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बुधवार, 10 जून 2015

स्कूल नहीं जाता है फर्जी भी नहीं हो पाता है पकड़ा जाता है तोमर हो जाता है

इसी लिये बार बार
कहा जाता है
समझाया जाता है
सरकार के द्वारा
प्रचारित प्रसारित
किया जाता है
पोथी लेकर
कुछ दिन किसी
स्कूल में चले जाने
का फायदा नुकसान
तुरंत नहीं भी हो
सालों साल बाद
पता चल पाता है
जब फर्जी होने ना होने
का सबूत ढूँढने का
प्रयास स्कूल के
रजिस्टर से
किया जाता है
वैसे डंके की चोट पर
फर्जी होना और
साथ में सर
ऊँचा रखना
भी अपने आप में
एक कमाल ही
माना जाता है
जो है सो है
सच होना और
सच पर टिके रहना
भी एक बहुत बड़ी
बात हो जाता है
यहीं पर दुख: भी
होना शुरु हो जाता है
फर्जी के फंस जाने
पर तरस भी आता है
अनपढ़ और पढ़े लिखे
के फर्जीवाड़े के तरीकों
पर ध्यान चला जाता है
पढ़ा लिखा फर्जी
हिसाब किताब साफ
सुथरा रख पाता है
दिमाग लगा कर
फर्जीवाड़े को करते करते
खुद भी साफ सुथरा
नजर आता है
फर्जीवाड़ा करता भी है
फर्जीवाड़ा सिखाता भी है
फर्जियों के बीच में
सम्मानित भी
किया जाता है
‘उलूक’ का आना जाना है
रोज ही आता जाता है
बस समझ नहीं पाता है
पढ़ लिख नहीं पाया फर्जी
फर्जी प्रमाण पत्र लाते समय
असली प्रमाण पत्र वाले
पढ़े लिखे फर्जियों से
राय लेने क्यों
नहीं आ पाता है ?

चित्र साभार: http://www.mapsofindia.com/

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

आभासी असली से पार पा ही जाता है

असली दुनियाँ अपने
आस पास की
निपटा के आता है
लबादे एक नहीं
बहुत सारे
प्याज के छिलकों
की तरह के कई कई
रास्ते भर उतारता
चला जाता है
घर से चला होता है
सुबह सुबह
नौ बजे का
सरकारी सायरन
जब भगाता है
कोशिश ओढ़ने की
एक नई
मुस्कुराहट
रोज आईने
के सामने
कर के आता है
शाम होते धूल
की कई परतों
से आसमान
अपने सिर
के ऊपर का
पटा पाता है
होता सब वही है
साथ उसके
जिसके बारे में
सारी रात
और सुबह
हिसाब किताब
रोज का रोज
बिना किसी
कापी किताब
और पैन के
लगाता है
चैन की बैचेनी से
दोस्ती तोड़ने की
तरकीबें खरीदने
के बाजार अपनी
सोच में सजाता है
रोज होता है शुरु
एक कल्पना से
दिन हमेशा
संकल्प एक नया
एक नई उम्मीद
भी जगाता है
लौटते लौटते
थक चुकी होती है
असली दुनियाँ
हर तरफ आभासी
दुनियाँ का नशा
जैसे काँच के
गिलास ले कर
सामने आ जाता है
लबादे खुल चुके
होते हैं सब
कुछ गिर चुके होते हैं
कब कहाँ अंदाज
भी नहीं सा कुछ
आ पाता है
जो होता है
वो हो रहा होता है
और होता रहेगा
उसी तरह असली
के हिसाब से
नकली होने का
मजा आना शुरु
होते ही आभासी
का सुरुर चारों
तरफ छा जाता है ।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

सब कुछ जायज है अखबार के समाचार के लिये जैसे होता है प्यार के लिये

समाचार
देने वाला भी
कभी कभी
खुद एक
समाचार
हो जाता है

उसका ही
अखबार
उसकी खबर
एक लेकर
जब चला
आता है

पढ़ने वाले
ने तो बस
पढ़ना होता है

उसके बाद
बहस का
एक मुद्दा
हो जाता है

रात की
खबर जब
सुबह तक
चल कर
दूर से आती है

बहुत थक
चुकी होती है
असली बात
नहीं कुछ
बता पाती है

एक कच्ची
खबर
इतना पक
चुकी होती है

दाल चावल
के साथ
गल पक
कर भात
जैसी ही
हो जाती है

क्या नहीं
होता है
हमारे
आस पास

पैसे रुपिये
के लिये
दिमाग की
बत्ती गोल
होते होते
फ्यूज हो
जाती है

पर्दे के
सामने
कठपुतलियाँ
कर रही
होती हैं
तैयारियाँ

नाटक दिखाने
के लिये
पढ़े लिखों
बुद्धिजीवियों
को जो बात
हमेशा ही
बहुत ज्यादा
रिझाती हैं

