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बुधवार, 30 सितंबर 2015

निराशा सोख ले जाते हैं कुछ लोग जाते जाते

आयेंगे
उजले दिन
जरुर आएँगे
उदासी दूर
कर खुशी
खींच लायेंगे
कहीं से भी
अभी नहीं
भी सही
कभी भी
अंधेरे समय के
उजली उम्मीदों
के कवि की
उम्मीदें
उसकी अपनी नहीं
निराशाओं से
घिरे हुओं के
लिये आशाओं की
उसकी अपनी
बैचेनी की नहीं
हर बैचेन की
बैचेनी की
निर्वात पैदा
ही नहीं होने
देती हैं
कुछ हवायें
फिजा से
कुछ इस तरह
से चल देती हैं
हौले से जगाते
हुऐ आत्मविश्वास
भरोसा टूटता
नहीं है जरा भी
झूठ के अच्छे
समय के झाँसों
में आकर भी
कलम एक की
बंट जाती है
एक हाथ से
कई सारी
अनगिनत होकर
कई कई हाथों में
साथी होते नहीं
साथी दिखते नहीं
पर समझ में
आती है थोड़ी बहुत
किसी के साथ
चलने की बात
साथी को
पुकारते हुऐ
मशालें बुझते
बुझते जलना
शुरु हो जाती हैं
जिंदगी हार जाती है
जैसा महसूस होने
से पहले लिखने
लगते हैं लोग
थोड़ा थोड़ा उम्मीदें
कागजों के कोने
से कुछ इधर
कुछ उधर
बहुत नजदीक
पर ना सही
दूर कहीं भी ।

चित्र साभार: www.clker.com

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

उतनी ही श्रद्धांजलि जितनी मेरी कमजोर समझ में आती है तुम्हारी बातें वीरेन डंगवाल

बहुत ही कम
कम क्या
नहीं के बराबर
कुछ मकान
बिना जालियाँ
बिना अवरोध
के खुली मतलब
सच में खुली
खिड़कियों वाले
समय के हिसाब से
समय के साथ
समय की जरूरतें
सब कुछ आत्मसात
कर सकनें की क्षमता
किसी के लिये नहीं
कोई रोक टोक
कुछ अजीब
सी बात है पर
बैचेनी अपने
शिखर पर
जिसे लगता है
उसे कुछ समझ
में आती हैं कुछ
आती जाती बयारें
बेरंगी दीवारें
मुर्झाये हुई सी
प्रतीत होती
खिड़कियों के
बगल से
निकलती
चढ़ती बेलें
कभी मुलाकात
नहीं हुई बस
सुनी सुनाई
कुछ कुछ बातें
कुछ इस से
कुछ उस से
पर सच में
आज कुछ
उदास सा है मन
जब से सुना है
तुम जा चुके हो
विरेन डंगवाल
कहीं पर बहुत
मजबूती से
इतिहास के
पन्नों के लिये
गाड़ कर कुछ
मजबूत खूँटे
जो बहुत है
कमजोर समय के
कमजोर शब्दों पर
लटके हुऐ यथार्थ
को दिखाने के लिये
ढेर सारे आईने
विनम्र श्रद्धांजलि
विरेन डंगवाल
'उलूक' की अपनी
समझ के अनुसार।


चित्र साभार: http://currentaffairs.gktoday.in/renowned-hindi-poet-viren-dangwal-passes-09201526962.html

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

पागलों के साथ कौन खड़ा होना चाहता है ?

किसी को कुछ
समझाने के लिये
नहीं कहता है
‘उलूक’ आदतन
बड़बड़ाता है
देखता है अपने
चश्मे से अपना
घर जैसा
है जो भी
सामने से
नजर आता है
बक बका जाता
है कुछ भी
अखबार में जो
कभी भी
नहीं आता है
तेरे घर में नहीं
होता होगा
अच्छी बात है
उसके घर में
बबाल होता है
रोज कुछ ना
कुछ बेवकूफ
रोज आकर
साफ साफ
बता जाता है
रुपिये पैसे का
हिसाब कौन
करता है
सामने आकर
पीछे पीछे
बहुत कुछ
किया जाता है
अभी तैयारियाँ
चल रही है
नाक के लिये
नाक बचाने
के लिये झूठ
पर झूठ
अखबार में दिखे
सच्चों से बोला
जाता है
कौन कह रहा है
झूठ को झूठ
कुछ भी कह
दीजिये हर कोई
झूठ के छाते के
नीचे आकर खड़ा
होना चाहता है
किसी में नहीं है
हिम्मत सच के
लिये खड़े होने
के लिये हर कोई
सच को झूठा
बनाना चाहता है
‘उलूक’ के साथ
कोई भी नहीं है
ना होगा कभी
पागलों के साथ
खड़ा होना भी
कौन चाहता है ।

 चित्रसाभार: www.clipartsheep.com

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

लिंगदोह कौन है ? पता करवाओ

लिंगदोह
कौन है
है अभी
कि
नहीं है

होगा
कितने
होते हैं
ये भी कोई
होता होगा

शासन को
पता नहीं
दुश्शासन
को पता नहीं

अनुशासन
कुशासन
शासन
प्रशासन
रहने दो

आसन करो
योग करो

भोग मत करो

अच्छा सोचो
अच्छा देखो
कुछ गलत हो
रहा हो तो
जब तक होये
तब तक
मत देखो

जब हो जाये
तब सब आ
आ कर देखो

हल्ला गुल्ला
सुनो तो
सो जाओ

शांति होने
के बाद
मुँह धो के
पोछ के
मूँछों को
घुमाओ

अब
हर जगह
थाने हों
और
थानेदार हो

ऐसी सोच
मत बनाओ

कुर्सियाँ
बैठने
के लिये
होती हैं
बैठ जाओ

गुस्सा
दिखाओ
एक दो
अच्छे भले
सीधे साधे
को डंडा
मार के
चूट जाओ

लिंगदोह
कौन है
कोई पूछ
रहा है क्या
किसी से ?

