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बुधवार, 23 सितंबर 2009

करवट

अचानक
उन टूटी
खिड़कियों
का उतरा
रंग चमकने
लगा

शायद
जिंदगी ने
अंगड़ाई ली

शमशान की
खामोशी नहीं
शहनाईयां
बज रही हैं
आज

फिर से
आबाद
होने
को है
उसका
घरौंदा

कल तक
रोटी कपडे़
के लिये
मोहताज
हाथों में
दिखने
लगी हैं
चमकती
चूड़ियां

जुल्फें
संवरी हुवी
होंठो पे
लाली भी है

लेकिन
कहीं ना
कहीं
कुछ
छूटा
हुवा
सा
लगता है

चेहरे पे
जो नूर था
रंगत थी
आंखों में

आज वो
उतरा हुवा सा
ना जाने
क्यों लगता है

बच्चों के
चीखने
की आवाज
अब नहीं आती

बूड़े माँ बाप
के चेहरों पे
खामोशी सी
छाई है

शायद किसी
आधीं ने उड़ा
दिया सब कुछ

अपनी जगह पर
ही है हर
एक चीज
हमेशा की तरह

पर कुछ तो
हुआ है
ना जाने

जो महसूस तो
होता है
पर दिखता नहीं है 

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