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मंगलवार, 30 जून 2015

सही सही है या गलत सही है पिताजी भी ना जाने किसको सिखा गये

पिता जी सब
गलत सलत
ही सिखा गये
पता नहीं क्या
क्या उल्टा
क्या क्या
सीधा बता गये
कुछ भी तो नहीं
होता यहाँ
उनका जैसा
सिखाया हुआ
कहते रह गये
जिंदगी भर
उनके पिता जी
भी उनको ऐसा
ही कुछ सुना गये
बच्चो मेरे तुमको
भी वही सब सिखाने
की कोशिश में
पाँव के घुटने मेरे
खुद के अपने
हाथों में घूम फिर
उल्टे होकर वापस
अपनी जगह
पर आ गये
कल पता है मुझे
मेरे बाद तुम्हें भी
वही महसूस होना है
हर पिता को अपनी
संतानों से शायद
यही सब कहना है
कुछ लोग कुछ बातें
इसी तरह की फालतू
यहाँ वहाँ सब ही
जगह पर फैला गये
कुछ किताबों में
लिख गये कुछ
घर में कुछ
अड़ोस पड़ोस में
अपने ही घर
मोहल्ले में
फुसफुसा गये
बस क्या नहीं
कहा किसी ने भी
किसी से कभी भी
उल्टा करना होता है
दिशा को हमेशा
गर कोई बताये
सारे के सारे
लोग अच्छे इस
दुनियाँ के मर खप
के यहाँ से उधर
और वहाँ गये
उल्टा होता है सीधा
सीधे को उल्टा
करना ही पता नहीं
क्यों पिता जी लोग
संतानों को बस
अपनी नहीं सिखा गये
हर चीज दिखती है
अपने आस पास
की आज उल्टी
कैसे पूछा जाये
किसी से उनके
पिता जी को
उनके पिता जी
सीधा सिखा गये
या उल्टा सिखा गये ।
चित्र साभार: www.clipartof.com

सोमवार, 29 जून 2015

चोर की देश भक्ति से भाई कौन परेशान होता है

चोर हो तो 
होने से भी
क्या होता है
देश भक्ति
की पाँत में

तो सबसे आगे 

ही खड़ा होता है 

देश भक्ति अलग
एक बात होती है
चोरी करने के
साथ और नहीं
करने के भी
साथ होती है
एक देश भक्त
पूरा ही पर खाली
भगत होता है
एक देश भक्त
होने के साथ साथ
चोर भी छोटा सा
या बहुत बड़ा
भी कोई होता है
समझना देश को
फिर भक्ति को
चोरी चकारी के
साथ होना गजब
और बहुत ही
गजब होता है
संविधान उदार
देश का बहुत ही
उदार होता है
चोर जेल में रहे
या ना रहे
देश का भगत
होने से कुछ भी
कहीं भी कुछ
कम नहीं होता है
क्यों नहीं समझता
है कोई कितना ढेर
सारा काम होता है
सुबह से लेकर
शाम तक कहाँ
आराम होता है
देशभक्ति के
साथ साथ चोरी
चकारी भी कर
ले जाना बस में
सबके नहीं होता है
‘उलूक’ शर्म होनी
चाहिये उसे जो
ना भगत होता है
ना चोर होता है
खाली रोज जिस
नक्कारे के हाथ में
दूसरों को चाटने
के वास्ते काला
रंग भरा हुआ बस
एक कलम होता है
ऐसे ही कुछ देश
भक्तों की खाली
भक्ति के कारण
ही सारा देश
बदनाम होता है ।

चित्र साभार: anmolvachan.in

रविवार, 28 जून 2015

नहीं भी हुआ हो तब भी हो गया है हो गया है कह देने से कुछ नहीं होता है

बहुत सारे लोग
कह रहे होते हैं
एक बार नहीं
बार बार
कह रहे होते हैं
तो बीच में
अपनी तरफ से
कुछ भी कहना
नहीं होता है
जो भी कहा
जा रहा होता है
नहीं भी समझ में
आ रहा होता है
तो भी समझ में
अच्छी तरह से
आ रहा है ही
कहना होता है
मान लेना होता है
हर उस बात को
जिसको पढ़ा
लिखा तबका
बिना पढ़े लिखे
को साथ में लेकर
मिलकर जोर शोर
से हर जगह
गली कूँचे
ऊपर से नीचे
जहाँ देखो वहाँ
कह रहा होता है
नहीं भी दिख
रहा होता है
कहीं पर भी
कुछ भी उस
तरह का जिस
तरह होने का
शोर हर तरफ
हो रहा होता है
आने वाला है
कहा गया होता है
कभी भी पहले
कभी को
आ गया है
मान कर
जोर शोर से
आगे को बढ़ाने
के लिये अपने
आगे वाले को
बिना समझे
समझ कर
मान कर उसके
आगे वाले से
कहने कहाने
के लिये बस कह
देना होता है।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शनिवार, 27 जून 2015

