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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

बात कोई नई नहीं कह रहा हूँ आज फिर हुई कहीं बस लिख दे रहा हूँ

समय के साथ
समय का मिलना
धीरे धीरे कम
होता चला गया
बच्चों से अपेक्षाओं
का ढेर कहीं
मन के कोने में
लगता चला गया
एक बूढ़ा और
एक बुढ़िया अब
अकले में
एक दूसरे से
बतियाते बतियाते
कहीं खो से जाते हैं
बात करते करते
भूल जाते हैं
बात कहाँ से
शुरु हुई थी
कुछ ही देर पहले
फिर मुस्कुराते हैं
उम्र के आखिरी
पड़ाव पर
दिखता है
कहीं असर
अपेक्षाओं
के भार का
फिर खुद बताना
शुरु हो जाते हैं
किस तरह
काटना होता है
समय को
समय की
ही छुरी से
रोज का रोज
कतरा कतरा
दिखने लगता है
कहीं दूर पर
अकेली
भटकती हुई
खुद की
परछाई भी
जैसे उन्ही
की तरह
ढूँढ रही हो
खुद को
खुद में ही
फिर बूढ़ा
देखता है
बुढ़िया के
चेहरे की
तरफ और
जवाब दे देता है
जैसे बिना कोई
प्रश्न किये हुऐ
किसी से भी
क्या सिखाया था
बच्चों को कभी
कि अ से अदब
भी होता है
नहीं सिखाया ना
मुझे पता है
सब सिखाते हैं
अ से अधिकार
और समझ आते ही
उसकी समझ में
आ जाता है
अपने लिये
अपना अधिकार
और फिर समय
नहीं बचता उसके
पास किसी और
के लिये कभी ।

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