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शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

गुरु पूर्णिमा पर प्रणाम गुरुओं को भी घंटालों को भी

कहाँ हो गुरु
दिखाई नहीं
देते हो
आजकल
कहाँ रहते हो
क्या करते हो
कुछ पता
ही नहीं
चल पाता है
बस दिखता है
सामने से कुछ
होता हुआ जब
तब तुम्हारे और
तुम्हारे गुरुभक्त
चेलों के आस पास
होने का अहसास
बहुत ही जल्दी
और
बहुत आसानी
से हो जाता है
एक जमाना था गुरु
जब तुम्हारे लगाये
हुऐ पेड़ सामने से
लगे नजर आते थे
फल नहीं
होते थे कहीं
फूल भी नहीं तुम
किसी को
दिखाते थे
कहीं दूर
बहुत दूर
क्षितिज में
निकलते हुऐ
सूरज का आभास
उसके बिना
निकले हुऐ ही
हो जाता था
आज पता नहीं
समय तेज
चल रहा है
या
तुम्हारा शिष्य ही
कुछ धीमा
हो गया है
दिन ही होता है
और रात का
तारा निकल
बगल में
खड़ा हो कर
जैसे मुस्कुराता है
और
मुँह चिढ़ाता है
गुरु
क्या गुरु मंत्र दिये
तुमने उस समय
लगा था
जग जीत
ही लिया जायेगा
पर आज
जो सब
दिख रहा है
आस पास
उस सब में तो
गुरु से कुछ
भी ढेला भर
नहीं किया जायेगा
तुमने जो
भी सिखाया
जिस की
समझ में आया
उसकी पाँचों
अँगुलियाँ
घी में हैं
जो दिख रहा है
उसका सिर
भी कढ़ाही
में है या नहीं है
ये पता नहीं है
अपना सिर
पकड़ कर
बैठे हुऐ
एक शिष्य को
आगे उससे
कुछ भी नहीं
अब दिख रहा है
जो है सो है
गुरु
गुरु तुम भी रहे
कुछ को
गुरु बनने
तक पहुँचा ही गये
लेकिन लगता है
दिन गुरुओं के
लद गये गुरु
गुरु घंटालों के
बहुत जोर शोर के
साथ जरूर आ गये
जय तो होनी
ही चाहिये गुरु
गुरु की
गुरु गुरु
ही होता है
पर गुरु
अब बिना
घंटाल बने
गुरु से भी
कुछ नहीं होता है ।

चित्र साभार: blogs.articulate.com


गुरुवार, 30 जुलाई 2015

सब कुछ सामने एक साथ बातें पकड़े कोई कैसे आफत की बात

महीने के अंतिम
दिनों के मुद्दों
पर भारी पड़ती
महत्वाकाँक्षाऐं
अहसास जैसे
महीने के वेतन
में से बची हुई
कुछ भारी खिरची
आवाज करती हुई
बेबात में जेब
को ही जैसे
फाड़ने को तैयार
पुरानी पैंट की
कच्ची पड़ती हुई
कपड़े की जेब
से दिखाई देती हुई
जमाने के साथ
चलने से इंकार
कर चुकी चवन्नी
के साथ में
एक अठन्नी
जगह घेरने को
इंतजार करते
दिमाग के कोने को
अपने अपने हिसाब से
राशन पानी बिजली
गैस दूध अखबार
सब्जी टेलिफोन
केबिल के बिलों
के हिसाब किताब
की हड़बड़ाहट
के साथ टी वी
पर चलती बहस
लाशें जलती कहीं
कहीं दफन होती
कहीं कानून
कहीं धर्म
आम आदमी की
समस्यायें उसकी
महत्वाकाँक्षाऐं
उसके मुद्दे
सब गडमगड
थोड़ा देश थोड़ा
देश भक्ति के
साथ साथ
रसोई से आती
तेज आवाज
खाना बन चुका है
लगा दूँ क्या ?

चित्र साभार: www.123rf.com

बुधवार, 29 जुलाई 2015

समझदारी है सफेद को सफेद रहने देकर वक्त रहते सारा सफेद कर लिया जाये

छोड़ दिया जाये
कभी किसी समय
खींच कर कुछ
सफेद लकीरें
सफेद पन्ने के
ऊपर यूँ ही
हर वक्त सफेद
को काला कर
ले जाने की मंशा
भी ठीक नहीं
रंग रहें रंगीन रहें
रंगीनियों से भरे रहें
रहने दिया जाये
काले में सफेद भी
और सफेद में
काला भी होता है
कहीं कम कहीं
ज्यादा भी होता है
रहने भी दिया जाये
ढकने के लिये सब
कुछ नजर सफेद
पर टिकी रहे
रहनी ही चाहिये
मौका मिले ओढ़ने का
सफेदी को कभी
अच्छा होता है अगर
खुद ही ओढ़ लिया जाये
सर से शुरु होती है
सफेदी जहाँ सब
सफेद दिखता है
पाँवो के तले पर भी
सफेद ही कर लिया जाये
सफेद पर ही चलना हो
सब कुछ सफेद ही रहे
सफेद पर ही
रुक लिया जाये
इससे पहले किसी को
ढकना पढ़े तेरा भी कुछ
सफेद सफेद से ‘उलूक’
वक्त को समझ कर
जितना कर सकता है
कोई सफेद सफेदी के साथ
सफेद कर लिया जाये ।

चित्र साभार: itoon.co

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

मौत आती है जिंदों को बौना दिखाने के लिये कभी कभी

निराशा
घेरती है
जिंदगी को
बहुत ही
बेरहमी से
सूख जाती हैं
आँखे भी
भूले जाते हैं
आँसू
याद में बस
पानी रह जाता है
देखते देखते
अपने आस पास
कुछ दूर कुछ
नजदीक
हर जगह फैली हुई
उदासी
कचोटती रहती है
अंदर से कहीं
डर गिद्धों को
देख देख कर
नुची हुई कुछ
लाशें
जानवरों की
जीवन चक्र हमेशा
खूबसूरती में
नहीं घूमता है
बहुत तेजी से
बढ़ते कैक्टस
भयभीत करते हैं
और फिर
किसी दिन
अचानक जिंदगी
नहीं मौत
जगाना शुरु
करती है
खुद के अंदर की
मरती हुई
आत्मा को
एक संबल
सा देती हुई
जब साफ साफ
दिखता है
श्रद्धाँजलि अर्पित
करते हुऐ कैक्टस
बहुत बौने
नजर आते हैं
सूखी हुई
बरसों से आँखें
नम होना
शुरु हो जाती हैं
झरने बहने
लगते हैं
एक हमेशा
के लिये
नींद में चला
गया शख्स
जिंदगी हो
जाता है
सारे बौनो
के सामने
मौत बहुत
ही ज्यादा
विशाल  नजर
आती है ।

