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बुधवार, 20 नवंबर 2013

कोई तो लिखे कुछ अलग सा लगे

कभी कुछ
अलग सा
कुछ ऐसा
भी लिख
जिसे नहीं
पढ़ने वाला
भी

थोड़ा सा
पढ़ सके
कुछ ऐसा
जो किसी
झूमती हुई
कलम से
रंगबिरंगी
स्याही से
इंद्रधनुष
सा
लिखा हुआ
आसमान
पर दिखे

कुछ देर
के लिये
ही सही

रोज की
चिल्ल पौं से
थोड़ी देर के
लिये सही
आँख कान
नाक हटे

नहीं पीने
वाले को
कुछ पीने
जैसा लगे
नशा सा
लिखा हो
नशा ही
लिखा हो

पढ़े कोई
तो झूमती
हुई कलम
सफेद कागज
के ऊपर
इधर उधर
लहराती
सी दिखे

हर कोई
शराबी हो
ये जरूरी नहीं
नशा पढ़ के
हो जाने में
कोई खराबी नहीं

लिख मगर
ऐसा ही
कुछ
पढ़े कोई
तो पढ़ता
ही रहे

पढ़ के
हटे कुछ
लड़खड़ाये
इतना नही
कि
जा ही गिरे

रोज ही के
लिये नहीं
है गुजारिश
पर लिखे

कभी किसी
दिन ऐसा
कुछ भी हो
कहीं कुछ
अलग
सा दिखे
अलग सा
कुछ लगे

मुझे
ना सही
तुझे
ही लगे ।

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

एक की हो रही पहचान है एक पी रहा कड़वा जाम है !

अगला आदमी भी
कितना परेशान है
अपनी एक पहचान
बनाने की कोशिश में
हो रहा हलकान है
बगल वाला है तो
उसका ही जैसा
कुछ भी नहीं है
थोड़ा सा भी कहीं
कुछ अलग अलग सा
दिखता भी नहीं है
करता हुआ कुछ
अजब गजब सा
समझ में नहीं आता
हर गली हर मौहल्ले में
हो रहा फिर भी
उसका ही नाम है
अखबार रेडियो टी वी
वालों से बनाई अगले
ने बहुत पहचान है
हजार जतन कर
कराने के बाद भी
कोई क्यों नही देता
ऐसे शख्स की तरफ
थोड़ा सा भी ध्यान है
सभी तो सब कुछ
करने में लगे हुऐ हैं
बस अपने लिये
ही तो यहां या वहां
होना है किसी और
के लिये नहीं जब
कुछ इंतजाम है
इसे मिलता है
उसे मिलता है
अगले को ही बस
क्यों नहीं मिलता
कुछ सम्मान है
किसी का नाम होने से
किसी को हो रहा
बहुत नुकसान है
कोई करे कुछ तो
उसके लिये कभी
इसकी और उसकी
हो रही पहचान से
किसी की सांसत में
देखो फंस रही जान है ।

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

बता देना तूने क्या कुछ अलग ही देखा है

बचपन से
आज तक
देखता
आ रहा हूँ
दौड़ बच्चों की
दौड़ जवानों की
दौड़ अधेड़ों की
और
बूढ़ों की दौड़
हर दौर में
दौड़ को
बदलते देखा है
हौले हौले
मुस्कुराते हुऐ
एक दूसरे को
पछाड़ते हुऐ
गले मिलते
खुश होते
और
रोते हुओं
को देखा है
दौर बदले हैं
दौड़ें भी बदली हैं
मैदान बदले हैं
दौड़ने के
तरीके बदले हैं
नंगे पैर दौड़ते हुऐ
बच्चे के पैरों से
खून के साथ
आँख से खुशी
को छलकते
हुऐ देखा है
सोच में
आ रही है
एक छोटी
सी बात
आज की दौड़ों
के दौर में
क्या ये सब
अकेले मैंने ही
और
बस मैंने ही
यहाँ देखा है
कुछ मौसम
का मिजाज
ही है ऐसा
या तेरे यहाँ भी
यही सब कुछ
तून भी
कभी देखा है
साथ साथ
कदमताल
पर चल कर
दौड़ने पहुंचने
वाले को
दौड़ के
शुरु होते ही
बदलते हुऐ
देखा है
दौड़े होती है
आज भी
उसी तरह से
जैसे हमेशा
होती रही है
मैदान दर मैदान
लेकिन किसी
गिरते हुऐ
के ऊपर से
किसी को
दौड़ते हुऐ
तो मैंने इसी
दौर में
और
बस यहीं
और
यहीं देखा है ।

