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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

बंदरों के नाटक में जरूरी है हनुमान जी और राम जी का भी कुछ घसीटा

बंदर ने बंदर
को नोचा और
हनुमान जी ने
कुछ नहीं सोचा
तुझे ही क्यों
नजर आने
लगा इस सब
में कोई लोचा
भगवान राम जी
के सारे लोगों
ने सारा कुछ देखा
राम जी को भेजा
भी होगा जरूर
चुपचाप कोई
ना कोई संदेशा
समाचार अखबार
में आता ही है हमेशा
बंदर हो हनुमान हो
चाहे राम हो
आस्था के नाम पर
कौन रुका कभी
और किसने है
किसी को रोका
मौहल्ला हो शहर हो
राज्य हो देश हो
तेरे जैसे लोगों
ने ही
हमेशा ही
विकास के पहिये
को ऐसे ही रोका
काम तेरा है देखना
फूटी आँखों से
रात के चूहों के
तमाशों को
किसने बताया
और किसके कहने
पर तूने दिन का
सारा तमाशा देखा
सुधर जा अभी भी
मत पड़ा कर
मरेगा किसी दिन
पता चलेगा जब
खबर आयेगी
बंदरों ने पीटा
हनुमान ने पीटा
और उसके बाद
बचे खुचे उल्लू

उलूक को राम
ने भी जी भर कर
तबीयत से पीटा ।

चित्र साभार:
www.dailyslave.com

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

आ जाओ अलीबाबा फिर एक बार खेलने के लिये चोर चोर

रोज जब चोरों से
सामना होता है
अलीबाबा तुम
बहुत याद आते हो
सारे चोर खुश
नजर आते हैं
जब भी चोर चोर
खेल रहे होते हैं
और जोर जोर से
चोर चोर चिल्लाते हैं
चोर अब चालीस
ही नहीं होते हैं
मरजीना अब
नाचती भी नहीं है
अशर्फियाँ तोलने
के तराजू और
अशर्फियाँ भी
अब नहीं होते हैं
खुल जा सिमसिम
अभी भी कह रहे हैं
लोग खड़े हैं चट्टानों
के सामने से
इंतजार में खुलने के
किसी दरवाजे के
अलीबाबा बस एक
तुम हो कि दिखाई
ही नहीं देते हो
आ भी जाओ
इससे पहले हर कोई
निशान लगाने लगे
दरवाजे दरवाजे
इस देश में और
पैदा होना शुरु हों
गलतफहमियाँ
लुटने शुरु हों
घर घर में ही
घर घर के लोग
डर अंदर के फैलने
लगें बाहर की तरफ
मिट्टी घास और पेड़
पानी बादल और
काले सफेद धुऐं में भी
रहम करो ले आओ
कुछ ऐसा जो ले पाये
जगह खुल जा
सिमसिम की
और पिघलना शुरु
हो जायें चट्टाने
बहने लगे वो सब
जो मिटा दे सारे
निशान और पहचान
सारी कायनात
एक हो जाये और
समा जाये सब कुछ
कुछ कुछ ही में
आ भी जाओ
अलीबाबा
इस से पहले की
देर हो जाये और
‘उलूक’ को नींद
आ जाये एक नये
सूरज उगने के समय ।

चित्र साभार: www.bpiindia.com

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

राम ही राम हैं चारों ओर हैं बहुत आम हैं रावण को फिर किसलिये किस बात पर जलाया

विजया दशमी
के जुलूस
में भगदड़
मचने पर
पकड़ कर
थाने लाये
गये दो लोगों
से जब
पूछताछ हुई

एक ने
अपने को
लंका का राजा
रावण बताया
दस सिर
तो नहीं थे
फिर भी
हरकतों से
सिर से पाँव
तक रावण
जैसा ही
नजर आया

और

दूसरे की
पहचान
बहुत
आसानी से
अयोध्या के
भगवान राम
की हुई
जिनको बिना
देखे भी
सारे के सारे
रामनामी
दुपट्टे ओढ़े
भक्तों ने
आँख नाक
कान बंद
कर के
जय श्री राम
का नारा
जोर शोर
से लगाया 


दोनो ने
अपना गाँव
इस लोक
में नहीं
परलोक में
कहीं होना
बताया

मजाक ही
मजाक में
उतर गये
उस लोक से
इस लोक में
इस बार
दशहरा
पृथ्वी लोक
में आकर
खुद ही देखने
का प्लान
उन्होने
खुद नहीं
उनके लिये
ऊपर उनके ही
किसी चाहने
वाले ने बनाया