चित्र साभार: www.clipartbest.com

सोमवार, 27 जुलाई 2015

नमन श्रद्धाँजलि विनम्र हे महापुरुष महाइंसान माननीय डा0 ऐ पी जे अब्दुल कलाम

एक अहसास है
और रहेगा भी
हमेशा तेरे लिये
कहीं दिल के किसी
एक कोने में कहीं
नहीं बता सकता
सही सही किस
जगह और कहाँ
लिख नहीं सकता
लिखना भी कठिन
है कुछ भी यहाँ
लिख भी दिया
समझेगा कौन
उस जगह जहाँ
शब्द ढूढने में
माहिर हैं और
कम नहीं बहुत
हैं सारे हैं लोग
यहाँ से लेकर
गिनती नहीं है
कहाँ से कहाँ
इंसान और
इंसानियत
डूबती रही है
एक बार नहीं
कई कई बार
पता नहीं
कहाँ कहाँ
तुझ जैसी पवित्र
आत्माऐं ही
होती हैं रही हैं
सदियों से डूबते
मरते हुऐ अँधेरे
में डूबते को तिनके
के सहारे की
जैसी प्राण रोशनी
होता रहा है जिससे
जीवित मरता जहाँ
अवसान हुआ होगा
पवित्र शरीर का
अमर आया था है
और रहेगा नाम
धरती पर आकाश
पर तेरा जैसा सच में
इंसानियत से भरा
इंसानों में सबसे
बड़ा इंसान दूसरा
इसके बाद अब
कब दिखेगा
कौन जाने यहाँ ।

चित्र साभार: pages.rediff.com

रविवार, 26 जुलाई 2015

समझदार को बहुत ज्यादा ही समझदारी आती है

सब्जी
और घास
साथ साथ
उगती हैं
दूर से
देखने पर
दोनों एक
सी नजर
भी आती हैं

पर सब्जी
पकाने के
लिये घास
नहीं काटी
जाती है

बकरियों के
रेहड़ में
कुत्ते भी
साथ में हों
तब भी
वही बात
हो जाती है

मांंसाहारियों
के द्वारा
खाने के लिये
बकरियाँ ही
काटी जाती हैं

हिंदी में लिखी
किसी की
अपने घर
की रोज की
चुगलखोरी
साहित्य में नहीं
गिनी जाती हैं

कोई कुछ
लिख रहा
हो अगर
पहले उसकी
लिखी गई
बातों को
समझने की
कोशिश की
जाती है

अपने ही
घर के किसी
आदमी के
द्वारा कही
जाती हैं
और
समझ में
रोज रोज
ही नहीं अगर
आती हैं तो
किसी दिन
कभी पहले
उससे ऐसी
उल जलूल
क्यों लिखी हैं
इस तरह
की बातें
पूछे जाने
की कोशिश
की जाती है

काले अक्षरों
की भैंसे
बनाना अच्छी
बात नहीं
मानी जाती हैं

अक्षरों की
भैंसों की
रेहड़ को
हाँकने वाले
की तुलना
साहित्यकारों
से नहीं
की जाती है

‘उलूक’
बैचेन मत
हुआ कर
अगर कभी
तेरे कनस्तर
पीटने की
आवाज दूर
से किसी को
शादी बारात के
ढोल नगाड़े
का भ्रम पैदा
कर जाती हैं

साहित्यकार
समझने वाले
को समझदारी
आती है और
बहुत आती है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 25 जुलाई 2015

किया कराया दिख जाता है बस देखने वाली आँखों को खोलना आना चाहिये

बहुत कुछ
दिख जाता है
सामने वाले
की आँखों में
बस देखने का
एक नजरिया
होना चाहिये
सभी कुछ
एक सा ही
होता है
जब आदमी
के सामने से
आदमी होता है
बस चश्मा
सामने वाले
की आँखों में
नहीं होना चाहिये
आँखों में आँखे
डाल कर देखने
की बात ही कुछ
और होती है
कितनी भी
गहराई हो
आँख तो बस
आँख होती है
तैरना भी हो
सकता है वहीं
डूबना भी हो
सकता है कहीं
बस डूबने मरने
की सोच कर
डरना नहीं चाहिये
निपटा दिया गया
कुछ भी काम
छुप नहीं पाता है
कितना भी ढकने
की कोशिश
कर ले कोई
छुपा नहीं पाता है
मुँह से राम
निकलता हुआ
सुनाई भी देता है
पर आँखों में
सीता हरण साफ
दिखाई दे जाता है
आँखों में देखना
शुरु कर ही दिया
हो अगर फिर
आँखों से आँखों
को हटाना
नहीं चाहिये
निकलती हैं
कहानियाँ
कहानियों में से ही
बहुत इफरात में
‘उलूक’
कितना भी दफन
कर ले कोई जमीन
के नीचे गहराई में
बस मिट्टी को हाथों
से खोदने में
शर्माना नहीं चाहिये ।

चित्र साभार: www.123rf.com

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

है कोई जुगाड़ कुछ कर कहीं से कुछ तो उखाड़ महामहिम सुना है राज्य पुरुस्कार देने जा रहे हैं

पहाड़ी प्रदेश के सारे
प्रभावशालियों में
नये महामहिम
कुछ अलग से
नजर आ रहे हैं
पहले वाले के
खोदे गये गड्ढों में
उनके घुसाये गये
सारे मेंढक जोर जोर
से टर्रा रहे हैं
होने वाली है
बरसात इनामों की
नये वाले सुना है
छप्पर तनवा रहे हैं
कागज घुमा रहा था
चपरासी विभाग का
लिखा हुआ था
राज्य पुरुस्कार
उत्कृष्ट को मिलेगा
महामहिम काँट छाँट
कर उत्कृष्ट को
छाँटने के लिये
कागजों में भरे हुऐ
आवेदन मंगा रहे हैं
राज्य जब से
काँट छाँट कर
छोटा बना है
तब से उत्कृष्ठ
अलग से अपने
आप ही पहचाने
जा रहे हैं
ढूँढने की
जरूरत नहीं है
अपने समाचार
खुद ही
अपने अपने
अखबारों में
अपने चित्रों के साथ
नियमित अंतराल
पर छपवा रहे हैं
महामहिम किसलिये
कागजों को बरबाद
करवा रहे हैं
समझदार हैं
समझदारी से
समझ कर
छोटे से राज्य के
कुछ चिन्हिंत
उत्कृष्ट लोगों
में से ही किसी से
पूछताछ कर
राज्य पुरुस्कार की
घोषणा क्यों नहीं
करवा रहे हैं
‘उलूक’ को सपनों
में तमगे लटके हुऐ
सूखे पेड़ों के साथ
अपने रहने के
ठिकाने पुराने
खण्डहर आज बहुत
याद आ रहे हैं।

