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सोमवार, 27 जनवरी 2014

क्यों तू लिखे हुऐ पर एक्सपायरी डाल कर नहीं जाता है

ऐसा कुछ भी नहीं है
जो लिखा जाता है
आदत पड़ जाये
किसी को तो क्या
किया जाता है
बहुत दिन तक
नहीं चलता है
लिखे हुऐ को
किसी ने नहीं
देखा कहीं
रेफ्रीजिरेटर में
रखा जाता है
दुबारा पलट कर
देखने वैसे भी तो
कोई नहीं आता है
एक बार भी आ गया
तब भी तो बहुत
गजब हो जाता है
बिकने वाला सामान
भी नहीं होता है
फिर भी पहले से ही
मन बना लिया जाता है
एक्स्पायरी एक दिन
की ही है बताना भी
जरूरी नहीं हो जाता है
दाल चावल बीन कर
हर कोई खाना चाहता है
कुछ होते है जिन्हें
बस कीड़ोँ को ही
गिनने में मजा आता है
रास्ते में ही लिखता
हुआ चलने वाला
मिट जाने के डर से भी
लौट नहीं पाता है
शब्द फिर भी
कुचला करते हैं
आसमान पढ़ते हुऐ
चलने वाला भी
उसी रास्ते से
आता जाता है
बड़ी बड़ी बातें
समझने वाले
और होते हैं
जिनके लिखने
लिखाने का हल्ला
कुछ लिखने से
बहुत पहले ही
हो जाता है
"कदर उल्लू
की उल्लू ही
जानता है 

चुगत हुमा को
क्या खाक
पहचानता है"
उलूक की
महफिल में
ऐसा ही एक शेर
किसी उल्लू के मुँह
से ही यूँ ही नहीं
फिसल जाता है ।

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