मौन की भाषा को बस समझना होता है किसी की मछलियों से कुछ कहना नहीं होता है

बोलते बोलते बोलती
बंद हो जाती है जब
किसी की अपनी ही
पाली पोसी मछलियाँ
तैरना छोड़ कर
पेड़ पर चढ़ना
शुरु हो जाती हैं
वाकई बहुत
मुश्किल होता है
घर का माहौल
घर वालों को
ही पता होता है
जरूरी नहीं
हर घर में किसी
ना किसी को कुछ
ना कुछ लिखना
भी होता है
हर किसी का
लिखा हर कोई
पढ़ने की कोशिश
करे ऐसा भी
जरूरी नहीं होता है
संजीदा होते हैं
बहुत से लोग
संजीदगी ओढ़ लेने
का शौक भी होता है
और बहुत ही
संजीदगी से होता है
मौन रहने का
मतलब वही नहीं
होता है जैसा
मौन देखने वाले
को महसूस होता है
मछलियाँ एक ही
की पाली हुई हों
ऐसा भी नहीं होता है
एक की मछलियों
के साथ मगरमच्छ
भी सोता है
पानी में रहें या
हवा में उड़े
पालने वाला उनके
आने जाने पर
कुछ नहीं कहता है
जानता है मौन रखने
का अपना अलग
फायदा होता है
लंबी पारी खेले हुऐ
मौनी के मौन पर
बहुत कह लेने से
कुछ नहीं होता है
कहते कहते खुद
अपनी मछलियों को
आसमान की ओर
उछलते देख कर
बहुत बोलने वाला
बहुत संजीदगी के साथ
मौन हो लेता है
बोलने वाले के साथ
कुछ भी बोल देने वालों
के लिये भी ये एक
अच्छा मौका होता है
ग्रंथों में बताया गया है
सारा संसार ही एक
मंदिर होता है
कर्म पूजा होती है
पूजा पाठ करते समय
वैसे भी किसी को
किसी से कुछ नहीं
कहना होता है
मछलियाँ तो
मछलियाँ होती हैं
उनका करना
करना नहीं होता है ।

चित्र साभार: all-free-download.com

शुक्रवार, 26 जून 2015

जय हो जय हो जय हो

सब की जय हो
एक हजारवीं
पोस्ट है
जय जय हो
दोस्तों की
जय हो
दुश्मनों की
जय हो
मोदी की
जय हो
केजरीवाल की
जय हो
इंदिरा गाँधी
के साथ
गाँधी की
जय हो
दोस्तों की
जय हो
दुश्मनों की
जय हो
चोरों की
जय हो
पुलिस वालों की
जय हो
रिश्तों की
जय हो
कुत्तों की
जय हो
सब की
जय हो
सोचने वालों की
जय हो
गरीबों की
जय हो
अमीरों की
जय हो
जो हो रहा है
उसकी
जय हो
जो नहीं हो रहा है
उसकी भी
जय हो
राम की
जय हो
हनुमान की
जय हो
हिंदू की
जय हो
मुसलमान की
जय हो
ईमानदार की
जय हो
बेईमान की
जय हो
सबकी
जय हो
देखने में
जो भी दिखे
जो नहीं दिखे
कोई कुछ कहे
उसकी भी
जय हो
जय जय की
जय हो
झूठ की
जय हो
सबसे बड़ी
 जय हो
सच मुँह की खाये
उसकी भी
जय हो
होना सब उसके
हिसाब से है
जो मेरा
हिसाब नहीं है
‘उलूक’ की
जय हो
जय हो जय हो
आप आये
आपने पढ़ दिया
आपकी भी
जय  हो ।

चित्र साभर: www.clker.com

गुरुवार, 25 जून 2015

इकाई दहाई नहीं सैकड़े का अंतिम पन्ना

कुछ जग बीती हो
या कुछ आप बीती
यहाँ सब बराबर होता है
ये भी एक मिसाल है 
 :)


कभी किसी समय
सब कुछ छोड़ कर
अपनी खुद की एक
बात कह देने में
कोई बुराई नहीं है
बाकी बातें
अपनी जगह हैं
ये भी सही है
कोई सुनता नहीं है
ना किसी को कोई
फर्क पड़ता है
किसी के
कहते रहने से
अपना सब कुछ
समेटते समेटते
इधर उधर के कुछ
कुछ उलझे उलझते
किसी और के
कटोरों में बटेरे हुऐ
तुड़े मुड़े कागजों की
सलवटों को सीधा
करते चले जाने से
ना ही सलवटे‌
सीधी होती हैं
ना ही कागज के
दर्द ही कम होते हैं
उधर की दुनियाँ में
उसके सच्चे होने
का भ्रम ही
तो होता है
इधर तो सभी
कुछ भ्रम है
भूलभुलइया
की गलियों
में बने हुऐ रास्तों
के निशान जिन्हें
कोई भी आने
जाने वाला
देखने समझने
की कोशिश
नहीं करता है
फिर भी भीड़
आ भी रही है
और जा भी रही है
ऐसे में सब कुछ
सबका लिख
दिया जाये
या कभी अपनी
किताब का
एक कोरा पन्ना
खोल के रख
दिया जाये
एक ही बात है
उसपर सबकुछ
लिख दिये गये और
खुद पर कुछ नहीं
लिखे गये दोनो
एक ही बात हैं
उनके लिये जिन्हे
गलियाँ पसंद हैं
निशान लगी
दीवारें नहीं ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

बुधवार, 24 जून 2015

क्या नहीं होता है होने के लिये यहाँ होता हुआ

क्या क्या लिख
दिया जाये
क्या नहीं
लिखा जाये
बहुत कुछ
दौड़ता है
जिस समय
उलझता हुआ
रगों में खून के
साथ लाल रंग से
अलग तैरता हुआ
बिना घुले कुछ
कहीं अटकता हुआ
टकराता गिरता पड़ता
पकड़ने की कोशिश में
हाथ से ही खुद के
जैसे फिसलता हुआ
क्या क्या दिखता
है सामने से
लिखने के लिये
नहीं होने वाला
जैसा होता हुआ
उठा कर ले गया हो
जैसे कोई किसी
का दिल बताकर
उसे रखने के लिये
कहीं दिखाने के लिये
रखा गया हो रास्ते में
यूँ ही कहीं रखने के
लिये ही जैसे रखा हुआ
देखता हुआ निकलता है
दिल वाला अपने ही दिल
को देखते हुऐ बस
बगल से उसके
आदमी के दिल
या दिल किसी
औरत का होने
ना होने की उधेड़बुन
में लिखने लिखाने
की कुछ सोचता हुआ ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