चित्र साभार: clipartavenue.com

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

कुछ लिखने वाले के कुछ पढ़ने वाले कुछ भी पढ़ते पढ़ते उसी के जैसे हो जाते हैं

इतना इतना
कितना कितना
लिखता है
देखा कर कभी
तो सही खुद भी
पढ़ कर जितना
जितना लिखता है
लिखने का कोई
नियम कहीं भी
किसी भी पन्ने में
नजर नहीं आता है
लगता है बिना
नापे तोले कुछ भी
कहीं से हाथ मार कर
झोले के अंदर
से निकाल कर
ले आता है
कभी सौ ग्राम
लिखने की भी
नहीं सोचता है
हर पन्ना जैसे
एक डेढ़ किलो का
रोज ही बनाना
जरूरी हो जाता है
शब्द भी गिने चुने
दो चार हर बार
वही नजर आते हैं
बार बार कई बार
खुद को बेशर्मी
से दोहराते हैं
बातें जमाने की
वही घिसी पिटी
जो अमूमन सभी
किया करते हैं
तेरे शब्द ही
उसी में से कुछ
खोज निकाल कर
उसी से उलझ जाते हैं
कितने शरीफ होते है
फिर भी पढ़ देने वाले
तेरे लिखे को ‘उलूक’
धन्य हैं कुछ लोग
ज्यादा नहीं भी सही
दो चार रोज फिर भी
कभी इधर से नहीं तो
दो चार कभी उधर के
आ ही आते हैं
झेलते हैं अच्छा है
बहुत ही अच्छा है
लिखने लिखाने के
बाद चले भी जाते हैं
कुछ भी लिख देने
वाले का साथ
यहीं पर दिखता है
कुछ भी पढ़ देने वाले
जरूर निभाते हैं ।

चित्र साभार: jaysonlinereviews.com

बुधवार, 22 जुलाई 2015

पागल एक होगा सारा निकाय कैसे पागल हो जायेगा (दुनियाँ के किसी भी कोने मे मरे लोगों के लिये श्रद्धांजलि इस क्षमा के साथ कि ब्लाग जगत में आज भी छुट्टी नहीं की गई )

पंजीकृत पागल
होने के लिये
क्या करना चाहिये
कौन बतायेगा
एक पागल
एक ही होता है
अपनी तरह
का होता है
कोई दूसरा पागल
उसकी सहायता
के लिये आखिरकार
क्यों आगे आयेगा
अब सभी लोग
पागल तो हो
नहीं सकते हैं
इसलिये जो ऐसा
सोचने लग जाये
वही तो सबसे
बड़ा पागल
कहलायेगा
कुछ हो जाये
कहीं दुनियाँ के
किसी कोने में
उसके लिये
खुद के घर में
इतना बड़ा रोना
शुरु हो जायेगा
समझ में नहीं
आती हैं कभी
इस तरह की
हरकतें विज्ञान
के हिसाब से
या मनोविज्ञान
के हिसाब से
कौन किस से
क्या कहे जब
घर ही पागलों
से भर जायेगा
अब क्या सोचना
क्या कुछ समझना
कैलीफोर्नियाँ में
मर गये शेर के लिये
जब करेगा शोक
तेरे घर का शेर
पाठक
तब तेरे समझ में
शायद कुछ आयेगा
एक दिन खाना
क्यों नहीं बना
किस से पूछने जायेगा
बात एक पागल
और सारे पागलों
की हो रही होगी
जहाँ कहीं भी
‘उलूक’ जैसे किसी
एक पागल को
पागल है
कह दिया जायेगा ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

‘उलूक’ की फटी म्यान और जंग खायी हुई तलवार

चाँद तारे
आसमान
सूरज पेड़
पौंधे भगवान
जानवर पालतू
और आवारा
सब के अपने
अपने काम
बस आदमी
एक बेचारा
अपने काम
तो अपने काम
ऊपर से देखने
की आदत
दूसरे की बहती
नाक और जुखाम
कुछ के भाव कम
कुछ के भाव ज्यादा
कुछ अकेले अकेले
कुछ बाँट लेंगे
आधा आधा
कुछ मौज में
खुद ही बने हुऐ
मर्जी से प्यादा
कुछ बिसात
से बाहर भी
बिना काम
किस का फायदा
किसका नुकसान
अपनी अपनी
किस्मत अपना
अपना भाग्य
किताबें पढ़ पढ़
कर भी चढ़े
माथे पर दुर्भाग्य
इसकी बात
उसकी समझ
उसकी बात
उलट पलट
‘उलूक’ की आँखें
‘उलूक’ की समझ
‘उलूक’ की खबर
‘उलूक’ का अखबार
रहने दे छोड़
भी दे पढ़ना
भी अब यार
कुछ बेतार
कुछ बेकार ।

चित्र साभार: openclipart.org

सोमवार, 20 जुलाई 2015

अब क्या बताये क्या समझायें भाई जी आधी से ज्यादा बातें हम खुद भी नहीं समझ पाते हैं

कोई नयी
बात नहीं है
पिछले साल
पिछले के
पिछले साल

और
उससे पहले के
सालो साल
से हो रही
कुछ बातों पर

कोई प्रश्न अगर
नहीं भी उठते हैं

उठने भी
किस लिये हैं

परम्पराऐं
इसी तरह
से शुरु होती हैं
और
होते होते
त्योहार
हो जाती हैं

मनाना
जरूरी भी
होता है
मनाया भी
जाता है
बताया भी
जाता है
खबर भी
बनाई जाती है
अखबार में
भी आती है

बस कुछ
मनाने वाले
इस बार
नहीं मनाते हैं
उनकी जगह
कुछ नये
मनाने वाले
आ जाते हैं

त्योहार मनाना
किस को
अच्छा नहीं
लगता है

पर
परम्परा
शुरु कर
परम्परा को
त्योहार
बनने तक
पहुचाने वाले
कहीं भी
मैदान में
नजर नहीं
आते हैं

