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शुक्रवार, 30 जून 2017

बुरा हैड अच्छा टेल अच्छा हैड बुरा टेल अपने अपने सिक्कों के अपने अपने खेल

           
              चिट्ठाकार दिवस की शुभकामनाएं ।

आधा पूरा
हो चुके
साल के
अंतिम दिन

यानि ठीक
बीच में
ना इधर
ना उधर

सन्तुलन
बनाते हुऐ
कोशिश
जारी है

बात को
खींच तान
कर लम्बा
कर ले
जाने की
हमेशा
की तरह
आदतन

मानकर

अच्छी और
संतुलित सोच
के लोगों को
छेड़ने के लिये
बहुत जरूरी है

थोड़ी सी
हिम्मत कर
फैला देना
उस सोच को

जिसपर
निकल कर
आ जायें
उन बातों
के पर

जिनका
असलियत
से कभी
भी कोई
दूर दूर
तक का
नाता रिश्ता
नहीं हो

बस सोच
उड़ती हुई
दिखे

और
लोग दिखें

दूर
आसमान
में कहीं
अपनी नजरें
गढ़ाये हुऐ
अच्छी उड़ती
हुई इसी
चीज पर

बंद मुखौटों
के पीछे से
गरदन तक
भरी सही
सोच को
सामने लाने
के लिये ही
बहुत जरूरी है
गलत सोच के
मुद्दे सामने
ले कर आना
डुगडुगी बजाना
बेशर्मी के साथ

शरम का
लिहाज
करने वाले
कभी कभी
बमुश्किल
निकल कर
आते हैं खुले में
उलूक
सौ सुनारी
गलत बातों पर
अपनी अच्छी
सोच की
लुहारी चोट
मारने के लिये।

चित्र साभार:
http://raviratlami.blogspot.in/2017/06/blog-post_30.html

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

रात का गंजा दिन का अंधा ‘उलूक’ बस रायता फैला रखा है

बहुत कुछ
कहना है
कैसे
कहा जाये
नहीं कहा
जा सकता है

लिखना
सोच के
हिसाब से
किसने
कह दिया
सब कुछ
साफ साफ
सफेद लिखा
जा सकता है

सब दावा
करते हैं
सफेद झूठ
लिखते हैं

सच
लिखने वाले
शहीद हो
चुके हैं
कई जमाने
पहले
ये जरूर
कहा जा
सकता है

लिखने
लिखाने
के कोर्ट
पढ़े लिखे
वकील
परिपक्व
जज
होते होंगे
बस इतना
कहा जा
सकता है

सबको पता
होता है
सब ही
जानते है
सबकुछ
कुछ
कहते हैं
कुछ कुछ
पढ़ते हैं
कुछ
ज्यादा
टिप्पणी
नहीं देते हैं
कुछ
दे देते हैं
यूँ ही
देना है
करके कुछ
कुछ
अपने अपने
का रिश्ता
अपने अपने
का धंधा
लिखने
लिखाने
ने भी
बना रखा है

‘उलूक’
खींच
अपने बाल
किसी ने
रोका
कहाँ है
बस मगर
थोड़ा सा
हौले हौले

जोर से
खींचना
ठीक नहीं
गालियाँ
खायेंगे
गालियाँ
खाने वाले
कह कर
दिन की
अंधी एक
रात की
चिड़िया को
सरे आम
गंजा बना
रखा है।

चित्र साभार: Dreamstime.com

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

खुजली ‘उलूक’ की

युद्ध
हो रहा है

बिगुल
बज रहा है

सारे सिपाही
हो रहे हैं

अपने अपने
हथियारों
के साथ

सीमा पर
जा रहे हैं

देश के
अन्दर
की बात
हो रही है

कुछ ही
देश प्रेमी हैं
बता रहे हैं

बाकी सब
देश द्रोही हैं
देश द्रोहियों
से आह्वान
कर रहे है

देश प्रेमियों
को चुनने
को क्यों
नहीं आगे
आ रहे हैं

देश को
किसलिये
थोड़ा सा
भी नहीं
बचा रहे हैं

देश
द्रोहियों से
कह रहे है
थोड़ा सा
कुछ तो
शरमायें

कुछ
देश भक्त
गिड़गिड़ा
रहे हैं

फालतू में
कुछ
देश द्रोहियों
के चरण
पकड़े थे
पिछली बार

आज खुल
कर बता
रहे हैं

प्रायश्चित
कर रहे हैं

इस बार
वो भी
देशभक्तों
के साथ
आ रहे हैं
समझा रहे हैं

समझिये
देश भक्त
देशभक्ति
चुनाव और
लोगों की
सक्रियता

सभी कर
रहे हैं
कुछ
ना कुछ

देश के
लिये
शहीद
होने
जा रहे हैं

‘उलूक’
तेरे दिमाग
में भरे
हुऐ गोबर
के कीड़े

बहुत
ज्यादा
कुलबुला
रहे हैं


मत खोला
कर अपना
मुँह इस
तरह से

तेरे बारे में
बहुत से
लोग लगे हैं
समझाने में
बहुत से
लोगों को
बहुत कुछ

पता नहीं
इतना एक
उल्लू से
किसलिये
लोग
घबरा रहे हैं

कल किसे
पता है
कौन रहेगा
देश भक्तों
के साथ

किसे
मालूम है
कौन रहेगा
देश द्रोहियों
के साथ

कौन से
देश भक्त
अभी जा
रहे हैं
या
कुछ देर
के बाद
आ रहे हैं

जो अभी हैं
वो रहेंगे
जो नहीं हैं
वो क्या करेंगे

किसे पता है
किसे पड़ी है
अपनी अपनी
खुजली लोग
अपने आप
खुजला रहे हैं ?

