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शनिवार, 27 जुलाई 2013

लिखने से कोई विद्वान नहीं होता है

सम्पादक जी
को देखते ही
साथ में किसी
जगह कहीं

मित्र से रहा
नहीं गया

कह बैठे
यूँ ही

भाई जी
ये भी
लिख रहे हैं
कुछ कुछ
आजकल

कुछ
कीजिये
इन पर
भी कृपा
कहीं
पीछे पीछे
के पृष्ठ पर
ही सही
थोड़ा सा
इनका कुछ
छापकर
क्या पता
किसी के
कुछ समझ में
भी आ जाये
ऎसे ही कभी
बड़ी ना सही
कोई छोटी
सी दुकान
लिखने पढ़ने
की इनकी
भी कहीं
किसी कोने
में एक
खुल जाये

मित्रवर की
इस बात पर
उमड़ आया
बहुत प्यार
मन ही मन
किया उनका
आभार

फिर मित्र को
समझाने के
लिये बताया

पत्रिका में
जो छपता है
वो तो
कविता
या लेख
होता है
विद्वानो
के द्वारा
विद्वानो
के लिये
लिखा हुआ
एक संकेत
होता है

आप मेरे को
वहाँ कहाँ
अड़ा रहे हो
शनील के
कपडे़ में
टाट का 
टल्ला क्यों
लगा रहे हो

मेरा लिखना
कभी भी
कविता या लेख
नहीं होता है
वो तो बस
मेरे द्वारा
अपने ही
आस पास
देखी
समझी गयी
कहानी का 
एक पेज
होता है
और
आस पास
इतना कुछ
होता है
जैसे खाद
बनाने के लिये
कूडे़ का एक
ढेर होता है
रोज अपने
पास इसलिये
लिखने के लिये
कुछ ना कुछ
जरूर होता है

यहाँ आ कर
लिख लेता हूँ
क्योंकि
यहाँ लिखने
के लिये ही
बस एक
विद्वान होना
जरूरी नहीं
होता है

खुद की
समझ में
भी नहीं
आती हैंं
कई बार
कई बात 
उसको भी
कह देने से
किसी को
कोई भी
कहाँ यहाँ
परहेज
होता है

विद्वान लोग
कुछ भी
नहीं लिख
देते हैं
'उलूक'
कुछ भी
लिख देता है
और उसका
कुछ मतलब
निकल ही
आये ये
जरूरी भी
नहीं होता है ।

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