अब
‘उलूक’
की आखों से
दिखाई देने
वाले दिवास्वप्न
कविता
नहीं होते हैं

समझ में
आते हैं
तो बस
उनको ही
आ पाते हैं

जो मैदान
के किसी
कोने में
बैठे बैठे
त्योहार
मनाने वालों
की मिठाईयों
फल फूल
आदि के लिये
धनराशि
उपलब्ध
कराने हेतु
अपने से
थोड़ा ऊपर
की ओर
आशा भरी
नजरों से
अपने अपने
दामन
फैलाते हैं

किसी की
समझ में
आये या
ना आये
कहने वाले
कहते ही हैं

रोज कहते हैं
रोज ही
कहने आते हैं
कहते हैं
और
चले जाते हैं

तालियाँ
बजने बजाने
की ना
उम्मीद होती है
ढोल नगाड़ों
और नारों
के शोर में
वैसे भी
तालियाँ
 बजाने वाले
कानों में
थोड़ी सी
गुदगुदी ही
कर पाते हैं ।

चित्र साभार: wallpoper.com

रविवार, 19 जुलाई 2015

हाशिये भी बुरे नहीं होते हैं अगर खुद ही खींचे गये होते हैं

हाशिये खुद ही बनें
खुद के लिये खुद ही
समझ में आ जायें
खुद चला चले कोई
मानकर कुछ
निशानों को हाशिये
और फिर खुद ही
खींच ले लक्ष्मण रेखा
हाशिये के पार
निकल लेने के बाद
सोच कर कि भस्म
वैसे भी कोई नहीं होता
रावण तक जब
नहीं हो सका
हाशियों में धकेलने
के मौके की तलाश में
रहने वालों के लिये
हाशिये माने भी
नहीं रखते हैं
एक जैसे ही रेंगते हुऐ
समझ में आने वाले
समझ लेते हैं रेंगना
एक दूसरे का बहुत
ही आसानी से
बहुत जल्दी और
आनन फानन में
खींच देते हैं एक
काल्पनिक हाशिया
सीधा खड़ा होने की
कोशिश में लगे
हुऐ के लिये और
जब तक समझ पाये
जमीन की हकीकत
खड़े होने की कोशिश
में धकियाये हुआ
हाशिये के पार से
देखता हुआ नजर
आता है खुद को ही
लक्ष्मण भी नहीं
होता है कहीं
रेखाऐं भी दिखती
नहीं हैं बस
महसूस होती हैं
क्या बुरा है ऐसे में
सीख लेना ‘उलूक’
पहले से ही खुद ही
चल कर खड़े हो लेना
हाशिये के पार
खुद खींच कर
खुद के लिये
एक हाशिया।

चित्र साभार: www.slideshare.net

शनिवार, 18 जुलाई 2015

खिंचते नहीं भी हों इशारे खींचने के लिये खींचने जरूरी होते हैं

थोड़े कुछ
गिने चुने
रोज के वही
उसी तरह के
जैसे होते हैं
खाने पीने
के शौकीन
जैसे कहीं किसी
खाने पीने की
जगह ही होते हैं
यहाँ ना ढाबा
ना रोटियों पराठों
का ना दाल मखानी
ना मिली जुली सब्जी
कुछ कच्ची कुछ
पकी पकाई बातें
सोच की अपनी
अपनी किसी की
किताबें कापियाँ
कलम पेंसिल
दवात स्याही
काली हरी लाल
में से कुछ कुछ
थोड़े बहुत
मिलते जुलते
जरूर होते हैं
उम्र के हर पड़ाव
के रंग उनके
इंद्रधनुष में
सात ही नहीं
हमेशा किसी के
कम किसी के
ज्यादा भी होते हैं
दर्द सहते भी हैं
मीठे कभी कभी
नमकीन कभी तीखे
दवा लिखने वाले
सभी तो नहीं होते हैं
बहुत कुछ टपकता है
दिमाग से दिल से
छलकते भी हैं
सबके हिसाब से
सभी के शराब के
जाम हों जरूरी
नहीं होते हैं
कहना अलग
लिखना अलग
पढ़ना अलग
सब कुछ छोड़ कर
कुछ के लिये
किसी के कुछ
इशारे बहुत होते हैं
कुछ आदतन
खींचते हैं फिर
सींचते हैं बातों को
‘उलूक’ की तरह
बेबात के पता
होते हुऐ भी
बातों के पेड़ और
पौंधे नहीं होत हैं ।

चित्र साभार: all-free-download.com

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

मर जाना किसे समझ में आता नहीं है

मर जाने का
मतलब मरने
मरने तक
कैसे समझ में
आ सकता है
मरने का मतलब
कोई बिना मरे
कैसे बता सकता है
मर जाना भी तो
कई तरह का होता है
कोई मरता भी है
और उसे पता भी
नहीं होता है
सापेक्ष मरना
निरपेक्ष मरना
जिंदा मरना
मरा हुआ मरना
बहुत सारे भ्रम
हो ही जाते हैं
मरने मारने पर
आने के मायने
वैसे भी अलग
हो ही जाते हैं
सच का मरना
झूठ का मरना
अलग अलग
बात हो जाती हैं
जिंदा मर जाना
मरा हुआ सा
नजर आना
अलग ही बात
हो जाती है
बे‌ईमान के लिये
एक ईमानदार
मर जाता है
ईमानदार मरे हुऐ
की लाश उठाता है
मरना भी अजीब है
मर जाने के बाद
कोई कैसे बताये
समझ में आता है
या नहीं आता है
सब मरते हैं
मरने से पहले भी
कभी कहीं थोड़ा
कहीं कभी ज्यादा
मरने की बात
कोई भी मरने वाला
किसी भी जिंदा
आदमी को
मगर कभी भी
बताता 
नहीं है । 

चित्र साभार: www.clker.com

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

झगड़े होते होंगे कहीं पर अब सामने से खुलेआम नहीं होते हैं

बिल्लियाँ बंदर
तराजू और रोटी
की कहानी कोई
नई कहानी नहीं है
एक बहुत पुरानी
कहानी है
इतनी पुरानी कहानी
जिसे सुनाते सुनाते
सुनाने वाले सभी
घर के लोग इस समय
घर में बने लकड़ी के
कानस पर रखी हुई
फोटो में सूखे फूलों
की मालाऐं ओढ़े
धूल मिट्टी से भरे
खिसियाये हुऐ से
कब से बैठे हैं
जैसे पूछ रहे हैं
बिल्लियों बंदरों के
झगड़े क्या अब भी
उसी तरह से होते हैं
इस बात से अंजान
कि दीमक चाट चुकी है
कानस की लकड़ी को
और वो सब खुद
लकड़ी के बुरादे
पर चुपचाप बैठे हैं
कौन बताये जाकर
उन्हें ऊपर कहीं कि
बिल्लियाँ और बंदर
अब साथ में ही
दिखाई देते हैं
रोटी और तराजू भी
नजर नहीं आते हैं
तराजू की जरूरत
अब नहीं पड़ती है
उसे ले जाकर दोनों
साथ ही कहीं पर
टाँग कर बैठे हैं
तराजू देखने वाले
सुना है न्याय देते हैं
रोटी के लिये क्यों
और किस लिये
कब तक झगड़ना
इसलिये आटे को ही
दोनो आधा आधा
चुपचाप बांट लेते हैं
बिल्लियों और
बंदरों की नई
कहानियों में अब
ना रोटियाँ होती हैं
ना झगड़े होते हैं
ना तराजू ही होते हैं ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