मंगलवार, 23 जून 2015

परिवर्तन दूर बहुत दूर से बस दिखाना जरूरी होता है

बहुत साफ समझ में
आना शुरु होता है
जब आना शुरु होता है
बात बदल देने के लिये
शुरु होती है बहुत
जोर शोर से सब कुछ
जड़ से लेकर शिखर तक
पेड़ ऐसा मगर कहीं
लगाना नहीं होता है
बात जंगल जंगल
लगाने की होती है
बात जंगल जंगल
फैलाने की होती है
जंगल की तरफ
मगर किसी को
जाना नहीं होता है
परिवर्तन परिवर्तन
सुनते सुनते उम्र
गुजर जाने को होती है
परिवर्तन की बातों में
करना होता है परिवर्तन
समय के हिसाब से
परिवर्तन लिखना होता है
परिवर्तन बताना होता है
परिवर्तन लाने का तरीका
नया सिखाना होता है
इस सब के बीच बहुत
बारीकी से देखना
समझना होता है
परिवर्तन हो ना जाये
अपने अपने हिसाब
किताब के पुराने
बहीखातों में इसलिये
इतना ध्यान जरूरी
रखना होता है
इसका उसका
दोस्त का दुश्मन का
साथ रखना होता है
गलती से ना आ पाये
परिवर्तन भूले भटके
गली के किनारों से भी
कहीं ऐसे किसी रास्ते को
भूल कर भी जगह पर
छोड़िये जनाब ‘उलूक’
कागज में बने नक्शों
में तक लाना नहीं होता है ।

चित्र साभार: jobclipart.com

सोमवार, 22 जून 2015

वाशिंगटन से चली है खबर ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ ने की है कवर

झूठ बोलने वाले
होते हैं दिमाग के तेज
‘दैनिक हिन्दुस्तान’ का
सबसे पीछे का है पेज
बच्चों पर शोघ कर
खबर बनाई गई है
दूर की एक कौड़ी जैसे
मुट्ठी खोल के बहुत
पास से दिखाई गई है
शोध करने वाले
बेवकूफ नजर आते हैं
बच्चे भी कभी कोई
बात सच बताते हैं
यही शोध कुछ बड़ों
पर भी होना चाहिये
बिना पढ़े और पढ़े
लिखों पर होना चाहिये
सारा सच खुल कर
सामने आ जायेगा
पढ़ा लिखा पक्का
बाजी मार ले जायेगा
वाशिंगटन महंगी जगह है
डालर बेकार में रुलायेगा
दिल्ली में रुपिया सस्ता है
सस्ते में काम हो जायेगा
शोघ करने की
जरूरत नहीं पड़ेगी
निष्कर्ष पहले
मिल जायेगा
सबको पता है
सब जानते है
झूठ जहाँ सच
कहलाता है
सच को झूठा
कहा जायेगा
झूठ बड़े अक्षर में
पहले पन्ने में
सच छोटे शब्दों में
पीछे के पन्ने में
मुँह अपना छुपायेगा
संविधान है और विधान है
मुहर लगा सच की माथे पर
अपने जैसों के कांधे पर
सच की अर्थी उठायेगा
कंधा देने उमड़ पड़ेगा
एक एक सच्चा
बच्चा बच्चा
सच्चे दिमाग का
कच्चे झूठ का परचम
चारों दिशा में फहरायेगा
जय जय होगी बस जय होगी
‘उलूक’ बिना दिमाग
झूठ देख कर सच है सच है
यही सच है यही सच है
गली में जाकर अपने घर की
जोर जोर से चिल्लायेगा
सच बोलने वालों के
दिमाग में नहीं होते हैं पेंच
अपने आप बिना शोध
सिद्ध हो जायेगा ।

चित्र साभार: wallpaper.mohoboroto.com

रविवार, 21 जून 2015

नाटक कर पर्दे में उछाल खुद ही बजा अपने ही गाल

कुछ भी संभव
हो सकता  है
ऐसा कभी कभी
महसूस होता है
जब दिखता है
नाटक करने वालों
और दर्शकों के
बीच में कोई भी
पर्दा ना उठाने
के लिये होता है
ना ही गिराने
के लिये होता है
नाटक करने वाले
के पास बहुत सी
शर्म होती है
दर्शक सामने वाला
पूरा बेशर्म होता है
नाटक करने भी
नहीं जाता है
बस दूर से खड़ा खड़ा
देख रहा होता है
वैसे तो पूरी दुनियाँ ही
एक नौटंकी होती है
नाटक करने कराने
के लिये ही बनी होती है
लिखने लिखाने
करने कराने वाला
ऊपर कहीं बैठा होता है
नाटक कम्पनी का
लेकिन अपना ही
ठेका होता है
ठेकेदार के नीचे
किटकिनदार होते हैं
किटकिनदार
करने कराने
के लिये पूरा ही
जिम्मेदार होते हैं
‘उलूक’ कानी आँखों से
रात के अंधेरे से पहले के
धुंधलके में रोशनी
समेट रहा होता है
दर्शकों में से कुछ
बेवकूफों को नाटक
के बीच में कूदते हुऐ
देख रहा होता है
कम्पनी के नाटककार
खिलखिला रहे होते हैं
अपने लिये खुद ही
तालियाँ बजा रहे होते हैं
बाकी फालतू के दर्शकों
के बीच से पहुँच गये
नाटक में भाग लेने
गये हुऐ नाटक
कर रहे होते हैं
साथ में मुफ्त में
गालियाँ खा
रहे होते हैं
गाल बजाने वाले
अपने गाल खुद ही
बजा रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.india-forums.com