बेकार
की बातें
बेकार
जगह पर
बेकार में
मत फैलाओ

खबर देने
की जरूरत
अभी से
नहीं है
खबरची को

साफ सफाई
रंग चूना
करने के
बाद ही
बुलाओ

उसी को
बुला कर
उसी से
किसी से
पुछवाओ

लिंगदोह
के बारे में
पता कर
उसे नोटिस
भिजवाओ

आओ
मिल बाँट
कर चाय
समोसे खाओ

बिल
थानेदार
के नाम
कटवाओ

शासन के
जासूसों के
आँख में
घोड़ों के
आँख की
पट्टियाँ
दोनो ओर
से लगवाओ

सामने
से हरी
घास
दिखवाओ

सब कुछ
चैन से
है बताओ

बैचेनी की
खबरों को
घास के
नीचे दबवाओ

‘उलूक’
की मानो
और
कोशिश करो

लिंगदोह
के लिये
दो गज
जमीन का
इंतजाम
करवाओ

पर पहले
पता तो
करवाओ
लिंगदोह
कौन है ?

चित्र साभार: www.christianmessenger.in

बुधवार, 23 सितंबर 2015

भगदड़ मच जाती है जब मलाई छीन ली जाती है

चींंटियाँ बहुत कम
अकेली दौड़ती
नजर आती है
चीटियाँ बिना वजह
लाईन बना कर
इधर से उधर
कभी नहीं जाती हैं
छोटी 
चींंटियाँ एक साथ
कुछ बड़ी अलग
कहीं साथ साथ
और बहुत बड़ी
कम देखने वाले
को भी दूर से ही
दिख जाती हैं
लगता नहीं कभी
छोटी चींंटियों के दर्द
और गमो के बारे में
बड़ी चीटियाँ कोई
संवेदना जता पाती हैं
चींंटियों की किताब में
लिखे लेख कविताऐं
भी कोई संकेत सा
नहीं दे पाती हैं
चींंटियों के काम
कभी रुकते नहीं है
बहुत मेहनती
होती हैं चींंटियाँ हमेशा
चाटने पर आ गई
तो मरा हुआ हाथी
भी चाट जाती हैं
छोटी चींटियों के
लिये बड़ी चीटियों
का प्रेम और चिंता
अखबार के समाचार
के ऊपर छपे समाचार
से उजागर हो जाती है
पहले दिन छपती है
चींंटियों से उस गुड़ के
बरतन को छीने
जाने की खबर जिसे
लूट लूट कर चींंटियाँ
लाईन चीटियों की
लाईन में रख पाती हैं
खबर फैलती है
चींंटियों में मची भगदड़ की
दूसरे किस्म की चीटियों के
कान में पहुँच जाती है
दूसरे दिन दूसरी चींंटियाँ
पहली चींंटियों की मदद
के लिये झंडे लहराना
शुरु हो जाती है पूछती हैं
ऐसे कैसे सरकार
अपनी चींंटियों में
भेद कर जाती है
इधर भी तो लूट ही मची है
चींंटियाँ ही लूट रही हैं
उधर की चींंटियों को
गुड़ छीन कर दे देने
का संकेत देकर सरकार
आखिर करना क्या चाहती है
ये सब रोज का रोना है
चलता हुआ खिलौना है
चाबी भरने की याद
आती है तभी भरी जाती है
कुछ समझ में
आये या ना आये
एक बात पक्की
सौ आने समझ में आती है
लाईन में लगी चींंटियों
की मदद करने लाईन
वाली चींंटियाँ ही आती है
लाईन से बाहर दौड़ भाग
कर लाईन को देखते
रहने वाली चींंटियाँ
गुड़ की बस खुश्बू दूर से
ही सूँघती रह जाती हैं ।

चित्र साभार: www.gettyimages.com

सोमवार, 21 सितंबर 2015

दुकान के अंदर एक और दुकान को खोला जाये

जब दुकान
खोल ही
ली जाये
तो फिर क्यों
देखा जाये
इधर उधर
बस बेचने की
सोची जाये

दुकान का
बिक जाये
तो बहुत
ही अच्छा
नहीं बिके
अपना माल
किसी और
का बेचा जाये

रोज उठाया
जाये शटर
एक समय
और
एक समय
आकर गिराया
भी जाये

कहाँ लिखा है
जरूरी है
रोज का रोज
कुछ ना कुछ
बिक बिका
ही जाये

खरीददार
अपनी जरूरत
के हिसाब से
अपनी बाजार की
अपनी दुकान पर
आये और जाये

दुकानदार
धार दे अपनी
दुकानदारी
की तलवार को
अकेला ना
काट सके
अगर बीमार
के ही अनार को
अपने जैसे
लम्बे समय के
ठोके बजाये
साथियों को
साथ में लेकर
किसी खेत
में जा कर
हल जोत
ले जाये