बुधवार, 15 जुलाई 2015

चलो ऊपर वाले से पेट के बाहर चिपकी कुछ खाली जेबें भी अलग से माँगते हैं

कुछ भी नहीं
खाया जाता है
थोड़े से में पेट
ऊपर कहीं
गले गले तक
भर जाता है
महीने भर
का अनाज
थैलों में नहीं
बोरियों में
भरा आता है
खर्च थोड़ा
सा होता है
ज्यादा बचा
घर पर ही
रह जाता है
एक भरा
हुआ पेट
मगर भर ही
नहीं पाता है
एक नहीं बहुत
सारे भरे पेट
नजर आते हैं
आदतें मगर
नहीं छोड़ती
हैं पीछा
खाना खाने
के बाद भी
दोनो हाथों की
मुट्ठियों में भी
भर भर कर
उठाते हैं
बातों में यही
सब भरे
हुऐ पेट
पेट में भरे
रसों से
सरोबार हो
कर बातों
को गीला
और रसीला
बनाते हैं
नया सुनने
वाले होते हैं
हर साल ही
नये आते हैं
गोपाल के
भजनों को सुन
कल्पनाओं में
खो जाते हैं
सुंदर सपने
देखतें हैं
बात करने
वालों में
उनको कृष्ण
और राम
नजर आते हैं
पुराने मगर
सब जानते हैं
इन सब भरे पेटों
की बातों में भरे
रसीले जहर को
पहचानते हैं
ऊपर वाले से
पूछते भी हैं हमेशा
बनाते समय ऐसे
भरे पेटों के
पेटों के
अगल बगल
दो चार जेबें
बाहर से उनके
कारीगर लोग
अलग से क्यों
नहीं टांगते हैं ।

 चित्र साभार: theinsidepress.com

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

घाव कुरेदने के भी अपने ही मजे होते हैं

सबके होते हैं
अपने दर्द
अपने घावों के
घाव अपने
खुद के कर्मों के
घाव किसी
के दिये हुऐ या
शौक से
पाले हुऐ घाव
चेहरे पर नजर
आते घाव
हल्के से
मुस्कुराते घाव
घाव कुछ
तमीजदार या
फिर एक दो
बदतमीज घाव
लेकिन इन सब
के बावजूद
बहुत घाघ भी
हो सकते हैं घाव
घाव होने के
फायदे भी
आसानी से
उठाये जाते हैं
घाव के बदले में
घाव लिये
भी जाते हैं
घाव देना
आसान होता है
आसानी से दिये
भी जाते हैं घाव
कुछ लोग
घावों के व्यापारी
भी हो जाते हैं
अपनी दुकान
का पता
मगर हमेशा
छुपाते हैं
घाव कुरेदने में
दक्ष होते हैं
घावों को
बहुत दूर से भी
सूँघ ले जाते हैं
घाव कुरेदने से
गुरेज नहीं करते हैं
बातों ही बातों में
बीच में कभी
किसी बात पर
इससे पहले
घाव वाले को
आये कुछ अंदाज
बहुत शराफत
के साथ
मुस्कुराते हुऐ
घाव को आदतन
कुरेद ले जाते हैं ।

चित्र साभार: www.123rf.com

सोमवार, 13 जुलाई 2015

कह दिया सो कह दिया पवित्र है है तो है दिखा मत कह देना कहाँ से दिखायेगा

वो भरा है गंदगी से
और पवित्र भी है
जैसे आज गंगाजल
में गंदगी तो है
फिर भी पवित्र है
गंदगी होने से
कुछ नहीं होता है
इस देश की
विरासत पवित्रता है
सारे गंदगी से
भरे लोग जो
सभी पवित्र हैं
ने आज उसे
प्रमाण पत्र
दे दिया है
पवित्रों में पवित्र
है कह दिया है
मेरे आस पास
भी बहुत सारी
गंदगी है
मैं भी कोशिश
कर रहा हूँ
गंदगी की
आदत डालने की
क्योंकि गंदगी ही
निकालेगी समस्या
का समाधान
मुझे भी गिना
जाने लगेगा
गंदगी में डूबे हुऐ
महानों में से
एक महान
क्योंकि जब तक
गंदगी नहीं
जमा हो पायेगी
पवित्रता कहाँ से
आकर किधर
को जायेगी
जमाने के साथ
चलना चाहता
है ‘उलूक’
तो आज से
और अभी से
शुरु हो जा
इधर उधर
जहाँ दिखे गंदगी
उठा कर ला
जल्दी कर
जल्दी ही गंदगी
सारे देश में
फैल जायेगी
हर किसी को
गंगा की तरह
पवित्र कर
ले जायेगी
तेरे लिये
कुछ भी बचा
नहीं रह पायेगा
कोई भी तेरी
पवित्रता सिद्ध
करने के लिये
तेरा साथ तब
नहीं दे पायेगा ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

रविवार, 12 जुलाई 2015

थोड़े बहुत शब्द होने पर भी अच्छा लिखा जाता है

अब कैसे
समझाया जाये
एक थोड़ा सा
कम पढ़ा लिखा
जब लिखना ही
शुरु हो जाये
अच्छा है
युद्ध का मैदान
नहीं है वर्ना
हथियारों की
कमी हो जाये
मरने जीने की
बात भी यहाँ
नहीं होती है
छीलने काटने
को घास भी
नहीं होती है
लेकिन दिखता है
समझ में आता है
अपने अपने
हथियार हर
कोई चलाता है
घाव नहीं दिखता
है कहीं किसी
के लगा हुआ
लाल रंग का
खून भी निकल
कर नहीं
आता है
पर कोशिश
करना कोई
नहीं छोड़ता है
घड़ा फोड़ने
के लिये कुर्सी
दौड़ में जैसे
एक भागीदार
आँख में पट्टी
बाँध कर
दौड़ता है
निकल नहीं
पाता है
खोल से अपने
उतार नहीं
पाता है
ढोंग के कपड़े
कितना ही
छिपाता है
पढ़ा लिखा
अपने शब्दों
के भंडार के
साथ पीछे
रह जाता है
कम पढ़ा लिखा
थोड़े शब्दों में
समझा जाता है
जो वास्तविक
जीवन में
जैसा होता है
लिखने लिखाने
से भी कुछ
नहीं होता है
जैसा वहाँ होता है
वैसा ही यहाँ आ
कर भी रह जाता है
‘उलूक’ ठीक है
चलाता चल
कौन देख रहा है
कोई अपनी नाव
रेत में रखे रखे ही
चप्पू चलाता है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 11 जुलाई 2015

