http://blogsiteslist.com
उदगार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
उदगार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

कविता और छंद से ही कहना आये जरूरी नहीं है कुछ कहने के लिये जरूरी कुछ उदगार होते हैं

बहुत अच्छे होते हैं
समझदार होते हैं
किसी अपने
जैसे के लिये
वफादार होते हैं
ज्यादा के लिये नहीं
थोड़े थोड़े के लिये
अपनी सोच में
खंजर और
बात में लिये
तलवार होते हैं
सच्चे होते हैं
ना खुदा के होते हैं
ना भगवान के होते हैं
ना दीन के होते हैं
ना ईमान के होते हैं
बहुत बड़ी बात होती है
घर में एक नहीं भी हों
चोरों के सरदार के
साथ साथ चोरों के
परिवार के होते हैं
रोज सुबह के
अखबार के होते हैं
जबाँ से रसीले
होठों से गीले
गले मिलने को
किसी के भी
तलबगार होते हैं
पहचानता है
हर कोई समाज
के लिये एक
मील का पत्थर
एक सड़क
हवा में बिना
हवाई जहाज
उड़ने के लिये
भी तैय्यार होते हैं
गजब होते हैंं
कुछ लोग
उससे गजब
उनके आसपास
मक्खियों की तरह
किसी आस में
भिनाभिनाते
कुछ कुछ के
तलबगार होते हैं
 कहते हैं किसी
तरह लिखते हैं
किसी तरह
ना कवि होते हैं
ना कहानीकार होते हैं
ना ही किसी उम्मीद
और ना किसी सम्मान
के तलबगार होते हैं
उलूक तेरे जैसे
देखने तेरे जैसे सोचने
तेरा जैसे कहने वाले
लोग और आदमी
तो वैसे भी नहीं
कहे जाने चाहिये
संक्रमित होते हैं
बस बीमार और
बहुत ही
बीमार होते हैं ।

चित्र साभार: cliparts.co

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

आओ मित्र आह्वान करें तुम हम और सब ईसा का आज ध्यान करें

तुम्हारी शुद्ध आत्मा
से निकली भावनाओं
से मैं भी इत्तेफाक
रखता हूँ इसी कारण
तरह तरह के इत्र भी
अपने आस पास रखता हूँ
अच्छा है अगर चल गया
उद्गार किसी झूठ
को छिपाने के लिये
नहीं तो क्या बुरा है
कुछ इत्र छिड़क कर
चारों तरफ फैलाने में
वाकई आज का दिन
बहुत बड़ा दिन है
अवतरण होना है
ईसा को फिर से
एक बार यहां
आज ही के दिन
इस खबर की खबर
भी एक बड़ी खबर है
बड़ा दिन बड़ी आत्माऐं
बड़ी दीवार बड़ा चित्र
और कुछ बड़ी ही नहीं
बहुत बड़ी बातों को
सुनहरे फ्रेम में
मढ़ देने का दिन है
आप सर्व समावेशी
उदगारों की आवश्यकता
की बात करते हो
आज के जैसे दिनो
में ही तो उदगारों को
महिमा मण्डित कर
लेने का दिन है
साल भर के अंदर
कुछ कुछ दिनों के
अंतर में बहुत से
बड़े बड़े दिन
आते ही रहते हैं
मौके होते हैं यही
कुछ पल के ही सही
आत्ममंथन खुद का
करवाते ही रहते हैं
बहुत छोटी यादाश्त
हो चली हो जहाँ
दूसरे दिन से कहीं
आग लगाने को
माचिस खोजने को भी
हम जाते ही रहते हैं
फिर भी चलो
और कोई नहीं
तुम और मैं ही सही
उद्गारों को आत्मकेंद्रित
करें आज के दिन बस
उदगारों का व्यापार करें
सर्वज्ञ सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान
से प्रार्थना करें
अवतरित होकर
वो आज
सारी मानवजाति
का कल्याँण करें
फिर कल से कुछ
भूलें कुछ याद करें
शुरु हो जायें हम तुम
और सब फिर से
किसी दूसरे बड़े दिन के
आने का इंतजार करें ।

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

जिसके लिये लिखा हो उस तक संदेश जरूर पहुँच जाता है !

पता नहीं क्या क्या और
कितना कितना बदला है
कितना और बदलेगा
और क्या फिर हो जायेगा
सुना था कभी राम थे
सीता जी थी
और रावण भी था
बंदर तब भी
हुआ करते थे
आज भी हैं
ऐसी बहुत से
वाकयों से
वाकिफ होते होते
कहां से कहां आ गये
बस कुछ ही
दिन हुऐ हों जैसे
छोटे शहर में
छोटी सी बाजार
चाय की
दुकानों में जुटना
और बांट लेना बहुत कुछ
यूं ही बातों ही बातों में
आज जैसे
वही सब कुछ
एक पर्दे पर आ गया हो
बहुत कुछ है
कहीं किसी के
पास आग है
किसी के
पास पानी है
कोई
आँसुओं के सैलाब में
भी मुस्कुरा रहा है
कोई
जादू दिखा रहा है
कहीं
झगड़ा है
कहीं
समझौता है
दर्द खुशी
प्यार इजहार
क्या नहीं है
दिखाना बहुत
आसान होता है
इच्छा होनी चाहिये
कुछ ना कुछ
लिखा ही जाता है
अब चाय की वो दुकान
शायद यहाँ आ गयी है
हर एक पात्र
किसी ना किसी में
कहीं ना कहीं
नजर आता है
हर पात्र के पास
है कुछ ना कुछ
कहीं कम
कहीं कहीं तो बहुत कुछ
चाय तो अब
कभी नहीं दिखती
पर सूत्रधार
जरूर दिख जाता है
कहानी कविता
यात्रा घटना दुर्घटना
और पता नहीं क्या क्या
सब कुछ
ऐसे बटोर के ले आता है
जैसे महीन
झाड़ू से एक सुनार
अपने छटके हुऐ
सोने के चूरे को
जमा कर ले जाता है
एक बात को लिखना जहां
बहुत मुश्किल हो जाता है
धन्य हैं आप
कैसे इतना कुछ
आपसे इतनी
आसानी से हो जाता है
आप ही के
लिये हैं ये उदगार
मुझे पता है
आप को सब कुछ
यहां पता चल जाता है ।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...