http://blogsiteslist.com

बुधवार, 30 नवंबर 2016

समीकरण

गणित
नहीं पढ़ी है
के बहाने
नही चलेंगे
समीकरण
फिर भी
पीछा नहीं
छोड़ेंगे

समीकरण
नंगे होते हैं

अजीब
बात है
समीकरण
तक तो
ठीक था
ये नंगे होना
समीकरण का
समझ में
नहीं आया

आयेगा
भी नहीं
गणित के
समीकरण में
क या अ
का मान
हल करके
आ जाता है
हल एक भी
हो सकता है
कई बार
एक से
अधिक भी
हो जाता है

आम
जिंदगी के
समीकरण
आदमी के
चाल चलन
के साथ
चलते हैं

नंगे आदमी
एक साथ
कई समीकरण
रोज सुबह
उठते समय
साबुन के साथ
अपने चेहरे
पर मलते हैं

समीकरण
को संतुष्ठ
करता आदमी
भौंक भी
सकता है
उसे कोई
कुत्ता कहने
की हिम्मत
नहीं कर
सकता है

समीकरण
से अलग
बैठा दूर
से तमाशा
देखता
क या अ
पागल बता
दिया जाता है

आदमी
क्या है
कैसा है
उसे खुद
भी समझ
में नहीं
आता है

सारे
समीकरणों
के कर्णधार
तय करते हैं
किस कुत्ते
को आदमी
बनाना है
और
कौन सा
आदमी खुद
ही कुत्ता
हो जाता है

जय हो
सच की
जो दिखाया
जाता है

‘उलूक’
तू कुछ भी
नहीं उखाड़
सकता
किसी का
कभी भी
तेरे
किसी भी
समीकरण
में नहीं होने
से ही तेरा
सपाट चेहरा
किसी के
मुँह देखने
के काम
का भी
नहीं रह
जाता है ।

चित्र साभार: Drumcondra IWB - Drumcondra Education Centre

रविवार, 27 नवंबर 2016

पूछने में लगा है जमाना वही सब जिसे अच्छी तरह से सबने समझ लिया है

अपना ही
शहर है
अपना ही
मोहल्ला है
अपने ही
लोग हैं 
अपनी ही
गलियाँ हैं

दिमाग
लगाने की
जरूरत
भी नहीं है
हर किसी
के पास
ऊपर
कहीं से
भेजी गई
कुछ जमा
प्रश्नावलियाँ हैंं

सब ही
देख
रहें हैं
सब कुछ
सब ही
समझ
रहे हैं
सब कुछ
सब ही
पूछ रहें
हैं सभी
से प्रश्न

समझने
के लिये
कहीं
सामने
वाले ने
भी
सब कुछ
अच्छी तरह
से तो
नहीं समझ
लिया है

किसी
के पास
खुद से
पूछे गये
सालों साल
जमा
की गई
सवालों की
लड़ियाँ हैं

कुछ
पहेलियों
को
समझने
सुलझाने
के लिये
जोड़ तोड़
कर
एकत्रित
की गई
कड़ियाँ हैं

खुद
का ही
खुद ही
लिये गये
इम्तिहान
में प्रयोग
की गई
सफेद
श्यामपट
की काली
खड़ियाँ हैं

किसलिये
कोशिश
करते हो
समझने
की समय
को इन
सब से
जिनके पास
समय से
पहले ही
चुक चुकी
घड़ियाँ हैं

उलूक के
लिखने
लिखाने को
पढ़ता भी है
कहता भी है
नहीं समझ
में आता है
जरा सा भी
इसमें से
पर
जो भी
लिखा है
भाई बहुत
ही बढ़िया है।

चित्र साभार:
Fotosearch

बुधवार, 23 नवंबर 2016

सब नहीं लिखते हैं ना ही सब ही पढ़ते हैं सब कुछ जरूरी भी नहीं है लिखना सब कुछ और पढ़ना कुछ भी

मन तो
बहुत
होता है
खुदा झूठ
ना बुलाये

अब खुदा
बोल गये
भगवान
नहीं बोले
समझ लें

मतलब
वही है
उसी से है
जो कहीं है
कहीं नहीं है

सुबह
हाँ तो
बात
मन के
बहुत
होने से
शुरु
हुई थी

और
सुबह
सबके साथ
होता है
रोज होता है
वही होता है

जब दिन
शुरु होता है
प्रतिज्ञा
लेने जैसा
कुछ ऐसा
कि
राजा दशरथ
का प्राण जाये
पर बचन
ना जाये जैसा

जो कि

कहा जाये
तो सीधे सीधे
नहीं सोचना
है आज से
बन्दर क्या
उसके पूँछ
के बाल के
बारे में भी
जरा सा

नहीं बहुत
हो गया
भीड़ से
दूर खड़े
कब तक
खुरचता
रहे कोई
पैर के
अँगूठे से
बंजर
जमीन को
सोच कर
उगाने की
गन्ने की
फसल
बिना खाद
बिना जल