ऊपर वालों ने
नीचे आने जाने
में अड़ंगा भी
नहीं लगाया

भीड़ से
पल्ला पड़ा जब
राम और
रावण का
नीचे उतर कर
भीड़ में से
किसी ने
अपने आप को
राम का भाई
किसी ने चाचा
किसी ने बहुत ही
नजदीक का
ताऊ बताया

रावण के
बारे में
पूछने पर
किसी ने
कोई जवाब
नहीं दिया
इसने उससे
और उसने
किसी और
से पूछने
की राय दे
कर अपना
मुँह इधर
और
उधर को किया
सभी ने
अपना अपना
पीछा रावण
को देखते
ही छुड़ाया

राम की
बाँछे खिली
सामने खड़ी
सारी जनता
से उनकी
खुद की
रिश्तेदारी मिली

और

रावण बेचारा
सोच में पड़े
खड़ा रह पड़ा
किसलिये
और
किस मुहूर्त में
राम के साथ
रामराज्य
की ओर
ऊपर से नीचे
एक बार
और
अपनी जलालत
देखने
निकल पड़ा ?

चित्र साभार: www.shutterstock.com

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

शव का इंतजार नहीं शमशान का खुला रहना जरूरी होता है

हाँ भाई हाँ
होने होने की
बात होती है
कभी पहले सुबह
और उसके बाद
रात होती है
कभी रात पहले
और सुबह उसके
बाद होती है
फर्क किसी को
नहीं पड़ता है
होने को जमीन से
आसमान की ओर
भी अगर कभी
बरसात होती है
होता है और कई
बार होता है
दुकान का शटर
ऊपर उठा होता है
दुकानदार अपने
पूरे जत्थे के साथ
छुट्टी पर गया होता है
छुट्टी लेना सभी का
अपना अपना
अधिकार होता है
खाली पड़ी दुकानों
से भी बाजार होता है
ग्राहक का भी अपना
एक प्रकार होता है
एक खाली बाजार
देखने के लिये
आता जाता है
एक बस खाली
खरीददार होता है
होना ना होना
होता है नहीं
भी होता है
खाली दुकान को
खोलना ज्यादा
जरूरी होता है
कभी दुकान
खुली होती है और
बेचने के लिये कुछ
भी नहीं होता है
दुकानदार कहीं
दूसरी ओर कुछ
अपने लिये कुछ
और खरीदने
गया होता है
बहुत कुछ होता है
यहाँ होता है या
वहाँ होता है
गन्दी आदत है
बेशरम ‘उलूक’ की
नहीं दिखता है
दिन में उसे
फिर भी देखा और
सुना कह रहा होता है ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

बहुत बार मन गधा गधा हो जाता है गधा ही बस अपना सा लगता है और बहुत याद आता है

कई बार लिखते समय
कई संदर्भ में याद
आये हो गधे भाई
बहुत दिन हो गये
मुलाकात किये हुऐ
याद किये हुऐ
बात किये हुऐ
कोई खबर ना
कोई समाचार
आज तुम्हारी याद
फिर से है आई
जब से सुनी है
जानवर के चक्कर में
आदमी की आदमी से
हुई है खूनी
रक्तरंजित हाथापाई
आये भी कोई
खबर कैसे तुम्हारी
ना किसी खबरची ने
ना ही किसी अखबार ने
तुममें कोई दिलचस्पी
आज तक महसूस
ही नहीं हुआ कि
हो कभी दिखाई
मुलाकात होती तो
होती भी कैसे
ना अरहर की दाल
से ही तुम्हें
कुछ लेना देना
ना मुर्गे से ही
होता है तुम्हारा कभी
कुछ सुनना कहना
गाय और भैंस में से
एक भी नहीं कही
जा सकती तुम्हारी
नजदीक की या
बहुत दूर की बहना
बस तालमेल दिखता है
तुम्हारा अगर कहीं तो
सिर्फ और सिर्फ
अपने धोबी से
कुछ गंदे कुछ मैले कुचैले
कुछ साफ सुथरे धुले हुऐ
कपड़ों के थैले से
अब ऐसा भी होना
क्या होना
देश के किसी भी
काम के नहीं
शरम तुम्हें पता नहीं
कभी आई की नहीं आई
घास खाना हिनहिनाना
और बस खड़े खड़े ही सोना
ना खाने के काम के
ना दिखाने के काम के
चुनाव चिन्ह ही बन जायें
ऐसा जैसा भी
तुमसे नहीं है
कभी भी होना
कितना अच्छा है
ना भाई गधे
ना तुम्हें किसी ने पूछना
ना तुम्हें छेड़ने के कारण
किसी पर किसी को
काली स्याही भी कभी
फेंकने के लिये किसी को
ढकोसला कर कर के रोना
आ भी जाया करो
दिखो ना भी कहीं
याद में ही सही
गर्दभ मयी हो गया हो
जहाँ सब कुछ
बचा हुआ ही ना लगे
कि है कहीं कुछ
तुमसे गले मिल कर
ढाड़े मार मार कर
आज तो ‘उलूक’ को
भी है देश के नाम पर
देशभक्ति दिखाने
और ओढ़ने के लिये रोना ।