कौन देख रहा है
क्या बिक रहा है
किसे पड़ी है
कहाँ का
बिक रहा है
खरीदने की
आदत से
आदतन
कुछ भी
कहीं भी
खरीदा जाये

माल
अपनी दुकान
का ना बिके
थोड़ा सा
दिमाग लगा कर
पैकिंग का
लिफाफा
बदला जाये

मालिक की
दुकान के
अंदर खोल
कर एक
अपनी दुकान
दुकान के
मालिक का
माल मुफ्त में
एक के साथ एक
बेचा जाये

मालिक से
की जाये
मुस्कुरा कर
मुफ्त के बिके
माल की बात

साथ में
बिके हुऐ
दुकान के
माल से
अपनी और
ठोके पीटे
साथियों की
पीछे की
जेब को
गुनगुने नोटों
की गर्मी से
थोड़ा थोड़ा
रोज का रोज
गुनगुना
सेका जाये ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

रविवार, 20 सितंबर 2015

देखा कुछ ?

देखा कुछ ?
हाँ देखा
दिन में
वैसे भी
मजबूरी में
खुली रह जाती
हैं आँखे
देखना ही पड़ता है
दिखाई दे जाता है
वो बात अलग है
कोई बताता है
कोई चुप
रह जाता है
कोई नजर
जमीन से
घुमाते हुऐ
दिन में ही
रात के तारे
आकाश में
ढूँढना शुरु
हो जाता है
दिन तो दिन
रात को भी
खोल कर
रखता हूँ आँखें
रोज ही
कुछ ना कुछ
अंधेरे का भी
देख लेता हूँ
अच्छा तो
क्या देखा ? बता
क्यों बताऊँ ?
तुम अपने
देखे को देखो
मेरे देखे को देख
कर क्या करोगे
जमाने के साथ
बदलना भी सीखो
सब लोग एक साथ
एक ही चीज को
एक ही नजरिये
से क्यों देखें
बिल्कुल मत देखो
सबसे अच्छा
अपनी अपनी आँख
अपना अपना देखना
जैसे अपने
पानी के लिये
अपना अपना कुआँ
अपने अपने घर के
आँगन में खोदना
अब देखने
की बात में
खोदना कहाँ
से आ गया
ये पूछना शुरु
मत हो जाना
खुद भी देखो
औरों को भी
देखने दो
जो भी देखो
देखने तक रहने दो
ना खुद कुछ कहो
ना किसी और से पूछो
कि देखा कुछ ?

चित्र साभार: clipartzebraz.com

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

भाई कोई खबर नहीं है खबर गई हुई है

सारे के सारे
खबरची
अपनी अपनी
खबरों के साथ
सुना गया है
टहलने चले गये हैं
पक्की खबर नहीं है
क्योंकि किसी को
कोई भी खबर बना
कर नहीं दे गये हैं
खबर दे जाते तब भी
कुछ होने जाने
वाला नहीं था
परेशानी बस
इतनी सी है
कि समझ में
नहीं आ पा रहा है
इस बार ऐसा
कैसे हो गया
खबर दे ही
नहीं गये हैं
खबर अपने
साथ ही ले गये हैं
अब ले गये हैं तो
कैसे पता चले
खबर की खबर
क्या बनाई गई है
कैसे बनाई गई है
किस ने लिखाई है
किस से लिखवाई गई है
किसका नाम
कहाँ पर लिखा है
किस खबरची को
नुकसान हुआ है
और किस खबरची को
फायदा पहुँचा है
बड़ी बैचेनी हो गई है
जैसे एक दुधारू भैंस
दुहने से पहले खो गई है
‘उलूक’ सोच में हैं तब से
खाली दिमाग को
अपने हिला रहा है
समझ में कभी भी
नहीं आ पाया जिसके
सोच रहा है
कुछ आ रहा है
कुछ आ रहा है
बहुत अच्छा हुआ
खबर चली गई है
और खबरची के
साथ ही गई है
खबर आ
भी जाती है
तब भी कहाँ
समझ में
आ पाती है
खबर कैसी
भी हो माहौल तो
वही बनाती है ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

औरों के जैसे देख कर आँख बंद करना नहीं सीखेगा किसी दिन जरूर पछतायेगा

थोड़ा कुछ सोच कर
थोड़ा कुछ विचार कर
लिखेगा तो शायद
कुछ अच्छा कभी
लिख लिया जायेगा
गद्य हो या पद्य हो
पढ़ने वाले के शायद
कुछ कभी समझ
में आ ही जायेगा
लेखक या कवि
ना भी कहा गया
कुछ लिखता हैं तो
कम से कम कह
ही दिया जायेगा
देखे गये तमाशे
को लिखने पर
कैसे सोच लेता है
कोई तमाशबीन
आ कर अपने ही
तमाशे पर ताली
जोर से बजायेगा
जितना समझने
की कोशिश करेगा
किसी सीधी चीज को
उतना उसका उल्टा
सीधा नजर आयेगा
अपने हिसाब से
दिखता है अपने
सामने का तमाशा
हर किसी को
तेरे चोर चोर
चिल्लाने से कोई
थानेदार दौड़ कर
नहीं चला आयेगा
आ भी गया गलती से
किसी दिन कोई
भूला भटका
चोरों के साथ बैठ
चाय पी जायेगा
बहुत ज्यादा उछल
कूद करेगा ‘उलूक’
इस तरह से हमेशा
लिखना लिखाना
सारा का सारा
धरा का धरा
रह जायेगा
किसी दिन
चोरों की रपट
और गवाही पर
अंदर भी कर
दिया जायेगा
सोच कर लिखेगा
समझ कर लिखेगा
वाह वाह भी होगी
कभी चोरों का
सरदार इनामी
टोपी भी पहनायेगा ।