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

मान लीजिये नया है दुबारा नहीं चिपकाया है

हर दिन का
लिखा हुआ
कुछ अलग
हो जाता है
दिन के ही
दूसरे पहर
में लिखे हुऐ
का तक मतलब
बदल जाता है
सुबह की कलम
जहां उठाती सी
लगती है सोच को
शाम होते होते
जैसे कलम के
साथ कागज
भी सो जाता है
लिखने पढ़ने और
बोलने चालने को
हर कोई एक सुंदर
चुनरी ओढ़ाता है
अंदर घुमड़
रहे होते हैं
घनघोर बादल
बाहर सूखा पड़ता
हुआ दिखाता है
झूठ के साथ
जीने की इतनी
आदत हो जाती है
सच की बात
करते ही खुद
सच ही
बिफर जाता है
कैसे कह देता है
कोई ऐसे में
बेबाक अपने आप
आज की लिखी
एक नई चिट्ठी
का मौजू उतारा
हुआ कहीं से
नजर आता है
जीवन के शीशे
में जब साफ
नजर आता है
एक पहर से
दूसरे पहर
तक पहुंचने
से पहले ही
आदमी का
आदमी ही
जब एक
आदमी तक
नहीं रह पाता है
हो सकता है
मान भी लिया
वही लिखा
गया हो दुबारा
लेकिन बदलते
मौसम के साथ
पढ़ने वाले के लिये
मतलब भी तो
बदल जाता है ।

बुधवार, 31 जुलाई 2013

बाहर के लिये अलग बनाते है अंदर की बात खा जाते हैं !

मुड़ा तुड़ा 
कागज का
एक टुकड़ा
मेज के नीचे
कौने में पड़ा
मुस्कुराता है
लिखी होती है
कोई कहानी
अधूरी उसमें
जिसको कह
लेना वाकई
आसान नहीं
हो पाता है
ऎसे ही पता
नहीं कितने
कागज के
पन्ने हथेली
के बीच में
निचुड़ते ही
चले जाते हैं
कागज की
एक बौल
होकर मेज
के नीचे
लुढ़कते ही
चले जाते हैं
ऎसी ही
कई बौलों
की ढेरी
के बीच
में बैठे
हुऎ लोग
कहानियाँ
बनाने में

माहिर हो
जाते हैं
एक कहानी
शुरु जरूर
करते हैं
राम राज्य
का सपना
भी दिखाते हैं
राजा बनाने
के लिये
किसी को
भी कहीं से
ले भी आते हैं
कब खिसक
लेते हैं बीच
में ही और
कहाँ को
ये लेकिन
किसी को
नहीं बताते हैं
अंदर की
बात को
कहना इतना
आसान कहाँ
होता है
कागजों को
निचोड़ना 

नहीं छोड़
पाते हैं
कुछ दिन
बनाते हैं
कुछ और
कागज की बौलें
लोग राम
और राज्य
दोनो को
भूल जाते हैं
ऎसे ही में
कहानीकार
और कलाकार
नई कहानी
का एक
प्लौट ले
हाजिर हो
जाते हैं ।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

अब अलग हो जाओ चूहो

बहुत खुश नजर आ रहे थे
आज लोग बाग यहाँ वहाँ
और ना जाने कहाँ कहाँ
चूहों को अलग अलग
दिशाओं में जाता हुआ
देखकर ताली बजा रहे थे
पर ये भूल जा रहे थे
सब कुछ कुतरने के बाद
का दृश्य भूत में भी
हमेशा से ऎसा ही हुआ
करता आया है
चूहे बिल बनाते हैं
कहाँ कहॉं कुतर रहे हैं
क्या क्या कुतर रहे हैं
कैसे कुतर रहे हैं
कहाँ किसी को ये
सब कभी बताते है
जिसे दिखता है बस
कुतरा हुआ दिखता है
चूहा कोई भी उसके
आसपास कहीं एक भी
दूर दूर तक नही किसी
को दिखता है
और ये भी अगले आक्रमण
की एक सोची समझी तैयारी है
ये बात किसी के भी समझ में
कहीं भी तो नहीं आ रही है
चुहिया इस समय
सबको समझा रही है
अलग  हो जाने का
आदेश देती जा रही है
जाओ वीरो जाओ
अपने दांंत और पंजे
फिर से घिसने के लिये
तैयार हो जाओ
समय आ गया है
देश को फिर से
पाँच साल के लिये
नये सिरे से
कुतर के खाना है
जाओ अलग
अलग हो जाओ
सब को सोने का मौका
दे कर सुलाना है
फिर से लौट कर
यहीं आ जाना है
नयी ताकत बटोर कर
फिर एक हो जाना है
देखने वाले गदगद
हुऎ जा रहे हैं
सोच रहे हैं
बेवकूफ चूहे
आपस में
लड़ते जा रहे हैं
सारी मलाई
उनके खाने के लिये
ऎसे ही छोड़
के जा रहे हैं
उनको कहाँ मालूम है
चूहे पुराने
बिलों को छोड़ कर
नये बिलों को खोदने
के लिये जा रहे हैं ।

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