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बुधवार, 21 मई 2014

मुट्ठी बंद दिखने का वहम हो सकता है पर खुलने का समय सच में आता है

अंगुलियों को
मोड़कर
मुट्ठी बना लेना
कुछ भी पकड़
लेने की शुरुआत
पैदा होते हुऐ
बच्चे के साथ
आगे भी चलती
चली जाती है
पकड़ शुरु में
कोमल होती है
होते होते बहुत
कठोर हो जाती है
किसी भी चीज को
पकड़ लेने की सोच
चाँद भी पकड़ने के
लिये लपक जाती है
पकड़ने की यही
कोशिश कुछ
ना कुछ रंग
जरूर दिखाती है
आ ही जाता है
कुछ ना कुछ
छोटी सी मुट्ठी में
मुट्ठी बड़ी और बड़ी
होना शुरु हो जाती है
सब कुछ हो
रहा होता है
बस आँख बंद
हो जाती है
फिर आँख और
मुट्ठी खुलना शुरु
होती है जब
लगने लगता है
बहुत कुछ जैसे
हवा पानी
पहाड़ अपेक्षाऐं
मुट्ठी में आ चुकी हैं
और पकड़
उसके बाद
यहीं से ढीली
पड़ना शुरु
हो जाती है
‘उलूक’ वक्र का
ढलना यहीं से
सीखा जाता है
वक्र का शिखर
मुट्ठी से बाहर
आ ही जाता है
उस समय जब
सभी कुछ मुट्ठी
में समाया हुआ
मुट्ठी में नहीं
मिल पाता है
अपनी अपनी जगह
जहाँ था वहीं जैसे
वापस चला जाता है
अँगुलियाँ सीधी
हो चुकी होती हैं
जहाज के उड़ने का
समय हो जाता है ।

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