शनिवार, 20 जून 2015

बता भी दे करेगा या नहीं अखबार में नहीं छापा जायेगा

सब करने वाले हैं
क्या तेरा भी
करने का इरादा है
बहुत काम की
चीज होती है
करने में फायदा
ही फायदा है
नहीं करेगा
नुकसान में रहेगा
पता चल गया उसे
नहीं किया करके
किसी और बात
में परेशान करेगा
कर क्यों नहीं लेता
कर ले सारा संसार
ही करने वाला है
बाहर नहीं करने
की इच्छा है
कोई बात नहीं
कोई कोई तो
आकाश में
हवाई जहाज में
तक करने वाला है
समुद्र में पानी के
जहाजों में भी
किया जायेगा
जमीन आसमान
में तो होगा ही होगा
कोई घुस पाया
जमीन के अंदर
तो पाताल में
तक किया जायेगा
अभी ये करने की
बात हो रही है
इसके बाद फिर
वो करने के लिये
भी कहा जायेगा
आज कर लेगा
तभी प्रमाण पत्र
भी दिया जायेगा
नहीं करेगा ‘उलूक’
पेड़ों की टहनियों
पत्तियों में नाम
लिख दिया जायेगा
अगली बार जब
वो किया जायेगा
तब ये नहीं किया
करके वो भी नहीं
करने दिया जायेगा
अभी भी समय है
सोच ले
सब कुछ तो करता ही है
क्या नहीं करता है
इसे करने में कौन सा
बदनाम हो जायेगा ।

चित्र साभार: mystiquesadvice.blogspot.com

शुक्रवार, 19 जून 2015

अच्छा काल मतलब आपातकाल

अच्छे दिन की तरफ
कदम बढ़ाऊँ या नहीं
कई दिन महीने हो गये
फैसला ही नहीं
लिया जा रहा है
भ्रम बना हुआ है
बड़ा और बड़ा
होता जा रहा है
बताने वाले ने भी
खूब बताया
बहुत बड़ा सा
एक भोंपू
लेकर आया
उस समय लगा
बस अपने ही
समझ में सब
अच्छी तरह
से आ रहा है
बताने वाला
बताते बताते
भूल गया शायद
क्या बता रहा है
अच्छे दिन पर
चूना लगाकर
आपात काल
आ रहा है जैसा ही
अब कुछ अकेले में
जा कर फुसफुसा रहा है
अच्छे का मतलब
आपात होता है
दिन काल हुआ
जा रहा है
रोज ही रहता है
अपने घर में हमेशा से
तानाशाह हर दूसरा
बहुत पहले से ही
नजर आ रहा है
‘उलूक’ को आदत
हो चुकी है
राजशाही तानाशाही
हरामेशाही की
अपने ही घर परिवार
में अपने ही लोगों के साथ
आपातकाल आता है या
आपतकाल नहीं आता है
उसके घर के हिटलरों में से
एक भी ना कहीं आ रहा है
ना ही आने वाले समय
में कहीं जा रहा है
विनाशकाले विपरीत बुद्धी
ही उसके जैसे सभी भाई बंद
मंदबुद्धियों के लिये एक
वरदान हुआ जा रहा है।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

गुरुवार, 18 जून 2015

लेखक अलादीन अगर बन जाता है जिन्न को किस काम पर लगाता है

सुना है
अलादीन
भी आजकल
कुछ कुछ
लिख रहा है
चिराग को
घिसना भी
जरूरी है
उसकी सबसे
बड़ी मजबूरी है
लिखता है
लिखने में
उसे पता है
कुछ भी तो
नहीं लगता है
विद्वानों का 
लिखा जैसा
नहीं भी

हो पाता है
कथा कहानी
कविता शायरी
नहीं भी उसे
कहा जाता है
लोग देखते हैं
समझने की कुछ
कोशिश
करते हैं
अलादीन के पास
चिराग भी होता है
चिराग के अंदर ही
सिकुड़ कर उसका
जिन्न भी सोता है
चिराग घिसते ही
जिन्न बाहर
आ जाता है
बाहर निकल कर
विशालकाय
हो जाता है
जो भी उससे
माँगा जाता है
चुटकी में सामने
से ले आता है
फिर अलादीन
जो भी देख सुन
कर आता है
जिन्न को क्यों
नहीं बताता है
खुद ही लिखने
क्यों बैठ जाता है
अलादीन विद्वान
नहीं भी होता है
समाज में तो आंखिर
यहीं के रहता है
रहते रहते बहुत कुछ
सीख जाता है
रोज लिखता है
वो सब जो उसे
साफ साफ या
कुछ धुँधला भी
कहीं दिख जाता है
लिखने के बाद
चिराग घिसना
शुरु हो जाता है
जिन्न के निकलते
ही बाहर उसे
कुछ पढ़ने वालों को
ढूंढने के लिये
भिजवाता है
लिखते लिखाते
दिन गुजर जाता है
दूसरे दिन का
लिखना लिखाना
भी शुरु हो जाता है
जिन्न तब तक भी
मगर लौट कर
नहीं आ पाता है ।

चित्र साभार:
dlb-network.com

बुधवार, 17 जून 2015

सच यही है हम सब मतलब सब भारतीय हैं (राष्ट्रीय चरित्र)