चित्र साभार: www.cliparthut.com

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

बातें बनाने तक की बात है चल ही जाती हैं नहीं चलती है तो फौज लगा कर चला दी जाती हैं

बातें
कितनी भी
बना ली जायें
लगता है
अभी कुछ ही
कहा गया है
बहुत कुछ है
जो बचा हुआ
रह गया है

जल की
इतनी बूँदें
होती और
जमा हो
गई होती
जलजला
ला देती
बहा देती
बहुत कुछ
छोड़ दिया
जाता समय
के साथ
बहने के
लिये अगर

फिर लगता है
बातें भी बूँद बूँद
ही जमा होती हैं
जैसी जगह मिले
उसी की जैसी
हो लेती हैं

सामंजस्य हो
बात का
बात के साथ
जरूरी
नहीं होता है
कुछ बातें
खुद ही
तरतीब से
लग जाती हैं
कुछ
अपने ही आप
एक दूसरे पर
चढ़ जाती हैं
निकलना
चाहती हैं 
अंदर से बाहर

बेतरतीबी से
ऊँची नीची
सोच के साथ
उसी सोच
पर चढ़ कर
या उतर कर

आसान भी
नहीं होता है
बाँधें रखना
या फिर यूँ ही
छोड़ देना
बातों की
नकेल को

बातें एक साथ
अगर कह भी
दी जाती हैं
बाढ़ फिर भी
नहीं कभी
आ पाती है
बातें
पानी की तरह
बह तो जाती हैं
पर
दूर तक कहीं भी
नजर नहीं आती हैं
उनके निशान भी
समय की रेत
पर खो जाते हैं

सबके बस में
नहीं होता है
जमा किये
रहना बातों को
कुछ बहा देते हैं
यूँ ही कहीं भी
बातों को
बातों ही
बातों में

बातों के बादल
भी नहीं बनते हैं
बात बात में
फटते भी नहीं हैं

बातें
निचोड़नी
पड़ती हैं
कुछ पीनी
पड़ती हैं
कुछ जीनी
पड़ती हैं

बात तो
तब बनती है
जब कोई बात
बहुत ही
धीरे धीरे
हौले हौले से
बात की बात में
बातों के बीच
छोड़ दी जाती है

कब काट
जाती है
कब फाड़
जाती है
कब कहाँ
किस को
चीर जाती है

उसके बाद
मटकती
उछलती
चल देती है
हर जगह
जा जा कर
नाच दिखाती है

देखते रह जाते हैं
बातें बनाने वाले
उनकी खुद की
कहीं बात उन्हीं को
लपेट ले जाती है

‘उलूक’
जानता है
बहुत अच्छी तरह
सबसे
अच्छी बात
ऐसी ही
एक बात
होती है जो
किसी के भी
समझ में
कभी भी
नहीं आ पाती है

बातें बनाना
वैसे भी
किसी को भी
कहीं भी
नहीं सिखाया
जाता है
बातें तो
बात ही बात में
यूँ ही
चुटकी में
बना दी जाती हैं

मुश्किल
तब होती है
जब बातों
में से ही
एक बात
च्यूइंगम
हो जाती है ।

चित्र साभार:
www.shutterstock.com

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

सावन गुजरा इक्कीस इक्यावन ऐक सौ एक होते होते हो गये ग्यारा सौ हरा था सब कुछ हरा ही रहा

सावन
निकल गया
कुछ नया
नहीं हुआ
पहले भी
सारा
हरा हरा
ही नजर
आया है
अब तो
हरा जो है
और भी
हरा हरा
हो गया है
किससे कहूँ
किसको बताऊँ
हरा कोई
नहीं देखता है
हरे की जरूरत
भी किसी
को नहीं है
ना ही
जरूरत है
सावन की

