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सोमवार, 23 मई 2016

लिखना हवा से हवा में हवा भी कभी सीख ही लेना

कफन मरने के
बाद ही खरीदे
कोई और मरने
वाले के लिये
अच्छा है
सिला सिलाया
मलमल का
खूबसूरत सा
खुद पहले से
खरीद लेना
और
जरूरी है
थोड़ा सा कुछ
सम्भाल कर
जेब में उधर
ऊपर के लिये
भी रख लेना
सब कुछ इधर
का इधर ही
निगल लेने से
भी कुछ नहीं होना
अंदाज आ ही
जाना है तब तक
पूरा नहीं भी तो
कुछ कुछ ही सही
यहाँ कितना कुछ
क्या क्या
और किसका
सभी कुछ
है हो लेना
रेवड़ियांं होती
ही हैं हमेशा से
बटने के लिये
हर जगह ही
अंधों के
बीच में ही
खबर होती
ही है अंधों के
अखबारों में
अंधों के लिये ही
आँख वालों
को इसमें
भी आता है
ना जाने
किसलिये इतना
बिलखना रोना
लिखने वाले
लिख गये हैं
टुकडे‌ टुकड़े में
पूरा का पूरा
आधे आधे का
अधूरा भी
हिसाब सारा
सब कुछ कबीर
के जमाने से ही
कभी तो माना
कर जमाने के
उसूलों को
‘उलूक’
किसी एक
पन्ने में पूरा
ताड़ का पेड़
लिख लेने से
सब कुछ
हरा हरा
नहीं होना ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

इसका और उसका रहने दे ना देश सुना है जलजले से दस फिट खिसका है

नाम से लिखने पर
बबाला हो जाता है
इस और उस से
काम चलाया जाये
तो क्या जाता है
अंधे देख रहे हैं
अपने अपनो
के कामों को
कुछ कहना हो तो
बहुत ही सोचना
पड़ जाता है
वैसे भी चम्मचें
फैली हुई हैं इंटरनेट
की दुनियाँ में
गरीब और उसकी सोच
पर बात करने वाला
सबसे बड़ा पागल
एक हो जाता है
टी वी पर बहस देखिये
इसका भी होता है
उसका भी होता है
देखने वाले पागलों
को क्या कहा जाता है
बूंद बूंद से भरता है घड़ा
यही बताया यही
समझाया भी जाता है
बूंद पाप की होती है
बहुत छोटी सी
उसको अंदेखा करना
अभिमन्यू की तरह
पेट के अंदर ही
सिखाया जाता है
नाम नहीं ले रहा हूँ उसका
घिन आती है
ओले पकड़ने के लिये
खेतों में क्यों नहीं जाता है
उसकी बात कही है मैंने
तेरी समझ में आ गया होगा
मेरी समझ में भी आता है
कुछ कहने की हिम्मत
नहीं है तुझ में
तेरे को क्या मतलब है
चमचे तुझे तो उसके लिये
देश को रौंदना
अच्छी तरह आता है ।


चित्र साभार: www.123rf.com

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