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शनिवार, 28 दिसंबर 2013

ऐसा भी तो होता है या नहीं होता है

जाने अंजाने में
खुद या सामूहिक
रूप से किये गये
अपराधों के
दंश को
मन के किसी
कोने में दबा कर
उसके ऊपर
रंगबिरंगी
फूल पत्तियाँ
कुछ बनाकर
ढक देने से
अपराधबोध छिप
कहाँ पाता है
सहमति के साथ
तोड़ मरोड़कर
काँटों के जाल का
एक फूल बना
देने से ना तो
उसमें खुश्बू
आ पाती है
ना ही ऐसा कोई
सुंदर सा रंग जो
भ्रमित कर सके
किसी को भी
कुछ देर के
लिये ही सही
सदियां हो गई
इस तरह की
प्रक्रिया को
चलते आते हुऐ
पता नहीं कब से
आगे भी चलनी हैं
बस तरीके बदले हैं
समय के साथ
जुड़ते चले जा रहे हैं
इस तरह एक साथ
अपराध दर अपराध
जिसकी ना किसी
अदालत में सुनवाई
ही होनी है ना ही
कोई फैसला किसी
को ले लेना है
सजा के लिये
बस शूल की तरह
उठती हुई चुभन को
दैनिक जीवन का
एक नित्यकर्म
मानकर सहते
चले जाना है
और मौका मिलते ही
संलग्न हो जाना है
कहीं खुद या कहीं
किसी समूह के साथ
उसके दबाव में
करने के लिये एक
मान्यता प्राप्त अपराध | 

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

विनम्र श्रद्धांजलि राजेंद्र जी

एक सदी के अंदर एक
ज्यादा से ज्यादा दो
बहुत हो गया तो तीन
से ज्यादा को कभी भी
नहीं गिना जाता है
राजेंद्र यादव हिंदी साहित्य
का एक ऐसा ही स्तम्भ
जब यूं ही चला जाता है
उसको पढ़ने की कोशिश
करता हुआ एक
छोटा सा आदमी
समझ भी कुछ
कहां पाता है
ऐसे भीषण व्यक्तित्व
का कहा हुआ एक
वाक्य एक किताब के
बराबर हो जाता है
सुबह सवेरे समाचार पत्र में
लिखा हुआ कुछ कुछ
ऐसा जब सामने आता है
“जो तटस्थ हैं समय लिखेगा
उनका भी अपराध”
वाह निकलता है मुंह से
और सारा दिन सोचने में
ही निकल जाता है
जरूर लिखेगा बहुत लिखेगा
तटस्थ ही तो है एक
जिसे बस खुद के बारे
में ही सोचना आता है
लिखा जायेगा बहुत हो जायेगा
पता चलेगा इतिहास का भी
कैसे कैसे कूड़ा बनाया जाता है
एक तटस्थ अपनी
छोटी सोच को लेकर
माफी मांगते हुऐ फिर भी
अपनी विनम्र श्रद्धांजलि
देना ही चाहता है ।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

बेबस पेड़

एक झंडा एक भीड़
बेतरतीब होते हुऎ
भी परिभाषित
दे देती है अंदाज
चाहे थोड़ा ही
अपने रास्ते का
अपनी सीमा का
यहाँ तक अपनी
गुंडई का भी
दूसरी भीड़
एक दूसरा झंडा
सब कुछ तरतीब से
कदमताल करते हुऎ
मोती जैसे गुंथे हों
माला में किसी
परिभाषित नजर
तो आती है पर
होती नहीं है
यहां तक कि
अपराध करने का
अंदाज भी होता है
बहुत ही सूफियाना
दोनो भीड़ होती हैं
एक ही पेड़
की पत्तियाँ
बदल देने पर
झंडे के रंग और
काम करने के
ढंग के बावजूद
भी प्रदर्शित
कर जाती हैं
कहीं ना
कहीं चरित्र
बेबस पेड़
बस देखता
रह जाता है
अपनी ही
पत्तियों को
गिरते गिरते
बदलते हुऎ
रंग अपना
पतझड़ में ।

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