मेरे शहर में
जमाने गये
बहुत से
लोग हुऐ
हाय
उस समय
सोचा भी नहीं

किसी ने
बहुत
जोर देकर
हरे को
हरा ही कहा
एक दिन नहीं
कई बार कहा
यहाँ तक
कहा हरा
कि
सारे लोगों ने
उसे पागल
कह दिया

होते होते
सारा सब कुछ
हरा हरा हो गया
एक नहीं दो नहीं
पूरा शहर ही
पागलों का हो गया

ऐसा भी
क्या हरा हुआ
हरा भरा शहर
बचपन से हरा
होता हुआ
देखते देखते
सब कुछ
हरा हो गया
लोग हरे
सोच हरी
आत्मा हरी
और
क्या बताऊँ
जो हरा
नहीं भी था
वो सब कुछ
हरा हो गया

इस सारे हरे
के बीच में
जब ढूँढने
की कोशिश
की सावन
के बाद

बस जो
नहीं बचा था
वो ‘उलूक’
का हरा था
हरा नजर
आया ही नहीं
हरे के
बीच में
हरा ही
खो गया ।

चित्र साभार: www.vectors4all.net

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

लिखे पर चेहरा और चेहरे पर लिखा हुआ दिखता

कभी किसी दिन
चेहरे लिखता तो
कहीं कुछ दिखता
बिना चेहरे के लिखा
भी क्या लिखा
गर्दन से कटा
बचा कुचा बाकी
शरीर के नीचे का
बेकार सा हिस्सा
चेहरा लिखने का
मतलब चेहरा
और बस चेहरा
आईने में देखी
हुई शक्ल नहीं
छोटे कान नहीं
ना ही बहुत लम्बी
नाक ना पतली गर्दन
ना काली आँख
ना वैसा ना
वैसे जैसा कुछ
कुछ नहीं तो
पैमाना लिखता
कहीं नपता
पैमाना सुनता
मदहोश होता
कुछ कभी कहीं
किसी के लिये
क्या पता अगर
मयखाना लिखता
लिखना और नहीं
लिखना बारीक
सी रेखा बीच में
लिखने वालों और
नहीं लिखने वालों
के बीच की
लिखे के बीच में से
झाँकना शुरु होता
हुआ चेहरा लिखता
चेहरे के दिखते
पीछे का धुँधलाना
शुरु होता लिखा
और लिखाया दिखता
अच्छा होता पहाड़ी नदी
से उठता हुआ सुबह
सवेरे का कोहरा लिखता
स्याही से शब्द लिखते
लिखते छोड़ देता लकीर
उसके ऊपर लिख कर
देखता चेहरे बस चेहरे
चेहरे पर चेहरे लिखता
देखता लिखा हुआ
किसे दिखता और
किसे नहीं दिखता ।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

आज यानी अभी के अंधे और बटेरें

कोई भी कुछ
नहीं कर सकता
आँखों के परदों
पर पड़ चुके
जालों के लिये
साफ दिखना
या कुछ धुँधला
धुँधला हो जाना
अपना देखना
अपने को पता
पर मुहावरों के
झूठ और सच
मुहावरे जाने
कहने वाले
कह गये
बबाल सारे
जोड़ने तोड़ने
के छोड़ गये
अब अंधे के
हाथ में बटेर
का लग जाना
भी किसी ने
देखा ही होगा
पर कहाँ सिर
फोड़े ‘उलूक’ भी
जब सारी बटेरें
मुहँ चिढ़ाती हुई
दिखाई देने लगें
अंधों के हाथों में
खुद ही जाती हुई
और हर अंधा
लिये हुऐ नजर
आये एक बटेर
नहीं बटेरें ही बटेरें
हाथ में जेब में
और कुछ नाचती
हुई झोलों में भी
कोई नहीं समय
की बलिहारी
किसी दिन कभी
तो करेगा कोई
ना कोई अंधा
अपनी आँख बंद
नोच लेना तू भी
बटेर के एक दो पंख
ठंड पड़ जायेगी
कलेजे में तब ही
फिर बजा लेना
बाँसुरी बेसुरी अपनी ।

