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गुरुवार, 12 जनवरी 2017

ताजी खबर है देश के एन जी ओ ऑडिट नहीं करवाते हैं

चोर सिपाही
खेल
खेलते खेलते
समझ में
आना शुरु
हो जाते हैं

चोर भी
सिपाही भी
थाना और
कोतवाल भी

समझ में
आ जाना
और
समझ में
आ जाने
का भ्रम
हो जाना
ये अलग
अलग
पहलू हैं

इस पर
अभी चलो
नहीं जाते हैं

मान लेते हैं
सरल बातें
सरल
होती हैं

सब ही
सारी बातें
खास कर
खेल
की बातें
खेलते
खेलते ही
बहुत अच्छी
तरह से
सीख ले
जाते हैं

खेलते
खेलते
सब ही
बड़े होते हैं
होते चले
जाते हैं

चोर
चोर ही
हो पाते हैं
सिपाही
थाने में ही
पाये जाते हैं

कोतवाल
कोतवाल
ही होता है

सैंया भये
कोतवाल
जैसे मुहावरे
भी चलते हैं
चलने भी
चाहिये

कोतवाल
लोगों के भी
घर होते हैं
बीबियाँ
होती हैं
जोरू का
गुलाम भी
बहुत से लोग
खुशी खुशी
होना चाहते हैं

पता नहीं
कहाँ से
कहाँ पहुँच
जाता है
‘उलूक’ भी
लिखते लिखते

सुनकर
एक
छोटी सी
सरकारी
खबर
कि
देश के
लाखों
एन जी ओ
सरकार का
पैसा लेकर
रफू चक्कर
हो जाते हैं

पता नहीं
लोग
परिपक्व
क्यों
नहीं हो
पाते हैं

समझ में
आना
चाहिये

बड़े
होते होते
खेल खेल में
चोर भी चोर
पकड़ना
सीख जाते हैं

ना थाने
जाते हैं
ना कोतवाल
को बुलाते हैं
सरकार से
शुरु होकर
सरकार के
हाथों
से लेकर
सरकार के
काम
करते करते
सरकारी
हो जाते हैं ।

चित्र साभार: Emaze

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

बंदर

बंदर अब जंगल में
नहीं पाये जाते हैं
पहाड़ के कस्बे में
कूड़े के ढेर पर
खाना ढूंढते हुऐ
देखे जाते हैं
बंदर देख रहा है
गाँव के घर को
टूटता हुवा
गाँव के लोगों को
मैदान की और
फूटता हुवा
बंदर को भी
आदमी का
व्यवहार अब
बहुत अच्छी
तरह आने लगा है
नकलची बंदर कोशिश
कर अपने को आदमी
ही बनाने लगा है
ऎसा ही होता रहा
तो वो दिन दूर नहीं
जब आप देखेंगे
बंदर सपरिवार
पहाड़ छोड़ देहरादून
को जाने लगा है
वैसे भी बंदर अब
बंदर नहीं रह गया है
प्राकृतिक भोजन और
रहन सहन के बिना
अब आदमी जैसा
ही हो गया है
बंदर के बच्चे
बच्चों की तरह प्यारे
कोमल दिखाई दिया
करते थे कभी
कूड़े के ढेर से शुरू
किया है पेट भरना
बंदर ने जब से
बच्चे भी हो गये हैं
उसके बूढे़ से रूखे
सूखे से तब से
आदमी का बच्चा
भी दिखने लगा
है जैसा अभी
बंदर जानता है
आदमी ने पहाड़
को बनाना नहीं है
जंगल को पनपाना
भी नहीं है
आदमी तो व्यस्त है
खबरे सिलने बनाने में
बंदर के उजड़ने की
खबर अखबार टी वी
पर दिखाने में
जंगल पर डाक्यूमेंटरी
बनवाने में
जानवरों के नाम पर
फंड उगवाने में
एन जी ओ चलाने में
बंदर ने भी छोड़ दिया
आदमी पर
करना विश्वास
जंगल को छोड़
बंदर चल दिया
लेकर एक नयी आस
बनाने मैदानी शहर में
एक आलीशान आशियाना
इससे पहले आदमी समझ
सके बंदर समझ चुका है
और बंदर को भी ना पडे़
कुछ भी अपनी तरफ से
फाल्तू में उसको समझाना।

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