच
भूल से भी पैदा
नहीं हुई कभी
मजबूत लोग होते हैं
लिखते हैं लिखते हैं
लिखते चले जाते हैं
कविता हो कहानी हो
नाटक हो या कुछ और
ऐसे वैसे लिखना
शुरु नहीं हो जाते हैं
एक नहीं कई कोण
से शुरु करते हैं
कान के पीछे से
कई कई बार
लेखनी निकाल कर
सामने ले आते हैं
बार फिर से कान में
वापस रख कर
उसी जगह से
सोचना शुरु
हो जाते हैं
जहाँ से कुछ दिन
पहले हो कर
दो चार बार
कम से कम
पक्का कर आते हैं
लिखने लिखाने
के लिये आँगन होना है
दरवाजा होना है
खिड़की होनी है
या बस खाली पीली
किसी एक सूखे पेड़
पर यूँ ही पूरी
नजर गड़ा कर
वापस आ जाते हैं
एक नये मकान
बनाने के तरीके
होते हैं कई सारे
बिना प्लोट के
ऐसे ही तो नहीं
बनाये जाते हैं
बड़े बड़े बहुत
बड़े वाले जो होते हैं
पोस्टर पहले से
छपवाते हैं
शीर्षक आ जाता है
बाजार में कई साल
पहले से बिकने को
कोई नहीं पूछता बाद में
मुख्य अंश लिखना
क्यों भूल जाते हो
सब तेरी तरह के
नहीं होते ‘उलूक’
तुम तो हमेशा ही
बिना सोचे समझे
कुछ भी लिखना
शुरु हो जाते हो
पके पकाये किसी
और रसोईये की
रसोई का भात
ला ला कर फैलाते हो
विज्ञापन के बिना
छ्पने वाले एक
श्रेष्ठ लेखकों के
लेखों से भरा हुआ
अखबार बन कर
रोज छपने के बाद
कूड़े दान में बिना पढ़े
पढ़ाये पहुँचा दिये जाते हो
बहुत चिकने घड़े हो यार
इतना सब होने के बाद भी
गुरु फिर से शुरु हो जाते हो ।

शनिवार, 9 अगस्त 2014

बचपन से चलकर यहाँ तक गिनती करते या नहीं भी करते पर पहुँच ही जाते

दिन के आसमान
में उड़ते हुऐ चील
कौओं कबूतरों के झुंड
और रात में
आकाश गंगा के
चारों ओर बिखरे
मोती जैसे तारों की
गिनती करते करते
एक दो तीन से
अस्सी नब्बे होते जाते
कहीं थोड़ा सा भी
ध्यान भटकते
ही गड़बड़ा जाते
गिनती भूलते भूलते
उसी समय लौट आते
उतनी ही उर्जा और
जोश से फिर से
किसी एक जगह से
गिनती करना
शुरु हो जाते
ऐसा एक दो दिन
की बात हो
ऐसा भी नहीं
रोज के पसंदीदा
खेल हो जाते
कोई थकान नहीं
कोई शिकन नहीं
कोई गिला नहीं
किसी से शिकवा नहीं
सारे ही अपने होते
और इसी होते
होते के बीच
झुंड बदल जाते
कब गिनतियाँ
आदमी और
भीड़ हो जाते
ना दिखते कहीं
तारे और चाँद
ना ही चील के
विशाल डैने
ही नजर आते
थकान ही थकान
मकान ही मकान
पेड़ पौँधे दूर दूर
तक नजर नहीं आते
गिला शिकवा
किसी से करे या ना करें
समझना चाह कर
भी नहीं समझ पाते
समझ में आना शुरु
होने लगता यात्रा का
बहुत दूर तक आ जाना
कारवाँ में कारवाँओं
के समाते समाते
होता ही है होता ही है
कोई बड़ी बात फिर
भी नहीं होती इस सब में
कम से कम अपनापन
और अपने अगर
इन सब में कहीं
नहीं खो जाते ।
  