चित्र साभार: keratoconusgb.com

सोमवार, 14 सितंबर 2015

‘उलूक’ का बुदबुदाना समझे तो बस बुखार में किसी का बड़बड़ाना है

ना किसी को
समझाना है
ना किसी को
बताना है
रोज लिखने
की आदत है
बही खाते में
बस रोज का
हिसाब किताब
रोज दिखाना है
किसी के देखने
के लिये नहीं
किसी के समझने
के लिये नहीं
बस यूँ हीं कुछ
इस तरह से
यहीं का यहीं
छोड़ जाना है
होना तो वही है
जो होना जाना है
करने वाले हैं
कम नहीं हैं
बहुत बहुत हैं
करने कराने
के लिये ही हैं
उनको ही करना है
उनको ही कराना है
कविता कहानी
सुननी सुनानी
लिखनी लिखानी
दिखना दिखाना
बस एक बहाना है
छोटी सी बात
घुमा फिरा कर
टेढ़े मेढ़े पन्ने पर
कलम को भटकाना है
हिंदी का दिन है
हिंदी की बात को
हिंदी की भाषा में
हिंदी के ही कान में
बस फुसफुसाना है
आशा है आशावाद है
कुछ भी नहीं है
जो बरबाद है
सब है बस आबाद है
महामृत्युँजय मंत्र
का जाप करते रहे
हिंदी को समझाना है
‘उलूक’ अच्छा जमाना
अब शर्तिया हिंदी
का हिंदी में ही आना है ।

चित्र साभार: www.cliparthut.com

रविवार, 13 सितंबर 2015

कभी हिसाब लगायें अपने अंदर इंसानियत कितने दिन चलेगी कब तक कितनी बचेगी

अचानक कौंधा
कुछ औंधे लेटे हुऐ
जमीन पर घरेलू
कुत्ते के पास
मन हुआ कुछ
चिंता कर
उपाय खोजा जाये
इंसान की घटती
हुई इंसानियत पर
इस से पहले
कि इंसानियत ही
इतिहास हो जाये
कुछ देर के लिये सही
कुछ बातें खाली यूँ ही
दिल बहलाने के लिये
झूठ मूठ के लिये ही
खुद से कह ली जायें
समझ में आ चुकी
अब तक की सारी
बातें पोटलियों में बधीं
खुद के अंदर गाँठे खोल
कर फिर से देखी जायें
रोज की इधर की उधर
और उधर की इधर
करने की आदत से
थोड़ी देर के लिये ही सही
कुछ तौबा कर ली जाये
इस सब में उलझते
उलझते टटोला गया
खुद के ही अंदर
बहुत कुछ भीतर का
पता ही नहीं चला कैसे
और कब बालों वाला
कुछ जानवर जैसा
आदमी हो चला और
समझ में आने लगा
पास में बैठा हुआ
घरेलू जानवर कितना
कितना इंसान क्यों
और कैसे हो चला
थोड़ा सा धैर्य बंधा
चलो इधर खत्म भी
हो जाती है इंसानियत
तब भी कहीं ना
कहीं तो बची रहेगी
किसी मोहनजोदाडो‌
जैसी खुदाई में ‘उलूक’
की राख में ना सही
कुत्ते की हड्डी में
शर्तिया कुछ ना कुछ
तो पक्का ही मिलेगी ।