चित्र साभार: ClipartFest

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

आदमी सोचते रहने से आदमी नहीं हुआ जाता है ‘उलूक’

एकदम
अचानक
अनायास
परिपक्व
हो जाते हैं
कुछ मासूम
चेहरे अपने
आस पास के

फूलों के
पौंधों को
गुलाब के
पेड़ में
बदलता
देखना

कुछ देर
के लिये
अचम्भित
जरूर
करता है

जिंदगी
रोज ही
सिखाती
है कुछ
ना कुछ

इतना कुछ
जितना याद
रह ही नहीं
सकता है

फिर कहीं
किसी एक
मोड़ पर
चुभता है
एक और
काँटा

निकाल कर
दूर करना
ही पड़ता है

खून की
एक लाल
बून्द डराती
नहीं है

पीड़ा काँटा
चुभने की
नहीं होती है

आभास
होता है
लगातार
सीखना
जरूरी
होता है

भेदना
शरीर को
हौले हौले
आदत डाल
लेने के लिये

रूह में
कभी करे
कोई घाव
भीतर से
पता चले
कोई रूह
बन कर
बैठ जाये
अन्दर
दीमक
हो जाये

उथले पानी
के शीशों
की
मरीचिकायें
धोखा देती 

ही हैं

आदमी
आदमी
ही है
अपनी
औकात
समझना
जरूरी है
'उलूक'

कल फिर
ठहरेगा
कुछ देर
के लिये
पानी

तालाब में
मिट्टी
बैठ लेगी
दिखने
लगेगें
चाँद तारे
सूरज
सभी
बारिश
होने तक ।

चित्र साभार: Free Clip art

बुधवार, 4 जनवरी 2017

कविता बकवास नहीं होती है बकवास को किसलिये कविता कहलवाना चाहता है

जैसे ही
सोचो
नये
किस्म
का कुछ
नया
करने की

कहीं
ना कहीं
कुछ ना
कुछ ऐसा
 हो जाता है
जो
ध्यान
भटकाता है
और
लिखना
लिखाना
शुरु करने
से पहले ही
कबाड़ हो
जाता है

बड़ी तमन्ना
होती है
कभी एक
कविता लिख
कर कवि
हो जाने की

लेकिन
बकवास
लिखने का
कोटा कभी
पूरा ही
नहीं हो
पाता है

हर साल
नये साल में
मन बनाया
जाता है

जिन्दे कवियों
की मरी हुई
कविताओं को
और
मरे हुऐ
कवियों की
जिंदा
कविताओं
को याद
किया जाता है

कविता
लिखना
और
कवि हो
जाना
इसका
उसका
फिर फिर
याद आना
शुरु हो
जाता है

कविता
पढ़
लेने वाले
कविता
समझ
लेने वाले
कविता
खरीद
और बेच
लेने वालों
से ज्यादा
कविता पर
टिप्प्णी कर
देने वालों के
चरण
पादुकाओं
की तरफ
ध्यान चला
जाता है

रहने दे
‘उलूक’
औकात में
रहना ही
ठीक
रहता है

औकात से
बाहर जा
कर के
फायदे उठा
ले जाना
सबको नहीं
आ पाता है

लिखता
चला चल
बकवास
अपने
हिसाब की

कितनी लिखी
क्या लिखी
गिनती करने
कोई कहीं से
नहीं आता है

मत
किया कर
कोशिश
मरी हुई
बकवास से
जीवित कविता
को निकाल
कर खड़ी
करने की

खड़ी लाशों
के अम्बार में
किस लिये
कुछ और
लाशें अपनी
खुद की
पैदा की हुई
जोड़ना
चाहता है ।

चित्र साभार: profilepicturepoems.com

बुधवार, 9 नवंबर 2016

जन्म दिन राज्य का मना भी या नहीं भी सोलह का फिर भी होते होते हो ही गया है

पन्द्रह पच्चीसी
का राजकुवँर
आज सौलहवीं
पादान पर आ
कर खड़ा
हो गया है

पैदा होने से
लेकर जवानी
की दहलीज पर
पहुँचते पहुँचते
क्या हुआ है
क्या नहीं हुआ है

बड़े घर से
अलग होकर
छोटे घर के
चूल्हे में क्या
क्या पका है
क्या कच्चा
रह गया है

जंगल हरे
भस्म हुऐ हैं
ऊपर कहीं
ऊँचाइयों के
धुआँ आकाश
में ही तो फैला
है दूर तक
खुद को खुद
ही आइने में
इस धुंध के
ढूँढना मुश्किल
भी हो गया है
तो क्या हो गया है

बारिश हुई भी है
एक मुद्दत के बाद
तकते तकते
बादलों को लेकिन
राख से लिपट कर
पानी नदी नालौं
का खारा हो गया है
तो कौन सा
रोना हो गया है

