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रविवार, 17 मई 2015

शिव की तीसरी आँख और उसके खुलने का भय अब नहीं होता है

शिव की
तीसरी आँख
और उसके
खुलने का भय
अब नहीं होता है
जब से महसूस
होने लगा है
खुद को छोड़
हर दूसरा शख्स
अपने सामने का
एक शिव ही होता है
और
नहीं होता है
अर्थ
लिखी हुई
दो पंक्तियों का
वही सब जो
लिखा होता है
शिव तो
पढ़ रहा होता है
बीच में
उन दोनो
पंक्तियों के
वही सब
जो कहीं भी
नहीं लिखा
हुआ होता है
उम्र बढ़ने
या आँखें
कमजोर होने
का असर भी
नहीं होता है
जो दिखता
है तुझे
तुझे लगता
है बस
कि वो
वही होता है
तू पढ़ रहा
होता है
लिखी इबारत
पंक्तियों में
शब्द दर शब्द
पंक्तियों के बीच
में नहीं लिखे
हुऐ का पता
पता चलता है
तुझे छोड़ कर
हर किसी
को होता है
भूल तेरी ही है
अब भी समझ ले
दो आँखे एक जैसी
होने से हर कोई
तेरे जैसा
नहीं होता है
हर कोई
तुझे छोड़ कर
शिव होता है
तीसरा नेत्र
जिसका
हर समय ही
खुला होता है
तू पढ़
रहा होता है
लिखे हुऐ को
शिव उधर
पंक्तियों के
बीच में
नहीं लिखे
हुऐ को
गढ़ रहा
होता है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 29 नवंबर 2014

अंधेरा बाहर का कभी भी अंदर का नहीं होता है

अचानक
किसी क्षण
आभास
होता है
और याद
आना शुरु
होता
है अंधेरा
जिसे बहुत
आसान है
देखना और
टटोलना
अपने ही अंदर
बस आँखें
बंद करिये
और शुरु
हो जाईये
बाहर उजाले
में फैले हुऐ
अंधेरे के
आक्टोपस की
भुजाओं से
घिरे घिरे
आखिर कब
तक इंतजार
किया जा
सकता है
घुटन होने
के लिये
जरूरी नहीं
है एक
बंद कमरा
धूल और धुऐं
से भरा हुआ
साँस बंद
होती हुई
सी महसूस
होना शुरु
होने लगती है
कभी किसी
साफ सुथरे
माहौल में भी
ऐसे ही समय
पर बहुत
काम आता है
अपने अंदर
का अंधेरा
जो दे सकता
है सुकून
बस जरूरत
होती है उसे
टटोलने की
हाथों की
उँगलियों से नहीं
आखों की बंद
पुतलियों से ही
बस शर्त है
आँख बंद होते ही
देखना शुरु
नहीं करना है
कोई एक सपना
अंधेरे में फैले हुऐ
सपने कभी
किसी के
अपने नहीं होते हैं
अपने ही अंदर
का अंधेरा जितना
अपना होता है
उतना बाहर
का उजाला
नहीं होता है
बस टटोलना
आना जरूरी
होता है
जिसे सीख
लेने के लिये
जरूरी होता है
कभी कुछ
देर आँखे
बंद करना
और इस
बंद करने
का मतलब
बंद करना
ही होता है ।

चित्र साभार: tessbalexander.wordpress.com

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

बंद करके आँखों को कभी उजाले को अंंधेरे में भी देखा जाये

आँखें बंद कर
कुछ दिनों
कुछ कह
लिया जाये
अंंधेरे में अंंधेरा
जला कर भी
कुछ कर
लिया जाये
रोज दिखती है
बिना चश्मे
उजाले की
करामातें
कुछ नया करें
किसी दिन और
कुछ भी नहीं
कहीं देखा जाये
रातों में होती है
रोशनी और
बहुत होती है
चाँद तारों को भी
अवकाश दे
के देखा जाये
एक तुम आते
हो खयालों में
एक वो आते जाते हैं
किसी और के
आने जाने का भी
कभी सोचा जाये
मुद्दतें हो गई हैं
पता चल भी
नहीं पाया यूँ भी
अपने होने ना होने
का ही कभी कुछ
पता कर लिया जाये
‘उलूक’
अंधेरे से रखनी
भी है दोस्ती तुझे
तेरी किस्मत भी है
कुछ शर्म
और लिहाज
उसका ही सही
कभी कर
लिया जाये
आने जाने
से रोका
नहीं है तुझे
भी किसी
ने कभी
उजाले में अंंधेरे
के उसूलों को
अंंधेरे में आजमा
कर कहीं अंंधेरे में
ही कभी देखा जाये
खुली आँखो से
देखती है दुनियाँ
सभी कुछ हमेशा ही
बंद कर के भी
आँखों से देखा
जाता है कुछ कभी
बस यही और यही
देखने के लिये
ही सही कभी
ये भी देखा जाये ।

चित्र साभार: http://www.prwatch.org

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