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शनिवार, 4 जुलाई 2015

पीछे का पीछे ही ठीक है आगे देखने वाले ही आगे जाते हैं

लौट कर
देखने की चाह
अपने ही बनाये
हुऐ शब्दों के
रास्ते पर
बस एक चाह
ही रह जाती है
लौटा जाता नहीं है
पीछे से शब्दों की
एक बहुत ही लम्बी
सी कतार रह जाती है
मुड़ कर देखना भी
आसान नहीं होता है
गरदन अपनी नहीं
अपने ही लिखे
शब्दों की टेढ़ी
होती सी
नजर आती है
चलना शुरु करती
है जिंदगी भी
अपने खुद के
ही पैरों पर
हमेशा ही आगे
की ओर ही
पीछे देखने की
सोचने सोचने तक
पूरी हो जाती है
बहुत कुछ चलता है
साथ में शब्दों के
बनते बिगड़ते
रास्तों में
अपने बहुत कम
ही रह पाते है
अपने जैसों को
छाँटते हुऐ
साथ बदलते
बदलते शब्द भी
रास्ते बदलते
चले जाते हैं
कैसे लौटे कोई
देखने के लिये
अपने ही ढूँढे हुऐ
शब्दों के पिटारों में
दीमक जिंदगी के
किसने देखें हैं
क्या पता शब्दों को
चाटते हुऐ ही
साथ में चलते
चले जाते हैं
मिटता हुआ
चलता है समय भी
दिखता कुछ
भी नहीं है
हम भी तुम भी
और सभी
धुंधले होते ही
चले जाते हैं
आगे के शब्दों पर
नजर रहना ही
ठीक लगता है
पीछे लिखे हुऐ
महसूस कराते हैं
जैसे कुछ खींचते हैं
कुछ खींच कर गिराते हैं ।

चित्र साभार: imageenvision.com

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

अभी ये दिख रहा है आगे करो इंतजार क्या और नजर आता है



हमाम के चित्र
बाहर ही बाहर
तक दिखाना तो
समझ में आता है

पता नहीं
कैमरे वाला
क्यों
किसी दिन
अंदर तक
पहुँच जाता है
कब कौन
सी बात को
कितना काँट छाँट
कर दिखाता है

सामने बैठे
ईडियट बाक्स के
ईडियट ‘उलूक’ को
कहाँ कुछ समझ
में आता है

बहुत बार बहुत से
झाडुओं की कहानी
झाडू‌ लगाने वालों
के मुँह से सुन चुका
होना ही काफी
नहीं होता है

गजब की
बात होती है
जब झाड़ू लगाने वाला
झाड़ू लगाने से पहले
खुद ही कूड़ा फैलाता है

बहुत अच्छी तरह
से आती है कुछ बाते
कभी कभी समझ में
बेवकूफों को भी

पर क्या किया जाये
कुछ बेवकूफों के
कहने कहाने पर
बेवकूफ कह रहा है
क्यों सुनते हो
बात में दम नजर
नहीं आता है
जैसा ही कुछ कुछ
कह दिया जाता है

और कुछ लोग
कुछ भी नहीं
समझते हैं
या समझना ही
नहीं चाहते हैं

भेड़ के रेहड़ के
भेड़ हो लेते हैं
पता होता है
उनको बहुत ही
अच्छी तरह से
भीड़ की भगदड़
में मरने में भी
मजा आता है

कोई माने
या ना माने
बहुत बोलने से कुछ
नहीं भी होता है

फिर भी
बोलते बोलते
कलाकारी से
एक कलाकार
बहुत सफाई से
मुद्दे चोरों के भी
चुरा चुरा कर
चोरों को ही
बेच जाता है ।

चित्र साभार: imageenvision.com

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

पिताजी की सोच

मैंने पिताजी को
मेरे बारे में
माँ से कई बार
पूछते हुवे सुना था
"इसके घोड़े हमेशा
इसकी गाड़ी के पीछे
क्यों लगे होते हैं?"
माँ मुस्कुराती
लाड़ झलकाती
और साड़ी का पल्लू
ठीक कर पिताजी
को तुरंत बताती
चिंता करने की
कोई बात नहीं है
अभी छोटा है
कुछ दिन देखिये
अपने आप सब
जगह पर आ जायेगा
गाड़ी भी और घोड़ा भी
ये बातें मैं कभी
भी नहीं समझ पाया
जब भी कोशिश की
लगता था खाली
दिमाग खपाया
माँ और पिताजी
आज दोनो नहीं रहे
बीस एक साल
और गुजर गये
मैं शायद अब
वाकई मैं बड़ा
हो पडा़ अचानक
आँख खुली और
दिखने लगे आसपास
के घोड़े और गाड़ियां
सब लगे हुवे हैं
उसी तरह जिस
तरह शायद मेरे
हुवा करते थे
और आज मैं
फिर से उसी
असमंजस मैं हूँ
कि आँखिर पिताजी
ऎसा क्यों कहा
करते थे?

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