जो है वो कौन कहता है जो नहीं है कहते सभी हैं

शर्म लिख
रहा हो कोई
जरूरत पड़
जाती है
सोचने की
बेशर्मी लिखना
शुरु कर ही
जाये कोई
कहाँ कमी है
आज क्या लिखें
क्या ना लिखें
लिखें भी कि
कुछ नहीं
ही लिखें
उन्हें सोचना है
जिन्हें कहना
कुछ नहीं है
कहने वाले
को पता है
जानता है वो
बिना कुछ कहे
रहना ही नहीं है
कविता कहानी
लेख आलेख
दस्तावेज और
भी बहुत
कुछ है
हथियार है
शौक है
आदत है
लत है
सहने की
सीमा से
बाहर बहना
कुछ नहीं है
लिखने लिखाने
की बातें
हाथों से कागज
तक का सफर
सबके बस का
भी नहीं है
उतार लेना
दिल और
दिमाग लाकर
दिखे दूसरे को
सामने से
कटा हुआ
जैसे एक सर
बहते हुऐ
कुछ खून
के साथ कुछ
कहीं सोच में
आने तक ही
होना ऐसा
कुछ भी
कभी भी
कहीं भी
नहीं है ।

चित्र साभार:
www.cliparthut.com

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

कविता को टेढ़ा मेढ़ा नहीं सीधे सीधे सीधा लिखा जाता है

मन करता है
किसी समय
एक सादे सफेद
पन्ने पर खींच
दी जायें कुछ
आड़ी तिरछी रेखायें
फिर बनाये जायें
कुछ नियम
उन आड़ी तिरछी
रेखाओं के आड़े पन
और तिरछे पन के लिये
जिससे आसान हो जाये
समझना किसी भी
आड़े और तिरछे को
कहीं से भी कभी भी
सीधे खड़े होकर
बहुत कुछ बहुत
सीधा सीधा
दिखता है
मगर बहुत ही
टेढ़ा होता है
बहुत कुछ टेढ़ा
दिखता है
टेढ़ा दिखाता है
जिसको सीधा
करने के चक्कर
में सीधा करने वाला
खुद ही टेढ़ा हो जाता है
टेढ़े होने ना होने
का कहीं कोई
नियम कानून भी
नजर नहीं आता है
ऐसा भी नहीं होता है
टेढ़ा हो जाने के
कारण कोई टेढ़ी
सजा भी पाता है
नियम कानून
व्यवस्था के सवाल
अपनी जगह
पर होते हैं
लेकिन सीधा
सीधा है का
पता टेढ़ों के साथ
रहने उठने बैठने
के साथ ही पता
चल पाता है
‘उलूक’ लिखने दे
सब को उन के
अपने अपने नियमों
के हिसाब से
सीधा होने की
कतई जरूरत नहीं है
कुछ चीजें टेढ़ी ही
अच्छी लगती हैं
उन्हें टेढा‌ ही
रहने दिया जाता है
क्यों झल्लाता है
अगर तेरे लिखे को
किसी से भूल वश
कविता है कह
दिया जाता है ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

इधर उधर का इधर उधर रहने दे इधर ला ला कर रोज रोज ना चिपका

कई बार आता है
खुद की सोच के
किसी कोने में
खुद से ही कहने
रहने दे छोड़
भी दे अब
उस सब पर लिखना
जो सुनाई दे रहा है
जो दिखाई दे रहा है
बहुत हो गया
कुछ अपनी खुद
की सोच का कुछ
ताजा नया लिख
दिमाग भी तो
सोच जरा
बहुत बड़ा भी
नहीं होता है
जितना कुछ भी
आस पास खुद ही
के हो रहा होता है
उसका लेखा जोखा
सँभालते सँभालते
खुद के अंदर का ही
सब अपना ही तो कूड़ा
कूड़ा हो रहा होता है
कुछ देर के लिये
ही सही मान भी जा
सोच में अपनी ही
कृष्ण हो जा
मोर ना सही
कौऐ के पंख की
कलगी सिर पर लगा
पाँचजन्य नहीं भी
बजा सके तो एक
कनिस्तर ही बजा
इससे पहले बंद
कर दे कोई मुँह
और
बाँध दे हाथों को
कर ले कुछ उछल कूद
मुहल्ले की किसी
खाली गली में जाकर
देर रात ही सही
जोर जोर से चिल्ला
दूसरों के बेसुरे गीतों
पर नाचना बंद कर
कुछ अपना खुद का
उट पटाँग सुर
में ही सही
अपने ही सुर से
मिला कर अपना
खुद का कुछ गा
सोच में आने दे
अपनी सोच
इधर उधर की
खोदना छोड़
कुछ तो
ओरीजिनल सोच
ओरीजिनल लिख
ओरीजिनल सुना
इसकी उसकी
इसको उसको
ही करने दे
सब पका ही
रहे हैं ‘उलूक’
तू भी मत पका
सोच में आ रहे
ओरीजिनल को
निकल आने दे
उसके बारे में
थोड़ा ही सही
कुछ तो बता
इधर उधर का
इधर उधर रहने दे
इधर ला ला कर
रोज रोज ना चिपका ।