बीच बीच में
कुछ कुछ
देर के लिये
भ्रम होते ही हैं
चमकना शुरु
करता है
एक पत्थर
धीरे धीरे उसके
सोना हो जाने
की खबर खबरची
लेकर आता है
ढोल नगाढ़े बजते हैं
नाच गाना भी
शुरु हो जाता है
फूल दिखते हैं
माला दिखती हैं
शादी विवाह में
क्या होता होगा
ऐसा अजब गजब
माहौल हो जाता है
जुटनी शुरु
होती है भीड़
कान में रूई
डाली जाती हैं
आँख में काले
पट्ट्ठे वाला चश्मा
डाला जाता है
मुँह में भरे
जाते हैं लड्डू
बोलना बंद
कराया जाता है
सोच बंद करता है
अपनी अपनी
हर कोई
जमूरा होकर
जय हो जय हो
जय हो मदारी
की गाता है
पत्थर अपनी
जगह जैसा था
वैसा का वैसा
रह जाता है
खबरची पैंतरा
बदलता है
हुर्र हुर्र का
हाँका लगाता है
पत्थर है पत्थर है
सोने का रंग
चढ़वाता है
सोने का रंग
चढ़वाता है
जोर शोर से
चिल्लाता है
भ्रम पहले का था
या अब भ्रम है
समझ से बाहर
हो जाता है
फख्र लेकिन
अपनी जगह पर
अपना रहता है
वही ढांढस
बंधवाता है
हम अलग नहीं
हो सकते हैं
हम सब भारतीय हैं
का नारा पेट में
हो रही गुड़गुड़
के साथ ही
बहुत जोर शोर से
जोर लगाता है
‘उलूक’ खुश
होता है सोच कर
चलो कभी कभी
एक बार
फिर से सही
कोई उसको
उसकी
औकात की
याद दिलाता है ।
चित्र साभार: www.clipartpanda.com

मंगलवार, 16 जून 2015

कब्ज पेट का जैसा दिमाग में हो जाता है बात समझ से बाहर हो जाती है

पेट में कब्ज हो
बात चिकित्सक
के समझ में
भी आती है
दवायें भी होती हैं
प्राकृतिक
चिकित्सा
भी की जाती है
परेशानी का
कारण है
इससे भी इंकार
नहीं किया
जा सकता है
बात खुले आम
नहीं भी की जाती है
पर कभी कभी
किसी किसी के बीच
विषय बन कर
बड़ी बहस के रुप में
उभर कर सामने
से आ जाती है
गहन बात है
तभी तो ‘पीकू’
जैसी फिल्म में
तक दिखाई जाती है
जतन कर लेते है
करने वाले भी
फिर भी किसी
ना किसी तरह
सुबह उठने के
बाद से लेकर
दिन भर में
किसी ना किसी
समय निपटा
भी ली जाती है
ये सब पढ़ कर
समझता है और
समझ में आता
भी है एक जागरूक
सुधि पाठक को
यहीं पर ‘उलूक’
की बक बक पटरी
से उतरती हुई
भी नजर आती है
बात कब्ज से
शुरु होती है
वापस लौट कर
कब्ज पर ही
आ जाती है
प्रश्न उठ जाये
अगर किसी क्षण
दिमाग में हो रहे
कब्ज की बात
को लेकर
बड़ी अजीब सी
स्थिति हो जाती है
लिख लिखा कर भी
कितना निकाला जाये
क्या निकाला जाये
उम्र के एक मोड़ पर
आकर अपने आस पास
में जब कोई नई बात
समझने के लिये
नहीं रह जाती है ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

सोमवार, 15 जून 2015

मुद्दा पाप और मुद्दा श्राप

पापों को धोने
का साबुन
अगर बाजार में
उतारा जायेगा
कोई बतायेगा
आज के दिन
उस साबुन का
नाम किसके
नाम पर
रखा जायेगा
साबुन बिकेंगे
अपने ही पूरे
देश में या
विदेशों में
ले जा कर भी
बेचा जायेगा
सीधे सीधे
खरीदेगा आदमी
साबुन खुद
अपने लिये
जा कर किसी
दुकान से या
राशन कार्ड में
दिलवाया जायेगा
बहुत सी बातें हैं
नई नई आती हैं
अंदाज नहीं
लग पाता है
किसको कितना
भाव दिया जायेगा
पाप के साथ
श्राप भी बिकने
की चीज है
बड़ी काम की
पुराने युगों की
श्राप देने लेने
का फैशन भी
क्या कभी लौट
कर आयेगा
पापी बेचेगा श्राप
खुद बनाकर
अपनी दुकान पर
या गलती से किसी
ईमानदार के हाथ
में ठेका लग जायेगा
कितने तरह के श्राप
बिकेंगे बाजार में
किसके नाम का श्राप
सबसे खतरनाक
माना जायेगा ?

चित्र साभार: churchhousecollection.blogspot.com

रविवार, 14 जून 2015

कोशिश कर घर में पहचान महानों में महान

एक खेत
सौ दो सौ
किसान
किसी का हल
किसी का बैल
बबूल के बीज
आम की दुकान
जवानों में बस
वही जवान
जिसके पास
एक से निशान
बंदूकें जंग
खाई हुई
उधार की
गोलियाँ
घोड़े दबाने
के लिये
अपने छोड़
सामने वाले
कंधे को
पहचान
मुँह में रामायण
गीता बाईबिल
और कुरान
हाथ में गिलास
बोतल में सामान
अपने मुद्दे मुद्दे
दूसरे के मुद्दे
बे‌ईमान
घर में लगे
तो लगे आग
पानी ले
चल रेगिस्तान
‘उलूक’ बंद रख
नाक मुँह
और कान
अपनी अपनी
ढपली
अपने अपने
गान
जय जवान
जय किसान ।