चित्र साभार: schools-demo.clipart.com

शनिवार, 12 सितंबर 2015

गुनाह करने का आजकल बहुत बड़ा ईनाम होता है

तेरी समझ में
आ रहा होता है
गुनाह और
गुनहगार
कहाँ नहीं होता है
तुझे भी पता होता है
होता रहे इससे
कुछ नहीं होता है
तू बेचता क्या है
ना तू वकील है
ना ही जज है
ना तूने मुकद्दमा
ही ठोका होता है
फिर तुझे किस
बात की खुजली
हर जगह होती है
खुजली होती है
तो खुजली का
मलहम कहीं से
क्यों नहीं लेता है
अब कोई कापी
किसी को दो घंटे
के लिये बाहर कहीं
से कुछ लिख लाने
के लिये दे देता है
तेरे कहने से
क्या होता है
सब को
पता होता है
तब भी क्या
होना होता है
जब कहीं रपट
नहीं होती है
ना ही कोई किसी
से कुछ कहता है
फिर कोई किसी को
किसी की जगह पर
परीक्षा में लिखने
लिखाने का ठेका
अगर दे भी देता है
तहकीकात होना
दिखाना ही काफी
और बहुत होता है
नाटक करने के लिये
सारा जंतर जुगाड़
किया गया होता है
हर जगह होता है
तेरे यहाँ भी किया
जा रहा होता है
तेरी किस्मत में
रोना लिखा होता है
तू क्यों नहीं दहाड़े
मार मार कर रोता है
देखा कभी किसी
बड़े चोर को
एक छोटा चोर
फाँसी देने का
हुकुम कहीं देता है
निपटाने के लिये
होती हैं ये सारी
नौटंकियाँ हर जगह
दिख जाता है
गुनहगार
माला पहने हुऐ
कहीं ना कहीं
दिख जाता है
जाँच करने वाला
चोर ही उसे
फूल का एक
गुच्छा बना
कर देता है
जो अखबार में
कभी भी कहीं
नहीं होता है
ऐसी खबर को
देने का हक
हर किसी को
नहीं होता है
‘उलूक’ तोते को
दी जाती है हमेशा
हरी मिर्च खाने को
माना कि उल्लू को
कोई नहीं देता है
तू भी कभी कभी
कुछ ना कुछ इस
तरह का खुद ही
खरीद कर क्यों
नहीं ले लेता है
मिर्ची खा कर
सू सू कर लेना
ही सबसे अच्छा
और सच में बहुत
अच्छा होता है।
चित्र साभार: www.dreamstime.com

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

दसवाँ हिंदी का सम्मेलन कुछ नया होगा सदियों तक याद किया जायेगा

हर जगह कुछ
ना कुछ अढ़ाने
की आदत है
यहाँ कैसे उसे
छोड़ पायेगा
दूर से ही सही
कुछ तो उल्टा
सीधा खोज कर
लाकर पढ़ायेगा
विश्व का है
हिंदी का है
सम्मेलन बड़ा है
छोटी मोटी बात
से नहीं घुमायेगा
छोटा होता होगा
तेरे घर के आसपास
उसी तरह का कुछ
बड़ा बड़ा किया जायेगा
जमाना अंतःविषय
दृष्टिकोण का होना
बहुत जरूरी हो
गया है आजकल
एक विषय पर ही
बात करने से
दूसरे विषय का
अपना आदमी
कहाँ समायोजित
किया जायेगा
सारे विषयों पर
चर्चा के बाद
समय बच गया
तो हिंदी पर भी
कुछ हवा में
छोड़ा जायेगा
कुछ फोड़ने
लायक हुआ तो
फोड़ा भी जायेगा
सम्मान की पड़ी है
कुछ लोगों को
उनको ना सही
उनसे मिलते जुलते
किसी ना किसी को
तो दिया ही जायेगा
सम्मानित किया
जायेगा तो दो मीटर
के कपड़े का शॉल भी
दिया ही जायेगा
दिख जायेगा किसी
ना किसी के कंधे पर
फोटो टी वी अखबार
वालों को तो बुलाया
जरूर ही जायेगा
हिंदी वाला नहीं
बुलाया गया कोई
चिंता की बात
नही करनी होगी
कुछ ना कुछ उनके
घर को डाक से
भेज दिया जायेगा
नेता होंगे राजनेता होंगे
मंच सुप्रसिद्ध व्यक्तियों
से पाट दिया जायेगा
शराबियों को रोकने
का इंतजाम किया
ही गया है पहले से ही
किसी सरकारी बड़े ने
कह ही दिया है
पीने पिलाने छी छी
की कोशिश करना छोड़
बात करने पर भी
हिंदी सम्मेलन से बाहर
फेंक दिया जायेगा
और क्या चाहिये
बता हिंदी तुझको
तेरे लिये है तेरे द्वारा
ही किया जा रहा है
तेरा उद्धार हमेशा से
मेरा कुछ नहीं है
तेरा तुझको अर्पण
ही किया जायेगा
जरूर किया जायेगा
'उलूक'
बहुत कुछ कहने
की आदत है जिसको
यहाँ आ कर पक्का
इसी तरह का कुछ
कहने से अपने को
नहीं रोक पायेगा
देख लेना जो भी
होगा सामने होगा
समय बतायेगा ।

चित्र साभार: kharinews.in

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

छोड़ भी दे देख कर लिखना सब कुछ और कुछ लिख कर देख बिना देखे भी कुछ तो जरूर लिखा जायेगा

रात को सोया कर
कुछ सपने वपने
हसीन देखा कर
सुबह सूर्य को जल
चढ़ाने के बाद ही
कुछ लिखने और
लिखाने की कभी
कभी सोचा कर
देखेगा सारा बबाल
ही चला जायेगा
दिन भर के कूड़े
कबाड़ की कहानियाँ
बीन कर जमा करने
की आदत से भी
बाज आ जायेगा
छोड़ देगा सोचना
बकरी कब गाय
की जगह लेगी कब
मुर्गे को राम की
जगह पर रख
दिया जायेगा
कब दिया जायेगा
राम को फिर वनवास
कब उसे लौट कर
आने के लिये मजबूर
कर दिया जायेगा
ऐसा देखना भी क्या
ऐसे देखे पर कुछ
लिखना भी क्या
राजा के अपने
गिनती के बर्तनों के
साथ अराजक हो
जाने पर अराजकता
का राज होकर भी
ना दिखे किसी भी
अंधे बहरे को
इससे अच्छा मौसम
लगता नहीं ‘उलूक’
तेरी जिंदगी में
फिर कहीं आगे
किसी साल में
दुबारा आयेगा
छोड़ भी दे देख
कर लिखना सब कुछ
और कुछ लिख कर
देख बिना देखे भी
कुछ तो जरूर
लिखा जायेगा ।

