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सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

बंद करके आँखों को कभी उजाले को अंंधेरे में भी देखा जाये

आँखें बंद कर
कुछ दिनों
कुछ कह
लिया जाये
अंंधेरे में अंंधेरा
जला कर भी
कुछ कर
लिया जाये
रोज दिखती है
बिना चश्मे
उजाले की
करामातें
कुछ नया करें
किसी दिन और
कुछ भी नहीं
कहीं देखा जाये
रातों में होती है
रोशनी और
बहुत होती है
चाँद तारों को भी
अवकाश दे
के देखा जाये
एक तुम आते
हो खयालों में
एक वो आते जाते हैं
किसी और के
आने जाने का भी
कभी सोचा जाये
मुद्दतें हो गई हैं
पता चल भी
नहीं पाया यूँ भी
अपने होने ना होने
का ही कभी कुछ
पता कर लिया जाये
‘उलूक’
अंधेरे से रखनी
भी है दोस्ती तुझे
तेरी किस्मत भी है
कुछ शर्म
और लिहाज
उसका ही सही
कभी कर
लिया जाये
आने जाने
से रोका
नहीं है तुझे
भी किसी
ने कभी
उजाले में अंंधेरे
के उसूलों को
अंंधेरे में आजमा
कर कहीं अंंधेरे में
ही कभी देखा जाये
खुली आँखो से
देखती है दुनियाँ
सभी कुछ हमेशा ही
बंद कर के भी
आँखों से देखा
जाता है कुछ कभी
बस यही और यही
देखने के लिये
ही सही कभी
ये भी देखा जाये ।

चित्र साभार: http://www.prwatch.org

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

समापन

अंधेरे के घेरे हैं
चारों तरफ
उजालों से नफरत
हो जायेगी
दिया लेकर
चले आओगे
रोशनी ही
भटक जायेगी
कितनी बेशर्मी से
कह गये वो
रोशन है आशियां
रोशनी भी आयेगी
बेवफाओं को
तमगे बटे हैं
वफा ही क्यों
ना शर्मायेगी
यकीं होने लगा
है पूरा मुझको
दुनियां यूं ही
बहल जायेगी ।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

आदमी

अंंधेरे का खौफ बढ़ गया इतना
रात को दिन बना रहा आदमी।

दिये का चलन खत्म हो चला समझो
बल्ब को सूरज बना रहा आदमी।

आदमीयत तो मर गयी ऎ आदमी
रोबोट को आदमी बना रहा आदमी।

रोना आँखों की सेहत है सुना था कभी
रोया इतना कि रोना भूल गया आदमी।

हंसने खेलने की याद भी कहाँ आती है उसे
सोने चाँदी के गेहूँ जो उगा रहा आदमी।

अब पतंगे कहाँ जला करते है यारो
दिये को खुद रोशनी दिखा रहा आदमी।

आदमी आदमी
हर तरफ आदमी
रहने भी दो
अब जब खुदा भी
खुद हो चला आदमी।

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