बोलना
बोलते
रहना
अपने
को ही
महसूस
कराने
लगे अपने
पूर्वाग्रह

जब

अपने
आसपास
अपने जैसा
हर कोई
अपने
साथ बैठा
कूड़े के
ढेर के ऊपर
नाचना
शुरु करे
गाते हुऐ
भजन
अपने
भगवान का
भगवान
मतलब खुदा
से भी है
ईसा से
भी है
परेशान
ना होवें

नाचना
कूड़े की
दुर्गंध
और
सड़ाँध
के साथ
निर्विकार
होकर

पूजते हुऐ 

जोड़े हाथ
समझते हुऐ 

गिरोहों से 
अलग होकर 
अकेले जीने 
के खामियाजे 

‘उलूक’ 
मंगलयान 
पहुँच चुका 
होगा
मंगल पर 
उधर
देखा कर 
अच्छा रहेगा 
तेरे लिये 

कूड़े पर 
बैठे बैठे 
कब तक 
सूँघता
रहेगा 
दुर्गंध 

वो बात 
अलग है 
अगर नशा 
होना शुरु 
हो चुका हो 

और 

आदत हो 
गई हो 

सबसे
अच्छा है 
सुबह सुबह 
फारिग
होते 
समय
देशभक्ति 
कर लेना
सोच कर
तिरंगा झंडा
जिसकी
किसी
को याद
नहीं आ
रही है
इस समय
क्योंकि
देश
व्यस्त है
कहना
चाहिये
कहना
जरूरी है ।

चित्र साभार: All-free-download.com

रविवार, 20 नवंबर 2016

तालियाँ एक हाथ से बज रही होती हैं उसका शोर सब कुछ बोल रहा होता है

तालियों के
शोर के बीच
बोलने की
बेवकूफी
करता है

फिर ढूँढता
भी है अपनी
ही आवाज को

कान तक
बहुत कुछ
पहुँच रहा
होता है
उसमें खुद
का बोला
गया कुछ
नहीं होता है

प्रकृति
बहुत कुछ
सिखाती है
अपने ही
आसपास की

लेकिन
खुली आँख
का अँधा
नयनसुख
अपने ही
चश्मे का
आईना बना
अपनी ही
जुल्फों में
अपनी ही
बेखुदी से
खेल रहा
होता है

सोचता ही
नहीं है
जरा सा भी
कि सियारों
का हूँकना
अकेला कभी
नहीं होता है

आवाज से
आवाज
को मिलाता
दूसरा तीसरा
भी कहीं
आसपास
ही होता है

कुत्तों का
भौंकना
तक उस
माहौल में
अपने मूल
को भूल कर
सियारों के
ही अन्दाज
की उसी
आवाज में
अपने आप
ही अपनी
आवाज को
तोल रहा
होता है

हर तरफ
हुआँ हुआँ
का शोर ही
जो कुछ भी
जिसे भी
बोलना
होता है
बोल रहा
होता है

तालियाँ
ना सियारों
को आती
हैंं बजानी
ना कुत्तों
का ध्यान
तालियों के
शोर की
ओर हो
रहा होता है

‘उलूक’
कानों
में अपने
अपने ही
हाथ लगाये
अपना
ही कहा
अंधेरे में
ढूँढने की
खातिर
डोल रहा
होता है

कुछ नहीं
सुनाई देता
है कहीं से
भी उसे

सुनाई भी
कैसे दे

जब
हर समय
हर तरफ
एक हाथ से
बज रही
तालियों
का शोर
ही सब
कुछ बोल
रहा होता है ।

चित्र साभार: k--k.club

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

खुद की सोच ही एक वजूका हो जाये खेत के बीच खड़ा हुआ तो फिर किसी और को क्या समझ में आये एक वजूका सोच से बड़ा होता है

क्या बुराई है
हो जाने में
सोच का
खुद की
एक वजूका
और जा कर
खड़े हो लेने
में कहीं भी
किसी जगह
जरूरी नहीं
उस जगह
का एक
खेत ही होना

वजूके
समझते हैं
वजूकों के
तौर तरीके
लगता है
पता नहीं
गलत भी
हो सकता है

वजूके
सोचते हैं
करते हैं
चलते हैं
वजूकों के
इशारों
इशारों पर
कुछ
वजूकी चालें

वजूकों के
पास शतरंज
नहीं होता है

सब सामान्य
होता है
वजूके के लिये
वजूके के द्वारा
वजूके के हित में
जो भी होता है
वजूकों में
सर्वमान्य होता है

वजूके पेड़
नहीं होते हैं
वजूकों का
जंगल होना
भी जरूरी
नहीं होता है

वजूका खेत में
खड़ा कहीं
कहीं दूर से
दिखाई देता है
जिस पर
कोई भी ध्यान
नहीं देता है
चिड़िया कौए
वजूकों पर
बैठ कर
बीट करते हैं
वजूका कुछ
नहीं कहता है

वजूका ही
शायद एक
इन्सान
होता है
सब को
समझ में
नहीं आती
हैं इंसानों
की कही
हुई बातें
इंसानों के
बीच में हमेशा