चित्र साभार: altamashrafiq.blogspot.com

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

समाचार बड़े का कहीं बड़ा कहीं थोड़ा छोटा सा होता है

बकरे और मुर्गे
चैंन की साँस
खींच कर
ले रहे हैं
सारे नहीं देश
में बस एक दो
जगह पर कहीं
वहीं मारिया जी की
पदोन्नति हो गई है
शीना बोरा को
आरूषि नहीं बनने दूँगा
उनसे कहा गया
उनके लिये लगता है 
फलीभूत हो गया है
मृतक की आत्मा ने
खुश हो कर
सरकार से उनको
अपने केस को छोड़
आगे बढ़ाने के लिये
कुछ कुछ बहुत
अच्छा कह दिया है
हेम मिश्रा बेल पर
बाहर आ गया है
सरकार का कोई
आदमी आकर इस
बात को यहाँ
नहीं बता गया है
खुद ही बाहर आया है
खुद ही आकर उसने
खुद ही फैला दिया है
बड़े फ्रेम की बडी खबरें
और उसके
फ्रेम की
दरारों से 
निकलती
छोटी खुरचने
रोज ही होती हैं
ऐसे में ही होता है और
बहुत अच्छा होता है
अपने छोटे फ्रेम के
बड़े लोगों की छोटी
छोटी जेबकतरई
उठाइगीरी के बीच
से उठा कर कुछ
छोटा छोटा चुरा
कर कुछ यहाँ
ले आना होता है
फिर उसे जी भर
कर अपने ही कैनवास
में बेफिक्र सजाना होता है
बड़े हम्माम से अच्छा
छोटे तंग गोसलखाने का
अपना मजा अपना
ही आनन्द होता है

उलूक करता रहता है
हमेशा कुछ ना कुछ
नौटंकी कुछ कलाकारी
कुछ बाजीगरी
उसकी रात की दुनियाँ
में इन्ही सब फुलझड़ियों
का उजाला होता है  ।

चित्र साभार:
earthend-newbeginning.com

सोमवार, 7 सितंबर 2015

खबर है खबर रहे प्रश्न ना बने ऐसा कि कोई हल करने के लिये भी कहे

क्या है ये एक डेढ़
पन्ने के अखबार
के लिये रोज एक
तुड़ी मुड़ी सिलवटें
पड़ी हुई खबर
उसे भी खींच तान
कर लम्बा कर जैसे
नंगे के खुद अपनी
खुली टाँगों के
ना ढक पाने की
जद्दोजहद में
खींचते खींचते
उधड़ती हुई बनियाँन
के लटके हुऐ चीथड़े
आगे पीछे ऊपर नीचे
और इन सब के बीच में
खबरची भी जैसे
लटका हुआ कहीं
क्या किया जा सकता है
रोज का रोज रोज की
एक चिट्ठी बिना पते की
एक सफेद सादे पन्ने
के साथ उत्तर की
अभिलाषा में बिना टिकट
लैटर बाक्स में डाल कर
आने का अपना मजा है
पोस्टमैन कौन सा
गिनती करता है
किसी दिन एक कम
किसी दिन दो ज्यादा
खबर ताजा हो या बासी
खबर दिमाग लगाने
के लिये नहीं पढ़ने सुनने
सुनाने भर के लिये होती है
कागज में छपी हो तो
उसका भी लिफाफा
बना दिया जाता है कभी
चिट्ठी में घूमती तो रहती है
कई कई दिनों तक
वैसे भी बिना पते के
लिफाफे को किसने
खोलना है किसने पढ़ना है
पढ़ भी लिया तो कौन सा
किसी खबर का जवाब
देना जरूरी होता है
कहाँ किसी किताब में
लिखा हुआ होता है
लगा रह ‘उलूक’
तुझे भी कौन सा
अखबार बेचना है
खबर देख और
ला कर रख दे
रोज एक कम से कम
एक नहीं तो कभी
आधी ही सही
कहो कैसी कही ?

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

रविवार, 6 सितंबर 2015

मेंढक और योगिक टर्राना जरूरी है बहुत समझ में आना

एक ठहरा हुआ
पानी होता है
समुद्र का होता है
एक टेडपोल सतह
पर अपने आप को
व्हैल समझने लगे
ऐसा भी होता है
समय बलिहारी होता है
उसके जैसे बाकी
टैडपोल उसके लिये
कीड़े हो जाते हैं
क्योंकि वो नापना
शुरु कर देता है
लम्बाई पूँछ की
भूल जाता है
बनना सारे
टेडपोलों को
एक दिन मैंढक
ही होता है
टर्राने के लिये
टर्र टर्र पर
टेडपोल मुँह
नहीं लगाता है
किसी भी टेडपोल को
बहुत इतराता है
तैरना भी चाहता है
तो कहीं अलग
किसी कोने में
भूल जाता है
किसी दिन जब
सारे टैडपोल
मैंढक हो जायेंगे
कौन बड़ा हो जायेगा
कौन ज्यादा बड़ी
आवाज से टर्रायेगा
उस समय किसका
टर्राना समुद्र के
नमकीन पानी में
बस डूब जायेगा
कौन सुनेगा
बहुत ध्यान
से टर्राना और
किसका सुनेगा
कैसा महसूस होगा
उसे जब पुराने
उसी के किसी
टेड़ी पूँछ वाले
साँथी के पूँछ से
दबा हुआ उसे
नजर आयेगा
टर्राने का इनाम
इसी लिये
कहा जाता है
समय के साथ
जरूरी है औकात
बोध कर लेना
समय कर दे अगर
शुरु टर्राना ‘उलूक’
उस समय टेढ़ी पूँछ
को मुँह ना लगाना
गजब कर जायेगा
गीता पढ़ो
रामायण पढ़ो
राम नाम जपो
राधे कृष्ण करो
कुछ भी काम
में नहीं आयेगा
समय खोल देता है
आँखे ही नहीं आत्मा
को भी ‘उलूक’
समझ सकता है
अभी भी समझ ले
अपने कम से कम
चार साथियों को
नहीं तो अर्थी उठाने
वाला भी तेरी कोई
दूर दूर तक नजर
नहीं आयेगा ।

