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गुरुवार, 23 जनवरी 2014

पता होता है फूटता है फिर भी जानबूझ कर हवा भरता है

पानी में बनते
रहते हैं बुलबुले
कब बनते हैं
कब उठते हैं
और कब
फूट जाते हैं
कोशिश करना
भी चाहता है
कोई छाँटना
एक बुलबुला
अपने लिये
मुश्किल में जैसे
फँस जाता है
जब तक नजर
में आता है एक
बहुत सारों को 

अगल बगल से
बन कर फूटता
हुआ देखता
रह जाता है
कुछ ही देर में
ही बुलबुलों से
ही जैसे सम्मोहित
हो जाता है
कब बुलबुलों के
बीच का ही एक
बुलबुला खुद
हो जाता है
समझ ही
नहीं पाता है
बुलबुलों को
कोमल अस्थाई
और अस्तित्वहीन
समझने की
कोशिश में ये
भूल जाता है 

बुलबुला एक 
क्षण में ही
फूटते फूटते
अपनी पहचान
बना जाता है
एक फूटा नहीं
जैसे हजार पैदा
कर जाता है
ये और वो भी
इसी तरह
रोज ही फूटते हैं
रोज भरी
जाती है हवा
रोज उड़ने की
कोशिश करते हैं
अपने उड़ने की छोड़
दूसरे की उड़ान से
उलझ जाते हैं
इस जद्दोजहद में
कितने बुलबुले
फोड़ते जाते हैं
बुलबुले पूरी जिंदगी
में लाखों बनते हैं
लाखों फूटते हैं
फिर भी बुलबुले
ही कहलाते हैं
ये और वो भी
एक बार नहीं
कई बार फूटते हैं
या फोड़ दिये जाते हैं
इच्छा आकाँक्षाओं की
हवा को जमा भी
नहीं कर पाते हैं
ना वो हो पाते हैं
ना ये हो पाते हैं
हवा भी यहीं
रह जाती है
बुलबुले बनते हैं
उड़ते भी हैं
फिर फूट जाते हैं
सब कुछ बहुत कुछ
साफ कह रहा होता है
सब सब कुछ
समझते हुऐ भी
नासमझ हो जाते हैं
फूटते ही हवा
भरने भराने के
जुगाड़ में लीन और
तल्लीन हो जाते हैं ।

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

किसने बोला कलियुग में रामराज्य नहीं है आता

बाघ बकरी कभी
खेला जाता था
अब नहीं
खेला जाता
बहुत सी जगह
ये देखा है जाता
बाघ बकरी की
मदद कर उसे
बाघ बनाने में
मदद करने है आता
जहाँ बाघ बकरी
की मदद कतिपय
कारणों से नहीं
है कर पाता
वहाँ खुद ही
शहर की मुर्गियों
से बकरियों के लिये
अपील करवाने की
गुहार भी है लगाता
बाघ जिन बकरियों
के साथ है रहता
उनको खाने की
इच्छा नहीं दिखाता
वो बाघ होता है
इतना गया गुजरा
भी नहीं होता
उसके पास इधर
उधर से भी खाने
के लिये बहुत
है आ जाता
बाघ की टीम
का हर सदस्य
बकरियों को
हमेशा ही है
ये समझाता
बाघ बस बकरियों
को बाघ बनाने के
लिये अपनी
जान है लगाता
जिस बकरी की
समझ में नहीं
आ पाती है बात
उसके हाथ से
बाघ बनने का
स्वर्णिम अवसर
है निकल जाता
बाघ बकरियों को
बाघ बनाने के
लिये ही तो
उनकी लाईन
है लगवाता
अपनी कुछ खास
बकरियों को ही
इसके लिये
मानीटर है बनाता
अब इतना कुछ
कर रहा होता है
अपने लिये भी
कुछ माहौल इससे
बनवा ले जाता
बकरियों का इसमें
कौन सा कुछ
है चला जाता
बकरियों की मैं मैं
का शोर जब
अखबार में उसकी
फोटो के साथ
छप है जाता
उसका कद थोड़ा
सा लम्बा इससे
अगर हो भी जाता
ये सब भी तो
बाघ बकरी के
खेल में आघे को
काम है आता
बाघ का ऎसा
आत्मविश्वास
कहानियों में भी
नजर नहीं आता
कौन कहता है
राम राज्य अब
कहीं यहा नहीं
पाया है जाता
बाघ बकरियों को
अपने साथ है
पानी तक पिलाता
बस कभी जब
महसूस करता है
बकरियों के लिये
कुछ नहीं कर पाता
शहर की मुर्गियों से
उनके लिये
झंडे है उठवाता
बकरियों के लिये
बन जाती है
ये एक बडी़ खबर
अखबार तो कायल
होता है बाघ का
उसे छींक भी आये
उसकी फोटो अपने
फ्रंट पेज में
है छपवाता
बकरियों पर आई
आफत का होने
जा रहा है समाधान
बाघ का बस
होना ही
बकरियों के साथ
काम के होने का
संकेत है हो जाता
बाघ बकरी कभी
खेला जाता था
अब नहीं है
खेला जाता ।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

इच्छा

कोई हमको
कभी क्यूं
नहीं बनाता
अपना दलाल
कब से कोशिश
कर रहे हैं
लग गये हैं
कई साल
क्या क्या
होना चाहिये
शक्ल में
कोई नहीं बताता
जिसको देखो
लाईन तोड़
हमसे आघे
निकल जाता
अटल जी के
लोगों ने
कभी नहीं दिया
हमें भाव
आदर्श दिखना
बोलना
शायद है
वहां का दांव
सोनिया के लोग
भी कन्नी
काट निकल
जाते हैं
अन्ना के जलूस
में नहीं
गये फिर भी
नहीं बुलाते हैं
हाथी मैडम के
पास जाने
के लिये
पैसे चाहिये
कालेज में
छोटे घोटाले
से इतना
कैसे बनाइये
हमारे दर्द
को जरा
अपना दर्द
कभी बनाइये
दलाली के
गुर हमें
भी कभी
सिखलाईये
बहुत इच्छा
है एक
नामी दलाल
बनने की
सफेद कुर्ता
पायजामा
सफेद टोपी
पहनने की ।

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