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बुधवार, 27 जून 2012

विदाई

आज मैडम जी को
विदा कर के आया
उनके अवकाश ग्रहंण
के उपलक्ष्य में था
विभाग ने एक
समारोह करवाया
विदाई समारोह में
ऎसा महसूस होने
लग जाता है
मजबूत से मजबूत
आदमी भी थोड़ा
भावुक अपने को
जरूर दिखाता है
कौऎ मुर्गी कबूतर
भी होते हैं कहीं
आस पास में मौजूद
माहौल उन सबको भी
बगुला भगत बनाता है
एक के बाद एक
मँच पर बोलने
को बुलाया जाता है
कभी कुछ नहीं
कहने वाला भी
लम्बा एक भाषण
फोड़ ले जाता है
कोई शेर लाता है
शायर हो जाता है
कोई गाना सुनाता है
किशोर कुमार की
टाँग तोड़ने में जरा
भी नहीं घबराता है
कविता ले के आने वाला
अपने को सुमित्रा नन्दन पँत
हूँ कहने में नहीं शरमाता है
सेवा काल में सबसे ज्यादा
गाली खाने वाला जो होता है
सबसे बड़ी माला
वो ही तो पहनाता है
सारे गिले शिकवे भूल कर
नम आँखों से मुस्कुराता है
आँसू बनाने के लिये
कोई भी ग्लीसरीन
तक नहीं लगाता है
शब्दों का चयन देखने
लग जाये अगर कोई
अपने को अर्थ ढूढने में
असमर्थ पाता है
भावार्थ ढूँढने के लिये
घर वापस लौट कर
शब्दकोष ढूँढने
लग जाता है
इससे सिद्ध ये जरूर
लेकिन हो जाता है
कि अवकाश ग्रहण
करना माहौल को
ऊर्जावान जरूर ही
बना ले जाता है
फिर ये समझ में
नहीँ आ पाता है
कि विभागों में
शाँति व्यवस्था
कायम करने के लिये
अवकाश लेने देने को
हथियार क्यों नहीं
सरकार द्वारा एक
बना लिया जाता है ।

रविवार, 11 दिसंबर 2011

बूढ़े के भाग से छींका टूटा

कल की कहानी
आज चौबीस घंटे
पुरानी हो गयी
पडौ़सन जो कल
सिर्फ मम्मी थी
आज नानी हो गयी
अखबार में थे
कई समाचार
कुछ गंभीर कुछ
चटपटे और रसीले
बावरे मियां तो
बिना चश्मे के
भी हो रहे थे रंगीले
जो साठ में जाने
वाले थे और हो
रहे थे ढीले
कल अचानक हुवा
उर्जा का संचार
हो ही गयी पैंसठ
सुन कर बिस्तरे से
गिर पड़े नींद में
जैसे ही पत्नी ने
सुनाया फ्रंट पेज
का समाचार
आज सारे सैनिक
लौट के आने लगे
छुट्टियां करवा दी
सब कैंसिल
सारे के सारे
बिना घंटी सुने
कक्षाओं मे हैं
जाने लगे।

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