विपदा आपदा में
बचपन से जवानी
तक खेलता कूदता
दबता निकलता
पहाड़ों की मिट्टी
नदी नालों में
लाशों को
नीलाम
करता करता
बहुत ही
मजबूत
हो गया है

ये बहुत है
खाली मुट्ठी में
किसी को
सब कुछ होने
का अहसास
इतनी जल्दी
हो गया है

कपड़े जन्मदिन
के उपहार में
मिले उससे
उतारे भी उसने
किससे
क्या कुछ
कहने को
अब रह गया है

उसकी छोड़
कर गुलामी
बदनसीबी की
अब इसके
गुलाम हो लेने
का मौसम
भी हो गया है

जन्मदिन होते
ही हैं हर साल
सालों साल
हर किसी के
‘उलूक’
इस बार भी
होना था हुआ है

क्या गया
क्या मिला
पुराना इक
हिसाब अगले
साल तक के
लिये पुराने
इस साल के
साथ ही आज
फिर से दफन
हो गया है ।

चित्र साभार: Revolutionary GIS - WordPress.com

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

हत्यारे की जाति का डी एन ए निकाल कर लाने का एक चम्मच कटोरा आज तक कोई वैज्ञानिक क्यों नहीं ले कर आया

शहर के एक
नाले में मिला
एक कंकाल
बेकार हो गया
एक छोटी
सी ही बस
खबर बन पाया
किस जाति
का था खुद
बता ही
नहीं पाया
खुद मरा
या मारा गया
निकल कर
अभी कुछ
भी नहीं आया
किस जाति
के हत्यारे
के हाथों
मुक्ति पाया
हादसा था
या किसी ने
कुछ करवाया
समझ में
समझदारों के
जरा भी नहीं
आ पाया
बड़ी खबर
हो सकती थी
जाति जैसी
एक जरूरी
चीज हाथ में
लग सकती थी
हो नहीं पाया
लाश की जाति
और
हत्यारे की जाति
कितनी जरूरी है
जो आदमी है
वो अभी तक
नहीं समझ पाया
विज्ञान और
वैज्ञानिकों को
कोई क्यों नहीं
इतनी सी बात
समझा पाया
डी एन ए
एक आदमी
का निकाल कर
उसने कितना
बड़ा और बेकार
का लफ़ड़ा
है फैलाया
जाति का
डी एन ए
निकाल कर
लाने वाला
वैज्ञानिक
अभी तक
किसी भी
जाति का
लफ़ड़े को
सुलझाने
के लिये
आगे निकल
कर नहीं आया
‘उलूक’
कर कुछ नया
नोबेल तो
नहीं मिलेगा
देश भक्त
देश प्रेमी
लोग दे देंगे
जरूर
कुछ ना कुछ
हाथ में तेरे
बाद में मत
कहना
किसी से
इतनी सी
छोटी सी
बात को भी
नहीं बताया
समझाया ।

चित्र साभार: Clipart Kid

सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

कर कुछ उतारने की कोशिश तू भी कभी 'उलूक'

कोशिश
कर तो सही
उतारने की
सब कुछ
कभी
फिर दौड़ने
की भी
उसके बाद
दिन की
रोशनी में ही
बिना झिझक
जो सब
कर रहे हैं
क्यों नहीं
हो पा
रहा है
तुझसे
सोचने का
विषय है
तेरे लिये
उनके
लिये नहीं
जिन्होने
उतार
दिया है
सब कुछ
कभी का
सब कुछ
के लिये
हर
उतारा हुआ
उतारे हुए
के साथ
ही खड़ा
होता है
तू बस
देखता
ही रहता है
दोष
किसका है
उतार कर
तो देख
बस
एक बार
शीशे के
सामने
ही सही
अकेले में
समझ सकेगा
पहने हुऐ
होने के
नुकसान
जाति
उतारने
की बात
नहीं है
क्षेत्र
उतारने
की बात
नहीं है
धर्म
उतारने
की बात
नहीं है
कपड़े
उतारने
की बात
भी नहीं है
बात
उतरे हुए
को
सामने से
देख कर
ही समझ
में आती है
निरन्तरता
बनाये
रखने
के लिये
वैसे भी
बहुत
जरूरी है
कुछ ना
कुछ करते
चले जाना
समय के
साथ चलने
के लिये
समय
की तरह
समय पहने
तो
पहन लेना
समय उतारे
तो
उतार लेना
अच्छा है
सब को
सब की
सारी बातें
समझ में
आसानी से
नहीं आती हैं
वरना
आदमी
के बनाये
आदमी
के लिये
नियमों
के अन्दर
किसी को
आदमी
कह देने
के जुर्म में
कभी भी
अन्दर हो
सकता है
कोई भी
आदमी
आमने
सामने ही
पीठ करके
एक दूसरे
से
निपटने में
लगे हुऐ
सारे आदमी
अच्छी तरह
जानते हैं
उतारना
पहनना
पहनना
उतारना
तू भी
लगा रह
समेटने में
अपने
झड़ते हुए
परों को
फिर से
चिपकाने की
सोच लिये
‘उलूक’
जिसके पास
उतारने
के लिये
कुछ ना हो
उसे पहले
कुछ पहनना
ही पड़ता है
पंख ही सही
समय की
मार खा कर
गिरे हुए ।