चित्र साभार: clipartmountain.com

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

कुछ भी लिख देना लिखना नहीं कहा जाता है

एक बात पूछूँ
पूछ
पर पूछने से पहले
ये बता
किस से पूछ रहा है
पता है
हाँ पता है
किसी से नहीं
पूछ रहा हूँ
आदत है पूछने की
बस यूँ ही ऐसे ही
कुछ भी कहीं भी
पूछ रहा हूँ
तुमको कोई
परेशानी है
तो मत बताना
बताना जरूरी
नहीं होता है
कान में बता
रहा हूँ वैसे भी
कोई नहीं
कुछ बताता है
पूछने से ही
गुस्सा हो जाता है
गुर्राता है
कहना शुरु
हो जाता है
अरे
तू भी पूछने
वालों में
शामिल हो गया
मुँह उठाता है
और पूछने
चला आता है
ये नहीं कि
वैसे ही हर कोई
पूछने में लगा
हुआ होता है
एक दो पूछने
वालों के लिये
कुछ जवाब सवाब
ही कुछ बना कर
क्यों नहीं ले आता है
हमेशा जो दिखे
वही साफ साफ
बताना अच्छा
नहीं माना जाता है
रोटी पका सब्जी देख
दाल बना भर पेट खा
खाली पीली
अपनी थाली अपने पेट
से बाहर किसलिये
फालतू में झाँकने
चला आता है
‘उलूक’
समाज में रहता है
क्यों नहीं
रोज ना भी सही
कुछ देर के लिये
सामाजिक क्यों
नहीं हो जाता है
पूछने गाछने के
चक्कर में किसलिये
प्रश्नों का रायता
इधर उधर फैलाता है ।

चित्र साभार: serengetipest.com

सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

शिव की बूटी के उत्थान का समय भी आ रहा है


तब सही
समझे थे
या अब सही
समझ रहे हैं
बस इतना सा
समझ में नहीं
आ पा रहा है
जो है सो है
मजा तो
आ रहा है
बहुत दिनो के
बाद कुछ कुछ
लगा जैसे
पहाड़ी राज्य
की किस्मत का
दरवाजा ऊपर वाला
अब जाकर जल्दी
खोलने जा रहा है
भाँग की खेती
करने का अधिकार
जल्दी ही सरकार
के द्वारा पहाड़ी
किसानो को
दिया जा रहा है
बहुत अच्छी बात
इसमें जो बताई
समझाई गई है
उससे कोई खतरा
किसी को नहीं होगा
जैसा आभास
पहली बार में ही
आ जा रहा है
जंगलों में इफरात
से उगती है भाँग
जिस जमीन पर
काले सोने के
नाम से आज
भी ओने कोने
में बेचा खरीदा
जा रहा है
खेतों में उगाया
जायेगा अब
काला सोना
ठेका सरकार
और सरकार के
नुमाँइंदों को ही
दिया जा रहा है
सुरा ने किये
बहुत सारे
चमत्कार
इतिहास में लिखा
है बहुत कुछ
अब वही प्रयोग
पुन: एक बार कर
भाँग और भाँग से
बनने वाले शिव
भगवान की बूटी
को पहाड़ के
कोने कोने में
पहुँचाने का
अप्रतिम प्रयास
किया जा रहा है
जय हो देव भूमी
और देवताओं की
मुँह मत बिसूर
खुश हो ले ‘उलूक’
झूठ में ही सही
असुरों के सुरों पर
शोध करने का
सामान बहुत सा
जगह जगह के
लिये जमा
किया जा रहा है ।

चित्र साभार:
www.shrisaibaba.com
legalizethecannabis.tumblr.com

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

अनदेखा ना हो भला मानुष कोई जमाने के हिसाब से जो आता जाता हो

पापों को
अगर अपने
किसी ने
कह
दिया हो
फिर सजा
देने की बात
सोचने की
सोच किसी
की ना हो

हो अगर कुछ
उसके बाद
थोड़ा कुछ
ईनाम
वीनाम हो 
थोड़ा बहुत
नाम वाम हो 

कुछ सम्मान
वम्मान हो
उसका भी हो
तुम्हारा भी हो
हमारा भी हो

झूठ
वैसे भी
बिक नहीं
सकता कभी
अगर
खरीदने वाला
खरीददार
ही ना हो

कुछ
बेचने की
कुछ
खरीदने की
और
कुछ
बाजार की
भी बात हो
चाहे कानो
कान हो

सोच लो
अभी भी
मर ना
पाओगे
मोक्ष पाने
के लिये
कीड़ा
बना कर
लौटा कर
फिर वापस
यहीं कहीं
भेज दिये
जाओगे

जमाने के
साथ चलना
इसलिये भी
सबके लिये
बराबर हो
और
जरूरी हो

सीखना
झूठ बेचना
भी सीखने
सिखाने में हो
बेचना नहीं
भी अगर
सीखना हो
कम से कम
कुछ खरीदना
ही थोड़ा बहुत
समझने
समझाने में हो

