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रविवार, 17 सितंबर 2017

इतना दिखा कर उसको ना पकाया करो कभी खुद को भी अपने साथ लाया करो

अपना भी
चेहरा कभी
ले कर के
आया करो


अपनी भी
कोई एक
बात कभी
आकर
बताया करो

पहचान चेहरे
की चेहरे से
होती है हजूर

एक जोकर को
इतना तो ना
दिखाया करो

बहुत कुछ
कहने को
होता है पास में
खुशी में भी
उतना ही
जितना उदास में

खूबसूरत हैं आप
आप की बातें भी
अपने आईने में
चिपकी तस्वीर
किसी दिन
हटाया करो

खिलौनों से
खेल लेना
जिन्दगी भर
के लिये
कोई कर ले
इस से अच्छा
कुछ भी नहीं
करने के लिये

किसी के
खिलौनों
की भीड़ में
खिलौना हो
खो ना
जाया करो

कहानियाँ
नहीं होती हैं
‘उलूक’ की
बकबक

बहके हुऐ
को ना
बहकाया करो

उसकी बातों
में अपना घर
इतना ना
दिखवाया करो

अपनी ही
आँखों से
अपना घर
देख कर के
आया करो।

चित्र साभार: CoolCLIPS.com

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

समय खुद लिखे हुऐ का मतलब भी बदलता चला जाता है

बहुत जगह
बहुत कुछ
कुछ ऐसे भी
लिखा हुआ
नजर आ जाता है
जैसे आईने पर पड़ी
धूल पर अँगुलियों
के निशान से कोई
कुछ बना जाता है
सागर किनारे रेत
पर बना दी गई
कुछ तस्वीरेँ
पत्थर की पुरानी
दीवार पर बना
एक तीर से
छिदा हुआ दिल
या फिर कुछ फटी हुई
कतरनों पर किये हुऐ
टेढ़े मेढ़े हताक्षर
हर कोई समय के
हिसाब से अपने
मन के दर्द और
खुशी उड़ेल
ले जाता है
कहीं भी
इधर या उधर
वो सब बस यूँ ही
मौज ही मौज में
लिख दिया जाता है
इसलिये लिखा जाता है
क्यूँकि बताना जब
मुश्किल हो जाता है
और जिसे कोई
समझना थोड़ा सा
भी नहीं चाहता है
हर लिखे हुऐ का
कुछ ना कुछ मतलब
जरूर कुछ ना कुछ
निकल ही जाता है
बस मायने बदलते
ही चले जाते हैं
समय के साथ साथ
उसी तरह जिस तरह
उधार लिये हुऐ धन पर
दिन पर दिन
कुछ ना कुछ
ब्याज चढ़ता
चला जाता है
यहाँ तक कि खुद
ही के लिखे हुऐ
कुछ शब्दों पर
लिखने वाला जब
कुछ साल बाद
लौट कर विचार
कुछ करना चाहता है
पता ही नहीं चलता है
उसे ही अपने लिखे हुऐ
शब्दो का ही अर्थ
उलझना शुरु हुआ नहीं
बस उलझता
ही चला जाता है
इसीलिये जरूरी और
बहुत ही जरूरी
हो जाता है
हर लिखे हुऐ को
गवाही के लिये
किसी ना किसी को
कभी ना कभी बताना
मजबूरी हो जाता है
छोटी सी बात को
समझने में एक पूरा
जीवन भी कितना
कम हो जाता है
समय हाथ से
निकलने के बाद
ही समय ही
जब समझाता है ।

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

मुझे तो छोड़ दे कम से कम हर किसी को कुछ ना कुछ सुनाता है

कभी कहीं किसी ऐसी
जगह चला चल जहाँ
बात कर सकें खुल के
बहुत से मसले हैं
सुलझाने कई जमाने से
रोज मुलाकात होती है
कभी सुबह कभी शाम
कभी रास्ते खासो आम
इसके उसके बारे में तो
रोज कुछ ना कुछ
सामने से आता है
कुछ कर भी
ना पाये कोई
तब भी लिख
लिखा कर
बराबर कर
लिया जाता है
तेरा क्या है तू तो
कभी कभार ही
बहुत ही कम
समय के लिये
मिल मिला पाता है
जब बाल बना
रहा होता है कोई
या नये कपड़े कैसे
लग रहे हैं पहन कर
देखने चला जाता है
हर मुलाकात में ऐसा
ही कुछ महसूस
किया जाता है
अपने तो हाल ही
बेहाल हो रहे हैं
कोई इधर दौड़ाता है
कोई उधर दौड़ाता है
एक तू है हर बार
उसी जगह पर
उसी उर्जा से ओतप्रोत
बैठा नहीं तो खड़ा
पाया जाता है
जिस जगह पर कोई
पिछली मुलाकात में
तुझे छोड़ के जाता है
बहुत कर लिये मजे तूने
उस पार आईने के
रहकर कई सालों साल
अब देखता हूँ कैसे
बाहर निकल कर के
मिलने नहीं आता है
कुछ तो लिहाज कर ले
फिर नहीं कहना किसी से
दुनियाँ भर में कोई कैसे
अपने खुद के अक्स को
इस तरह से बदनाम
कर ले जाता है ।

रविवार, 24 जून 2012

कुछ नया किया जाये

खुद के मन के अंदर
घुमड़ रहा हो जो
जरूरी नहीं उसका
बादल बनने दिया जाये
दूसरा बादल कहीं और
बना के क्यों ना
बरसने दिया जाये
अपने चेहरे को अपने
आईने में ही देखा जाये
जरूरी नहीं जो दिखे
खुद को उसे किसी
और को दिखाया जाये
अपने अपने आईने को
पर्दों से ढक दिया जाये
कोई क्या देख रहा है
उनके अपने आईने में
किसी से ना पूछा जाये
वीराने बुनने वालों को
किसी दिन बिल्कुल
भी ना टोका जाये
एक दिन तो ऎसा
हो जिस दिन अपने
गमलों को बस देखा जाये
उनकी आवारगी को आज
नजरअंदाज कर दिया जाये
एक दिन के लिये सही 
अपना ही आवारा 
हो लिया जाये
चुपचाप आज दिन में
ही सो लिया जाये
कुछ पल का ही सही
मौन ले लिया जाये
अपनी बक बक की रेल
को लाल सिग्नल दिया जाये
किसी और का सुरीला गीत
आज के लिये सबको
सुनने को दिया जाये।

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