चित्र साभार:
www.clipartpanda.com

शनिवार, 24 सितंबर 2016

तू भी कुछ फोड़ना सीख ‘उलूक’ धमाके करने लगा है कुछ भी फोड़ कर हर मुँगेरीलाल महान देश का

कुछ फोड़
कुछ मतलब
कुछ भी
फोड़ने में
कुछ लगता
भी नहीं है
नफे नुकसान
का कुछ
फोड़ लेने
के बाद
किसी ने
कुछ सोचना
भी नहीं है
फोड़ना कहीं
जोड़ा और
घटाया हुआ
दिखता भी
नहीं है
बेहिसाब
फूट रहा
हो जहाँ
कुछ भी
कहीं भी
कैसे भी
और
फोड़ रहा
हो हर कोई
अपनी औकात
के आभास से
धमाका बनाया
जा रहा हो
खरीदने बेचने
के हिसाब से
आज जब
इतना
आजाद है
आजादी
और
कुछ ना कुछ
फोड़ने की
हर किसी
में है बहुत
ज्यादा बेताबी
तू भी नाप
तू भी तौल
अपनी औकात
और
निकल बाहर
परवरिश
में खुद के
अन्दर पनपे
फालतू मूल्यों
के बन्धन
सारे खोल
और
फिर फोड़
कुछ तो फोड़
फोड़ेगा नहीं
तो धमाका
कैसे उगायेगा
धमाका नहीं
अगर होगा
बाजार में
क्या बेचने
को जायेगा
फोड़
कुछ भी
फोड़
किसी ने
नहीं देखनी
है आग
किसी ने
नहीं देखना
है धुआँ
बाकी करता
रह सारे
काम अपने
अपनी दिनचर्या
चाहे नोंच माँस
चाहे नोंच हड्डियाँ
चाहे जमा कर
चाहे सुखा
बूँद बूँद
इन्सानी खून
पर फोड़
कुछ फोड़
नहीं फोड़ेगा
अपने संस्कारी
उसूलों में
दब दबा
जायेगा
सौ पचास
साल बाद
देश द्रोही
या
गाँधी
की पात में
खड़ा कर
तुझे एक
अपराधी
घोषित कर
दिया जायेगा
इसलिये
बहुत जरूरी है
कुछ फोड़।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

बुधवार, 21 सितंबर 2016

‘उलूक’ वन्दे माता नमो जय ऊँ काफी है इससे ज्यादा कहाँ से चढ़ कर कूदना चाहता है

कहाँ कहाँ
और
कितना कितना
रफू करे
कोई बेशरम
और
करे भी
किसलिये
जब फैशन
गलती से
उधड़ गये को
छुपाने का नहीं
खुद बा खुद
जितना हो सके
उधाड़ कर
ज्यादा से ज्यादा
हो सके तो
सब कुछ
बेधड़क
दिखा ले
जाने का है

इसी बात पर
अर्ज किया है

कुछ ऐसा है कि
पुराने किसी दिन
लिखे कुछ को
आज दिखाने
का सही मौका है
उस समय मौका
अपने ही
मन्दिर का था
समय की
बलिहारी
होती है
जब वैसा ही
देश में
हो जाता है

दीमकें छोटी
दिखती हैं
पर फैलने में
वक्त नहीं लेती हैं

तो कद्रदानो सुनो

जिस दिन
एक बेशरम को
शरम के ऊपर
गद्दी डाल कर
बैठा ही
दिया जाता है
हर बेशरम को
उसकी आँखों से
उसका मसीहा
बहुत पास
नजर आता है
शरम के पेड़
होते हैं
या
नहीं होते हैं
किसे जानना
होता है
किसे चढ़ना
होता है
जर्रे जर्रे पर
उगे ठूँठों
पर ही जब
बैठा हुआ
एक बेशरम
नजर आता है

अब हिन्दू
 की बात हो
मुसलमान
की बात हो
कब्र की
बात हो
या
शमशान
की बात हो

अबे जमूरे
ये हिन्दू
मुसलमान
तक तो
सब ठीक था
ये कब्र और
शमशान
कहाँ से
आ गये
फकीरों की
बातों में


समझा करो
खिसक गया
हो कोई तो
फकीर याद
आना शुरु
हो जाता है

अब खालिस
मजाक हो
तो भी
ये सब हो
ही जाता है

अब क्या
कहे कोई
कैसे कहे
समझ
अपनी अपनी
सबकी
अपनी अपनी
औकात की

दीमक के
खोदे हुऐ के
ऊपर कूदे
पिस्सुओं से
अगर एक
बड़ा मकान
ढह जाता है

क्या सीन
होता है

सारा देश
जुमले फोड़ना
शुरु हो जाता है

‘उलूक’
तू खुजलाता रह
अपनी पूँछ

तुझे पता है
तेरी खुद की
औकात क्या है

ये क्या कम है
आता है
यहाँ की
दीवार पर
अपने भ्रम
जिसे सच
कहता है
चैप जाता है

छापता रह खबरें

कौन “होशियार”
 बेवकूफों के
अखबार में
छपी खबरों से
हिलाया जाता है ।

चित्र साभार: http://www.shutterstock.com/

सोमवार, 5 सितंबर 2016

अर्जुन को नहीं छाँट कर आये इस बार गुरु द्रोणाचार्य सुनो तो जरा सा फर्जी ‘उलूक’ की एक और फर्जी बात

