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बुधवार, 30 सितंबर 2015

निराशा सोख ले जाते हैं कुछ लोग जाते जाते

आयेंगे
उजले दिन
जरुर आएँगे
उदासी दूर
कर खुशी
खींच लायेंगे
कहीं से भी
अभी नहीं
भी सही
कभी भी
अंधेरे समय के
उजली उम्मीदों
के कवि की
उम्मीदें
उसकी अपनी नहीं
निराशाओं से
घिरे हुओं के
लिये आशाओं की
उसकी अपनी
बैचेनी की नहीं
हर बैचेन की
बैचेनी की
निर्वात पैदा
ही नहीं होने
देती हैं
कुछ हवायें
फिजा से
कुछ इस तरह
से चल देती हैं
हौले से जगाते
हुऐ आत्मविश्वास
भरोसा टूटता
नहीं है जरा भी
झूठ के अच्छे
समय के झाँसों
में आकर भी
कलम एक की
बंट जाती है
एक हाथ से
कई सारी
अनगिनत होकर
कई कई हाथों में
साथी होते नहीं
साथी दिखते नहीं
पर समझ में
आती है थोड़ी बहुत
किसी के साथ
चलने की बात
साथी को
पुकारते हुऐ
मशालें बुझते
बुझते जलना
शुरु हो जाती हैं
जिंदगी हार जाती है
जैसा महसूस होने
से पहले लिखने
लगते हैं लोग
थोड़ा थोड़ा उम्मीदें
कागजों के कोने
से कुछ इधर
कुछ उधर
बहुत नजदीक
पर ना सही
दूर कहीं भी ।

चित्र साभार: www.clker.com

रविवार, 8 दिसंबर 2013

जरूरी जो होता है कहीं जरूर लिखा होता है

क्या ये जरूरी है
कि कोई महसूस करे
एक शाम की उदासी
और पूछ ही ले
बात ही बात में
शाम से कि वो
इतनी उदास क्यों है
क्या ये भी जरूरी है
कि वो अपने हिस्से की
रोशनी की बात कभी
अपने हिस्से के
अंधेरे से कर ही ले
यूं ही कहीं किसी
एक खास अंदाज से
शायद ये भी जरूरी नहीं
कर लेना दिन की धूप को
पकड़ कर अपनी मुट्ठी में
और बांट देना टुकड़े टुकड़े
फिर रात की
बिखरी चाँदनी को बुहारने
की कोशिश में देखना
अपनी खाली हथेली
में रखे हुऐ चंद
अधेरे के निशान
और खुद ही देखना
करीने से सजाने की
जद्दोजहद में कहीं
फटे कोने से निकला हुआ
खुद की जिंदगी का
एक छोटा सा कोना
कहाँ लिखा है
अपनी प्रायिकताओं से
खुद अपने आप जूझना
और अपने हिसाब से
तय करना
अपनी जरूरते
होती रहे शाम उदास
आज की भी और
कल की भी
बहुत कुछ होता है
करने और सोचेने
के लिये बताया हुआ
खाली इन बेकार की
बातों को ही क्यों है
रोज का रोज
कहीं ना कहीं
इसी तरह से नोचना !

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