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रविवार, 22 जून 2014

सीख ले समय पर एक बात कभी काम भी आ जाती है

एक पत्थर में
बनता हुआ
दिखता है
एक आकार
और अपेक्षाऐं
जन्म लेना
शुरु करती हैं
बहुत तेजी से
और उतनी
ही तेजी से
मर भी जाती हैं
कुछ भी तो
नहीं होता है
पत्थर वहीं का
वहीं उसी तरह
जैसा था पड़ा
ही रहता है
अपेक्षाऐं फिर
पैदा हो जाती हैं
जिंदा रहती हैं
कुछ नहीं होता है
पूरी भी होती हैं
तब भी कुछ
नहीं होता है
एक बहुत
साफ साफ
दिखता हुआ
हिलता डुलता
जीवित आकर
भी पत्थर
होता है और
पता भी
नहीं होता है
अपेक्षाऐं पैदा
करवाता है
पालना पोसना
सिखाता है
उनके जवान
होने से पहले ही
खुद के हाथों
से ही कत्ल
करवाता है
मरे हुऐ पत्थर
और जिंदा पत्थर
में बस एक ही
अंतर नजर आता है
एक से अपेक्षाऐं
मरने के बाद भी
पैदा होना
नहीं छोड़ती हैं
और दूसरे से
अपेक्षाऐं बाँझ
हो जाती हैं
‘उलूक’ समझा
कुछ या नहीं
एक छोटी सी बात
बहुत ज्यादा
पढ़े लिखे होने
के बाद भी
आसानी से
समझ में
नहीं आ पाती है
पत्थर में
जीवन है
या जीवित ही
पत्थर है
अंतर ही नहीं
कर पाती है ।

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

अपेक्षाऐं कैसी भी किसी से रखने में क्या जाता है !

दो टांगों पर चलता
चला जाऊं अपनी ही
जिंदगी भर ऐसा
सोचना तो समझ में
थोड़ा थोड़ा आता है
सर के बल चल कर
किसी के पास पहुंचने
की किसी की अपेक्षा
को कैसे पूरा
किया जाता है
पता कहां
चल पाती हैं
किसी की अपेक्षाऐं
जब अपेक्षाऐं रखना
अपेक्षाऐं बताना कभी
नहीं हो पाता है
अपने से जो होना
संभव कभी नहीं
हो पाता है वही
सब कुछ किसी से
करवाने की अपेक्षा
रखते हुऐ आदमी
दुनियां से विदा
भी हो जाता है
पर अपेक्षा भी
कितनी कितनी
अजीब से अजीब
कर सकता है
सामने वाला
ऐसा किसी
किताब में
लिखा हुआ
भी नहीं
बताया जाता है
इधर आदमी
तैयार कर रहा
होता है अपने
आप को किसी
का गधा बनाने की
उधर अगला
सोच रहा होता है
आदमी के शरीर में
बाल उगा कर उसे
भालू बनाने की
क्या करे कोई बेचारा
किसी को किसी की
अपेक्षाओं का सपना
जब नहीं आता है
अपेक्षाऐं किसी से रखने
का मोह कभी कोई
त्याग ही नहीं पाता है
अपेक्षाऐं होती
हैं अपेक्षाऐं
रह जाती हैं
हमेशा अपेक्षाऐं
रखने वाला
बस खीजता है
झल्लाता है
खुद पर अपने
ज्यादा से ज्यादा
क्या कर सकता है
कर पाता है
दो घूंट के बाद
दीवारों पर अपने
ही घर की कुछ
गालियां लिख
ले जाता है
सुबह होते
होते उसे भी
मगर भूल जाता है
अपेक्षाओं के पेड़ को
अपने फिर से सींचना
अपेक्षाओं से
शुरु हो जाता है ।

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