चित्र साभार: abkldesigns.com

बुधवार, 8 जुलाई 2015

कुछ कुछ पर लिखना चाहो कुछ लिखने वाले बहुत कुछ लिख ले जाते हैं

माने निकाले
तो कोई
कैसे निकाले
कुछ के कुछ भी
माने नहीं होते हैं
कुछ के कुछ
माने होने जरूरी
भी नहीं होते हैं
बहुत से लोग
बहुत कुछ
लिखते हैं
बहुत से लोग
कुछ कुछ
लिखते हैं
कुछ लोग
बहुत कुछ
पढ़ते हैं
कुछ लोग
कुछ कुछ
ही पढ़ते हैं
इतना कुछ है
यहाँ देखिये
लिखने वाला
अटक रहा है
भी तो कहाँ
कुछ पर या
कुछ कुछ पर
अब एक कुछ का
कुछ माने होना
और कुछ के साथ
एक कुछ और
लगा देने से
माने बदल जाना
कुछ कुछ का
कुछ हो जाना
कुछ लोग कुछ
पर ही लिखते हैं
कुछ लोग कुछ
कुछ पर ही
लिखते हैं
कितनी मजेदार
है ना ये बात
कुछ लोग कुछ
लोगों को ही
पढ़ना चाहते हैं
कुछ लोग सब
लोगों को पढ़ना
चाह कर भी
नहीं पढ़ पाते हैं
अब क्या
क्या लिखेंगे
कितना लिखेंगे
कुछ पर कुछ
लिखना चाह
कर भी कुछ लोग
कुछ भी नहीं
लिख पाते हैं
‘उलूक’ तेरा कुछ भी
नहीं हो सकता है
लोग बहुत कुछ
करना चाहते हैं
कुछ लोगों की
नजरे इनायत है
कुछ लोग कुछ
करना चाहकर भी
कुछ नहीं कर पाते हैं ।

चित्र साभार: www.boostsolutions.com

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

गणित लगाकर लिखने से एक लिखा एक ही माना बतायेगा

लिखने का गणित
सीख कर लिख
उसके बाद कुछ
भी जोड़ घटाना
गुणा भाग लिख
देख दो और दो
चार ही हो पायेगा
गणितज्ञ लेखक
जो भी लिखेगा
लिखा हुआ
अपने आप ही
सीधे पाठक तक
सवालों के जवाब
की तरह लिखे
लिखाये को
पहुँचायेगा
चार का तीन
या पाँच बनाना
भी कोई चाहेगा
तब भी नहीं
बना पायेगा
अर्थ लिखने और
पढ़ने के बीच का
समझने समझाने
में नहीं गड़बड़ायेगा
साफ साफ लिखा हुआ
साफ साफ पढ़ा जायेगा
खाना भी चाहेगा
कोई समझा कर
बीच में कुछ
अपने हिसाब का
बिना गणित सीखे
नहीं कर पायेगा
लिखे लिखाये में
वैसे भी कोई
खाने पीने का
जुगाड़ नही
समझ में आ गई
बात पर कोई भी
कमीशन नहीं
बना पायेगा
मुश्किल होगा
करना कोई घोटाला
एक बात का
एक ही मतलब
निकल कर आयेगा
दुखी क्यों होते हो
मित्र लिखो मन से
कितने ही गीत
माना वही निकलेगा
जो लिखने वाले से
दिल से लिखा जायेगा
‘उलूक’ नहीं पढ़ सका
गणित ये अलग बात है
कोई हिसाब किताब
खुश रहो बेफिकर रहो
अपना नहीं लगायेगा ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

सोमवार, 6 जुलाई 2015

सवाल मत उठाओ मान भी जाओ सब कुछ तो ठीक है

सवाल मत
उठाओ
मान भी जाओ
सब कुछ
तो ठीक है
नाटक भी
दिखाओ
दर्शक भी
बढ़ाओ
पर्दे के
पीछे करो
देखने भी
मत जाओ
सब कुछ
तो ठीक है
सड़क पर
मत आओ
किनारे से
निकल जाओ
सब कुछ
तो ठीक है
आने की
जाने की
इधर की
उधर की
खबरें भी
फैलाओ
सब कुछ
तो ठीक है
बहस भी
चलाओ
दूर से भी
दिखाओ
दर्शन भी
कराओ
कुछ मत
छिपाओ
सब कुछ
तो ठीक है
घोटाले भी
खुलवाओ
खुले बंद
करवाओ
जाँच करने
कराने की
मशीने भी
 मंगवाओ
उसने पूछना
बंद तो
कर दिया
तुम भी
किसी से
पूछने
ना जाओ
मान भी जाओ
पंगे ना उठाओ
वो भी चुप
हो गया है
तुम भी चुप
हो जाओ
सब कुछ
तो ठीक है ।

चित्र साभार: www.gograph.com

रविवार, 5 जुलाई 2015

कागज कलम और दवात हर जगह नहीं पाया जाता है

लिखा जाये
फिर
कुछ
खुशबू
डाल कर
महकाया
जाये

किसलिये
और क्यों
लिखा जाये
उसके जैसा
जिसके लिखे
में से 
खुशबू 
भी आती है

लिखे में
से
खुशबू  ?

अब आप
को भी
लग
रहा होगा

लिखने वाला
ही है
रोज का

आज शायद
ज्यादा ही
कुछ सनक
गया होगा

सनक तो
होती ही है
किसी को
कम होती है
किसी को
ज्यादा
होती है

कोई
आसानी से
मान लेता है
पूछते ही
क्या
सनकी हो
तुरंत ही
अपने दोनो
हाथ खड़े
कर लेता है

कोई ज्यादा
सनक जाता है
सनक ही
सनक में
ये भी
भूल जाता है
कि है
कि नहीं है

किसी के
पूछते ही
सनकी हो
कि नहीं हो
भड़भड़ा कर
भड़क जाता है

असली
लेखक
और
लेखक
हो रहे
लेखक का
थोड़ा सा
अंतर इसी
जगह पर
नहीं लिखने
पढ़ने वाला
बस
एक प्रश्न
बिना बंदूक
के दाग कर
पता कर
ले जाता है

होता
वैसे कुछ
नुकसान
जैसा
किसी को
कहीं देखा
नहीं जाता है

पूछने वाला
मुस्कुरा कर
पीछे लौट
जाता है

सनकी
अपनी
सनक
के साथ
व्यवस्था
में पुरानी
अपनी ही
बनी बनाई
में लगने
लगाने में
फिर से
लग
जाता है

