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बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

मौन की ताकत

कुछ मौन रहे
कुछ रहे चुप चुप
कुछ लगे रहे
कोशिश में
लम्बे अर्से तक
उनको सुनने
की छुप छुप
पर कहां कैसे
सुन पाते
कोई मूड में
होता सुनाने के
जो सुनाते
एक लम्बे दौर
का आतंक
अत्याचार भ्रष्टाचार
धीरे धीरे चुपचाप
गुमसुम बना देता है
हिलता रहता
मौनअंदर से सिमटते सिमटते
अपने को ठोस बना देता है
मजबूत बना देता है
ऎसे मौन की आवाज
कोई ऎसे ही कैसे
सुन सकता है
वो जो ना
बोल सकता है
ना कुछ कह सकता है
ऎसे सारे मौन
व्यक्त कर चुके हैं
अपने अपने आक्रोश
बना चुके हैं एक कोश
किसने क्या कहा
किसने क्या सुना
कोई नहीं जान पायेगा
पर हरेक का मौन
एक होकर अपनी बात
सबको एक सांथ
चिल्ला चिल्ला के सुनायेगा
आतंकियों भ्रष्टाचारियों
अत्याचारियों को
पता है मौन की बात
अब ये सारे लोग खुद
आतंकित होते चले जायेंगे
मौन ने बोये हैं
जो बीज इस बीच
प्रस्फुटित होंगे
बस इंतजार है कुछ
और दिनो का
धीरे धीरे सारे मौन
खिलते चले जायेंगे
किसका कौन सा
मौन रहा होगा
कोई कैसे जान पायेगा
जब सब से एक सा
एक सांथ प्रत्युत्तर पायेगा
खिलेगा मौन का फूल महकेगा
आतंक अत्याचार व्यभिचार
भ्रष्टाचार की जमीन पर
ठीक उसी कमल की तरह
जिसे कीचड़ में भी
खिलना मंजूर होता है।

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