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मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

भाई फिर तेरी याद आई

गधे ने किसी
गधे को गधा
कह कर आज
तक नहीं बुलाया
आदमी कौन से
सुर्खाब के पर 

अपने लगा
कर है आया
बता दे कुछ
जरा सा भी
किसी धोबी के
दुख: को थोड़ा
सा भी वो कम
कभी हो कर पाया
किस अधिकार से
जिसको भी चाहे
गधा कहता हुआ
चलता है
चला
आज तक आया
गधों के झुंड
देखिये किस
शान से दौड़ते
जंगलों में
चले जाते हैं
बस अपनी
अपनी गधी
या बच्चों की
बात ही बस
नहीं सोच
पाते हैं
जान दे कर
जंगल के राजा
शेर की जान
तक बचाते हैं
बस घास को
भोजन के रूप
में ही  खाते हैं
घास की ढेरी
बना के कल
के लिये भी
नहीं वो बचाते हैं
सुधर जायें अब
लोग जो यूँ ही
गधे को बदनाम
किये जाते हैं
आदमी के कर्मों
क्यों अब तक
नहीं शर्माते हैं
गधा है कहने
की जगह अब
आदमी हो गया है
कहना शुरू क्यों
नहीं हो जाते हैं
गधे भी वाकई में
गधे ही रह जाते हैं
कोई आंदोलन
कोई सत्याग्रह
इस उत्पीड़न के
खिलाफ क्यों
नहीं चलाते हैं ।

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