खुद भी
चैन से
रहना
और
रहने
देना हो

‘उलूक’
आदत हो
पता हो
आदमी के
अंदर से
आदमी को
निचोड़ कर
ले आना
समझ में
आता हो

अनदेखा
ना
होता हो
भला मानुष
कोई भी
कहीं इस
जमाने में
जो किताबों
से इतर
कुछ मंत्र
जमाने के
हिसाब के
नये
बताता हो
समझाता हो ।

चित्र साभार: sushkrsh.blogspot.com

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

आग लिखना सरल है बाकी फालतू की आग है

आग है
बहुत है
इधर भी है
उधर भी है
जल भी रहा
है बहुत कुछ
राख है और
बहुत है
इधर भी है
उधर भी है
लगा हुआ है
धौंकने में
चिंगारी कोई
इधर भी है
उधर भी है
हो भी रहा है
कुछ नहीं भी
हो रहा है
इधर भी कुछ
उधर भी कुछ
अलग अलग
है आग है
इधर की है अलग
अलग है आग
उधर की है
आग सोच की है
आग मोबाईल की है
आग फैशन की है
आग मोटर
साइकिल की है
आग पढ़ने की है
आग पढ़ाने की है
आग निभाने की है
आग पचाने की है
आग जमा करने की है
 आग जलने की है
आग जलाने की है
आग लकड़ियों की है
आग जंगल और
जंगलियों की है
आग सब्सीडी की है
आग मेहनत की है
आग हराम खोरी की है
‘उलूक’ रुक जा रुक जा
मत बाँट आग को
तो कम से कम
आग आग है
आँख आँख है
परेशान मत हुआ कर
हर आस्तीन में साँप है
जरूरी भी है जो है
काटने वाला नहीं है
बस दिखाने का साँप है ।

चित्र साभार: newyork.cbslocal.com

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

ऊपर जाने के रास्ते समझो जरा नीचे से निकल कर जाने हो रहे हैं

डूबते हुऐ जहाज
में बहुत तेजी
से हो रहे हैं
एक नहीं एक
साथ हो रहे हैं
सारे हो रहे हैं
सारे के सारे
काम ही हो रहे हैं
काम का दिखना
जरूरी नहीं है
जरूरी है देखना
किनारे से
भोंपुओं के सहारे
सहारे से कई
इशारे हो रहे हैं
हो रहें हैं कि
नहीं हो रहे हैं
इतनी गजब की
बातें हो रही है
ये सब कुछ
जल्दी ही गिन कर
गिनीज बुक को
बताने हो रहे हैं
जहाज की सैल्फी
डूबती हुई जनता
खुद ही ले रही है
किस्मत बहुत ही
खराब है कुछ
लोगों की जहाँ
जहाज चलाने वाले
के लोगों के शोर
नगाड़ों के शोर
में खो रहे हैं
किसी के होश
उड़ रहे हैं जहाज
के डूबने की
सोच सोच कर
पैंट के पाँयचे
ना जाने किस डर
से गीले हो रहे हैं
बेवकूफ का बेवकूफ
रह गया ‘उलूक’
उसे तो हमेशा
दिखा है सोचने
समझने के
लाले हो रहे हैं
वादा किया भी है
ऊँचाईयों में ले
जाने का जहाज
वादा निभाने के
लिये ही तो काम
सारे हो रहे हैं
किसने कह दिया
ऊपर को ही जाना
जरूरी है ऊँचाईयाँ
छूने के लिये
मन लगा कर
इच्छा से डूब कर
भी ऊपर को ही
जाने के रास्ते
जब बहुत
आसान और
बहुत सारे हो रहे हैं ।

