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रविवार, 24 मई 2015

लिखते लिखते लिखने वाले की बीमारी पर भी लिख

दवा पर लिख
कुछ कभी
दारू पर लिख
दर्द पर लिख
रही है सारी दुनियाँ
तू भी लिख
कोई नहीं
रोक रहा है
पर कहीं कुछ
कभी कँगारू पर लिख
चाँद पर लिख
कुछ सितारों पर लिख
लिखने पर रोक लगे
तब तक कुछ
बेसहारों पर लिख
लिखने लिखाने पर
पूछना शुरु
करती है जनता
कभी कुछ समाधान
पर लिख कभी
आसमान पर लिख
करने वाले मिल जुल
कर निपटाते हैं
काम अपने हिसाब से
सिर के बाल
नोच ले अपने
उसके बाद चाहे
बाल उगाने की
कलाकारी पर लिख
हर कोई बेच
कर आता है
सड़क पर खुले
आम सब कुछ
तू भी तो बेच
कुछ कभी और
फिर बेचने वालों की
मक्कारी पर भी लिख
लिखना लिखाना ही
एक दवा है मरीजों
की तेरी तरह के
डर मत पूछने वालों से
कभी पूछने वालों की
रिश्तेदारी पर लिख
हरामखोरों की जमात
के साथ रहने का
मतलब ये नहीं
होता है जानम
लिखते लिखते कभी
कुछ अपनी भी
हरामखोरी पर लिख ।

चित्र साभार: www.colinsclipart.com

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