चित्र साभार: cybernag.in

शनिवार, 13 जून 2015

शुरुआत हो चुकी है बापू अभी तो बस नोट से जा रहे हैं

जब से सुना है
बापू दस रुपिये
के नये छपे नोट
में नजर नहीं
आ रहे हैं
कल्पना करने में
कुछ नहीं जाता है
देखने की कोशिश
कर रहा हूँ
एक चित्र
बना कर
बिगाड़ कर
सुधार कर
रंग भी
भर रहा हूँ
मगर रंग हैं
कि कूची से
ही शर्मा रहे हैं
लाल हरे पीले
काले सफेद
हो जा रहे हैं
इतनी बड़ी
बात भी नहीं है
तिरंगे के रंग
भी तो अब
अलग अलग
झंडों में दिखाये
जा रहे हैं
कहीं गेरुऐ हैं
कहीं हरे हैं
कहीं सफेद ही
बेच दिये
जा रहे हैं
अभी तो
दस रुपिये के
नोट से ही
हटाये जा रहे हैं
जल्दी ही
सपने में ही नहीं
होगा बस सच होगा
और तेरे देखते
देखते ही होगा
‘उलूक’ जब
दिखेगा कि
बापू की मूर्तियों
को वर्दी पहने हुऐ
कुछ अनुशाशित लोग
क्रेन से उठवा उठवा
कर थाने के मालखाने
में जमा करवा रहे हैं ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

शुक्रवार, 12 जून 2015

अक्ल वालों की नजर गाय पर होती है बेवकूफ खुद ही बैल हो जाते हैं

दूध से रोज
ही नहाते हैं
दूध के धुले
भी कहलाते हैं
ऐसे शुद्ध लोगों
पर ना जाने
कैसे आप जैसे
अशुद्ध लोग
मिलावटी होने
का इलजाम
लगा ले जाते हैं
काम तो
होते ही हैं
करने के लिये
किये भी जाते हैं
अब कौन से काम
जरूरी होते हैं
कौन से गैर जरूरी
इस बात को
काम करने वाले
ही बता पाते हैं
कुछ काम अपने
नहीं भी होते है
पर दुधारू गाय
की तरह
पहचाने जाते हैं
कुछ काम अपने
ही काम होते हैं
और सींग मारने
वाले बैल माने जाते हैं
बेवकूफ लोग
सींग पकड़े लटके
नजर आते हैं
होशियार गाय के
दूध से रोज नहाते है
इसीलिये दूध के
धुले भी कहलाते हैं
‘उलूक’ देखता
रहता है गाय
और गाय के
दूध की धार को
उसकी सोच में
बैलों की सींगों के
घाव रोज
ही बनते हैं
और रोज ही
हरे हो जाते हैं ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

गुरुवार, 11 जून 2015

कीचड़ करना जरूरी है कमल के लिये ये नहीं सोच रहा होता है

जब सोच ही
अंधी हो जाती है
सारी दुनियाँ
अपनी जैसी ही
नजर आती है
अफसोस भी
होता है
कोई कैसे किसी
के लिये कुछ
भी सोच देता है
किसी के काम
करने का कोई
ना कोई मकसद
जरूर होता है
उसकी नजर होती है
उसकी सोच होती है
बुरा कोई भी
नहीं होता है
जो कुछ भी होता है
अच्छे के लिये होता है
कुछ भी किसी
के लिये भी
किसी समय भी
कहने से पहले
कोई क्यों नहीं
थोड़ा सोच लेता है
एक उल्टा लटका
हुआ चमगादड़ भी
उल्टा ही नहीं होता है
वो भी सामने वाले
सीधे को उल्टा हो कर
ही देख रहा होता है
‘उलूक’ तेरे लिये
तेरे आस पास
हर कोई गंदगी
बिखेर रहा होता है
सब के चेहरे पे
मुस्कान होती है
देखने वाला भी
खुश हो रहा होता है
बस यहीं पर पता
चल रहा होता है
एक अंधी सोच वाला
अंधेरे को बेकार ही में
कोस रहा होता है
जबकि गंदगी और
कीचड़ बटोरने वाला
हर कोई आने वाले
समय में कमल
खिलाने की
सोच रहा होता है ।

चित्र साभार: www.cliparthut.com

बुधवार, 10 जून 2015

स्कूल नहीं जाता है फर्जी भी नहीं हो पाता है पकड़ा जाता है तोमर हो जाता है

इसी लिये बार बार
कहा जाता है
समझाया जाता है
सरकार के द्वारा
प्रचारित प्रसारित
किया जाता है
पोथी लेकर
कुछ दिन किसी
स्कूल में चले जाने
का फायदा नुकसान
तुरंत नहीं भी हो
सालों साल बाद
पता चल पाता है
जब फर्जी होने ना होने
का सबूत ढूँढने का
प्रयास स्कूल के
रजिस्टर से
किया जाता है
वैसे डंके की चोट पर
फर्जी होना और
साथ में सर
ऊँचा रखना
भी अपने आप में
एक कमाल ही
माना जाता है
जो है सो है
सच होना और
सच पर टिके रहना
भी एक बहुत बड़ी
बात हो जाता है
यहीं पर दुख: भी
होना शुरु हो जाता है
फर्जी के फंस जाने
पर तरस भी आता है
अनपढ़ और पढ़े लिखे
के फर्जीवाड़े के तरीकों
पर ध्यान चला जाता है
पढ़ा लिखा फर्जी
हिसाब किताब साफ
सुथरा रख पाता है
दिमाग लगा कर
फर्जीवाड़े को करते करते
खुद भी साफ सुथरा
नजर आता है
फर्जीवाड़ा करता भी है
फर्जीवाड़ा सिखाता भी है
फर्जियों के बीच में
सम्मानित भी
किया जाता है
‘उलूक’ का आना जाना है
रोज ही आता जाता है
बस समझ नहीं पाता है
पढ़ लिख नहीं पाया फर्जी
फर्जी प्रमाण पत्र लाते समय
असली प्रमाण पत्र वाले
पढ़े लिखे फर्जियों से
राय लेने क्यों
नहीं आ पाता है ?