जब
लगाये गये
गुरु कुछ
गुरु छाँटने
के काम पर
किसी गुरुकुल
के लिये
दो चार और
गुरुओं के साथ
एक ऐ श्रेणी के
गुरुकुल के
महागुरु
के द्वारा

पता चला
बाद में
अर्जुन पर नहीं
एकलव्य पर
रखकर
आ चुके हैं
गुरु अपना हाथ
विश्वास में लेकर
सारे गुरुओं की
समिति को
अपने साथ

अब जमाना
बदल रहा
हो जब
गुरु भी
बदल जाये
तो कौन सी
है इसमें
नयी बात

एक ही
अगर होता
तो कुछ
नहीं कहता
पर एक
अनार के
लिये सौ
बीमार हो
जाते हों जहाँ
वहाँ यही तो
है होना होता

समस्या बस
यही समझने
की बची
इस सब के बाद
एक लव्य ने
किसे दे दिया
होगा अँगूठा
अपना काट

फिर समझ
में आया
फर्जी गुरु
‘उलूक’ के
भी कुछ

कुछ कुछ
सब कुछ में
से देख कर
जब देख बैठा
एक सफेद
लिफाफा मोटा
भरा भरा
हर गुरु
के हाथ

वाह
एकलव्य
मान गये
तुझे भी
निभाया
तूने इतने
गुरुओं को
अँगूठा काटे
बिना अपना
किस तरह
एक साथ ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

'उलूक’ पहले अपना खुद का नामरद होना छिपाना सीख

सोच को सुला
फिर लिख ले
जितनी चाहे
लम्बी और
गहरी नींद

 सपने देख
मशालें देख
गाँव देख
लोग देख
गा सके
तो गा
नहीं गा सके
तो चिल्ला
क्राँति गीत

कहीं भी
किसी भी
गिरोह में
जा और देख
गिरोह में
शामिल करते
गिरोहबाजों
की कलाबाजियाँ
पैंतरेबाजियाँ
और कुछ
सीख

हरामखोरियों
की
हरामखोरियाँ
ही सही
सीख

देश राज्य
जिला शहर
मोहल्ले की
जगह अपनी
जगह पर
अपनी जमीन
खुद के नीचे
बचाने
की कला
सीख

कोशिश कर
उतारने की
सब कुछ
कोशिश कर
दौड़ने की
दिन की
रोशनी में
नंगा होकर
बिना झिझक
जिंदा रहने
के लिये
बहुत
जरूरी है
सीख

किसी
भी चोर
को गाँधी
बनाना
और
गाँधी को
चोर बनाना
सीख

इन्सान
की मौत
पर बहा
घड़ियाली
आँसू

कुछ
थोड़ा सा
आदमी का
खून पी
जाना भी
सीख

सब जानते हैं
सब को पता है
सब कुछ बहुत
साफ साफ
सारे ऐसे
मरदों को
रहने दे

‘उलूक’
ये सब
दुनियादारी है
रहेगी हमेशा
पहले अपना
खुद का
नामरद होना
छिपाना
सीख ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

बुधवार, 11 मई 2016

किसे पड़ी है तेरे किसी दिन कुछ नहीं कहने की उलूक कुछ कहने के लिये एक चेहरा होना जरूरी होता है

लिखा हुआ हो
कहीं पर भी हो
कुछ भी हो

देख कर उसे
पढ़ना और
समझना

हमेशा जरूरी
नहीं होता है

कुछ कुछ
खराब हो चुकी
आँखों को
खुली रख कर
जोर लगा कर
साफ साफ
देखने की
कोशिश करना

कुछ दिखना
कुछ नहीं दिखना
फिर दिखा दिखा
सब दिख गया कहना

कहने सुनने सुनाने
तक ही ठीक होता है

सुना गया सब कुछ
कितना सही होता है
सुनाई देने के बाद
सोचना जरूरी
नहीं होता है 


रोजाना कान की
सफाई करना
ज्यादातर लोगों
की आदत में
वैसे भी शामिल
नहीं होता है

लिखने लिखाने
से कुछ होना है
या नहीं होना है

लिखने वाले
कौन है और
लिखे को पढ़ कर
लिखे पर सोचने
लिखे पर कुछ
कहने वाले कौन हैं

या
किसने लिखा है
क्या लिखा है

लिख दिया है
बताने वाले
लोगों को
सारा लिखा
पता होना
जरूरी
नहीं होता है

लेखक लेखिका
का पोस्टर
लगा कर
दुकान खोल
लेने से
किताबें बिकना
शुरु होती भी हैं

तब भी
हर दुकान
का रजिस्ट्रेशन
लेखक के नाम से
हर जगह होना
होता है
या
नहीं होता है
किसे पता होता है

लिखने
लिखाने वाला

लिखने की
दुकान के
शटर खोलने की
आवाज के
साथ उठता है
शटर गिराने की
आवाज के
साथ सोता है

कौन जानता है
ऐसा भी होता है
या नहीं होता है

अपनी अपनी
किताबें संभाले
हुए लोगों को
आदत पड़
चुकी होती है

अपना लिखा
अपने आप
पढ़नें की

खुद समझ कर
खुद को खुदी
समझा ले जाना
खुदा भी समझ
पाया है या नहीं
खुदा ही जानता है
सब को पता हो
ये भी जरूरी
नहीं होता है

किसी के कुछ
लिखे को नकार
देने की हिम्मत
सभी में
नहीं होती है

पूछने वाले
पढ़ते हैं
या नहीं
पता नहीं
भी होता है

प्रश्न करना
इतना जरूरी
नहीं होता है

लिखना कुछ भी
कहीं भी कभी भी
इतना जरूरी होता है ?

