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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

आदमी आदमी का हो सके या ना हो सके एक गधा गधे का नजदीकी जरूर हो जाता है



“अंशुमाली रस्तोगी जी” का आज दैनिक हिन्दुस्तान में छपा लेख 
“इतना सधा हूँ कि सचमुच गधा हूँ” 
पढ़ने के बाद । 

अकेले नहीं
होते हैं आप
महसूस 
करते हैं
और कुछ
नहीं कहते हैं
रिश्तेदारियाँ
घर में ही हों
जरूरी 
नहीं होता है
आपका 
हमशक्ल
हमख्याल 
कहीं और
भी होता है

आपका
बहुत
नजदीकी
रिश्तेदार
भी होता है

बस
आपको ही
पता नहीं
होता है

एक नहीं
कई बार
बहुत
सी बात
यूँ ही
कहने से
रह जाती हैं

सोच की
अंधेरी
कोठरी में
जैसे कहीं
खो जाती हैं

सुनने
समझने
वाला कोई
कहीं नहीं
होता है

कहने
वाला कहे
भी किससे

कितना
अकेला
अकेला
कभी कभी
एक अकेला
होता है

और
ऐसे में
कभी
अंजाने में
कहीं से
किसी की
एक चिट्ठी
आ जाती है

जिसमें
लिखी हुई
बातें दिल
को गदगद
कर जाती हैं

कहीं पर
कोई और
भी है
अपना जैसा
अपना
अपना सा

सुन कर
आखों में
कुछ नमी
छा जाती है

‘अंशुमाली’
 कहता है
कोई उसे
गधा कहे
तो अब
सहजता
से लेता है

बहुत दिनों
के बाद
गधे की याद
‘उलूक’ को भी
आ जाती है

गधा
सच में
महान है
ये बात
एक बार
फिर से
समझाती है

खुद के
गधे से
होने से
कोई
अकेला नहीं
हो जाता है

और
भी कई
होते हैं गधे
इधर उधर भी
कई कई
जगहों पर

सुनकर ही
दिल खुश
हो जाता है

बहुतों
के बीच
एक गधा
यहाँ देखा
जाता है

इसका
मतलब
ये नहीं
होता है
कि
दूसरा गधा
दूसरी जगह
कहीं नहीं
पाया जाता है ।

चित्र साभार: www.gograph.com

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