यही
कारण है
कागज
कलम
और
दवात
हर जगह
नहीं पाया
जाता है ।

चित्र साभार: www.unwinnable.com

शनिवार, 4 जुलाई 2015

पीछे का पीछे ही ठीक है आगे देखने वाले ही आगे जाते हैं

लौट कर
देखने की चाह
अपने ही बनाये
हुऐ शब्दों के
रास्ते पर
बस एक चाह
ही रह जाती है
लौटा जाता नहीं है
पीछे से शब्दों की
एक बहुत ही लम्बी
सी कतार रह जाती है
मुड़ कर देखना भी
आसान नहीं होता है
गरदन अपनी नहीं
अपने ही लिखे
शब्दों की टेढ़ी
होती सी
नजर आती है
चलना शुरु करती
है जिंदगी भी
अपने खुद के
ही पैरों पर
हमेशा ही आगे
की ओर ही
पीछे देखने की
सोचने सोचने तक
पूरी हो जाती है
बहुत कुछ चलता है
साथ में शब्दों के
बनते बिगड़ते
रास्तों में
अपने बहुत कम
ही रह पाते है
अपने जैसों को
छाँटते हुऐ
साथ बदलते
बदलते शब्द भी
रास्ते बदलते
चले जाते हैं
कैसे लौटे कोई
देखने के लिये
अपने ही ढूँढे हुऐ
शब्दों के पिटारों में
दीमक जिंदगी के
किसने देखें हैं
क्या पता शब्दों को
चाटते हुऐ ही
साथ में चलते
चले जाते हैं
मिटता हुआ
चलता है समय भी
दिखता कुछ
भी नहीं है
हम भी तुम भी
और सभी
धुंधले होते ही
चले जाते हैं
आगे के शब्दों पर
नजर रहना ही
ठीक लगता है
पीछे लिखे हुऐ
महसूस कराते हैं
जैसे कुछ खींचते हैं
कुछ खींच कर गिराते हैं ।

चित्र साभार: imageenvision.com

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

लिखना कुछ कुछ दिखने के इंतजार के बाद कुछ पूरा कुछ आधा आधा

अपना कुछ लिखा होता
कभी अपनी सोच से
उतार कर किसी
कागज पर जमीन पर
दीवार पर या कहीं भी
तो पता भी रहता
क्या लिखा जायेगा
किसी दिन की सुबह
दोपहर में या शाम
के समय चढ़ती धूप
उतरते सूरज
निकलते चाँद तारे
अंधेरे अंधेरे के समय
के सामने से होते हैं
सजीव ऐसे जैसे को
बहुत से लोग
उतार देते हैं हूबहू
दिखता है लिखा हुआ
किसी के एक चेहरे
का अक्स आईने के
पार से देखता हो
जैसे खुद को ही
कोशिश नहीं की
कभी उस नजरिये
से देखने की
दिखे कुछ ऐसा
लिखे कोई वैसा ही
आदत खराब हो
देखने की
इंतजार हो होने के
कुछ अपने आस पास
अच्छा कम बुरा ज्यादा
उतरता है वही उसी तरह
जैसे निकाल कर
रोज लाता हो गंदला
मिट्टी से सना भूरा
काला सा जल
बोतल में अपारदर्शी
चिपका कर बाहर से
एक सुंदर कागज में
सजा कर लिख कर
गंगाजल ताजा ताजा ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

सारे पढे‌ लिखे लिखते हैं कविता और कवि भी होते हैं

टेढ़ा मेढ़ा
लिखा हुआ
हो कहीं पर
जिसका कोई
मतलब नहीं
निकल रहा हो


जरूरी नहीं
होता है
कि वो एक
कवि का
लिखा हुआ
लिखा हो

जिसे कविता
कहना शुरु
कर दिया
जाये और
तुरन्त ही
कुछ लोग
दूसरे लिखने
पढ़ने वाले
करने लगें
चीर फाड़

जैसे गलत
तरीके
से मर गये
या
मार दिये
गये जानवर
या
आदमी को
खोल कर
देखा जाता है
मरने के बाद

जिसे कहा
जाता है
हिंदी में
शव परीक्षा

इसलिये यहाँ
पोस्ट मोर्टम
कहना उचित
प्रतीत होता है

चलन में है
और
पढ़ा लिखा
वैसे भी
हिंदी में
कहे गये को
कम ही
समझता है

अब ‘उलूक’
क्या जाने
ये भी कवि है
और
वो भी कवि है

सब कविता
लिखते हैं
अपनी अपनी
इसमें दोष
किसका है

उसका
जो कवि है
या उसका
जिसको
आदत है

वो मजबूरी
में किसी
रोज कुछ
ना कुछ
जो लिख
मारता है

कभी
कुत्ते पर
कभी
चूहे पर
और कभी
उसी तरह के
किसी
जानवर पर
जिसके
नसीब में
कुर्सी लिखी
होती है

लेकिन इन
सब में
एक बात
अटल सत्य है

टेढ़ा मेढ़ा
लिखने वाला
गलती से
लिखना पढ़ना
सीख भी
गया हो
कभी झूठ
नहीं बोलता है

उससे
कभी नहीं
कहा जाता
है कि
उसका
किसी कवि
से ही
ना ही किसी
कविता से ही

भगवान
कसम
कहीं कोई
रिश्ता
होता है

सब कवि
होते हैं
जो कविता
करते हैं

सबसे बड़े
बेवकूफ
तो वही
होते हैं  ।

चित्र साभार: www.stmatthiaschool.org

बुधवार, 1 जुलाई 2015

किसको क्या लगता है लगता होगा लगता रहे सोचने से अच्छा है कर लेना

अच्छा होता है
कुछ लिख लिखा
कर बंद कर देना
किताब के
पन्नों को
हो सके तो
चिपका देना
या सिल लेना
सुई तागे से
चारों तरफ से
ताकि खुलें
नहीं पन्ने
शब्दों को हवा
पानी लगना
अच्छा नहीं होता
बरसात में वैसे भी
नमी ज्यादा
होने से सील
जाती हैं चीजें
खत्म हो जाता
है शब्दों का
कुरकुरापन
गीले भीगे हुऐ
शब्द गीले
कागजों से
चिपके हुऐ
आकर्षित नहीं
करते किसी को
क्या देखने
क्या समझने
किसी के लिखे
हुऐ शब्द
शब्द तो
शब्द होते हैं
शब्दकोष में
बहुत होते हैं
इसके शब्द इसके
उसके शब्द उसके
करता रहे कोई
अपने हिसाब से
आगे पीछे
बनाता रहे
आँगन मकान
चिड़िया तूफान
दूसरों के शब्दों
से बनी इमारत
देख कर रहना
वैसे भी सीखा
नहीं जाता
अपने अपने मकान
खुद ही बनाना
खुद उसमें रहना
खुद सजाना
सँवारना अच्छा है
सबकी अपनी
किताब अपने ही
गोंद से चिपकी हुई
अपने पास ही
रहनी चाहिये
खुले पन्ने हवा में
फड़फड़ाते आवाज
करते हुऐ अच्छे
नहीं समझे जाते हैं
ऐसा पढ़ाया तो
नहीं गया है यहाँ
इस जगह पर
पर ऐसा ही जैसा
कुछ महसूस होता है
सही है या गलत
पता नहीं है अभी
पहली बार ही कहा है
किसी और को भी
ऐसा लगता है
चिपकी किताबों के
चिपके पन्नों को
गिनता भी तो
कोई नहीं है यहाँ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

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