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रविवार, 22 जून 2014

सीख ले समय पर एक बात कभी काम भी आ जाती है

एक पत्थर में
बनता हुआ
दिखता है
एक आकार
और अपेक्षाऐं
जन्म लेना
शुरु करती हैं
बहुत तेजी से
और उतनी
ही तेजी से
मर भी जाती हैं
कुछ भी तो
नहीं होता है
पत्थर वहीं का
वहीं उसी तरह
जैसा था पड़ा
ही रहता है
अपेक्षाऐं फिर
पैदा हो जाती हैं
जिंदा रहती हैं
कुछ नहीं होता है
पूरी भी होती हैं
तब भी कुछ
नहीं होता है
एक बहुत
साफ साफ
दिखता हुआ
हिलता डुलता
जीवित आकर
भी पत्थर
होता है और
पता भी
नहीं होता है
अपेक्षाऐं पैदा
करवाता है
पालना पोसना
सिखाता है
उनके जवान
होने से पहले ही
खुद के हाथों
से ही कत्ल
करवाता है
मरे हुऐ पत्थर
और जिंदा पत्थर
में बस एक ही
अंतर नजर आता है
एक से अपेक्षाऐं
मरने के बाद भी
पैदा होना
नहीं छोड़ती हैं
और दूसरे से
अपेक्षाऐं बाँझ
हो जाती हैं
‘उलूक’ समझा
कुछ या नहीं
एक छोटी सी बात
बहुत ज्यादा
पढ़े लिखे होने
के बाद भी
आसानी से
समझ में
नहीं आ पाती है
पत्थर में
जीवन है
या जीवित ही
पत्थर है
अंतर ही नहीं
कर पाती है ।

बुधवार, 6 जून 2012

आँख आँख

घर में आँख से
आँख मिलाता है
खाली बिना बात के
पंगा हो जाता है
चेहरा फिर भाव
हीन हो जाता है
बाहर आँख वाला
सामने आता है
कन्नी काट कर
किनारे किनारे
निकल जाता है
आँख वाली से
आँख मिलाता है
डूबता उतराता है
खो जाता है
चेहरा नये नये
भाव दिखाता है
रोज कुछ लोग
घर पर आँख
को झेलते हैं
बाहर आ कर
खुशी खुशी आँख आँख
फिर भी खेलते हैं
आँख वाली की आँख
गुलाबी हो जाती है
आँख वाले को आँखें
मिल जाती हैं
सिलसिला सब ये
नहीं चला पाते हैं
कुछ लोग इस कला
में माहिर हो जाते हैं
करना वैसे तो बहुत
कुछ चाहते हैं
पर घर की आँखों
से डर जाते हैं
इसलिये बस
आँख से आँख
मिलाते हैं
पलकें झुकाते हैं
पलकें उठाते हैं
रोज आते हैं
रोज चले जाते हैं
आँख आँख में
अंतर साफ साफ
दिखाते हैं ।

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