चित्र साभार: www.frog-life-cycle.com

शनिवार, 5 सितंबर 2015

‘उलूक’ व्यस्त है आज बहुत एक सपने के अंदर एक सपना बना रहा है

काला चश्मा
लगा कर
सपने में अपने
आज बहुत ज्यादा
इतरा रहा है

शिक्षक दिवस
की छुट्टी है
खुली मौज
मना रहा है

कुछ कुछ 

खुद समझ
रहा है
कुछ कुछ
खुद को
समझा रहा है

समझने
के लिये
अपना गणित
खुद अपना
हिसाब किताब
लगा रहा है

सपने देख
रहा है
देखिये जरा
क्या क्या
देख पा रहा है

सरकारी
आदेशों की
भाषाओं को
तोड़ मरोड़
कर सरकार
को ही आईना
दिखा रहा है

कुछ शिष्यों
की इस
दल में भर्ती
कुछ को
उस दल में
भरती
करा रहा है

बाकी बचे
खुचों को
वामपंथी
बन जाने
का पाठ
पढ़ा रहा है

अपनी कुर्सी
गद्दीदार
बनवाने की
सीड़ी नई
बना रहा है

ऊपर चढ़ने
के लिये
ऊपर देने
के लिये
गैर लेखा
परीक्षा राशि
ठिकाने
लगा रहा है

रोज इधर
से उधर
रोज उधर
से इधर
आने जाने
के लिये
चिट्ठियाँ
लिखवा रहा है

डाक टिकट
बचा दिखा
पूरी टैक्सी
का
टी ऐ डी ऐ
बनवा रहा है

सरकारी
दुकान
के अंदर
अपनी
प्राईवेट दुकान
धड़ल्ले से
चला रहा है

किराया
अपने मित्रों
के साथ
मिल बांट कर
खुल्ले आम
आम खा रहा है

पढ़ने पढा‌ने
का मौसम
तो आ ही
नहीं पा रहा है

मौसम विभाग
की खबर है
कुछ ऐसा
फैलाया
जा रहा है

कक्षा में
जाकर
खड़े होना
शान के खिलाफ
हो जा रहा है

परीक्षा
साल भर
करवाने का
काम ऊपर
का काम
हो जा रहा है

इसी बहाने से
तू इधर आ
मैं उधर आऊँ
गिरोह
बना रहा है

कापी जाँचने
का कमप्यूटर
जैसा होना
चाह रहा है

हजारों हजारों
चुटकी में
मिनटों में
निपटा रहा है

सूचना देने में
कतई भी
नहीं घबरा
रहा है

इस पर
उसकी
उस पर
इसकी दे
जा रहा है

आर टी आई
अपनी मखौल
खुद उड़ा रहा है

शोध करने
करवाने का
ईनाम
मंगवा रहा है

यू जी सी
के ठेंगे से
ठेंगा मिला
रहा है

सातवें
वेतन आयोग
के आने
के दिन
गिनता
जा रहा है

पैंसठ की
सत्तर हो जाये
अवकाश की उम्र

गणेश जी
को पाव
लड्डू
खिला रहा है

किसे फुरसत है
शिक्षक दिवस
मनाने की
पुराना
राधाकृष्णन
सोचने वाला
घर पर
मना रहा है

‘उलूक’
व्यस्त है
सपने में अपने
उससे आज
बाहर ही
नहीं आ
पा रहा है

कृष्ण जी
की कौन
सोचे ऐसे में
जन्माष्टमी
मनाने के लिये
शहर भर के
कबूतरों से
कह जा रहा है

सपने में
एक सपना
देख देख
खुद ही
निहाल हुऐ
जा रहा है

उलूक उवाच है
किसे मतलब है
कहने में क्या
जा रहा है ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