चित्र साभार: http://www.mapsofindia.com/

मंगलवार, 9 जून 2015

हाय मैगी किसने किया ये हाल तेरा हिसाब नहीं लगा पा रहे हैं

हाय मैगी
तू शहीद होने
जा रही है और
हम कुछ नहीं
कर पा रहे हैं
बहुत शर्म
आ रही है
कैसे हुआ
किसने किया
पता ही नहीं
कर पा रहे हैं  

फिर कैसे कहा
जा रहा है

समझ में नहीं
आ रहा है कि
अच्छे दिन
आ रहे हैं
बगुले खुश हैं
मेरे आसपास के
भजन गा रहे हैं
मछलियाँ 
अब
दिख रही हैं 
सतह पर
घड़ियाल तक
आँसू नहीं
बहा रहे हैं
अमन है चैन है
बिक रहा है
बहुत सस्ते में
सब ही खरीद
कर अपने अपने
घर परिवार
के लिये लिये
जा रहे हैं
‘उलूक’ ही बस
एक है इन
सब के बीच में
जिसके गले में
ही कहीं शब्द
अटक जा रहे हैं
गीत गाना चाहता है
मैगी तेरे वियोग का
मगर सुर ही
बिगड़ जा रहे हैं
कब लौटेगी
कैसे लौटेगी
चिंता हो रही है
लोग समझ
नहीं पा रहे हैं
थोड़ी सी ही सही
सांत्वना मिली है
जब से सुना है
बाबा रामदेव
देश के लिये
देश की मिट्टी
से बनी देश
वासियों के लिये
जल्दी ही खुद
बनाने जा रहे हैं।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

सोमवार, 8 जून 2015

परेशानी तब होती है जब बंदर मदारी मदारी खेलना शुरु हो जाता है

मदारी को इतना
मजा आता है
जैसे एक पूरी
बोतल का नशा
हो जाता है
जब वो अपने
बंदर को सामने
वाले के सिर पर
चढ़ कर
जनता के बीच में
उसकी टोपी
उतरवाना सिखाता है
बालों पर लटक
कर नीचे उतरना
कंधे पर चढ़ कर
कानों में खों खों करना
देखते ही मदारी के
चेहरे की रंगत में
रंग आ जाता है
जब पाला पोसा हुआ
बंदर खीसें निपोरते हुऐ
गंजे के सिर में
तबला बजाता है
मदारी खुद सीखता
भी है सिखाना
अपने ही आसपास से
सब कुछ देख देख कर
बड़े मदारी की हरकतों को
कैसे बंदरों के कंधों में
हाथ रख रख कर
अपने लिये बड़ा मदारी
बंदरों से अपने सारे
काम निकलवाता है
काम निकलते ही
बंदरों को भगाने के लिये
दूसरे पाले हुऐ बंदरों से
हाँका लगवाता है
सब से ज्यादा मजा तो
आइंस्टाइन को आता है
सामने के चौखट पर
खड़े होकर जब वो खुद
एक प्रेक्षक बन जाता है
'जय हो सापेक्षता के
सिद्धाँत की' उस समय
अनायास ही जबान से
निकल जाता है जब
एक मदारी के सर पर ही
उसका सिखाया पाल पोसा
चढ़ाया हुआ बंदर
उसके ही बाल नोचता
नजर आता है ।



चित्र साभार: jebrail.blogfa.com

रविवार, 7 जून 2015

चिकने खंबे पर ही चढ़ता है रोज उसी तरह फिसलता है हर बार जमीन पर आ जाता है

ये लिखना भी कोई
लिखना है लल्लू
किसी की समझ में
कुछ नहीं आता है
तेरी बेशर्मी की भी
कोई हद नहीं है
सुनता है फिर
और भी जोर शोर
से लिखना शुरु
हो जाता है
सोचा कर अगर
सोच सकता है
बता कोई एक
तुझे छोड़ कर
है कोई ऐसा दूसरा
जो तेरी तरह रोज
शाम होते ही
शुरु हो जाता है
किसे फुरसत है
कौन बेकार है
सबके पास है
अपने अपने हैं
और बहुत सारे
बड़े काम हैं
बेरोजगार होने
का मतलब
लेखक हो जाना
नहीं हो जाता है
गलतफहमी को
खुशफहमी बना
कर खुद की खुद ही
नाचना शुरु हो
जाने वाला तेरे अलावा
इस नक्कारखाने में
कोई दूसरा नजर
नहीं आता है
क्या किया जा सकता है
तेरी इस बीमारी का
जिसका इलाज
अस्पताल में भी
नहीं पाया जाता है
कुऐं में घुसे हुऐ
मेंढक की तरह
क्यों कब तक किसके
लिये गला फाड़ टर्राता है
समझा कर
छोटे शहर का पागल
शहर के कोने कोने में
पहचान लिया जाता है
इसी लिये
बड़ी जगह की बड़ी बड़ी
बातों में उलझाने फँसाने
के खेलों को सीखने
सिखाने के लिये
एक समझदार
गली से बाहर निकल कर
एक खुले बड़े से
मैदान में आ जाता है ।



चित्र साभार: girlrunningcrazy.com

शनिवार, 6 जून 2015

अपनी दिखती नहीं सामने वाले की छू रहे होते हैं

एक नहीं कई
कई होते हैं
अपने ही खुद
के चारों
ओर होते हैं
सीधे खड़े
भी होते हैं
टेढ़े मेढ़े भी
नहीं होते हैं
गिरते हुऐ भी
नहीं दिखते हैं
उठते हुऐ भी
नहीं दिखते हैं
संतुलन के
उदाहरण कहीं
भी उनसे बेहतर
नहीं होते हैं
ना कुछ सुन
रहे होते हैं
ना कुछ देख
रहे होते हैं
ना कुछ कह
रहे होते हैं
होते भी हैं
या नहीं भी
होते हैं जैसे
भी हो रहे
होते हैं
रोने वाले कहीं
रो रहे होते हैं
हँसने वाले
कहीं दूसरी ओर
खो रहे होते हैं
अजब माहौल
की गजब कहानी
सुनने सुनाने वाले
अपनी अपनी
कहानियों को
अपने अपने
कंधों में खुद ही
ढो रहे होते हैं
‘उलूक’ समझ में
क्यों नहीं घुस
पाती है एक
छोटी सी बात
कभी भी तेरे
खाली दिमाग में
एक लम्बी रीढ़
की हड्डी
पीठ के पीछे से
लटकाने के
बावजूद
तेरे जैसे एक
नहीं बहुत सारे
आस पास के ही तेरे
बिना रीढ़ के
हो रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.123rf.com

