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शनिवार, 18 जुलाई 2015

खिंचते नहीं भी हों इशारे खींचने के लिये खींचने जरूरी होते हैं

थोड़े कुछ
गिने चुने
रोज के वही
उसी तरह के
जैसे होते हैं
खाने पीने
के शौकीन
जैसे कहीं किसी
खाने पीने की
जगह ही होते हैं
यहाँ ना ढाबा
ना रोटियों पराठों
का ना दाल मखानी
ना मिली जुली सब्जी
कुछ कच्ची कुछ
पकी पकाई बातें
सोच की अपनी
अपनी किसी की
किताबें कापियाँ
कलम पेंसिल
दवात स्याही
काली हरी लाल
में से कुछ कुछ
थोड़े बहुत
मिलते जुलते
जरूर होते हैं
उम्र के हर पड़ाव
के रंग उनके
इंद्रधनुष में
सात ही नहीं
हमेशा किसी के
कम किसी के
ज्यादा भी होते हैं
दर्द सहते भी हैं
मीठे कभी कभी
नमकीन कभी तीखे
दवा लिखने वाले
सभी तो नहीं होते हैं
बहुत कुछ टपकता है
दिमाग से दिल से
छलकते भी हैं
सबके हिसाब से
सभी के शराब के
जाम हों जरूरी
नहीं होते हैं
कहना अलग
लिखना अलग
पढ़ना अलग
सब कुछ छोड़ कर
कुछ के लिये
किसी के कुछ
इशारे बहुत होते हैं
कुछ आदतन
खींचते हैं फिर
सींचते हैं बातों को
‘उलूक’ की तरह
बेबात के पता
होते हुऐ भी
बातों के पेड़ और
पौंधे नहीं होत हैं ।

चित्र साभार: all-free-download.com

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

रंग देखना रंग पढ़ना रंग लिखना रंग समझना या बस रंग से रंग देना कुछ तो कह दे ना

रंग दिखाये
माँ बाप ने
चलना शुरु
किया जब
पावों पर अपने
लड़खड़ाते हुऐ
सहारे से
उँगलियों के
उनकी ही
हाथों की

रंग कम
समझ में आये
उस समय पर
आई समझ में
तितलियाँ
उड़ती उड़ती
पेड़ पौंधे फूल
एक नहीं
बहुत सारे
कौआ काला
कबूतर सफेद

अच्छाई और बुराई
खुशी और दुख:
प्यार और दुलार
रंगीन तोते मोर
और होली में
उड़ते अबीर
और गुलाल

रंग बने इंद्र के
धनुष भी पर
युद्ध कभी भी नहीं
हमेशा उमड़े
भाव रंगीन

रंगों के साथ
रंगों को देखकर
छूकर या
आत्मसात कर
बिना भीगे भी
रंगों से रंगों के
रंगो का देवत्व
कृष्ण का हरा
या राम का हरा

कभी नहीं हरा सका
रंगो को रंगों
के साथ खेलते हुऐ
जैसे अठखेलियाँ
रंगों के ही
धनुष तीर और
तलवार होने
के बावजूद
लाल रंग देख
कर कभी
याद नहीं आया
खून का रंग तक

सालों गुजर गये
ना माँ रही
ना बाप रहे
पूछें किससे
सब बताते बताते
क्यों छिपा गये
रंगों के उस रंग को

जिसे देख कर
निकलने लगें
आँसू उठे दिल
में दर्द और
महसूस होने लगे
रंग का रंग से
अलग होना
समझ में आने लगे
काले का काला
और सफेद का
बस और बस
सफेद होना
रंग का टोपी
झंडा मफलर
और कपड़ा होना

एक नटखट
परी सोच का
बेकाबू बदरंग
जवान होना
रंग जीवन
के लिये
या जीवन
रंग के लिये
हो सके तो
तुम्हीं पूछ लेना
समझ में आ जाये
कभी कुछ इसी तरह
‘उलूक’

