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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

बात कोई नई नहीं कह रहा हूँ आज फिर हुई कहीं बस लिख दे रहा हूँ

समय के साथ
समय का मिलना
धीरे धीरे कम
होता चला गया
बच्चों से अपेक्षाओं
का ढेर कहीं
मन के कोने में
लगता चला गया
एक बूढ़ा और
एक बुढ़िया अब
अकले में
एक दूसरे से
बतियाते बतियाते
कहीं खो से जाते हैं
बात करते करते
भूल जाते हैं
बात कहाँ से
शुरु हुई थी
कुछ ही देर पहले
फिर मुस्कुराते हैं
उम्र के आखिरी
पड़ाव पर
दिखता है
कहीं असर
अपेक्षाओं
के भार का
फिर खुद बताना
शुरु हो जाते हैं
किस तरह
काटना होता है
समय को
समय की
ही छुरी से
रोज का रोज
कतरा कतरा
दिखने लगता है
कहीं दूर पर
अकेली
भटकती हुई
खुद की
परछाई भी
जैसे उन्ही
की तरह
ढूँढ रही हो
खुद को
खुद में ही
फिर बूढ़ा
देखता है
बुढ़िया के
चेहरे की
तरफ और
जवाब दे देता है
जैसे बिना कोई
प्रश्न किये हुऐ
किसी से भी
क्या सिखाया था
बच्चों को कभी
कि अ से अदब
भी होता है
नहीं सिखाया ना
मुझे पता है
सब सिखाते हैं
अ से अधिकार
और समझ आते ही
उसकी समझ में
आ जाता है
अपने लिये
अपना अधिकार
और फिर समय
नहीं बचता उसके
पास किसी और
के लिये कभी ।

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

अ धन ब का वर्ग

परीक्षाऎं हो गयी हैं शुरु
मौका मिलता है
साल में एक बार
मुलाकातें होती हैं
बहुत सी बातें होती हैं
बहुत से सद्स्यों की
टीम में एक हैं
मेरे आदरणीय गुरू
उनको बहुत कुछ
वाकई में आता है
प्रोफेसर साहब से रहा
नहीं जाता है
पढाने लिखाने की
आदत पुरानी है
किसी से कहीं भी
उन के द्वारा कुछ भी
पूछ ही लिया जाता है
कल की बात आज
वो खाली समय में
बता रहे थे
क्या होता जा रहा है
आज के बच्चों को
समझा रहे थे
सर में वैसे तो उनके
बाल बहुत कम दिखाई देते हैं
पर नाई की दुकान का
वर्णन वो अपनी कथाओं
में जरुर ले ही लेते हैं
बोले कल मैं जब एक
नाई की दुकान में गया
कक्षा नौ में पढ़ने वाली
एक बच्ची ने प्रवेश किया
नाई को बौय कट बाल
काटने का आदेश दिया
बच्ची बाल कटवा रही थी
मेरे दिमाग की नसें
प्रश्नो को घुमा रही थी
आदत से मजबूर मैं
अपने को रोक नहीं पाया
बच्ची के सामने एक प्रश्न
पूछने के लिये लाया
बेटी क्या तुम अ धन ब
का वर्ग कितना होगा
मुझे बता सकती हो
बच्ची मुस्कुराई
उसने नाई की कैंची
चेहरे के ऊपर से हटवाई
बोलते हुवे चेहरा अपना घुमाई
अरे अंकल आप तो
बड़ी कक्षाओं को पढ़ाते हो
ये फालतू के प्रश्न कैसे
अब सोच पाते हो
कैल्कुलेटर का जमाना है
बटन सिर्फ एक दबाना है
किस को पड़ी है अ या ब की
हमारी पीढी़ को तो राकेट
कल परसों में हो जाना है
तो फालतू में अ धन ब
फिर उसपर उसका वर्ग
करने काहे जाना है।

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