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शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

रोज सुनता है मेरे यहाँ की कभी अपने यहाँ की क्यों नहीं कहता है

क्या तुम्हारे यहाँ भी
वही सब हुआ होता है
जो जो जैसा जैसा
मेरे यहाँ रोज का
रोज हुआ होता है
लगता तो नहीं है
एक जैसा ही
हुआ होता होगा
मेरे यहाँ का हुआ हुआ
हो रहा और होने वाला जितना भी जो भी
पता हुआ होता है
शाम होने होने तक
शराब की तरह
कलम से निकल कर
पन्ने के गले के नीचे
उतर चुका होता है
नशा पन्ने को
हुआ होता है या
नहीं हुआ होता है
तुड़ा मुड़ा कागज
कमरे के किसी कोने
में बेजान बेसुद सा
जरूर पड़ा होता है
तुम्हारे यहाँ का हुआ
शायद मेरे यहाँ के हुऐ से
कुछ अलग हुआ होता है
उसके यहाँ का हुआ
वो अपने यहाँ पर
कह रहा होता है
इसके यहाँ का हुआ
ये अपने यहाँ पर
कह रहा होता है
उसका उसका जैसा
इसका इसका जैसा
मेरे यहाँ का मेरे
जैसा ही होता है
तेरे यहाँ कैसा
कैसा होता है तू तो
कहीं भी कभी भी
कुछ भी नहीं कहता है
कबीर ने कहा हो
या ना कहा हो पर
सबसे अच्छा तो
वही होता है ‘उलूक’
जो सबकी सुनता है
अपनी करता है और
कहीं भी अपने यहाँ के
हुऐ और होने वाले के
बारे में कुछ भी
नहीं कहता है ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

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