चित्र साभार: blogs.21rs.
es  

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

ना इसका हूँ ना उसका हूँ क्या करूं इधर भी हूँ उधर भी रहना ही रहना है

मत नाप लिखे
हुऐ वाक्यों की
लम्बाई को
पैमाना हाथ
में लेकर अपने
कुछ भी तो कहीं
भी नहीं होना है
दो इंच बड़ा भी
हो जाये या
तीन इंच आगे
या पीछे से कहीं
कम भी अगर
कहीं किसी बात
को होना है
इधर का इधर
और उधर का उधर
बस बहस के लिये
कैमरे के सामने
बैठ कर दिखाने
सुनाने का रोना है
नहीं समझेगा
फिर भी पता है
तुझे तेरे अपने
फटे में खुद ही
हाथ डाल कर
सोचना अपने
ही खेलने के लिये
कोई खिलौना है
लिख कुछ बोल कुछ
दिखा कुछ बता कुछ
छपा कुछ दे कुछ
दिला कुछ पता
किसी को कुछ
भी नहीं होना है
काले कोयले का
धुआँ सफेद
राख सफेद
बचा कहीं उसके
बाद कहीं कुछ
नहीं होना है
लगा रह देखने में
कुछ कलाबाजी
कुछ कलाकारी
दिखना सब सफेद
है साफ सुथरा
कुछ दिनो के बाद
कौन सा किस को
कहाँ उसी जगह पर
लम्बे समय तक
खसौटे गये को
दिखने दिखाने
के लिये रहना है
‘उलूक’
की आदत है
उसको भी कुछ भी
कभी भी कहीं भी
कहने के लिये
ही बस कुछ कहना है ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

गाय बहुत जरूरी होती है श्राद्ध करने के बाद पता चल रहा था

श्राद्ध पक्ष अष्टमी
पिता जी का श्राद्ध
सुबह सुबह पंडित जी
करवा कर गये आज
साथ में श्राद्ध में
प्रयोग हुऐ व्यँजनों
को किसी भी गाय
को खिलाने का
निर्देश भी दे गये
गलती से भी कौर
खाने का किसी
बैल के मुँह में
गाय से पहले
ना लगे जरा सा
खबरादर भी
कर के गये
श्राद्ध करने कराने
तक तो सब
आसान सा ही
लग रहा था
कोई मुश्किल
नहीं पड़ी थी
सब कुछ ठीक
ठाक चल रहा था
गाय की बात
आते ही समस्या
लेकिन बड़ी एक
खड़ी हो गई थी
रोज कई दिनों से
अखबार टी वी रेडियो
जगह जगह
से गाय गाय
की माला जपना
हर किसी का दिखता
हुआ मिल रहा था
गाय को देखे सुने
कई जमाने हो चुके थे
घर के आस पास
दूर दूर तक गाय
का पता नहीं
मिल रहा था
घर से निकला
हर दुकान में
गाय का प्लास्टिक
का पुतला जरूर
दिख रहा था
पीठ में एक छेद था
पैसा डालने के लिये
आगे कहीं एक
नगरपालिका का
कूड़ेदान दिख रहा था
एक घायल बैल
प्लास्टिक के एक बंद
थेले के अंदर के कचरे
के लिये जीजान से
उस पर पिल रहा था
‘उलूक’ चलता ही
जा रहा था गाय
की खोज में
गाय गाय सोचता
हुआ चल रहा था
खाने से भरा थैला
उसके दायें हाथ से
कभी बायें हाथ में
कभी बायें हाथ से
दायें हाथ में
अपनी जगह को
बार बार
बदल रहा था ।

चित्र साभार: www.allfreevectors.com

रविवार, 4 अक्तूबर 2015

गांंधी बाबा देखें कहाँ कहाँ से भगाये जाते हो और कहाँ तक भाग पाओगे

गांंधी जी मैं
कह ही रहा था
कल परसों की
ही बात थी
कब तक बकरी
की माँ की तरह
खैर मनाओगे
दो अक्टूबर
तुम्हारी बपौती
नहीं है किसी दिन
मलाई में गिरी
मक्खी की तरह
निकाल कर कहीं
फेंक दिये जाओगे
हो गया शुरु
तुम्हारा भी
देश निकाला
आ गई है खबर
सरकार ने सरकारी
आदेश है निकाला
‘गांंधी आश्रम’ के
सूचना पटों से
अभी निकाले जाओगे
‘खादी भारत’ होने
जा रहा है
नया नामकरण
खादी बुनने बुनाने
की किताबों से भी
भगा दिये जाओगे
काम हो रहा है
हर जगह तेजी से
नाम से नाम को
हर जगह मिटता
मिटाता लुटता लुटाता
अब आगे यही
सब देख पाओगे
बहुत कर लिये
मौज बाबा गांंधी
इतिहास की किताबों
से खोद निकाल कर
जल्दी ही खेतों के
गड्ढों में भी
बो दिये जाओगे
देख रहा है ‘उलूक’
बहुत कुछ देखना है
अच्छा होने वाला
अच्छे दिनों में
राष्ट्रपिता की कुर्सी
पर जल्दी ही किसी
नेता जी को ऊपर से
अपने बैठा हुआ पाओगे ।