शुक्रवार, 5 जून 2015

सब कुछ सीधा सीधा हो हमेशा ऐसा कैसे हो

रख दे अपना
दिल खोल कर
अपने सामने से
और पढ़ ले
हनुमान चालीसा
किसी को भी
तेरे दिल से
क्या लेना देना
सबके पास
अपना एक
दिल होता है
हाँ हो सकता है
हनुमान जी
के नाम पर
कुछ लोग रुक जायें
ये बात अलग है
कि हनुमान जी
किस के लिये
क्या कर सकते हैं
हो सकता है
हनुमान जी के लिये
भी प्रश्न कठिन हो जाये
उन्हें भी आगे कहीं
राम चंद्र जी के पास
पूछ्ने के लिये
जाना पड़ जाये
इसीलिये हमेशा
राय दी जाती है
खबर के चक्कर में
पड़ना ठीक नहीं है
खबर बनाने वाले
की मशीन खबर वाले
के हाथ में नहीं होती है
खबर की भी
एक नब्ज होती है
एक घड़ी होती है
जो टिक टिक
नहीं करती है
हनुमान जी ने
उस जमाने में घड़ी
देखी भी नहीं होगी
देखी होती तो
तुलसीदास जी की
किताब में कहीं ना कहीं
लिखी जरूर होती
इसलिये ठंड रख
गरम मत हो
खा पी और सो
खबर को अखबार
में रहने दे
अपने दिल को उठा
और वापिस दिल
की जगह में फिर से बो
हनुमान जी की भी
जय हो जय हो जय हो ।

चित्र साभार: beritapost.info

बुधवार, 3 जून 2015

आदमी तेरे बस के नहीं रहने दे चीटीं से ही कुछ कभी सीख कर आया कर

तेरे पेट में
होता है दर्द
होता होगा
कौन कह रहा है
नहीं होता है
अब सबके पेट
में दर्द हो
सब पेट के
दर्द की बात करें
ऐसा भी कैसे होता है
बहुत मजाकिया है
मजाक भी करता है
तो ऐसी करता है
जिसे मजाक है
सोचने सोचने तक
इस पर हँसना भी है
की सोच आते आते
कुछ देर तक ठहर कर
देख भाल कर
माहौल भाँप कर
वापस भी चली जाती है
और उसके बाद सच में
कोई मजाक भी करता है
तब भी गुस्से के मारे
आना चाह कर भी
नहीं आ पाती है
सबके होता है दर्द
किसी का कहीं होता है
किसी का कहीं होता है
सभी को अपने अपने
दर्द के साथ रहना होता है
दर्द की राजनीति मत कर
अच्छे दर्द के कभी आने
की बात मत कर
फालतू में लोगों का
समय बरबाद मत कर
दर्द होता है तो
दवा खाया कर
चुपचाप घर जा कर
सो जाया कर
बुद्धिजीवी होने का
मतलब परजीवी
हो जाना नहीं होता है
सबको चैन की
जरूरत होती है
अपना दिमाग किसी
तेरे जैसे को
खिलाना नहीं होता है
लीक को समझा कर
लीक पर चला कर
लीक से हटता भी है
अगर
तो कहीं किसी को
बताया मत कर
चीटिंया जिंदा चीटी को
नुकसान नहीं पहुँचाती हैं
चीटियाँ उसी चींटी को
चट करने जाती हैं
जो मर जाती है ।

चित्र साभार: sanbahia.blogspot.com

सोमवार, 1 जून 2015

बुद्धिजीवियों के शहर में चर्चा है किताबों की का कुछ शोर हो रहा है

भाई बड़ा गजब हो रहा है
कोई कुछ भी नहीं कह रहा है
फुसफुसा कर कहा
बुद्धिजीवियों से भरे
एक शहर के एक बुद्धिजीवी ने
बगल में बैठे दूसरे बुद्धिजीवी से
चिपकते चिपकते हुऐ कान
के पास मुँह लगाते हुऐ
बहुत बुरा
सच में बहुत बुरा हो रहा है
बड़ा ही गजब हो रहा है
मैं भी देख रहा हूँ
कई साल से यहाँ पर
बहुत कुछ हो रहा है
समझ भी नहीं पा रहा हूँ
कोई कुछ भी क्यों
नहीं कह रहा है
एक ने सुनते ही
दूसरे का जवाब
जैसे ही लगा उसे
उसका तीर निशाने
पर लग रहा है
दुबारा फुसफुसा कर कहा
सुनो
सुना है कल शहर में
कुछ बाहर के शहर के
बुद्धिजीवियों का कोई
फड़ लग रहा है
किताबों पर किसी
लिखने लिखाने वाले की
कोई चर्चा कर रहा है
फुसफुसाते क्यों नहीं
तुम वहाँ जा कर कि
यहाँ हो रहा है और
गजब हो रहा है
कितनी अजीब सी
बात है देखिये तो जरा
हर कोई एक दूसरे के
कान में जा जा कर
फुस फुस कर रहा है
कोई किसी से कुछ
नहीं कह रहा है
कुछ आप ही कह दें
इस पर जरा जोर
कुछ लगाकर
यहाँ तो फुसफुसाहट
का ही बस जोर हो रहा है ।

चित्र साभार: www.clipartreview.com

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