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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

जाते जाते आने वाले को कुछ सिखाने के लिये कान में बहुत कुछ फुसफुसा गया एक साल

बहुत कुछ बता गया
बहुत कुछ सिखा गया
याद नहीं है सब कुछ
पर बहुत कुछ
लिखा गया
एक साल
और आते आते
सामने से साफ साफ
दिख रहा है 
अब सीटी बजाता
जाता हुआ 
एक साल
पिछले सालों की तरह
हौले हौले से जैसे
मुस्कुरा कर अपने ही
होंठों के अंदर अंदर
कहीं अपने ही हाथ
का अँगूठा दिखा
गया एक साल
अच्छे दिन आने के
सपने सपनों के
सपनों में भी
बहुत अंदर अंदर
तक कहीं घुसा
गया एक साल
असलियत भी
बहुत ज्यादा खराब
नहीं दिख रही है
अच्छे अच्छे हाथों में
एक नया साफ सुथरा
सरकारी कोटे से
थोक में खरीदे गये
झाड़ुओं मे से
एक झाडू‌ थमा
गया एक साल
लिखने को
इफरात से था
बहुत कुछ खाली
दिमाग में था
शब्द चुक गये
लिखते लिखते
पढ़ने वालों की
पढ़ने की आदत
छुड़ा गया एक साल
ब्लाग बने कई नये
पुराने ब्लागों के
पुराने पन्नों को
थूक लगा लगा कर
चिपका गया एक साल
अपनी अपनी
अपने घर में
सबके घर की
सब ने कह दी
सुनने वालों को
ही बहरा बना
गया एक साल
खुद का खाना
खुद का पीना
खुद के चुटकुल्लों
पर खुद ही हंस कर
बहुत कुछ समझने
समझाने की किताबें
खुद ही लिखकर
अनपढ़ों को
बस्ते भर भर कर
थमा गया एक साल
खुश रहें आबाद रहें
हिंदू रहें मुसलमान रहें
रहा सहा आने वाले
साल में कहें
गिले शिकवे बचे कुचे
आने वाले साल में
और भी अच्छी तरह से
लपेटने के नये तरीके
सिखा गया एक साल ।

 चित्र साभार: shirahvollmermd.wordpress.com

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