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

समझौते होते हैं सब समझते हैं करने वाले बेवकूफ नहीं होते हैं

अपनी अच्छाइयों को
अपनी चोर जेबों
में छुपाये हुऐ
बस उसी तरह
जैसे छुपाना आसान
होता है अंधेरे में
अपनी परछाइयों को
समझौतों के तराजू
लिये फिर रहे हैं
गली गली
मजाल है कि
कोई पलड़ा
ऊँचा और कोई
नीचा हो जाये
तराजू भी हर
एक के पास
एक से समझौता ब्राँड
कहीं कोई चूक नहीं
हर एक के चेहरे पर
एक मुखौटा उसी तरह से
बचाव की मुद्रा में जैसे
लगा लेता है वैल्डिंग
करते समय आँखें
बचाने के लिये कोई
अच्छाई की शरम
गीली करती हुई जेबें
और समझौतों की
बेशर्मी से गरम होकर
खौलती फड़कती नसें
मेरी भी आदत में
आदतन शामिल
हो चुकी है उसी तरह
जिस तरह बंद
हो चुकी हों गीता कुरान
बाईबिल और रामायण
पढ़ने की कोशिश
करते करते किसी की
भारी बोझिल होते होते
आँखे और हर तरफ
फैल चुका हो चारों ओर
काला होता हुआ
सफेद कोहरे
में लिपटा हुआ
एक समझौता
एक ताबूत में
एक और कोशिश
हर किसी की
ताबूत के ढक्कन को
चाँदी से मढ़ कर
चमकदार बना देने की
ताकि गीली होती
चोर जेब से गिरती
शरम की गीली
ओस की बूँदे
साफ करती रहें
झूठ की चमक को
और सलामत रहे
हर किसी की
कुछ अच्छाई उसकी
चोर जेब में
बची रहे सड़ने से
समझौतों की सड़न से
बचते बचाते हुऐ
और समझौते होते रहें
यूँ ही मुखौटों की आड़ में
एक दूसरे के मुखौटों
की कतार के बीच
अच्छाइयाँ बची रहें
मिलें नहीं कभी
किसी की किसी से
समझौता करने
कराने के लिये
या खुद एक समझौता
हो जाने के लिये
अच्छाइयाँ
हर किसी की
होने के लिये ही
होती है बस
ताकी सनद रहे ।

बुधवार, 6 अगस्त 2014

बारिशों का पानी भी कोई पानी है नालियों में बह कर खो जाता है

खुली खिड़कियों
को बरसात
के मौसम में
यूँ ही खुला
छोड़ कर
चले जाने
के बाद
जब कोई
लौट कर
वापस
आता है
कई दिनों
के बाद
गली में
पाँवों के
निशान तक
बरसते पानी
के साथ
बह चुके
होते हैं
पता भी
नहीं चलता है
किसी के आने
और
झाँकने का भी
दरवाजे भी
कुछ कुछ
अकड़ चुके
होते है
बहुत सारे
लोग
बहुत सारे
लोगों के
साथ साथ
आगे पीछे
होते होते
कहीं से
कहीं की
ओर निकल
चुके होते हैं
वहम होने
या
ना होने का
हमेशा वहम
ही रह
जाता है
जब कोई
गया हुआ
वापस लौट
कर आता है
जहाँ से
गया था
वहाँ पहुँच
कर बस
इतना ही
पता चल
पाता है
पता नहीं
किसी ने
पता लिख
दिया था
उस का
उस जगह का
जहाँ उसे
लगता था
वो है
उस जगह पर
लौट कर
खुद अपने
को ही बस
नहीं ढूँढ
पाता है
हर कोई
अपने अपने
पते को
लेकर
अपनी अपनी
चिट्ठी

खुद के
लिये ही

लिखता हुआ
नजर आता है
ना पोस्ट आफिस
होता है जहाँ
ना ही कोई
डाकिया
कहीं दूर
दूर तक
नजर आता है
‘उलूक’
बहुत ही
जालिम है ये
सफेद पन्ना
काला नहीं
हो पाता है
अगर कभी
तो कोई
भी झाँकने
तक नहीं
आता है
काँटा
चुभा रहना
जरूरी है
पाँव के
नीचे से
खून दिखना
भी जरूरी
हो जाता है
तेरा पता तुझे
पता होता है
खुद ही खोना
खुद ही ढूँढना
खुद को यहाँ
हर किसी को
इतना मगर
जरूर
आता है ।

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