दुनियाँ चलती है
चलती रहेगी
हर आदमी खरीफ
की फसल हो
जरूरी कहीं
थोड़ा सा होता है
कहीं जरा सा
भी नहीं होता है

फारिग हो कर
आया हर कोई
कहे जरूरी है
जमाने के
हिसाब से
खेत में जाना
इस जमाने में
अब जरूरी नहीं
थोड़ा नहीं 

बहुत ही
खतरनाक 

होता है

सफेद पन्ना 

दिखाने
के लिये 

रख 
काफी है
‘उलूक’
लिखा 

लिखाया
काला 

सब
सफेद 

होता है ।

 चित्र साभार: www.pinterest.com

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

आदत है उलूक की मुँह के अंदर कुछ और रख बाहर कुछ और फैलाने की



चर्चा है कुछ है
कुछ लिखने की है
कुछ लिखाने की है
टूटे बिखरे पुराने
बेमतलब शब्दों
की जोड़ तोड़ से
खुले पन्नों की
किताबों की 
एक दुकान को
सजाने की है
शिकायत है
और बहुत है
कुछ में से भी
कुछ भी नहीं
समझा कर
बस बेवकूफ
बनाने की है
थोड़ा सा कुछ
समझ में आने
लायक जैसे को भी
घुमा फिरा कर
सारा कुछ लपेट
कर ले जाने की है
चर्चा है गरम है
असली खबर के
कहीं भी नहीं
आने की है
आदमी की बातें हैं
कुछ इधर की हैं
कुछ उधर की हैं
कम नहीं हैं
कम की नहीं हैं
बहुत हैं बहुत की हैं
मगर आदमी के लिये
उनको नहीं
बना पाने की है
कहानियाँ हैं लेकिन
बेफजूल की हैं
कुछ नहीं पर भी
कुछ भी कहीं पर भी
लिख लिख कर
रायता फैलाने की है
एक बेचारे सीधे साधे
उल्लू का फायदा
उठा कर हर तरफ
चारों ओर उलूकपना
फैला चुपचाप झाड़ियों
से निकल कर
साफ सुथरी सुनसान
चौड़ी सड़क पर आ कर
डेढ़ पसली फुला
सीना छत्तीस
इंची बनाने की है
चर्चा है अपने
आस पास के
लिये अंधा हो
पड़ोसी  के लिये
सी सी टी वी
कैमरा बन
रामायण गीता
महाभारत
लिख लिखा
कर मोहल्ला रत्न
पा लेने के जुगाड़ में
लग जाने की है
कुछ भी है सब के
बस की नहीं है
बात गधों के
अस्तबल में रह
दुलत्ती झेलते हुए
झंडा हाथ में
मजबूती से
थाम कर जयकारे
के साथ चुल्लू
भर में डूब
बिना तैरे तर
जाने की है
मत कहना नहीं
पड़ा कुछ
भी पल्ले में
पुरानी आदत
है
उलूक की
बात मुँह के अंदर
कुछ और रख
बाहर कुछ और
फैलाने की है ।