रंग को समझना
अगर कुछ भी
तो कुछ रंगों को
मुझे भी एक बार
फिर से समझा देना ।

चित्र साभार:
background-pictures.picphotos.net

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

आठ सौंवा पन्ना ‘उलूक’ का बालिकाओं को समर्पित आज उनके अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर

छोटे छोटे फूल
रंग बिरंगे और
कोमल भी
बिखेरते हुऐ
खुश्बू रंग
और खुशियाँ
चारों तरफ
दिखता है
हर किसी को
अपने आस
एक इंद्रधनुष
पहुँचते ही
इस दुनियाँ में
किसे अच्छा
नहीं लगता
कोमल अहसास
अपने पास
जिंदगी की दौड़
शुरु होते
बिना पैरों के
‘ठुमुक चलत
राम चंद्र बाजत
पैजनियाँ’
फिर यही
अहसास
बन जाते हैं
सतरंगी धागे
कलाई के
चारों ओर फिर
एक और
इंद्रधनुषी
छटा बिखेरते हुऐ
सृष्टि अधूरी
होगी समझ में
भी आता है
अनजाने से
किसी पल में
बचपन से लेकर
घर छोड़ते
नमी के साथ
और लौटते
खुशी के पलों में
हमेशा बहुत जल्दी
बढ़ी होती उँचाई
के साथ झिझक
जरूरी नहीं रही
बदलते समय के
साथ मजबूत
किया है इरादों को
सिक्के के दोनो
पहलू भी जरूरी हैं
और उन दोनो का
बराबर चमकीला
और मजबूत होना भी
आज का दिन
रोज के दिन में
बदले सभी दिन
साल के तुम्हारे
यही दुआ है
अपने लिये
क्योंकि खुद की ही
आने वाली पीढ़ियों
की सीड़ियों का
बहुत मजबूत होना
बहुत जरूरी है ।

 चित्र साभार: http://retroclipart.co

सोमवार, 5 मई 2014

चमक से बच चश्मा काला चाहे पड़ौसी से उधार माँग कर पास में रख

काँच के रंगीन
महीन टुकड़े
दिख रहे हैं
रोशनी को
बिखेरते हुऐ
चारों तरफ
इंद्रधनुष
बन रहे
हों जैसे
हर किसी
के लिये
अपने अपने
अलग अलग
टुकड़ा टुकड़ा
लालच का
लपकने के लिये
बिखर कर
फैल रही
चमक और रंगीन
रोशनी में थोड़ी देर
के लिये सही
आनंद तो है
हमेशा के लिये
मुट्ठी में बंद
कर लेने के लिये
आकर्षित कर रहे हैं
हीरे जैसे काँच
ये जानते बूझते हुऐ
रोशनी छिर जायेगी
उँगलियों के पोरों से
अंधेरे को छोड़ते हुऐ
हथेली के बीचों बीच
काँच के टुकड़े
घालय करेंगे
कुछ नाजुक पैर
रास्ते के बीच में
रहते हुऐ भी
हथेली में रख लेना
बिना भींचे उनको
महसूस नहीं
किया जायेगा
उनका स्पर्श
रिसना ही है
दो एक बूंद
लाल रँग
अंधेरी हथेली
के बीच से
अपनी तृष्णा
को साझा
कर लेने
का रिवाज
ही नहीं हो
जिस जगह
कोयले के
अथाह ढेर पर
बैठे अब
किसी और ने
बाँसुरी बजानी
शुरु कर दी है
हीरे पहले
कभी नहीं बने
अब बनेंगे
कोयले बता रहे हैं
ऐसा कहीं किसी
अखबार में
छपा था
किसी पेज में
अंदर की तरफ
‘उलूक’ उड़ के
निकल लेना
रास्ते के ऊपर
से बच कर
तेरे लिये यही
सबसे बेहतर
एक रास्ता है ।

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