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शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

आभासी असली से पार पा ही जाता है

असली दुनियाँ अपने
आस पास की
निपटा के आता है
लबादे एक नहीं
बहुत सारे
प्याज के छिलकों
की तरह के कई कई
रास्ते भर उतारता
चला जाता है
घर से चला होता है
सुबह सुबह
नौ बजे का
सरकारी सायरन
जब भगाता है
कोशिश ओढ़ने की
एक नई
मुस्कुराहट
रोज आईने
के सामने
कर के आता है
शाम होते धूल
की कई परतों
से आसमान
अपने सिर
के ऊपर का
पटा पाता है
होता सब वही है
साथ उसके
जिसके बारे में
सारी रात
और सुबह
हिसाब किताब
रोज का रोज
बिना किसी
कापी किताब
और पैन के
लगाता है
चैन की बैचेनी से
दोस्ती तोड़ने की
तरकीबें खरीदने
के बाजार अपनी
सोच में सजाता है
रोज होता है शुरु
एक कल्पना से
दिन हमेशा
संकल्प एक नया
एक नई उम्मीद
भी जगाता है
लौटते लौटते
थक चुकी होती है
असली दुनियाँ
हर तरफ आभासी
दुनियाँ का नशा
जैसे काँच के
गिलास ले कर
सामने आ जाता है
लबादे खुल चुके
होते हैं सब
कुछ गिर चुके होते हैं
कब कहाँ अंदाज
भी नहीं सा कुछ
आ पाता है
जो होता है
वो हो रहा होता है
और होता रहेगा
उसी तरह असली
के हिसाब से
नकली होने का
मजा आना शुरु
होते ही आभासी
का सुरुर चारों
तरफ छा जाता है ।

शनिवार, 5 जुलाई 2014

रस्म है एक लिखना लिखाना जो लिखना होता है वो कभी नहीं लिखना होता है



रोज लिखना
जरूरी है क्या
क्यों लिखते हो रोज
ऐसा कुछ जिसका
कोई मतलब नहीं होता है
कभी देखा है
लिखते लिखते लेखक
खुद के लिखे हुऐ का
सबसे पुराना सिरा
बहुत पीछे
कहीं खो देता है
क्या किया
जा सकता है
वैसे तो एक
लिखने वाले ने
कुछ कहने के
लिये ही लिखना
शुरु किया होता है
लिखते लिखते
कलम बहुत दूर
तक चली आती है
कहने वाली बात
कहने से ही
रह जाती है
सच कहना कहाँ
इतना आसान होता है
कायर होता है बहुत
कहने वाला
कुछ कहने के लिये
बहुत हिम्मत और
एक पक्का जिगर
चाहिये होता है
लगता नहीं है
खुद को इस
नजर से देखने में
उसे कहीं कोई
संकोच होता है
उसे बहुत अच्छी
तरह से पता होता है
सच को सच सच
लिख देने का
क्या हश्र होता है
किसी का उसी के
अपने ही पाले पौसे
उसके ही चारों ओर
रोज मडराने वाले
चील कौओं गिद्धों के
नोच खाये जाने की
खबर आने में कोई
संदेह नहीं होता है
बाकी जोड़ घटाना
गुणा भाग
जो कुछ भी होता है
इस आभासी दुनियाँ में
सब कुछ आभासी
लिखने तक ही
अच्छा होता है
सच को देखने
सच को समझने
और सच को सच
कहने की इच्छा
रखने वाला ‘उलूक’
तेरे जैसे की ही बस
सोच तक ही
में कहीं होता है
उसके अलावा अगर
ऐसा ही कोई दूसरा
कहीं ओर होता है
तो उसके होने से
कौन सा कहीं
कुछ गजब होता है
लिखना लिखाना
तो चलता रहता है
जो कहना होता है
वो कौन कहाँ
किसी से सच में
कह रहा होता है ।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

पानी नहीं है से क्या है अपनी नाव को तो अब चलने की आदत हो गई है

कोई नई बात 
नहीं कहीं गई है 
कोई गीत गजल 
कविता भी 
नहीं बनी है 
बहुत जगह एक 
ही चीज बने 
वो भी ठीक 
जैसा तो नहीं है 
इसलिये हमेशा 
कोशिश की गई है 
सारी अच्छी और 
सुन्दर बातें 
खुश्बू वाले 
फूलों के लिये 
कहने सुनने 
के लिये रख 
दी गई हैं 
अपने बातों के 
कट्टे में सीमेंट 
रेते रोढ़ी की 
जैसी कहानियाँ 
कुछ सँभाल कर 
रख दी गई हैं 
बहुत सारी 
इतनी सारी 
जैसे आसमान 
के तारों की 
एक आकाशगंगा 
ही हो गई है 
खत्म नहीं 
होने वाली हैं 
एक के निकलते
पता चल जाता है 
कहीं ना कहीं 
तीन चार और 
तैय्यार होने के 
लिये चली गई हैं 
रोज रोज दिखती है 
एक सी शक्लें 
अपने आस पास 
वाकई में बहुत 
बोरियत सी 
अब हो गई है 
बहुत खूबसूरत है 
ये आभासी दुनियाँ 
इससे तो अब 
मोहब्बत सी 
कुछ हो गई है 
बहुत से आदमियों 
के जमघट के बीच 
में अपनी ही 
पहचान जैसे कुछ 
कहीं खो गई है 
हर कोई बेचना 
चाहता है कुछ नया 
अपने कबाड़ की 
भी कहीं तो 
अब खपत 
लगता है हो 
ही गई है ।

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