चित्र साभार:
www.mkgandhi.org

शनिवार, 5 सितंबर 2015

‘उलूक’ व्यस्त है आज बहुत एक सपने के अंदर एक सपना बना रहा है

काला चश्मा
लगा कर
सपने में अपने
आज बहुत ज्यादा
इतरा रहा है

शिक्षक दिवस
की छुट्टी है
खुली मौज
मना रहा है

कुछ कुछ 

खुद समझ
रहा है
कुछ कुछ
खुद को
समझा रहा है

समझने
के लिये
अपना गणित
खुद अपना
हिसाब किताब
लगा रहा है

सपने देख
रहा है
देखिये जरा
क्या क्या
देख पा रहा है

सरकारी
आदेशों की
भाषाओं को
तोड़ मरोड़
कर सरकार
को ही आईना
दिखा रहा है

कुछ शिष्यों
की इस
दल में भर्ती
कुछ को
उस दल में
भरती
करा रहा है

बाकी बचे
खुचों को
वामपंथी
बन जाने
का पाठ
पढ़ा रहा है

अपनी कुर्सी
गद्दीदार
बनवाने की
सीड़ी नई
बना रहा है

ऊपर चढ़ने
के लिये
ऊपर देने
के लिये
गैर लेखा
परीक्षा राशि
ठिकाने
लगा रहा है

रोज इधर
से उधर
रोज उधर
से इधर
आने जाने
के लिये
चिट्ठियाँ
लिखवा रहा है

डाक टिकट
बचा दिखा
पूरी टैक्सी
का
टी ऐ डी ऐ
बनवा रहा है

सरकारी
दुकान
के अंदर
अपनी
प्राईवेट दुकान
धड़ल्ले से
चला रहा है

किराया
अपने मित्रों
के साथ
मिल बांट कर
खुल्ले आम
आम खा रहा है

पढ़ने पढा‌ने
का मौसम
तो आ ही
नहीं पा रहा है

मौसम विभाग
की खबर है
कुछ ऐसा
फैलाया
जा रहा है

कक्षा में
जाकर
खड़े होना
शान के खिलाफ
हो जा रहा है

परीक्षा
साल भर
करवाने का
काम ऊपर
का काम
हो जा रहा है

इसी बहाने से
तू इधर आ
मैं उधर आऊँ
गिरोह
बना रहा है

कापी जाँचने
का कमप्यूटर
जैसा होना
चाह रहा है

हजारों हजारों
चुटकी में
मिनटों में
निपटा रहा है

सूचना देने में
कतई भी
नहीं घबरा
रहा है

इस पर
उसकी
उस पर
इसकी दे
जा रहा है

आर टी आई
अपनी मखौल
खुद उड़ा रहा है

शोध करने
करवाने का
ईनाम
मंगवा रहा है

यू जी सी
के ठेंगे से
ठेंगा मिला
रहा है

सातवें
वेतन आयोग
के आने
के दिन
गिनता
जा रहा है

पैंसठ की
सत्तर हो जाये
अवकाश की उम्र

गणेश जी
को पाव
लड्डू
खिला रहा है

किसे फुरसत है
शिक्षक दिवस
मनाने की
पुराना
राधाकृष्णन
सोचने वाला
घर पर
मना रहा है

‘उलूक’
व्यस्त है
सपने में अपने
उससे आज
बाहर ही
नहीं आ
पा रहा है

कृष्ण जी
की कौन
सोचे ऐसे में
जन्माष्टमी
मनाने के लिये
शहर भर के
कबूतरों से
कह जा रहा है

सपने में
एक सपना
देख देख
खुद ही
निहाल हुऐ
जा रहा है

उलूक उवाच है
किसे मतलब है
कहने में क्या
जा रहा है ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

रविवार, 23 अगस्त 2015

कहते कहते ही कैसे होते हैं कभी थोड़ी देर से भी होते हैं

तुम तो पीछे ही
पड़ गये दिनों के
दिन तो दिन होते हैं
अच्छे और बुरे
नहीं होते हैं
अच्छी और बुरी
तो सोच होती है
उसी में कुछ ना कुछ
कहीं ना कहीं
कोई लोच होती है
सब की समझ में
सब कुछ अच्छी
तरह आ जाये
ऐसा भी नहीं होता है
आधी दुनियाँ में
उधर रात होने
से नहीं होती है
इधर की दुनियाँ
में दिन होने से
रात नहीं होती है
किसी से
नाँच ना जाने
आँगन टेढ़ा कहना
भी बहुत अच्छी
बात नहीं होती है
पहले ही पूछ लेने
की आदत ही सबसे
अच्छी एक आदत होती है
जो हमेशा भले लोगों
की हर भली बात
के साथ होती है
लंगड़ा कर यूँ ही
शौक से नहीं चलना
चाहता है कोई भी
कभी भी सोच में
नहीं होती है
दायें या बाँयें पाँव
में से किसी एक में कहीं
थोड़ी बहुत मोच होती है
अच्छा अगर नहीं
दिख रहा होता है
सामने से कहीं
कहीं ना कहीं
रास्ते में होती है
अच्छे की गाड़ी
और थोड़ा सा लेट
हो रही होती है
दिन तो दिन होते हैं
अच्छे और बुरे
नहीं होते हैं
किस्मत भी होती है
भेंट नहीं हो पा
रही होती है
वैसे भी सबके
एक साथ
नहीं होते हैं
जिसके हो चुके
होते है 'उलूक'
उसके अगली बार
तक तो होने
भी नहीं होते हैं ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

‘उलूक’ की फटी म्यान और जंग खायी हुई तलवार

चाँद तारे
आसमान
सूरज पेड़
पौंधे भगवान
जानवर पालतू
और आवारा
सब के अपने
अपने काम
बस आदमी
एक बेचारा
अपने काम
तो अपने काम
ऊपर से देखने
की आदत
दूसरे की बहती
नाक और जुखाम
कुछ के भाव कम
कुछ के भाव ज्यादा
कुछ अकेले अकेले
कुछ बाँट लेंगे
आधा आधा
कुछ मौज में
खुद ही बने हुऐ
मर्जी से प्यादा
कुछ बिसात
से बाहर भी
बिना काम
किस का फायदा
किसका नुकसान
अपनी अपनी
किस्मत अपना
अपना भाग्य
किताबें पढ़ पढ़
कर भी चढ़े
माथे पर दुर्भाग्य
इसकी बात
उसकी समझ
उसकी बात
उलट पलट
‘उलूक’ की आँखें
‘उलूक’ की समझ
‘उलूक’ की खबर
‘उलूक’ का अखबार
रहने दे छोड़
भी दे पढ़ना
भी अब यार
कुछ बेतार
कुछ बेकार ।