जिस पर्दे
के आगे
चल रही
होती है
राम की
एक कथा

उसी पर्दे
के पीछे
सीता के
साथ
बहुत ही
अनहोनी
होती चली
जाती है

नाटक
चलता ही
चला जाता है

जनता
के लिये
जनता
के द्वारा
लिखी हुई
कहानियाँ
ही बस
दिखाई
जाती हैं

पर्दा
उठता है
पर्दा
गिरता है
जनता
उसके उठने
और गिरने
में ही भटक
जाती है

कठपुतलियाँ
रमी होती है
जहाँ नाच में
मगन होकर

राम की
कहानी ही
सीता की
कहानी से
अलग कर
दी जाती है

नाटक
देखनेवाली
जनता
के लिये ही
उसी के
अखबार में
छाप कर
परोस दी
जाती है

एक ही
खबर
एक ही
जगह की
दो जगहों
की खबर
प्यार से
बना के
समझा दी
जाती है ।

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

असली / नकली

अच्छे शहद
की पहचान
कर देती है
बडे़ बड़ों
को हैरान
आजकल
बाजार में
भी नहीं
आ रहा है
मेरा शहद
बेचने वाला
मित्र भी
बहुत नखरे
दिखा रहा है
सोचा घर में
ही क्यों ना
बनाया जाये
घर में आने
वाली
मधुमक्खियों
को ही क्यों
ना पटाया जाये
सच है हवा में
रहकर जमीन
बेचना या
जमीन में
रहकर हवाई
जहाज उड़ाना
सबको बिना पढे़
ही आ जाता है
इसलिये कोशिश
करने में
क्या जाता है
यही सोचकर
असली खेतों में
चला जाता हूँ
असली फूलों को
काट काट कर
असली गुलदस्ते
बना लाता हूँ
बैठे बैठे राह
तकता जाता हूँ
मधुमक्खियों का
आना तो दूर
दिखना भी
बंद हो जाता है
गूगल में देखने
पर भी इसका
कोई समाधान जब
नहीं मिल पाता है
तब मजबूरी में
ये बेवकूफ
सारी बातें
अपने प्रकृति
प्रेमी मित्र
के संग
बांंटने  चला
जाता है
मित्र एक
प्लास्टिक के
फूलों का गुलदस्ता
ले कर आता है
चीनी के घोल में
उसको डुबाता है
कूड़े के ढेर
के बगल में
उसको फेंक
कर चला आता है
तुरंत ही सारा
शांत माहौल
मधुमखियों की
भिनभिनाहट
से गुंजायमान
हो जाता है
असली शहद
बनाने का
असली तरीका
और उस
शहद को
पहचानने वाले
असली लोगों
का पता
देखिये कितनी
आसानी से
मिल जाता है।

बुधवार, 2 मई 2012

सरकार का आईना

उन्होंने
जैसे ही
एक बात
उछाली
मैने तुरंत
अपने मन
की जेब
में संभाली
घर आकर
चार लाईन
लिख ही डाली
कह रहे थे
जोर लगाकर
किसी राज्य की
सरकार का
चेहरा देखना
हो अगर 
उस राज्य के
विश्वविद्यालय 
पर सरसरी
नजर डालो
कैसी चल
रही है सरकार
तुरत फुरत में
पता लगालो
वाह जी
क्या इंडीकेटर
ढूंढ के चाचा
जी लाये हैं
अपनी पोल
पट्टी खुद ही
खोलने का
जुगाड़ बनाये हैं
मेरी समझ
में भी बहुत
दिनों से ये नहीं
आ रहा था
हर रिटायर
होने वाला शख्स
कोर्ट जा जा
कर स्टे
क्यों ले
आ रहा था
अरे जब
बूढ़े़ से बूढ़ा़
सरकार में
मंत्री हो
जा रहा था
इतने बड़े राज्य
का बेड़ा गर्क
करने में
बिल्कुल भी
नहीं शर्मा
रहा था
तो मास्टर जी
ने क्या
बिगाड़ा था
किसी का
क्यों उनको साठ
साल होते ही
घर चले जाओ
का आदेश दिया
जा रहा था
काम धाम के
सपने खाली पीली
जब राजधानी
में जा कर
सरकार जनता
को दिखाती है
उसी तरह
विश्विद्यालय की
गाड़ी भी तो
खरामे खरामे
बुद्धि का
गोबर बनाती है
जो कहीं
नहीं हो सकता
उसे करने की
स्वतंत्रता भी
यहाँ आसानी से
मिल ही जाती है
बहुत सी बाते तो
यहाँ कहने
की मेरी भी
हिम्मत नहीं
हो पाती है
सुप्रीम कोर्ट
भी केवल
बुद्धिजीवियों
के झांसे
में ही आ
पाती है
वाकई में
सरकार का
असली चेहरा
तो हमें
ये ही
दिखाती है।

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