शिक्षक दिवस इस बार राधा के साथ कृष्ण और राधाकृष्णन साथ मनाते होंगे

कम नहीं हैं बहुत हैं
होने वाले कुछ
कृष्ण हो जायेंगे
कुछ बांसुरी भी छेड़ेंगे
कुछ अपनी कुछ
राधाओं के संग
कुछ रास रचायेंगे
कुछ अर्जुन भी होंगे
कुछ दुर्योधनों के
साथ चले जायेंगे
कुछ कहीं गीता
व्यास की बाँचेंगे
कुछ गुरु ध्यान
करना शुरु हो जायेंगे
शिक्षा की कुछ बातें
कुछ की कुछ बातों
में से ही निकल
कर बाहर
कुछ आयेंगी
कुछ शिक्षा
और कुछ
शिक्षकों के
संदर्भ की
नई कहानियाँ
बन जायेंगी
कुछ गीत होंगे
कुछ कविताऐं भी
सुनाई जायेंगी
कुछ शिक्षक होंगे
कुछ फूल होंगे
कुछ शाल होंगे
कुछ मालायें होंगी
कुछ चेहरे होंगे
कुछ मोहरे होंगें
कुछ खबरों में होंगे
कुछ तस्वीरों में होंगे
बनेगा अवश्य ही
कुछ अद्भुत संयोग
कुछ इस बार के
शिक्षक दिवस पर
कुछ ना कुछ तो
बन ही रहा है योग
शिक्षा के पीले वृक्ष
को जड़ उखाड़ कर
कुछ परखा जायेगा
मिट्टी पानी
हवा हटा कर
कंकरीट डाल फिर
मजबूत किया जायेगा
हर बार की तरह नहीं
इस बार कुछ अलग
कुछ नये इरादे होंगे
राधाकृष्णन
की यादें होंगी और
वहीं साथ में राधा के
कृष्ण के साथ किये
कुछ पुराने वादे होंगे
‘उलूक’ पता नहीं
कौन सा दिन मनायेगा
कुछ तो करेगा ही
हेड टेल करने के लिये
एक सिक्का पुराना
ढूँढ कर कहीं से
जरूर ले कर आयेगा।

चित्र साभार:
www.pinterest.com
livechennai.com

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

सकारात्मक और नकारात्मक हवा को देखने के नजरिये से पता चल जाता है

कभी लगता है
आता है
कभी लगता है
नहीं आता है
जब बहुत ज्यादा
भ्रम होना शुरु
हो जाता है
सोचा ही जाता है
पूछ ही लेना चाहिये
पूछने में किसी
का क्या जाता है
ऐसा सोच कर जब
जमूरा उस्ताद के
धौरे पहुँच जाता है
तो उस्ताद भी
मुस्कुराते हुऐ
बताता है
बहुत आसान
सा प्रश्न है जमूरे
देख अपने ही
सामने से एक
खाली जगह को
देखते देखते
सारी जिंदगी
एक आदमी
सोच सोच कर
कुछ बन रहा है
कुछ बन रहा है
देखते सोचते
गुजर भी जाता है
उसके मरने के बाद
उसका जैसा ही
दूसरा इसी बनने
की बात को
आगे बढ़ाता है
बन रहा है की जगह
पक्का बन रहा है
फैलाना शुरु
हो जाता है
सकारात्मक
कहा जाता है
ऐसे ही
सकारात्मक
लोगों में से ही
सबसे
सकारात्मक को
बन रहा है
कहने को
आगे बढ़ाने का
ठेका भी
दिया जाता है
नकारात्मक
खाली खाली
रोज खाली
जगह को
देखने खाली
चला आता है
देखता है
सोचता है
खाली है
खाली है
कहते कहते
खाली बेकार
में आता है और
खाली चला
जाता है
ऐसे खाली
लोगों को
खाली ही रहने
दिया जाता है
‘उलूक’
उसी खाली
जमीन को
देखते देखते
ऊँघता हुआ
पेड़ की किसी
डाल पर पंजे से
अपने कान
खुजलाता है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

बुधवार, 2 सितंबर 2015

कल का कबाड़ इंटरनेट बंद होने से कल शाम को रीसाईकिल होने से टप गया

अंदाज
नहीं आया
उठा है या
सो गया
कल
सारे दिन
इंटरनेट
जैसे
लिहाफ एक
मोटा सा
ओढ़ कर
उसी के
अंदर ही
कहीं
खो गया

इन तरंगों
में बैठ कर
उधर से
इधर को
वैसे भी
कुछ कम
ही आता है
और जाता है

बहुत
कोशिश
करने पर भी
इधर का कुछ
उधर धक्के दे दे
कर भेजने पर
भी नहीं गया

ये भी
कोई कहने
की बात है

अब
नहीं चला
तो नहीं चला

कई चीजें
खाली चलने
वाली ही नहीं
बल्की फर्राटा
दौड़ दौड़ने
वाली
कब से कहीं
जा कर खड़ी हो गई

उधर
तो कभी
किसी
खुली आँखों
वाले की नजर
भी नहीं गई

चल रही है
दौड़ रही है
की खबरें
बहुत सारी
अखबारों में
तब से और
ज्यादा बड़ी
आनी
शुरु हो गई

चलते
रहने से
कहीं पहुँच
जाने का
जमाना ही
अब नहीं
रह गया
पहुँच गया
पहुँच गया
फैलाना
ही फैलाने
के लिये
खड़े होकर
एक ही
जगह पर
बहुत हो गया

‘उलूक’
रोना
ठीक नहीं
इंटरनेट के
बंद हो जाने पर

कितना
खुश हुआ
होगा जमाना
कल

सोच
सोच कर
चटने
चटाने से
एक ही
दिन सही
बचा तो सही
बहुत कुछ
बहुत बहुत
बच गया ।

चित्र साभार: cliparts.co

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