चित्र साभार: openclipart.org

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

सारे पढे‌ लिखे लिखते हैं कविता और कवि भी होते हैं

टेढ़ा मेढ़ा
लिखा हुआ
हो कहीं पर
जिसका कोई
मतलब नहीं
निकल रहा हो


जरूरी नहीं
होता है
कि वो एक
कवि का
लिखा हुआ
लिखा हो

जिसे कविता
कहना शुरु
कर दिया
जाये और
तुरन्त ही
कुछ लोग
दूसरे लिखने
पढ़ने वाले
करने लगें
चीर फाड़

जैसे गलत
तरीके
से मर गये
या
मार दिये
गये जानवर
या
आदमी को
खोल कर
देखा जाता है
मरने के बाद

जिसे कहा
जाता है
हिंदी में
शव परीक्षा

इसलिये यहाँ
पोस्ट मोर्टम
कहना उचित
प्रतीत होता है

चलन में है
और
पढ़ा लिखा
वैसे भी
हिंदी में
कहे गये को
कम ही
समझता है

अब ‘उलूक’
क्या जाने
ये भी कवि है
और
वो भी कवि है

सब कविता
लिखते हैं
अपनी अपनी
इसमें दोष
किसका है

उसका
जो कवि है
या उसका
जिसको
आदत है

वो मजबूरी
में किसी
रोज कुछ
ना कुछ
जो लिख
मारता है

कभी
कुत्ते पर
कभी
चूहे पर
और कभी
उसी तरह के
किसी
जानवर पर
जिसके
नसीब में
कुर्सी लिखी
होती है

लेकिन इन
सब में
एक बात
अटल सत्य है

टेढ़ा मेढ़ा
लिखने वाला
गलती से
लिखना पढ़ना
सीख भी
गया हो
कभी झूठ
नहीं बोलता है

उससे
कभी नहीं
कहा जाता
है कि
उसका
किसी कवि
से ही
ना ही किसी
कविता से ही

भगवान
कसम
कहीं कोई
रिश्ता
होता है

सब कवि
होते हैं
जो कविता
करते हैं

सबसे बड़े
बेवकूफ
तो वही
होते हैं  ।

चित्र साभार: www.stmatthiaschool.org

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

‘उलूक’ उवाच पर काहे अपना सर खपाता है

किसी को कुछ
समझाने के लिये
कुछ नहीं
लिखा जाता है
हर कोई
समझदार होता है
जो आता है अपने
हिसाब से ही आता है
लिखे हुऐ पर अगर
बहुत थोड़ा सा ही
लिखा हुआ
नजर आता है
आने वाला
किसने कह दिया
कुछ लिखने लिखाने
के लिये ही आता है
इतनी बेशर्मी होना
भी तो अच्छी
बात नहीं होती है
नहीं लिखने पर
किसी के कुछ भी
नाराज नहीं
हुआ जाता है
तहजीब का देश है
पैरों के निशान
तो होते ही हैं
मिट्टी उठा कर
थोड़ी सी सर से
लगाया ही जाता है
कोयले का ही एक
प्रकार होता
है हीरा भी
कोयले से
कम से कम
नमस्कार तो
किया जाता है
‘उलूक’ मत
उठाया कर
ऐसे अजीब
से सवाल
जवाब देना
चाहे कोई
तो भी नहीं
दिया जाता है
ठेकेदारी करने
के भी
उसूल होते हैं
समझ लेना चहिये
लिखने लिखाने
के टेंडर
कहा होते हैं
कहाँ खोले
जाते हैं
हर बात
बताने वाला
एक मास्टर
ही हो ऐसा
जरूरी भी नहीं है
और माना
भी जाता है ।

चित्र साभार: www.mycutegraphics.com

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

‘उलूक’ क्या है? नहीं पढ़ने वाला भी अब जानने चला है

एक
ने नहीं
बहुतों ने
पूछना
शुरु कर
दिया है

बाकी सब
ठीक है

बहुत
सारे लोग
लिखते हैं
लिख रहे हैं
कुछ सार्थक
कुछ निर्रथक

तुम्हारे
बारे में
भी हो
रही है
चर्चा कई
जगहों पर

हमें भी
पता चला है

तुम्हारे
लिखने
लिखाने से
हमें कोई
मतलब नहीं है

कुछ ऐसा
वैसा ही
लिख रहे हो

आस पास
के किसी भी
जाने माने
स्थापित लेखकों
कवियों चर्चाकारों
की सूची में
तुम्हारा नाम
ढूँढ कर भी
नहीं मिला है

अच्छे
खासे तो थे
कुछ दिन पहले

कहीं
चुपचाप से
खड़े भी मिले थे

इधर ही
कुछ दिनों में
कौन सा
ऐसा आया
तूफानी
जलजला है

कुछ भी
कहीं नहीं
कहने वाला
कहीं भी
जा कर
कुछ भी
लिखने
लिखाने
को चला है

चलो
होता है
उम्र का
तकाजा भी है

कुछों को
छोड़ कर
सर और
दाड़ी का
लगभग
हर बाल भी
अब सफेद
हो चला है

वैसे
हमें कहना
कुछ नहीं है

बस
एक शंका
दूर करनी है

जानकारी
रहनी
भी चाहिये
अपने
परायों की
कितना
हौसला है

बस इतना
बता दो
तुम्हारे
लिखने
लिखाने
के साथ

हर जगह
जुड़ा ये
‘उलूक’
कौन सी
और
क्या बला है ?

चित्रसाभार: www.clipartpal.com

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