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गुरुवार, 5 मई 2016

भीख भिखारी कटोरे अपदस्थ सरकार के समय का सरकारी आदेश तैयार शिकार और कुछ तीरंदाज अखबारी शिकारी

संदर्भ: व्यक्तिगत और संस्थागत परीक्षार्थी। राज्यपाल की समझ में आयेगी बात आभार उनका ।

आता है 

एक सरकारी
आदेश

उस समय
जब
अपदस्त
होती है

जनता की
सरकार


आदेश
छीन लेने का

सारे कटोरे
सभी सफेदपोश
भिखारियों के

और

दे दिये जाते हैं

उसी समय
उसी आदेश
के साथ

सारे कटोरे
कहीं और के
तरतीब के साथ
लाईन लगाने
और माँग कर
खाने वाले
पेट भरे हुऐ
भूखे
भिखारियों को


खबर
अखबार

ही देता है
रोज की
खबरों

की तरह

पका कर
खबर को

बिना नमक
मिर्च धनिये के

खुश होते हैं

कुछ लोग
जिनको

पता होता है
समृद्ध
पढ़े लिखे

बुद्धिजीवी
भिखारियों
के भीख

मांगने और
बटोरने

के तरीकों
और

उनके
कटोरों का


उसी
समय लेकिन

समय भी
नहीं लगता है


उठ खड़ा
होता है

सवाल
अखबार

समाचार
और

खबर देने
वालों के

अखबारी
रिश्तेदारों

के कटोरों का

जिनका
कटोरा
कहीं ना कहीं

कटोरों से
जुड़ा होता है


पता चलता है
दूसरे दिन

सुबह का
अखबार

गवाही देना
शुरु होता है


पुराने शातिर
सीखे हुए

भिखारियों
की तरफ से

कहता है
बहुत परेशानी

हो जायेगी
जब भीख

देने वालों
की जेबें

फट जायेंगी

दो रुपियों
की भीख

चार रुपिया
हो जायेगी


बात उस
भीख की

हो रही
होती है
जो
करोड़ों
की होती है

अरबों की
होती है

जिसे नहीं
पाने से

बदहजमी
डबलरोटी

कूड़ेदान में
डालने
वालों को
हो रही होती है


जनता को
ना मतलब

कटोरे से
होता है

ना कटोरे
वालों से
होता है


अखबार
वालों को

अमीर
भिखारियों के

खिलाफ
दिये गये

फैसले से
बहुत
खुजली
हो रही होती है


पहले दिन
की खबर

दूसरे दिन
मिर्च मसाले

धनिये से
सजा कर

परोसी गई
होती है


‘उलूक’ से
होना
कुछ
नहीं होता है

हमेशा
की तरह

उसके पेट में
गुड़ गुड़ हो
रही होती है


बस ये
देख कर कि

किसी को
मतलब
ही
नहीं होता है

इस बात से
कि
भीख
की गंगा

करोड़ो की
हर वर्ष

आती जाती
कहाँ है

और
किस जगह

खर्च हो
कर
बही
जा रही
होती है ।


 चित्र साभार: www.canstockphoto.com

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