वजूके कुछ
नहीं कहते हैं
वजूके वजूकों
को समझते हैं
बहुत अच्छी
तरह  से
लेकिन ये
बात अलग है
वजूकों की
भीड़ नहीं
होती है कहीं
वजूके के बाद
 मीलों की
दूरी पर कहीं
किसी खेत में
एक और
वजूका अकेला
खड़ा होता है
‘उलूक’
तेरे करतबों
से दुनियाँ को
क्या लेना देना
हर किसी का
अपना एक
वजूका
पूरे देश में
एक ही
होता है
लेकिन
वजूका
होता है।

 चित्र साभार: Clipartix

बुधवार, 9 नवंबर 2016

जन्म दिन राज्य का मना भी या नहीं भी सोलह का फिर भी होते होते हो ही गया है

पन्द्रह पच्चीसी
का राजकुवँर
आज सौलहवीं
पादान पर आ
कर खड़ा
हो गया है

पैदा होने से
लेकर जवानी
की दहलीज पर
पहुँचते पहुँचते
क्या हुआ है
क्या नहीं हुआ है

बड़े घर से
अलग होकर
छोटे घर के
चूल्हे में क्या
क्या पका है
क्या कच्चा
रह गया है

जंगल हरे
भस्म हुऐ हैं
ऊपर कहीं
ऊँचाइयों के
धुआँ आकाश
में ही तो फैला
है दूर तक
खुद को खुद
ही आइने में
इस धुंध के
ढूँढना मुश्किल
भी हो गया है
तो क्या हो गया है

बारिश हुई भी है
एक मुद्दत के बाद
तकते तकते
बादलों को लेकिन
राख से लिपट कर
पानी नदी नालौं
का खारा हो गया है
तो कौन सा
रोना हो गया है

विपदा आपदा में
बचपन से जवानी
तक खेलता कूदता
दबता निकलता
पहाड़ों की मिट्टी
नदी नालों में
लाशों को
नीलाम
करता करता
बहुत ही
मजबूत
हो गया है

ये बहुत है
खाली मुट्ठी में
किसी को
सब कुछ होने
का अहसास
इतनी जल्दी
हो गया है

कपड़े जन्मदिन
के उपहार में
मिले उससे
उतारे भी उसने
किससे
क्या कुछ
कहने को
अब रह गया है

उसकी छोड़
कर गुलामी
बदनसीबी की
अब इसके
गुलाम हो लेने
का मौसम
भी हो गया है

जन्मदिन होते
ही हैं हर साल
सालों साल
हर किसी के
‘उलूक’
इस बार भी
होना था हुआ है

क्या गया
क्या मिला
पुराना इक
हिसाब अगले
साल तक के
लिये पुराने
इस साल के
साथ ही आज
फिर से दफन
हो गया है ।

चित्र साभार: Revolutionary GIS - WordPress.com

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

मुठभेड़ प्रश्नों की जवाब हो जाये कोई कुछ पूछ भी ना पाये

छोटे छोटे
अपने आस
पास के
उलझे प्रश्नों
से उलझते
उलझते
हमेशा
उलझ जाने
वाले को
सुलझने
सुलझाने
के सपने
देख लेने
की आदत
डाल लेनी
ही चाहिये

बड़े देश
के बड़े
प्रश्नों को
उठाने
वालों को
थोड़ी सी
ही सही
शरम तो
आनी ही
चाहिये

अच्छा होता है
प्रेस काँफ्रेंस
के उत्तरों को
सुन कर
मनन कर
कंठस्थ
कर लेना
या
उठा लेना
जवाब
कहीं किसी
किताब
अखबार
या रद्दी की
टोकरी से
और
फिर शुरु
कर देना
खोलना
दुकान पर
दुकान
जवाबों की
इस गली
से लेकर
उस गली तक

प्रश्न उठे
कहीं से भी
उसके उठने
से पहले
दाग देना
ढेर सारे
जवाब

इतने जवाब
की दब दबा
कर मर ही
जायेंं सारे
प्रश्न घुट
घुट कर

मर जाने
के बाद भी
सुनिश्चित
कर लिया
जाये
ठोक कर
दो चार
और
जवाब
ऊपर से
ताकि
एन्काउंटर
पूरा हो जाये

फिर भी
बच जाये
जो बेशरम
प्रश्न इतना
सब होने
के बाद भी

उसे जवाबों
से घेर कर
इतना बेइज्जत
कर दिया जाये
कि कर ले जाये
कहीं भी जा
कर आत्महत्या
इस तरह कि
मरते मरते
खुद ही एक
जवाब हो जाये

प्रश्न की मौत
का मातम ही
जवाबों का
जश्न हो जाये

‘उलूक’
भूल से
भी ना
कह पाये
नहीं आया
समझ में
जवाब

जो सुने
जैसा सुने
जिधर से
सुने बस
ऊपर से
नीचे और
नीचे से
ऊपर की
तरफ हाँ
हाँ की
गरदन
हिलाये
बिना
पलकें
झपकाये ।

चित्र साभार: CartoonStock

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...