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सोमवार, 26 मई 2014

कोई ना कोई पाल बिल सबसे पहले लाया जायेगा

बहुत ही बेवकूफ
थी पिछली सरकार
कोशिश में लगी
हुई थी बनाने में
कागज के टुकड़े से
आदमी का आधार
इतना भी नहीं
समझी देश प्रेम को
कैसे कागज में
उतारा जायेगा
सारे कागज ही
एक जैसे हों जहाँ
कौन कितना प्रेमी है
ऐसे में कैसे
हिसाब लगाया जायेगा
अब लग रहा है लेकिन
इसका भी समाधान
आसानी से ही
निकल आयेगा
दिखने शुरु हो जायेंगे
जैसे ही पूत के पाँव
पालने से बाहर
उसी को देख कर
देश प्रेम निर्धारित
कर लिया जायेगा
स्केल मिलेगा
नापने का कुछ
पुराने प्रेमियों को
उनसे नापने के लिये
इशारा दिया जायेगा
उन में से ही होगा
बताने वाला भी
कितने अंकों के साथ
देश प्रेमी होने के लिये
कोई योग्यता हासिल
कर ले जायेगा
देश प्रेम को अंदर
छुपाने वाले को
नोटिस दे दिया जायेगा
लोकपाल शोकपाल
आये या ना आ पाये
अपने पाल अपने सँभाल
बिल सबसे पहले
बहुमत से पास हो कर
सामने से आ जायेगा
अभिमन्यू कब से
सीख रहे थे पेट के अंदर
बाहर आने के बाद
उनका कमाल
‘उलूक’ देख लेना
तू भी बहुत जल्दी
अपने सामने सामने
ही देख पायेगा ।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

एक भीड़ एक पोस्टर और एक देश

इधर कुछ
पढ़े लिखे
कुछ अनपढ़
एक दूसरे के
ऊपर चढ़ते हुऐ
एक सरकारी
कागज हाथ में
कुछ जवान
कुछ बूढ़े
किसी को
कुछ पता नहीं
किसी से कोई
कुछ पूछता नहीं
भीड़ जैसे भेड़
और बकरियों
का एक रेहड़
कुछ लैप टौप
तेज रोशनी
फोटोग्राफी
अंगुलियों और
अंगूठे के निशान
सरकार बनाने
वालों को मिलती
एक खुद की पहचान
एक कागज का टुकड़ा
'आधार' का अभियान
उसी भीड़ का अभिन्न
हिस्सा 'उलूक'
गोते लगाती
हुई उसकी
अपनी पहचान
डूबने से अपने
को बचाती हुई
दूसरी तरफ
शहर की सड़कों
पर बजते ढोल
और नगाड़े
हरे पीले गेरुए
रंग में बटा हुआ
देश का भविष्य
थम्स अप लिमका
औरेंज जूस
प्लास्टिक की
खाली बोतलें
सड़क पर
बिखरे खाली
यूज एण्ड थ्रो गिलास
हजारों पैंप्लेट्स
नाच और नारे
परफ्यूम से ढकी सी
आती एल्कोहोल
की महक
लड़के और लड़कियां
कहीं खिसियाता
हुआ लिंग्दोह
फिर कहीं 'उलूक'
बचते बचाते
अपनी पहचान को
निकलता हुआ दूसरी
भीड़ के बीच से और
तीसरी तरफ
प्रेस में छपते हुए
एक आदमी
के पोस्टर
जो कल
सारी देश की
दीवार पर होंगे
और
यही भीड़
पढ़ रही होगी
दीवार पर
लिखे हुऐ
देश के
भविष्य को
जिसे इसे ही
तय करना है ।

मंगलवार, 14 मई 2013

कुछ तो सीख बेचना सपने ही सही

उसे देखते ही
मुझे कुछ हो
ही जाता है
अपनी करतूतों
का बिम्ब बस
सामने से ही
नजर आता है
सपने बेचने
में कितना
माहिर हो
चुका है
मेरा कुनबा
जैसे खुले
अखबार की
मुख्य खबर
कोई पढ़
कर सामने
से सुनाता है
कभी किसी
जमाने में
नयी पीढी़ के
सपनों को
आलम्ब देने
वाले लोग
आज अपने
सपनों को
किस शातिराना
अंदाज में
सोने से
मढ़ते चले
जा रहे हैं
इसके सपने
उसके सपने
का एक
अपने अपने
लिये ही बस
आधार बना
रहे हैं
सपने जिसे
देखने हैं
अभी कुछ
वो बस
कुछ सपने
अपने अपने
खरीदते ही
जा रहे हैं
सच हो रहे
सपने भी
पर उसके
और इसके
जो बेच
रहे हैं
खरीदने वाले
बस खरीद
रहे हैं
उन्हे भी
शायद पता
हो गया है
कि वो
सपने सच
होने नहीं
जा रहे हैं
वो तो बस
इस बहाने
हमसे सपने
बेचने की
कला में
पारंगत होना
चाह रहे हैं ।

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