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सोमवार, 11 जनवरी 2016

अब आत्माऐं होती ही नंगी हैं बस कुछ ढकने की कुछ सोची जाये

कई दिन के
सन्नाटे में
रहने के बाद
डाली पर उलटे
लटके बेताल
की बैचेनी बढ़ी
पेड़ से उतर कर
जमीन पर आ बैठा
हाथ की अंगुलियों
के बढ़े हुऐ नाखूनों से
जमीन की मिट्टी को
कुरेदते हुऐ
लग गया करने
कुछ ऐसा जो
कभी नहीं किया
उस तरह का कुछ
मतलब कोशिश
सोचने की
कुछ सोचना
सोचना बेताल का
पहली अजब बात
दूसरा सोचा भी
कुछ गजब का
क्या
एक आत्मा
और वो भी
पहने हुऐ 
सूट टाई 
बेताल खुद चाहे
नहीं पहन पाया
कभी कुछ भी
उधर नये जमाने
के साथ बदलता
विक्रमादित्य
जैसे थाली में
लुढ़कता सा
एक गोल बैगन
जबसे बीच बीच में
बेताल को टामा
दे दे कर गायब
होना शुरु हुआ है
बेताल तब तब
इसी तरह से
बेचैन हुआ है
होता ही है
बेरोजगारी
बड़ी ही जान
लेवा होती है
सधा हुआ
सालों साल का
काम बदल
दिया जाये
यही सब होता है
सोचने के
साथ लिखना
हमेशा नहीं होता है
सोच के
कुछ लिखा हो
लिखा जैसा हो
जरूरी नहीं होता है
कलम आरी भी
नहीं होती है
तलवार की तरह
की मानी गई है
पर उतनी भारी
भी नहीं होती है
लिखना छोड़
दिया जाये
लम्बे अर्से के बाद
कलम उठाने की
कोशिश की जाये
समझ में नहीं
आ पाती है
सीधे पन्ने के
ऊपर उसकी
इतनी टेड़ी चाल
आखिर क्यों
होती है
जानते सब हैं
इतनी अनाड़ी
भी नहीं होती है
रहने दे ‘उलूक’
छोड़ ये सब
लफ्फाजी
और कुछ कर
चलकर मदद कर
दूर कर बेताल
की उलझन
मिले उसे भी
कुछ काम
कपड़े पहने शरीफों
की नंगी आत्माओं
को कपड़े से
ढकने का ही सही
लाजवाब काम
जो भी है जैसा भी है
काम तो एक काम है
मार्के का सोचा है
शुरु करने की देर है
दुकान खुलने की
खबर आये ना आये
होना पर पक्का है
कुछ ऐसा जैसा
बिकने से पहले ही
सारा का सारा
माल साफ हो जाये
विक्रमादित्य
करते रहे
अपने जुगाड़
अपने हिसाब से
बेताल पेड़ पर
जा कर हमेशा की
तरह लटकने की
आदत ना छोड़ पाये
आत्माऐं हों नंगी
रहें भी नंगी
कुछ कपड़ों की
बात करके ही सही
नंगेपने को
पूरा ना भी सही
थोड़ा सा ही
कहीं पर ढक
लिया जाये ।

चित्र साभार: www.wikiwand.com

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