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शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

किसी दिन तो कह मुझे कुछ नहीं है बताना

वही रोज रोज
का रोना
वही संकरी
सी गली
उसी गली का
अंधेरा कोना
एक दूसरे को
टक्कर मार
कर निकलते
हुऐ लोग
कुछ कुत्ते
कुछ गायें
कुछ बैल
उसी से
सुबह शाम
गुजरना
गोबर में
जूते का
फिसलना
मुंह बनाकर
थूकते हुऐ
पैंट उठा कर
संभलते हुऐ
उचक उचक
कर चलना
कुछ सीधे कुछ
आड़े तिरछे
लोगों का उसी
समय मिलना
इसी सब का
दस के सरल
से पहाड़े की
तरह याद
हो जाना
इसी खिचड़ी
को बिना
नमक तेल
मसाले के
रोज का रोज
बिना पूछे
किसी के
सामने परोसना
एक दो बार
देखने के बाद
सब समझ
में आ जाना
खिचड़ी
खाना तो दूर
उसे देखने
भी नहीं आना
पता ही नहीं
चल पाना
गली का
रोम रोम में
घुस जाना
एक चौड़ी
साफ सुथरी
सड़क की
कल्पना का
सिरा गली
में ही खो जाना
गली के एक
कोने से
दूसरी और
उजाले में
निकलने से
पहले ही
अंधेरा
हो जाना
गली का
व्यक्तित्व में
ही शामिल
हो जाना
समझ में
आने तक
बहुत देर
हो जाना
गली का
गली में
जम जाना
उस दिन
का इंतजार
कयामत का
इंतजार
हो जाना
पता चले
जिस दिन
छोड़ दिया
है तूने
उस गली
से अब
आना जाना ।

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