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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

नया सीख कर आ ना कहना कुछ नहीं बचा

बहुत से मदारी
ताजिंदगी एक
ही बंदर से
काम चलाते हैं
इसी लिये
जमाने की
दौड़ में बस
यूँ ही पिछड़ते
चले जाते हैं
मेरा मदारी
भी सुना है
अब समझदारी
कहीं से सीख
के आ रहा है
कहते सुना
मैने उसे अब
मेरे नाच में
मजा नहीं
आ रहा है
वो एक नये
बंदर को ट्रेनिंग
देने चुपचाप
कहीं कहीं
कभी कभी
आ जा रहा है
जंजीर और
रस्सियों को
करने वाला
वो दरकिनार है
जमाना कब से
वाई फाई का
हुआ जा रहा है
उसकी अक्ल में
अब ये बहुत
अच्छी तरह से
घुस पा रहा है
रस्सी से तो
एक समय में
एक ही बंदर
को नचाया
जा रहा है
बंदर भी दिख
जा रहा है
रस्सी को भी
वो छुपा नहीं
पा रहा है
पर ई-दुनियाँ में
देखिये कितना
मजा आ रहा है
सब कुछ
पर्दे के पीछे ही
चला जा रहा है
बंदर और मदारी
दोनो का
एक साथ दीदार
हुआ जा रहा है
लेकिन किसने
मदारी बदल दिया
और किसके पास
नया बंदर
आ रहा है
इसका अंदाज
कोई भी नहीं
लगा पा रहा है
इन सब के बीच
गौर करियेगा जरा
मेरा सीखा
सिखाया हुआ नाच
कितनी बेदर्दी से
डुबोया जा रहा है
दिमाग वालों को कम
देखने वालों को
ज्यादा बारीकी से
ये सब समझ में
आ जा रहा है ।

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