चित्र साभार: news.statetimes.in

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

लिखना सीख ले अब भी लिखने लिखाने वालों के साथ रहकर कभी खबरें ढूँढने की आदत ही छूट जायेगी

वैसे कभी सोचता
क्यों नहीं कुछ
लिख लेना सीख
लेने के बारे में भी
बहुत सी समस्याँऐं
हल हो जायेंगी
रोज एक ना एक
कहीं नहीं छपने
वाली खबर को
लेकर उसकी कबर
खोदने की आदत
क्या पता इसी
में छूट जायेगी
पढ़ना समझना
तो लगा रहता है
अपनी अपनी
समझ के
हिसाब से ही
समझने ना
समझने वाले
की समझ में
घुसेगी या
बिना घुसे ही
फिसल जायेगी
लिखने लिखाने
वालों की खबरें ही
कही जाती हैं खबरें
लिखना लिखाना
आ जायेगा अगर
खबरों में से एक
खबर तेरी भी शायद
कोई खबर हो जायेगी
समझ में आयेगा
तेरे तब ही शायद
‘उलूक’
पढ़े लिखे खबर वालों
को सुनाना खबर
अनपढ़ की बचकानी
हरकत ही कही जायेगी
खबर अब भी होती
है हवा में लहराती हुई
खबर तब भी होगी
कहीं ना कहीं लहरायेगी
पढ़े लिखे होने के बाद
नजर ही नहीं आयेगी
चैन तेरे लिये भी होगा
कुछ बैचेनी रोज का रोज
बेकार की खबरों को
पढ़ने और झेलने
वालों की भी जायेगी ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

जन्म दिन अभी तक तो तेरा ही हो रहा है आज के दिन कौन जाने कब तक

कुछ देर के लिये
याद आया तिरंगा
उससे अलग कहीं
दिखी तस्वीर संत की
माने बदल गये
यहाँ तक आते आते
उसके भी इसके भी
एक डिजिटल हो गया
दूसरे की याद भी
नहीं बची कहीं
दिखा थोड़ा सा बाकी
अमावस्या के चाँद सा
समय के साथ साथ
कुछ खो गया
सोच सोच में पड़ी
कुछ डरी डरी सी
कहीं किसी को
अंदाज आ गया हो
सोचने का
श्राद्ध पर्व
पर जन्मदिन
के दिन का
दिन भी सूखा
दिन हो गया
याद आया कुछ
सुना सुनाया
कुछ कहानियाँ
तब की सच्ची
अब की झूठी
बापू कुछ नहीं कहना
जरूरतें बदल गई
हमारी वहाँ से
यहाँ तक आते आते
तेरे जमाने का
सच अब झूठ
और झूठ उस
समय का इस
समय का सबसे
बड़ा सच भी
निर्धारित हो गया
जन्मदिन मुबारक
हो फिर भी बहुत बहुत
बापू दो अक्टूबर
का दिन अभी तो
तेरा ही चल रहा है
भरोसा नहीं है
कब कह जाये कोई
अब और आज
से ही इस जमाने के
किसी नौटंकी बाज की
नौटंकी का दिन हो गया ।

चित्र साभार: caricaturez.blogspot.com

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

बेचिये जो भी बिक सकता है और जो तैयार है

पिछले महीने से
निकल रहे हैं
जलूस मेरे
शहर में
क्यों निकल
रहे हैं
कोई पूछने
वाला नहीं है
ना ही कोई
अखबार में
कोई खबर है
जिलाधीश भी
सो रहा है
थानेदार भी
बहुत होशियार है
निमंत्रण मिला है
मुजफ्फर नगर
काण्ड के खलनायकों
पर बहस करने का
बहुत पुरानी बात
हो गई है सुनने को
अभी की बात
को कौन तैयार है
नहीं देखा मंजर
इस तरह का
अभी तक की
जिंदगी में कभी
लोग कह रहे हैं
अच्छे दिन हैं
अच्छी बयार है
बुलाया गया है
निमंत्रण भी है
मुजफ्फर नगर
काण्ड के खलनायक
व उत्तराखण्ड पर
बहस के लिये
बतायें जरा अपने
घर के काण्डों पर
बात करने को
कौन तैयार है
माना कि ‘उलूक’
को अंधों मे
गिना जाता है
फिर भी दिखता है
कोने से कहीं
उसको भी कुछ
कहना ही है
मानकर कि
कहना है और
कहना भी
बेकार है।

चित्र साभार: www.anninvitation.com

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